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'''क्षयोपशम-विशुद्धि-देशना प्रायोग्यतालब्धि में ३४ बंधापसरणस्थान'''

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क्षयोपशम-विशुद्धि-देशना प्रायोग्यतालब्धि में ३४ बंधापसरणस्थान

लेखिका - आर्यिका गरिमामती माताजी

अनादि अनंत इस संसार में प्रत्येक जीव सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के बिना परिभ्रमण कर रहा है। सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के बिना मोक्षमार्ग की शुरुआत नहीं होती है इसीलिए सम्यत्त्âव की प्राप्ति करना अत्यन्त आवश्यक है। सम्यग्दर्शन मोक्षमहल की प्रथम सीढ़ी है। बहिरात्मा को अन्तरात्मा बनाने के लिए सम्यग्दर्शन नींव है, क्योंकि जीव अन्तरात्मा बने बिना परमात्मा बन नहीं सकता इसीलिए सम्यक्त्व की प्राप्ति का पुरुषार्थ करना चाहिए। अनादि मिथ्यादृष्टि जीव सम्यक्त्व की प्राप्ति के पूर्व ५ लब्धियाँ प्रारम्भ करता है अर्थात् प्रथमोपशम सम्यक्त्व की प्राप्ति के पूर्व ५ लब्धियों का होना अनिवार्य है। पाँच लब्धियों का विशद वर्णन लब्धिसार ग्रन्थ में पाया जाता है अर्थात् मिलता है। सर्वप्रथम यह जानना जरूरी है कि लब्धिसार ग्रन्थ की रचना वैâसे और कहाँ से हुई। इस ग्रन्थ का मूलस्रोत कषायपाहुड़ ग्रन्थ है। विस्तार से समझने पर कषायपाहुड़ ग्रन्थ की रचना का मूलस्रोत दृष्टिवाद अंग के १४ पूर्व रूपभेदों में पाँचवे पूर्व के बारह वस्तु अधिकारों में २० प्राभृत हैं। उन २० प्राभृत में से तीसरा पेज्जोदोस पाहुड़ है अर्थात् तृतीय प्राभृत को अवलम्बन कर ही कषायपाहुड़ ग्रन्थ की रचना हुई है।

[सम्पादन] इस कषायपाहुड़ ग्रन्थ में १५ अधिकार हैं-

  1. पेज्जदोस विभक्ति
  2. स्थिति विभक्ति
  3. अनुभाग विभक्ति
  4. बन्धक
  5. संक्रम
  6. वेदक
  7. उपयोग
  8. चतुःस्थान
  9. व्यञ्जन सम्यक्त्व
  10. दर्शन मोहकी उपशामना
  11. दर्शन मोहकी क्षपणा
  12. देशविरति
  13. संयम
  14. चारित्र मोहकी उपशामना
  15. चारित्र मोहनीय की क्षपणा

इन पन्द्रह अधिकारों में मात्र मोहनीय कर्म सम्बन्धी कथन किया गया है। शेष सात कर्म सम्बन्धी कथन नहीं पाया जाता है । अपनी मुख्य बात तो यह है कि लब्धिसार-क्षपणासार ग्रन्थ की रचना पद्रन्ह अधिकार में से१० से लेकर १५ तक इन छह अधिकारों के र्चूिणसूत्र से श्री नेमिचंद्र-सिद्वान्त चक्रवर्ती ने की है। लब्धिसार ग्रन्थ में सम्यक्त्व उत्पत्ति के पूर्व होने वाली पाँच लब्धियां क्रम से -

  1. क्षयोपशम लब्धि
  2. विशुद्धि लब्धि
  3. देशना लब्धि
  4. प्रायोग्य लब्धि
  5. करण लब्धि


इन पाँच लब्धियों में से आदि की चार लब्धियाँ तो सामान्य हैं अर्थात् भव्य अभव्य दोनों को हो सकती हैं किन्तु अन्तकी करण लब्धि के होने पर प्रथमोपशम सम्यक्त्व-चारित्र अवश्य होता है। सारांश यह है कि प्रारम्भ की क्षयोपशम लब्धि, विशुद्धि लब्धि, देशना लब्धि और प्रायोग्य लब्धि अभव्य को भी प्राप्त हो जाती है किन्तु करण लब्धि के न होने पर सम्यक्त्वव की प्राप्ति संभव नहीं है, करण लब्धि के होने पर ही जो भव्य जीव हैं उनको सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है। सर्वप्रथम क्षयोपशम लब्धि की प्राप्ति होती है। क्षयोपशम लब्धि के प्राप्त हो जाने पर विशुद्धि लब्धि होती है विशुद्धि लब्धि के प्राप्त हो जाने पर देशना लब्धि की प्राप्ति होती है देशना लब्धि के प्राप्त हो जाने पर प्रायोग्य लब्धि की प्राप्ति होती है और प्रायोग्य लब्धि के प्राप्त हो जाने पर जो भव्य जीव मिथ्यात्व से सम्यक्त्व के अभिमुख होता है तब तीन करणपरिणाम स्वरूप करण लब्धि होती है। इससे यह समझना कि पूर्व-पूर्व की लब्धि आगे-आगे की लब्धि की प्राप्ति में (लाभ में) कारण रूप हैं। क्षयोपशम लब्धि-कर्मों के मलरूप जो अप्रशस्त ज्ञानावरणादि कर्मों की पटल समूह की शक्ति रूप जो अनुभाग है वह जिस काल में प्रतिसमय अनंतगुणा घटता अनुक्रम रूप अनंत एक भाग प्रमाण होकर क्रम से उदय में आता है तब उस समय में जो अनंत बहुभाग हानि होती है वह क्षयोपशम लब्धि है।

[सम्पादन] अनंत एक भाग और बहुभाग का स्पष्टीकरण-

जैसे- उदाहरण माना हुआ समस्त द्रव्य ६४०० माना हुआ अनन्त ४ समस्त द्रव्य में अनन्त का भाग देने पर जो लब्ध आता है वह एक भाग है और शेष बहुभाग है। समस्त द्रव्य/अनन्त•एकभाग। ६४००/४•१६०० एकभाग समस्त द्रव्य-एक भाग•बहुभाग ६४००-१६००•४८०० बहुभाग जैसे-प्रथम समय में ४८०० द्रव्य की शक्ति को नष्ट करता है। दूसरे समय में पुनः एक भाग मे अनन्त का भाग देकर बहुभाग कम करता है शेष एक भाग में पुनःअनंत का भाग देकर बहुभाग नष्ट करता है इसी प्रकार प्र्रतिसमय करता है। नोट-यहाँ समझने के लिए उदाहरण लिखा है। अनुभाग में फलदान देने की शक्ति समझना न कि द्रव्य। समझाने के लिए संख्या लिखी है।

[सम्पादन] क्षयोपशम लब्धि का स्वरूप -

प्रति समय क्रम से पूर्व संचित कर्मों के मलरूप पटल के अर्थात् अप्रशस्त (पाप)कर्मों के अनुभाग स्पर्धक (फलदान देने की शक्ति )जिस समय विशुद्वि के द्वारा अनन्त गुणा हीन होते हुए उदीरणा को प्राप्त होते हैं उस समय क्षयोपशम लब्धि का लाभ होता है अर्थात् क्षयोपशम लब्धि की प्राप्ति होती है।

[सम्पादन] विशुद्धि लब्धि का स्वरूप -

आदि अर्थात् प्रथम क्षयोपशम लब्धि प्राप्त होने पर साता आदि प्रशस्त(पुण्य)प्रकृतियों के बन्ध योग्य जो जीव के परिणाम हैं वह विशुद्वि लब्धि है। विशेष- प्रति समय अनन्त गुणित हीन क्रम से उदीरित अनुभाग-स्पर्धकों से उत्पन्न हुआ साता आदि शुभ कर्मों के बन्ध के कारणभूत धर्मानुराग रूप शुभ परिणाम और असाता आदि अशुभ कर्मों के बन्ध का विरोधी जो जीव का परिणाम है वह विशुद्धि (लब्धि) है अथवा उसकी प्राप्ति का नाम विशुद्धि लब्धि है२। परिणामों में संक्लेश घटने पर विशुद्धि बढती ही है।

देशना लब्धि का स्वरूप - छह द्रव्य और नव पदार्थ का उपदेश देने वाले आचार्य आदि का लाभ अथवा उपदेशित पदार्थों को धारण करने का लाभ तृतीय देशनालब्धि है। जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन छह द्रव्यों के और जीव,अजीव,आश्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पाप इन नौ पदार्थों के उपदिष्ट अर्थ के ग्रहण, धारण तथा विचारण की शक्ति के समागम को देशनालब्धि कहते हैं।३ दीर्घ अतीत काल में उपदेशित पदार्थ की धारणा का लाभ भी देशना लब्धि है। उपदेशक रहित नारकादि भवों में पूर्वभव में श्रुत धारित तत्वार्थ के संस्कार के बल से देशना लब्धि रूप कार्य होता है और वहाँ पर भी सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है।सारांश यह है कि किसी भी भव में देशनालब्धि की प्राप्ति आवश्यक है उसके बिना सम्यग्दर्शन की प्राप्ति संभव नहीं है।

[सम्पादन] प्रायोग्य लब्धि का स्वरूप -

कर्मों की स्थिति को अन्तः कोड़ा कोड़ी तथा अनुभाग को द्विस्थानगत करने रूप जो परिणाम होते हैं उसे प्रायोग्य लब्धि कहते हैं। विशेष खुलासा इस प्रकार है-क्षयोपशम लब्धि, विशुद्धि लब्धि, देशना लब्धि संयुक्त कोई जीव प्रति समय विशुद्धि से बढ़ता हुआ आयु कर्म के बिना शेष सात कर्मों की स्थिति को अंतः कोड़ा कोड़ी सागर मात्र अवशेष रखता है। इस प्रायोग्य लब्धि में इतनी विशुद्धि हो जाती है कि सात कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति को एक काण्डक घात के द्वारा छेदकर काण्डक द्रव्य को अवशिष्ट (शेष रही) अन्त कोड़ा-कोड़ी सागर स्थिति में निक्षिप्त करता है अर्थात् देता है। अन्त: कोड़ा कोड़ी सागर-अंतः अर्थात् अन्दर ।अतः जहाँ विवक्षित प्रमाण से कुछ कम हो उसकी अन्तः संज्ञा होती है। इसी तरह कोड़ा कोड़ी से नीचे तथा कोड़ी से ऊपर को अन्तःकोड़ा कोड़ी कहते हैं। अंत: कोड़ा कोड़ी सागर ऐसा कहने पर कोड़ा कोड़ी सागरोपम को संख्यात कोटियों से खंडित करने पर जो एक खण्ड़ होता है यह अन्तः कोड़ा कोड़ी सागर का अर्थ ग्रहण करना चाहिए। विशुद्वि के कारण प्रशस्त प्रकृतियों के अनुभाग का घात नहीं होता हैं।

[सम्पादन] स्थिति कांडक घात का विवरण -

विवक्षित स्थिति समूह का घात करना स्थिति काण्डक घात है। यह एक अन्तर्मुहूर्त काल में निष्पन्न होता है। विवक्षित कर्म की स्थिति में से ऊपर की कुछ स्थिति समूह के परमाणुओं में मिला देना तथा ऊपर की स्थिति में स्थित सकल कर्म द्रव्य का अभाव कर देना स्थिति काण्डक घात है। जितने काल में यह स्थिति घात का कार्य किया जाता है वह काल स्थितिकाण्डकोत्कीरण काल कहलाता है। जितनी स्थिति का घात करता है स्थिति काण्डक द्वारा वह स्थितिकाण्डकायाम कहलाता है। समझने के लिए स्थितिकाण्डक घात करने में अन्तर्मुहूर्त काल लगता है। अन्तर्मुहूर्त में निष्पद्यमान इस स्थिति काण्डक के प्रत्येक समय में जितना द्रव्य नीचे (अधस्तन स्थितियों में)देता है उसे फालि कहते है। इसका अर्थ यह हुआ कि अन्तर्मुहूर्त काल में जितने समय होते हैं उतनी फालि करता है क्रम से एक-एक फालि का घात करता है। जैसे मान लो अन्तर्मुहूर्त में १० समय हैं तो १० फालि करता है (यह विषय अपूर्वकरण परिणाम में आता है किन्तु समझने के लिए यहाँ पर लिखा है क्योंकि स्थितिकाण्डकघात का प्रकरण होने से)

[सम्पादन] स्थितिकाण्डक घात का चित्रण-

सात कर्मों की स्थिति को अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण करने का चित्रण ७० कोड़ाकोड़ी सागर ४० को़ड़ाको़ड़ी सा़गर


विशेष - सबसे बड़ा स्थिति काण्डक घात प्रायोग्य लब्धि में ही करता है किन्तु सम्यक्त्व की प्राप्ति में इसकी मुख्यता है अन्यथा सम्यक्त्व की प्राप्ति न होने पर निरर्थक है। क्योंकि यह स्थिति काण्डक घात भव्य और अभव्यों में समान रूप से होता है। सब कर्मों की स्थिति अन्त: कोड़ा-कोड़ी करता है फिर भी सब में अन्तर पाया जाता है।

अनुभाग का विवरण - कर्म आठ होते हैं। आठ कर्मों के घातिय अघातिया दो भेद हैं। घातिया कर्म अप्रशस्त ही है। घातिया कर्म चार होते हैं-१. ज्ञानावरण २. दर्शनावरण ३.मोहनीय ४.अन्तराय । अघातिया कर्म भी चार होते हैं- १.वेदनीय २.आयु ३.नाम ४.गोत्र । अघातिया कर्म प्रशस्त अप्रशस्त दो प्रकार के होते हैं। घातिया कर्म के अनुभाग चतुःस्थान-१.लता २.दारू ३.अस्थि ४.शैल। अघातिया कर्म के अप्रशस्त प्रकृतियों के अनुभाग चतुःस्थान-१.निम्ब २.कांजी ३.विष ४. हलाहल। अघातिया कर्म के प्रशस्त प्रकृतियों के अनुभाग चतुःस्थान-१.गुड़ २.खांड़ ३.शर्वरा ४.अमृत। अप्रशस्त प्रकृतियों के चतुः स्थानीय अनुभाग को घात करके द्विस्थानीय अनुभाग में स्थापन कर देता है अर्थात् देता है यह समझना। घातिया कर्मों की अप्रशस्त प्रकृतियों के अनुभाग को अनंत बहुभाग प्रमाण खंड करके अर्थात् कम करके उस द्रव्य को लता-दारू रूप द्विस्थान में निक्षिप्त करता है और अघातिया कर्मों की अप्रस्त प्रकृतियों के अनुभाग को निंब-कांजी रूप अवशिष्ट अनुभाग में निक्षिप्त करता है तब जीव के जो परिणाम होते हैं उसे प्रायोग्यता लब्धि जानना चाहिए। यह प्रायोग्यता लब्धि भव्य और अभव्यों में साधारण होती है अर्थात् दोनों के समान रूप से होती है। विशुद्वि से प्रशस्त प्रकृतियों का अनुभागखंड़न नहीं होता है। इन अवस्थाओं के होने पर करण अर्थात पंचम लब्धि (करण लब्धि)होने के योग्य भाव पाये जाते हैं। इतनी विशुद्वि भव्य अभव्य इन दोनों प्रकार जीवो के हो सकती है अनुभाग द्विस्थानीय करता है उसका सरल शब्दों में सारांश यह है कि अनुभाग अर्थात् फल देने की शक्ति को कम करता है। जैसे-शैल कठोर होता है उससे कम कठोर लता है इसीलिए विशुद्वि वश शैल अस्थि रूप कठोर अनुभाग को दारू-लता करता है। प्रत्येक निषक की अनुभाग शक्ति को कम करता है ऐसा समझना।


[सम्पादन] स्थिति बंध के योग्य परिणाम -

प्रथमोपशम सम्यक्तव के अभिमुख मिथ्यादृष्टि जीव विशुद्वि की वृद्वि बढ़ता हुआ प्रायोग्य लब्धि के प्रथम समय से आंरभ करके आयु कर्म को छोड़कर शेष सात कर्मो स्थिति बंध पूर्व स्थितिबंध के (७० कोड़ा कोड़ी सागर इत्याादि) संख्यातवें भाग मात्र अर्थात अन्तः कोटा कोटी सागर प्रमाण बांधना है करना है । भावार्थ यह है कि पूर्व की स्थिति को स्थिति काण्ड़क धात के द्वारा अन्तः कोड़ा कोड़ी करता है नवीन स्थिति बंध भी अन्तः कोड़ा कोड़ी करता है। प्रायोग्य लब्धि के समय होने वाले प्रकृति बंधापसरण का कथन-अन्तः कोड़ कोड़ी सागरोपम स्थिति बन्ध प्रांरभ होने के पश्चात् स्थिति बन्ध प्रांरभ होने के पश्चात् स्थिति बंध में सौ सागर पृथक्तव मात्र स्थिति को पुनःपुनःकम करने पर ३४ प्रकृति बंधायसरण स्थान होते हैं। यहाँ पृथक्तव शब्द का अर्थ सात आठ लिया है। अतः सौ सागरोपम पृथक्तव का अर्थ सात -आठ सौ सागरोपम लेना चाहिये । प्रायोग्यता लब्धि के प्रथम समय में आयु छोड़ कर सात कर्मों का स्थिति बन्ध एक साथ अन्तः कोड़ी कोड़ी सागरोपम प्रमाण होने लगता है। फिर एक-एक अन्तर्मुहूर्त में उसमें भी पल्यका संख्यातवा भाग हीन करके स्थिति बन्ध करना है एक बार स्थिति बंध कम होने पर अन्तर्मुहूर्त तक समान ही स्थिति बन्ध होता है उसे एक स्थिति बन्धापसरण कहते है इस प्रकार स्थिति बंध कम होते होते पूर्वोक्त अन्तः कोटा कोट सागर स्थिति में पल्य प्रमाण स्थिति बन्ध कम होता है। फिर पल्य के संख्यातवें भाग स्थिति के हानि क्रम से दो पल्य तीन पल्य पुनः एक सागरोपम,दो सागरोपम ऐसे कम होते सात-आठ सौ सागरोपम प्रमाण जब स्थिति बंध कम होता है तब नरकायु प्रकृति बन्ध से व्युच्छिन्न होती है अर्थात् यहाँ से आगे नरकायुका बन्ध नहीं होगा। फिर पूर्वोक्त विधि से सात-आठ सौ सागरोपम प्रमाण स्थिति बन्ध जब कम होता है तब तिर्यंचायु की बन्ध व्युच्छित्ति होती है यह दूसरा प्रकृति बन्धाकरणपसरण स्थान हैं। इस प्रकार प्रायोग्यता लब्धि काल में चौतीस प्रकृति बन्धापसरण होते है

विशेष -

प्रकृति बन्धापसरण - परिणामों की विशुद्वता से प्रकृति बन्ध का क्रम से घटना प्रकृति बन्धापसरण कहलाता है।

स्थिति बन्धापसरण - परिणामों की विशुद्वता से स्थिति बन्ध का क्रम से घटना स्थिति बन्घापसरण कहलाता है।

बन्धापसरण - नवीन बंध के कम होने को बंधापसरण कहते है

बंध - स्थितिबंध अथवा अपसरण का अर्थ है धटना।

प्रकृति बन्धापसरण - बंध में से एक-एक प्रकृति का कम होना अर्थात् प्रकृति का कम प्रमाण से बंध होने को प्रकृति बन्धापसरण कहते है।

स्थिति बन्धापसरण - अन्तः कोटी कोटी सागरोपम से घटने प्रमाण से स्थिति का बंध होकर पूर्व स्थिति बन्ध की अपेक्षा नवीन स्थिति बंध कम करके बांधता है उसे स्थिति बन्धापसरण कहते हैं।

अंक सदृष्टि से मानी हुई संख्या- प्रथम अंतः कोड़ा कोड़ी सागर स्थिति बंध १लाख (१०००००) पल्योपम का संख्यातवां भाग ५ वर्ष (५) पल्यका प्रमाण पचीस वर्ष २५ वर्ष सागरोपम का प्रमाण सौ वर्ष १०० वर्ष (अन्त मुर्हूर्त का प्रमाण) सागरोपम पृथक्तव का प्रमाण सात सो वर्ष ७०० वर्ष

स्थिति बंधापसरण व प्रकृति बंधापसरण का क्रम

दूसरा प्रकृति बंधापसरण ११२१से ११२४ ९८६०० ७००-८०० सागर कम
प्रथम प्रकृति बंधापसरण ५६१ से ५६४ ९९३०० ७००-८०० सागर कम
इकतालीसवां स्थितिबंधापसरण १६१ से १६४ ९९८०० २ सा कम
इकीसवां स्थिति बंधपसरण ८१ से ८४ ९९९०० १ सागर कम
ग्यारहवां स्थिति बंधापसरण ४१ से ४४ ९९९५० २ पल्य कम
छठ्ठा स्थिति बंधापसरण २१ से २४ ९९९७५ १ पल्य कम
तीसरा स्थिति बंधापसरण ९ से १२ ९९९९० पल्य का संख्यातवांभाग कम
दूसरा स्थिति बंधापसरण ५ से ८ ९९९९५ पल्य का संख्यातवाभाग कम
प्रथम स्थिति बंधापसरण १ से ४ १०००००वर्ष अन्त कोड़ी कोड़ी सागर

प्रायोग्य लब्धि के प्रथम १से ४ समय पर्यन्त १ लाख स्थिति बंध हुआ पाचवें समय से ५ वर्ष कम १ लाख अर्थात् ९९,९९५ स्थिति बंध हुआ ६,७ और ८ वें समय पर्यंन्त स्थिति बंध उतना ही होता है। इसको १ स्थिति बंधापसरण कहते है। पुनः नवमें समय से पूर्व स्थिति बंध से ५ वर्ष कम अर्थात् ९९९९० स्थिति बंध हुआ । इस प्रकार प्रत्येक ४ समय तक ५-५ वर्ष स्थिति बंध कम होते २५ वर्ष कम हुआ अर्थात् १ पल्य कम हुआ । पुनः ५-५ वर्ष कर्म होते ५० वर्ष कर्म हुआ। पुनः ५-५ वर्ष कम होते होते १०० वर्ष अर्थात् १ सागर कम स्थिति बंध हुआ । इस प्रकार स्थिति बन्ध कम-कम होते ७००वर्ष कम अर्थात् ९९३०० वर्ष स्थिति बंध हुआ तब प्रथम प्रकृति बंधापसरण हुआ अर्थात् १ नरकायु की बंधब्युच्छित हुई। इस प्रकार आगे भी जानना। इस प्रकार सात सौ सात सौ वर्ष अर्थात् सागररोपम पृथत्त्व कम स्थितिबंध होने पर १-१ प्रकृति बंधापसरण होता है। उप प्रकृति बंधापसरणों में ७००²३४•२३८०० वर्ष स्थिति बंध कम होता है इस प्रकार से वास्तविक गणित में भी समझना चाहिए।

३४ बन्धा पसरण स्थानों के नाम-

  1. नरकायु
  2. तिर्यग्गायु
  3. मनुष्यायु
  4. देवायु
  5. नरक गति-नरकगत्यानुपूर्वी
  6. सूक्ष्म-अपर्याप्त-साधारण - संयोग रूप संयोग रूप का अर्थ यह है कि तीनो को
  7. सूक्ष्म-अपर्याप्त-प्रत्येक मिलकर ले तो यहाँ पर्यंन्त ही बंध हो पृथक-पृथक
  8. बादर-अपर्याप्त-साधारण हो सकता है
  9. बादर-अपर्याप्त-प्रत्येक
  10. द्वीन्द्रिय जाति अपर्याप्तक
  11. त्रीन्द्रिय जाति अपर्याप्तक
  12. चतुरिन्द्रिय जाति अपर्याप्तक - संयोग रूप -
  13. असंज्ञी पंचेन्द्रिय जाति अपर्याप्तक
  14. संज्ञी पंचेन्द्रिय जाति अपर्याप्तक
  15. सूक्ष्म - पर्याप्त -साधारण
  16. सूक्ष्म - पर्याप्त - प्रत्येक
  17. बादर - पर्याप्त- साधारण
  18. बादर- पर्याप्त - प्रत्येक-एकेन्द्रिय-आतप-स्थावर - संयोग रूप
  19. द्वीन्द्रिय-पर्याप्त
  20. त्रीन्द्रिय- पर्याप्त
  21. चतुरिन्द्रिय-पर्याप्त
  22. असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त
  23. तिर्यंच गति -तिर्यग्गत्यानुपूर्वी-उधोत - संयोग रूप-
  24. नीच गोत्र
  25. अप्रशस्त विहायोगति-दुर्भग-दुःस्वर-अनादेय
  26. हुण्ड़क संस्थान - सृपाटिका संहनन
  27. नपुंसक वेद
  28. वामन-संस्थान-कीलित संहनन
  29. कुब्जक संस्थान-अर्धनाराच संहनन
  30. स्त्रीवेद
  31. स्वाति संस्थान -नाराच संहनन
  32. न्यग्रोध संस्थान -वङ्कानाराच
  33. मनुष्य गति- मनुष्य गत्यानुपूर्वी-औदारिक शरीर औदारिक आंगोपांग वङ्कावृषभनाराच संहनन
  34. अस्थिर-अशुभ-अयशस्कीर्ति-अरति-शोक-असाता वेदनीय


इस प्रकार चौतीसी ही बन्धपसरण स्थान भव्य और अभव्य दोनों में ही समान रूप से होते हैं। सर्वत्र प्रकृति बन्धापसरण स्थानों में सौ सागर पृथक्ता हानि से आयु कर्म के सिवाय सात कर्म के प्रकृति के स्थिति बन्ध का क्रम पूर्ववत् जानना चाहिए। इन चौतीस बन्धापसरणों में बतलाई गई कुछ प्रकृतियाँ अशुभतम हैं अतः इनकी बन्धव्युच्छिति विशुद्व को प्राप्त होने वाले भव्य औा अभव्य दोनों केहो जाती है। किन्तु करण-लब्धि भव्य के ही होती है। उप बन्धापसरण स्थानों मेंसे चारो गति में कोन-कोन से बन्धापसरण स्थान होते है इसका विवरण इस प्रकार है। मनुष्य और तिर्यंचों में ३४ ही बन्धापसरण स्थान होते हैं। अर्थांत् मनुष्य गति और तिर्यंच गति में प्रथमोपशम सम्यक्तव के अभिमुख मिथ्यादृष्टि जीव के चौतीस (३४) ही बन्धापसरण पद (स्थान) होते है मिथ्यादृष्टि मनुष्यगति और तिर्यंचगति के जीवों में बन्ध योग्य ११७ प्रकृतियों में से नारकायु को आदि लेकर ४६ प्रकृतियों का बन्धापसरण स्थानों में कथन हैं। यद्यपि ३४ बन्धापसरण स्थानों में ५० प्रकृति होती है किन्तु जो संयोग रूप पर्याप्त-प्रत्येक-बादर- पंचेन्द्रिय इन चारों प्रकृतियों का आगे दूसरी प्रकृति के साथ बन्ध होता है इसीलिए ४६ प्रकृतियों की बन्ध व्युच्छित्ति कही है। ४६ प्रकृतियों की संख्या इस प्रकार है- नरकायु१तिर्यंचायु२मनुष्यायु३देवायु४ नरकगति५ नरकगत्यानुपूर्व६ सूक्ष्म७ अपर्याप्त साधारण९ एकन्द्रिय१०आतप११ स्थावर१२द्वीन्द्रिय१३ त्रीन्द्रिय१४ चतुरिन्द्रिय१५ तिर्यंचगति१६ तिर्यग्गत्यानुपूर्वी१७ उद्योत१८नीचगोत्र१९ अप्रशस्त विहायो गति२० दुर्भग२१ दुःस्वर२२ अनादेय२३ हुण्ड़क संस्थान२४ सृपाटिकसंहनन२५ नपुंसक वेद२६ वावन संस्थान२७ कीलित संहनन२८ कुब्जक संस्थान२९अर्धनाराच संहनन३० स्त्रीभेद३१ स्वाति संस्था३२ नाराच संहनन३३न्याग्रोध परिमंडल संस्थान३४ व्रजनाराच संहनन३५मनुष्यग३६ मनुष्यगत्यानुपूर्वी३७ औदारिक शरीर३८आंगोपांग३९व्रजवृषभनाराच संहनन४०अरति४१शोक४२अस्थिर४३अशुभ४४अयश स्कीर्ति४५असाता वेदनीय४६ इस प्रकार ३४ पदों में ४६ प्रकृतियों की बन्ध व्युच्छित्ति होती है और शेष ७१ प्रकृतियों का बन्ध होता है यह समझना चाहिए।

बन्धव्युच्छित्ति - विवक्षित समय या गुणस्थान में जिन प्रकृतियों का बन्ध हो रहा था उन प्रकृतियों का अगले समय में या अगले गुण स्थानक बंध नहीं होना अर्थात् बंध से छूट जाना बन्धव्युच्छित्ति कहलाती है। व्युच्छित्ति का अर्थ व्युच्छेद अर्थात् छूट जाना । जैसे मिथ्यात्व गुणस्थान में १६ प्रकृति की बन्धव्युच्छित्ति होती है इसका अर्थ यह हुआ कि दूसरे गुण स्थान में इन १६ प्रकृतियों का बन्ध नहीं होगा । ऐसा समय मेें भी लगाना चाहिये। भवनत्रिक और सोधर्म -ईशान स्वर्ग में बन्धापसरण पद सामान्य से बन्ध योग्य-प्रकृति•१०३, पद•१४,३१ प्रकृति की बंधव्युच्छित्ति-१०३-३१•७२ शेष बन्ध योग्य प्रकृति•७२ १४ पद उप प्रकृति वर्तमान पद क्रम उप बन्धापसरण के पद क्रम प्रकृति १. २. तिर्यंचायु २. ३. मनुष्यायु ३. १८ बादर -पर्याप्त -प्रत्येक-एकेन्द्रिय आतप स्थावर ४. २३. तिर्यंच गति-तिर्यग्गत्यानुपूर्वी-उद्य ५. २४. नीच गोत्र ६. २५. अप्रशस्त विहायोगति-दुर्भग दुःस्वर अनादेय ७. २६. हुण्डक संस्थान-सृपाटिका संहनन ८. २७. नपुंसक वेद ९. २८. वामन संस्थान-कीलित संहनन १०. २९. कुब्जक संस्थान अर्धनाराच संहनन ११. ३०. स्त्रीवेद १२. ३१. स्वाती संस्थान नाराच संहनन १३. ३२. न्यग्रोध संस्थान-वङ्कानाराच संहनन १४. ३४. अस्थिर-अशुभ-अयश स्कीति अरति-शोक-असाता वेदनीय ३४-३ बादर-पर्याप्त-प्रत्येक-३१ xxsddssd उप प्रकृतियों में से तीन प्रकृति कम करने पर ३१ प्रकृतियों की बन्धव्युच्छित्ति होती है। बादर-पर्याप्त -प्रत्येक इन तीन प्रकृतियों का बंध आगे दूसरी प्रकृतियों के साथ बन्ध होता है।आयु को अंबध में इसीलिए लिया है कि सम्यक्तव के अभिमुख मिथ्या दृष्टि जीव आयु का बंध नहीं करता है अर्थांत् प्रथमोपशम सम्यग्दृष्टिजीव को आयु बंध होता है। नोट - इसकी विशेष जानकारी के लिए कर्म कांड में देखना चाहिए। यहाँ पर ऐसे तो ५१प्रकृतियों की बन्धव्युच्छित्ति होती है पर यहाँ पर ४६ प्रकृतियों को गिना है। उसका यह है कि ५१ प्रकृतियों में से असंज्ञी पंचेन्द्रिय स्वतंत्र प्रकृति नहीं हैं। त्रस -बादर पर्याप्त व प्रत्येक इन चार प्रकृतियों का एकेन्दियादिक के साथ संयुक्त बंध नहीं होता है परन्तु संज्ञी पंचेन्द्रिय के साथ उपर्युक्त चार प्रकृतियों का बंध होता है इसलिए ये चार प्रकृतियों की बंधव्युच्छित्ति नहीं होती हैं इस प्रकार ५ प्रकृतियों को कम होने पर टीका में कही हुई ९ ३ ३ ३१-४६ प्रकृतियों की बंधव्युच्छित्ति होती है। अब रत्न प्रभा आदि ६ पृथिवियों में और सनत्कुमारादि दस स्वर्ग में

बन्धापसरण स्थान - रत्न प्रभा आदि छह पृथिवियों में और सनत्कुमारादि दस स्वर्गो में १४ पदों में से अठारहवाँ पद छोड़ कर १३ पद होते हैं। सामान्य बन्ध योग्य प्रकृति-१०० २८ प्रकृतियों की बंधव्युच्छित्ति ७२ प्रकति बन्ध योग्य (बघ्यमान प्रकृति)

वर्तमान पद क्रम उपबन्धापसरणों के पद क्रम प्रकृति १. २. तिर्यंचायु २. ३. मनुष्यायु ३. २३. तिर्यंचगति-तिर्यंचगत्यानुपूर्वी-उद्योत ४. २४. नीच गोत्र ५. २५. अप्रशस्त विहायोगति-दुर्भग-दुःस्वर ६. २६. हुण्ड़क संस्थान-सृपाटिका संहनन ७ २७. नपुंसक वेद ८. २८. वामन संस्थान- कीलित संहनन ९. २९. कुब्जक संस्थान-अर्धनाराच संहनन १०. ३०. स्त्रीवेद ११. ३१. स्वाति संस्थान-नाराच संहनन १२. ३२. न्यग्रोध संस्थान-व्रजनाराच संहनन १३. ३४. अस्थिर-अशुभ-अयश स्कीति अरति-शोक-असाता वेदनी

पूर्व से तीन प्रकृतियाँ कम हो गई क्योंकि एकेन्द्रिय-स्थावर व आतप इन तीन प्रकृतियों का तीसरे स्वर्ग से आगे बन्ध योग्य नहीं हैै आनत कल्प से लेकर नव ग्रैवेयक तक के देवों में बन्धापसरण स्थाआनतादि और उनरिम ग्रैवेयक पर्यंंत विमानों में पूवोक्ति कहे हुए तेरह प्रकृतिबन्धापसरण स्थानों में से दूसरा और तेवीसवां स्थान से रहित ग्यारह(११)प्रकृति बन्धापसरण स्थान (पद)होते हे। सामान्य से बन्ध योग्य प्रकृति -९६ पद (स्थान)-११ २४- प्रकृतियों की बन्धव्युच्छित्ति ७२-प्रकृति बन्ध योग्य (बध्यमान) पिूर्ववत् ही जानना । दो पद कौन से निकाले उसका स्पष्टीकरण दूसरा - तिर्यंचायु तेवीसवां-तिर्यंचगति-तिर्यंचगत्यानुपूर्वी-उद्योत

विशेष - देव और नारकियों में औदारिक शरीरादि प्रकृतियों का ध्रवबन्ध होता है उसकी बन्ध व्युच्छित्ति नही होती क्योंकि देव और नारकी मनुष्यायु और तिर्यंचायु का ही बन्ध करते है और मनुष्य और तिर्यंचों का औदारिक शरीर होता है। सातवी पृथिवि में बन्धापसरण स्थान- ऊपर कहे हुए ११ स्थानों में से तीसरे स्थान से रहित (मनुष्यायु)और दूसरे स्थान से सहित(तिर्यंचायु सहित) और चउवीसवें स्थान से रहित अर्था् नीच गोत्र से रहित दश स्थान सातवें नरक में पाये जाते है सामान्य से बन्ध योग्य- ९६ स्थान (पद)१० बन्ध व्युच्छित्ति - २३ बध्य योग्य प्रकृति - ७३ (उद्योत सहित)७४ उद्योत का बंध और अबंध दोनों संभव है।

वर्तमान पद क्रम उप बन्धापसरणों के पद क्रम प्रकृति १. २. तिर्यंचायु २. २५. अप्रशस्त-विहायोगति-दुर्भग दुःस्वर-अनादेय ३. २६. हुण्ड़क संस्थान-सृपाटिका संहनन ४. २७ नपुंसक भेद ५. २८. वामन संस्थान कीलित संहनन ६. २९. कुब्जक संस्थान-अर्ध नाराच संहनन ७. ३०. स्त्री वेद ८. ३१. स्वाती संस्थान-नाराच संहनन ९. ३२. न्योग्राध संस्थान -बङ्कानाराच संहनन १०. ३४. अस्थिर -अशुभ -अयश स्कीर्ति अरति-शोक असाता वेदनीय

नोटः- १. सातवें नरक से निकला हुआ जीव तिर्यंच ही बनता है मनुष्य आदि नहीं बनता है। २. सातवें नरक में नीच गोत्र का ही बन्ध होता है इसीलिए बन्ध ब्युच्छित्ति नही होती है। प्रथमोपशम सम्यक्ता के अभिमुख मिथ्यादृष्टि मनुष्य और तिर्यंचों के बन्ध योग्य प्रकृति-

बन्धयोग्य प्रकृति -७१ ज्ञाना वरण की (पाँच) ५ दर्शनावरण की ९ अंतराय ५ साता वेदनीय १ ४२ ± २८± उच्च गोत्र मिथ्यात्व १ •७१ अन्तानुबन्धी कषाय १६ पुरूष वेद,हास्य, रति, भय, जुगुप्सा-५ २८ (देवचतुष्क-देवगति,देवगत्यानुपूर्वी,वैक्रियिक शरीर, आंगो पांग

त्रसचतुष्क - त्रस,बादर, पर्याप्त,प्रत्येक वर्णचतुष्क - अगुरूलद्यु, उपधात,परधात, उच्छ्वास अगुरूलद्युचतुष्क - वर्ण,गन्ध,रस,स्पर्श स्थिरादिकषकट्क - स्थिर,शुभ, सुभग,सुस्वर,आदेय,यशकीर्ति समचतुस्रसंस्थान,तैजस शरीर, प्रशस्त विहायोगा निर्माण,पंचन्द्रिय इस प्रकार अप्रमत जीव के बन्ध योग्य २८ प्रकृति)औरउच्च गोत्र इन ७१ प्रकृतियों को बांधता है।

नोटः- यहाँ पर गर्भज संज्ञी पंचन्द्रिय पर्याप्त तिर्यंच लेना चाहिए। िदेवों और छह प्रथिवियो में बंधने वाली प्रकृतियों का निर्देश-मनुष्य और तिर्यंचों के बन्ध योग्य ७१ प्रकृतियों में से देव चतुष्क को कम करके मनुष्य चतुष्क (मनुष्य गति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, औदारिक शरीर औदारिक आंगोपांग) और वङ्कावृषभनाराच संहनन को मिलाने से इन ७२ प्रकृतियो को बन्धापसरण कर चुकने पर मिथ्यादृष्टि देव और प्रमादि छह प्रथिवियों के नारकी बांधते हैं। शेष प्रकृति उपयुक्त ही जानना । सिातवी पृथिवी मे बंधने वाली प्रकृतियों का निर्देश-पूर्वाक्त ७२ प्रकृतियों में से मनुष्यद्विक उच्च गोत्र कम कम करके तिर्यक्दिक नीच गोत्र सहित ७२ अथवा उद्योत सहित ७३ प्रकृति परिणाम सातवी प्रथिवी का नारकी बांधता है। ७२ प्रकृतियों में से-मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी,उच्चगोत्र-७२-३•६९ ६९±तिर्यंचगति,तिर्यंचगत्यानुपूर्वी नीच गोत्र•७२ बन्ध योग्य ७२±१ उद्योत•७३ प्रकृति बन्घ योग्य

विशेष - प्रथम सम्यक्तव के अभिमुख सप्तम पृथ्वीका मिथ्यादृष्टि नारकी बन्धापसरण कर चुकने के पश्चात ७२ प्रकृतियों का अथवा ७३ प्रकृतियों का बन्ध करता है। (उद्योत सहित)

स्थति-अनुभागबन्ध भेद का कथन - प्रथम सम्यक्तव के अभिमुख चारों गति वाला मिथ्यादृष्टि जीव बध्यमान प्रकृतियों के चौतीस बन्धापसरण स्थानों में प्रत्येक स्थान में अथवा प्रत्येक पद में पृथक्तव सौ सागर(अर्थात्-सात सौ आठ सौ सागर) द्यटता क्रम लिए अन्तः कोड़ा कोड़ी सागर प्रमाण स्थिति को बांधना है। बध्यमान प्रकृतियों के चौतीस बन्धापसरण स्थानों में उपयुक्त प्रत्येक पद में अप्रशस्त प्रकृतियों का द्विस्था गत (लता,दारू, रूप) अनुभाग को प्रति समय अनंतगुणा हीन बांधता है । और प्रशस्त प्रकृतियों का चतुःस्थानीय अर्थात् गुड़,खांड,शर्वâर अमृत रूप अनुभाग को प्रति समय अनंतगुणा बांधता है। अद्यातिया कर्म की अप्रशस्त प्रकतियों का भी द्विस्थानीय अर्थात् नीब-कांजी रूप अनुभाग को भी प्रति समय अनंतगुणा हीन बांधता है

प्रदेश बंध - प्रथम सम्यक्तव के अभिमुख विशुद्व चारों गति का मिथ्या-दृष्टि जीव मिथ्यात्च,अनंतानुबन्धी चतुष्क (क्रोध-मान-माया-लोभ) स्त्यानगृद्वि आदि तीन (निद्रा,प्रचला-प्रचला,स्त्यानगृद्वि) देव चतुष्क (देव गति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगो पांग समचतुरस्र संस्थान, वङ्कावृषभनाराच संहनन, प्रशस्त विहायोगति सुभग, सुस्वरः,आदेय,नीच गोत्र इन १९ प्रकृतियों का उत्कृष्ट वा अनुत्कृष्ट प्रदेश बंध करता है। उपयुकर्त १९ प्रकृतियों के बिना तीन महादंडकों में कही हुई ६१प्रकृतियों का अनुत्कृष्ट प्रदेश बंध करता है मनुष्य तिर्यंच के बन्ध योग्य पहला दड़क•७१ प्रकृतियों का भवनत्रिक में बन्ध योग्य दूसरा दडंक•५ प्रकृतियों का अन्य प्रकृति प्रथम दण्डक मेंं हैं । सातवी प्रथ्वी के नारकियों के बंध योग्य तीसरा दंडक ४ प्रकृतियोंं का।अन्य प्रकृतियों प्रथम और दूसरे दण्डक में कही इस प्रकार क्रम से तीनो दंडक में अपुनरूक्त प्रकृतियों ८० कही है ७१±५±४•८० प्रकृति बंध प्रकरण समाप्त हुआ।

उदय योग्य प्रकृति - नरक गति में प्रथम सम्यक्तव के अभिमुख विशुद्व मिथ्या दृष्टि जीव के वर्तमान में उदय योग्य ज्ञानावरण की ५ स्त्यानगृद्वि आदि ३ और निद्रा-प्रचला से रहित-४ अंतराय की ५ मोहनीय की १० अथवा ९ अथवा ८ के स्थान नारकायु -१ नाम कर्म की भाषा पर्याप्तिके काल में होने वाली २९ प्रकृति, वेदनीय में से कोई भी एक नीच गोत्र- कर्मों के नाम-ज्ञा. द. अं. मो. आ. ना. वे. गो प्रकृति की संख्या ५ ± ४ ± ५± ८± १± २९± १± १ • ५४ प्रकृति मोहनीय की आठ प्रकृति स्थान से युक्त ५४ प्रकृति मोहनीय की ८ प्रकृति - ० - भय जुगुप्सा रहित २ २/२ - हास्य रति-अरति शोक १ १ - नंपुसक वेद ४ ४/४/४/४ - ४ क्रोध-४ मान ४ माया ४ लोभ १/८ १ - मिथ्यात्व

मोहनीय के ४ कषाय और हास्य शोक युगल के बदलने पर ८ भंग होते है उसको वेदनीय के २ भंग से गुणा करने पर १६ भंग होते है । नरक गति में स्थिर युगल व शुभ युगल को छोड़कर शेष नामकर्म की अप्रशस्त प्रकृतियों का ही उदय होने पर नाम कर्म के भंग नहीं बनते है नरक गति में -५४ प्रकृति -१६ भंग ५४ प्रकृति के -१६ भंग

१. मिथ्यात्व अनं अप्रत्या सं. क्रोध न. पु हास्य रति साता वेदनी २. - - - - मान - - - - - ३. माया - - ४. लोभ - - ५. क्रोध अरित शोक ६. मान - - ७. माया - - ८. लोभ - - ९. क्रोध - - - असाता वे. १०. मान - - - - ११. माया - - - - १२. लोभ - - - - १३. क्रोध - अरति शोक - १४. मान - - - - १५. माया - - - - १६. लोभ - - - -

मोहनीय की ९ प्रकृति वही ५४ प्रकृति कोई जीव के भय अथवा जुगुप्सा सहित नौ प्रकृत्स्थिान से युक्त उदय रूप होती है इसीलिए उसके ५५ प्रकृति उदय रूप होती है पूर्व में कहे हुए १६ भंग के भय के -जुगुप्सा के गुणा करने पर ३२ बतीस भंग होतें है । १/१ १ भय अथवा जुगुप्सा २/२ २ हास्य रति- अरति शोक १ १ नपुंसक वेद ४/४/४/४ ४ ४ क्रोध ४ मान ४ माया ४ लोभ १ १/९० मिथ्यात्व पूर्वाक्त क्रम से ही १६ भंग भय के साथ (सहित) १६ भंग जुगुप्सा के साथ (सहित) प्रकृति ५५ भंग ३२ पुनः कोई जीव को उसी प्रकृति भग जुगुप्सा दोनों सहित दस (१०)प्रकृति स्थान से युक्त (५६) छप्पन प्रकृति उदय रूप होती है उसके भंग पूर्ववत् १६ सोलह जानना चाहिये क्योकि भय व जुगुप्सा इन दोनों का उदय एक ही समय में होने पर भय जुगुप्सा के भंग नहीं होतें ० ० भय जुगुप्सा रहित २/२ २ हास्य रति अथवा शोक अरति १/१/१ १ स्त्री वेद पुरूषवेद अथवा नपंंपुसकवेद ४/४/४/४ ४ ४ क्रोध ४ मान ४ माया ४ लोभ १ १/८ मिथ्यात्व मोहनीय के ४ कषाय और हास्य शोक युगल के बदलने पर ८ भंग होते है उसको वेदनीय के २ भंग से गुणा करने पर १६ भंग होते है। नरकगति में स्थिर युगल व शुभ युगल को छोड़कर शेष नाम कर्म की अप्रशस्त प्रकृतियों का ही उदय होने पर नाम कर्म के भंग नहीं बनते है। नरक गति में ५४ प्रकृति १६ भंग ५४ प्रकृति के १६ भंग १. मिथ्यात्व अनं अप्रत्य प्रत्या. सं. क्रोध नपु. हास्य रति सातावेदना २. ‘ ‘ ‘ ‘ ‘ मान ‘ ‘ ‘ ‘ ३. माया ‘ ‘ ‘ ४. लोभ ‘ ‘ ५. क्रोध अरति शोक ६. मान ‘ ‘ ७. माया ‘ ‘ ८. लोभ ‘ ‘ ९. क्रोध ‘ हास्य रति आसाता वेदनीय० १०. मान ‘ ‘ ‘ ‘ ११. माया ‘ ‘ ‘ ‘ १२. लोभ ‘ ‘ ‘ ‘ १३. क्रोध ‘ अरति शोक ‘ १४. मान ‘ ‘ ‘ ‘ १५. माया ‘ ‘ ‘ ‘ १६. लोभ ‘ ‘ ‘ ‘ मोहनीय ९. प्रकृति वही ५४ प्रकृति कोई जीव के भय अथवा जुगुप्सा सहित नौ प्रकृति स्थान से युक्त उदय रूप होती है इसीलिए उसके ५५ पचपन प्रकृति उदय रूप होती है पूर्व मे कहे हुए १६ भंग के भय-जुगुप्सा के गुणाकरने पर ३२ बत्तीस भंग होते है । १/१ १ भय अथवा जुगुप्सा २/२ २ हास्त रति/ अरति शोक १ १ नपुंसक वेद ४/४/४/४ ४ ४ क्रोध ४ मान ४ माया ४ लोभ १ १/९ मिथ्यात्व पूर्वाक्त क्रम से ही १६ भंग भय के साथ (सहित) १६ भंग जुगुप्सा के साथ (सहित) प्रकृति ५५/३२ भंग पुनः कोई जीव को उसी प्रकृति भग जुगुप्सा दोनों सहित दस (१०) प्रकृति स्थान से युक्त (५६) छप्पन प्रकृति उदय रूप होती है उसके भंग पूर्ववत् १६ सोलह जानना चाहिए क्योंकि भय व जुगुप्सा इन दोनों का उदय एक ही समय में होने पर भय जुगुप्सा के भंग नहीं होते २ २ भय जुगुप्सा सहित २/२ २ हास्य रति/शोक अरति १ १ नपुंसक वेद ४/४/४/४ ४ ४ क्रोध ४ मान ४ माया ४ लोभ १ १/१० मिथ्यात्व मोहनीय की दस प्रकृति पूर्ववत् १६ भंग ५४ ५५ ५६ प्रकृति ५६ प्रकृति १६ ३२ १६ भंग १६ भंग भय जुगुप्सा सहित तिर्यंचगति में उदय योग्य-तिर्यंच गति में पूर्वाक्त मोह के आठ प्रकृति स्थान से युक्त चोवन ५४ प्रकृति में संहनन मिलाने पर पचपन (५५) उदय रूप होती है। मोहनीय के रूप २४ भंग होते है ० ० भय जुगुप्सा रहित २/२ २ हास्य रति अथवा शोक अरति १/१/१ १ स्त्रीवेद पुरूषवेद अथवा नपुंषक वेद ४/४/४/४ ४ ४ क्रोध ४ मान ४ माया ४ लोभ १ १/८ मिथ्यात्व हास्य अथवा शोक यंगुल से एक युगलका तीन वेद से एक वेद की और ४ कषाय चौकड़ी से एक कषाय चौकड़ी से उदय होने पर २²३²४•२४ भंग मोहनीय के होते हैं । वेदनीय के दोनों में से एक प्रकृति का उदय होने पर २ भंग होते है। १/१ यश - अयश १/१ सुस्वर- दुःस्वर १/१ आदेय - अनादेय १/१ सुभग- दुर्भग १/१ प्रशस्त- अप्रशस्त विहायोगति १/१/१/१/१/१ छह- संहनन १/१/१/१/१/१ छह- संहनन नाम कर्म के ६ संस्थान में से एक संस्थान, ६ संहनन में से एक संहनन, २ विहायो गति में से एक विहायो गति और अंतिम चार युगलों में कोई भी एक-एक प्रकृतिका उदय होने पर ६²६²२²२²२²२²२•११५२ ग्यारह सौ बावन भंग होते है। नोटः- नरक गति में संहनन का उदय नहीं होता किन्तु तिर्यंच गति में संहनन का उदय होता हैं इसलिए पूर्वाक्त ५४ प्रकृतियों में संहनन मिलाने पर मोहनीय की ८ प्रकृति से युक्त ५५ प्रकृतियों का उदय होता है ११५२²२ वेदनीय ² २४ मोहनीय के •५५२९६ भंग भय -जुगुप्सा रहित ५५ प्रकृति ५५२९६ भंग भय - जुगुप्सा रहित ५६ प्रकृति उदय योग्य मोहनीय की ९ प्रकृति के साथ भंग (भय -जुगुप्सा के साथ ) पूर्वाक्त भंग में भय जुगुप्सा के साथ गुणा करने पर ५५२९६²२ • ११.०५९२ भय-जुगुप्सा के साथ पुनः उन्हीं पूर्वोक्त ५५ प्रकृति युग पद भय जुगुप्सा स्वरूप मोहनीय के दस स्थान से युक्त सत्तावन (५७) होते हैं। भय जुगुप्सा का एक ही समय में उदय होने पर एसके दो भंग नहीं होते है इसीलिए पूर्वोक्त ५५२९६ भंग ही होते है । ५५ ५६ ५७ उदय योग्य प्रकृति ५५२९६ ११०५९२ ५५२९६ भंग इन तीनों में (अर्थात् (५५,५६,५७) उधोत प्रकृति मिलाने पर ५६,५७,५८ का उदय होता है भंग पूर्ववत् ही जानना। ५६ ५७ ५८ प्रकृति ५५२९६ ११०५९२ ५५२९६ भंग मनुष्य गति में उदय योग्य प्रकृति- मनुष्य गति में भी तिर्यंच गति के समान ही जानना किन्तु इतना विशेष यह है कि मनुष्य गति में उद्योत नाम कर्म से युक्त तीन स्थान नहीं होते हैं क्योंकि उद्योत प्रकृति का उदय तिर्यंचो के ही होता है ऐसा नियम है। मनुष्य गति में उच्च का भी उदय होता है इसीलिए तिर्यंचों गति भंगों में ही २ गोत्र का गुणा करने पर मनुष्य गति के भंग होते हैं। भय-जगुप्सा रहित . ५५२९६²२ • ११०५९२ ११०५९२²२ • २२११८४ ५५२९६²२ • ११०५९२ ५५ प्रकृति ५६ प्रकृति ५७ प्रकृति ११०५९२ भंग २२११८४ भंग ११०५९२ भंग देव गति में उदय योग्य प्रकृति- देव गति में उदय योग्य नरक गति के समान ही जानना चाहिए। देवगति में मात्र यह विशेषता है कि देवगति में नाम कर्म की प्रशस्त प्रकृतियों का ही और उच्च गोत्र का ही उदय होता है। मोहनीय प्रकृति में से नपुंसक वेद को निकालकर स्त्री वेद व पुरूष वेद मिलाने से दुगने भंग होते हैं इसीलिए तीन स्थानों में भंग इस प्रकार होते हैं- मोहनीय की ८ प्रकृति मोहनीय की ९ प्रकृति मोहनीय की १० प्रकृति ० १/१ २ २/२ २/२ २/२ १/१ १/१ १/१ ४/४/४/४ ४/४/४/४ ४/४/४/४ १ १ १ ४²२²२ •१६ ४²२²२²२•३२ ४²२²२•१६ साता और असाता के साथ गुणा करने पर दुगने भंग होते है । १६²२•३२ ३२²२•६४ १६²२•३२ ५४ ५५ ५६ प्रकृति ३२ ६४ ३२ भंग पुनः निद्रा और प्रचला से युक्त पूर्व में (पूर्वाक्त) कही हुई ही चारों गति की प्रकृतियों में एक अधिक होती है । अर्थात् चारों गतियों में जिन प्रकृतियों का उदय है उन प्रकृतियों में निद्रा प्रचला में से कोई प्रकृति मिलाने पर एक-एक प्रकृति कर अधिक उदय होता है वहाँ इन दोनों प्रकृतियोंं के बदलने से सर्वत्र पूर्वोक्त भंग से दुगने भंग जानना। उदय योग्य प्रकृति सम्बन्धी स्थिति व अनुभाग तथा प्रदेशों की उदय -उदीरण का कथन- प्रथमोंपशम सम्यक्तव के अभिमुख मिथ्यादृष्टि जीव के जिन प्रकृतियों का उदय है उन प्रकृतियों की स्थिति क्षय से उदय में प्रविष्ट क स्थिति वेदक होता है तथा शेष स्थितियों का अवेदक होता है। अप्रशस्त प्रकृतियों के लता-दारू रूप अथवा निम्ब-कांजी रूप द्विस्थानीय अनुभाग का वेदक होता है उदय में आई हुई प्रशस्त प्रकृतियों के चतुःस्थानीय अनुभाग का वेदक होता है उदयगत प्रकृतियों के अजधन्य-अनुत्कृष्ट प्रदेशों का वेदक होता है।जिन प्रकृतियों का वेदक होता है उन प्रकृतियों के प्रकृतियों के प्रकृति स्थित और प्रदेशों की उदीरणा करता है । अर्थात् जद्यन्य वा उत्कृष्ट परमाणु का यहाँ उदय नहीं है उदय रूप प्रकृतियों का प्रकृति-स्थिति-अनुभाग और प्रदेशों का उदीरक होता है। जिन प्रकृतियों का उदय है उन्हीं की उदीरणा संभव है । उदय और उदीरणा में स्वामी भेद का अभाव है ।

प्रकृति सच्च- विशेष बात यह है कि अनादि मिथ्यादृष्टि अथवा सादि मिथ्यादृष्टि प्रथमोपशम सम्यक्तव के योग्य होता है । अनादि मिथ्यादृष्टि जीव जिसने आयु का बंध नहीं किया ऐसा अबद्वायुष्क जीव भुज्यमान आयु के बिना तीन आयु,तीर्थंकर,आहारक, चतुष्क,सम्यकप्रकृति, मिश्र प्रकृति इन दश प्रकृतियों से रहित १३८ प्रकृतियों का सत्व होता है वही अनादि मिथ्यादृष्टि जीव जिसने अगली आयु का बन्ध कर लिया है तो एक आयु कम होने पर ९ प्रकृतियों से रहित १३९ प्रकृतियों का सत्व होता हैं । सादि मिथ्यादृष्टि जीव जिसने आयु का बंध नहीं किया है ऐसे अबद्वायुष्क जीव ने भुज्यमान आयु के बिना तीन आयु,तीर्थंकर आहारक चतुष्क इन आठ के बिना १४० सम्यक्् प्रकृति का उद् वेलना हुए १ का सत्व, मिश्र मोहनीय की उद्वेलना हुए १३८ का सत्व । आदि मिथ्यादृष्टि जीव ने जिसने अगले भव की आयु का बन्ध कर लिया है ऐसा बद्वायुष्क जीव के बध्यमान और भुज्यमान दो आयु के तीर्थंकर,आहारक चतुष्क इस प्रकार ७ के बिना १४१ का सत्तव सम्यक् प्रकृति सहित ८ के बिना १४० का सत्तव । मिश्र मोहनीय सहित ९ के बिना १३९ का सत्तव होता है क्योंकि यह नियम है कि आहारक चतुष्टय की उद्वेलना हुए बिना और तीर्थंकर सत्ता वाला जीव प्रथमोपशम सम्यत्त्व के सम्मुख नहीं होता है उन पूर्व में कही हुई सत्तव प्रकृतियों का स्थिति सत्य अनुभाग सत्तव प्रदेश सत्तव अजधन्य और अनुत्कृष्ट होता हैं। जघन्य अथवा उत्कृष्ट संभव नहीं है इस प्रकार बंध,उदय,उदीरणा सत्तव प्रकृति चतुष्क अर्थात् प्रकृति-स्थिति-अनुभाग-प्रदेश प्रत्येक में उक्त प्रकार से प्रति नियमित है यह सब कार्य प्रायोग्य लब्धि के अंत तक जानना ।