ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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'''जैनागम में वर्णित हवन विधि आवश्यक क्यों

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जैनागम में वर्णित हवन विधि आवश्यक क्यों?

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चन्दनामती - पूज्य माताजी! वंदामि, मैं आपसे श्रावकों द्वारा पूजा-विधानों के अंत में की जाने वाली हवन विधि के बारे में कुछ समयोचित बातें पूछना चाहती हूँ।

श्री ज्ञानमती माताजी - पूछो।

चन्दनामती - पूजा विधानों के समापन में एवं पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं में अग्निकुण्डों में हवन क्यों किया जाता है?

श्री ज्ञानमती माताजी - ऐसा आगम का विधान है कि प्रत्येक पूजा-विधानों के अन्त में हवन अवश्य करना चाहिए अन्यथा वह यज्ञ अधूरा कहलाता है। सभी विधानों के शुभारंभ में विधानाचार्य पण्डित जी उस विधान के मूलमंत्र का जाप्यानुष्ठान सभी पूजकों से करवाते हैं, जो कि पूरे विधान तक किया जाता है। अन्त में सभी के मंत्रों का कुल जोड़ लगाकर उसकी दशमांश आहुति अग्नि में कराने की प्राचीन परम्परा है।

इसी प्रकार पंचकल्याणकों में भी प्रतिष्ठाचार्य इन्द्र-इन्द्राणियों से कई दिन पूर्व से ही पूजा-पाठ और मंत्र अनुष्ठान प्रतिष्ठा स्थल पर शुरू करवा देते हैं और विधिवत् उन मंत्रों की आहुतिपूर्वक हवन कराते हैं इसकी पूरी विधि जानने हेतु आचार्यश्री नेमिचन्द्र स्वामी द्वारा रचित प्रतिष्ठा तिलक आदि प्रतिष्ठा ग्रंथ देखना चाहिए।

चन्दनामती हवन की वास्तविक (शास्त्रोक्त) विधि क्या है?

श्री ज्ञानमती माताजी प्रतिष्ठा शास्त्रों के अनुसार हवन की विधि निम्न प्रकार है-

मंडप के सामने वेदी के सम्मुख चौकोर, गोल और त्रिकोण ऐसे तीन कुण्ड बनवाना चाहिए। यदि तीन कुण्ड बनवाने में असुविधा हो तो एक चौकोर कुण्ड बना लें। हवन करने वालों की संख्या यदि अधिक हो, तो अलग से स्थण्डिल बना लेना चाहिए। पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य द्वारा संपादित ‘‘मंदिर वेदी प्रतिष्ठा-कलशारोहण विधि’’ नामक पुस्तक में भी उन्होंने हवन से संबंधित प्रारंभिक जानकारी देते हुए उपर्युक्त बातें भी बताई हैं तथा पृ. नं.-७४ पर हवन करने वालों के लिए विशेष नियम भी बताए हैं। जैसे-हवन के लिए साकल्य (धूप) आदि और समिधाएं (लकड़ी के टुकड़े) पहले से तैयार करके रखें। हवन करने वाले दो वस्त्र पहनकर हवन करें इसके बाद थोड़ी सी हवन क्रिया बताकर पृ.७७ पर उल्लेख किया है- ‘‘ॐ ह्रीं होमार्थं अग्नित्रयाधारभूतां समिधां स्थापयामि’’ इत्यादि मंत्र बोलते हुए कुण्डों के अंदर समिधा (लकड़ी) स्थापित करें पुन: ॐ ॐ ॐ ॐ रं रं रं रं’’ यह मंत्र बोलकर कपूर जलाकर हवनकुण्ड में डालें अनंतर ‘‘ॐ ह्रीं श्री रं रं रं रं दर्भपूलेन ज्वालय ज्वालय नम: फट् स्वाहा’’ इस मंत्र का उच्चारण करते हुए डाभ के पूले से हवन कुण्ड की अग्नि संधुक्षित करें।

इसके बाद पण्डित पन्नालाल जी ने प्रतिष्ठाशास्त्रों के अनुसार तीनों कुण्डों को अलग-अलग मंत्रों द्वारा अघ्र्य चढ़ाने का नियम बताया है तथा पीठिका मंत्र, जाति मंत्र, निस्तारक मंत्र, ऋषि मंत्र, सुरेन्द्र मंत्र, परमराजादि मंत्र एवं परमेष्ठी मंत्रों से आहुतियाँ देना बताया है और जिस मंत्र का अनुष्ठान किया गया है उसकी दशांश आहुतियाँ भी देने के लिए लिखा है। स्वाहा बोलते हुए हवनकुण्डों में धूप, घी, लौंग, सप्तधान्य, समिधा आदि की आहुतियाँ दी जाती हैं।

चन्दनामती पूज्य माताजी! ये तीन कुण्ड किस अभिप्राय से बनाए जाते हैं, कृपया इस विषय में बताने का कष्ट करें।

श्री ज्ञानमती माताजी आचार्यश्री जिनसेन द्वारा रचित आदिपुराण के द्वितीय भाग (भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित) में ४०वें पर्व में उत्तरचूलिका रूप क्रियाओं के कथन में हवन विधि भी खूब अच्छी तरह बताई है। इसमें पृ. ३०१ पर श्री जिनसेन स्वामी कहते हैं-

कुण्डत्रये प्रणेतव्यास्त्रय एते महाग्नय:।
गार्हपत्याहवनीय दक्षिणाग्निप्रसिद्धय:।।८४।।

अर्थात् गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि नाम से प्रसिद्ध तीनों महाअग्नियों को तीनों कुण्डों में स्थापित करना चाहिए। इसका अभिप्राय यह है कि चौकोर कुण्ड तीर्थंकर कुण्ड कहलाता है, गोलकुण्ड गणधर कुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है तथा त्रिकोण कुण्ड सामान्य केवली कुण्ड के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों में वर्णन आता है कि तीर्थंकर, गणधर और सामान्य केवलियों के निर्वाण होने पर अग्नि कुमार इन्द्र आकर उन-उन नाम वाले चौकोर, गोल और त्रिकोण कुण्ड बनाकर अपने मुकुट से अग्नि जलाकर उनके परमौदारिक शरीर का संस्कार करते हैं इसीलिए चौकोर कुण्ड जिसमें तीर्थंकरों के शरीर का संस्कार होता है उसकी अग्नि को गार्हपत्य अग्नि कहा है, गोल कुण्ड जिसमें गणधरों के शरीर का संस्कार होता है उसे आहवनीय कुण्ड एवं उसकी अग्नि को आहवनींय अग्नि कहते हैं तथा त्रिकोणकुण्ड जो सामान्य केवलियों के अंतिम संस्कार से पवित्र है उसमें जलाई जाने वाली अग्नि दक्षिणाग्नि कहलाती है।

इन अग्नियों के लिए जिनसेन स्वामी ने आदिपुराण के द्वितीय भाग में पर्व ४० में पुन: कहा है-

न स्वतोऽग्ने: पवित्रत्वं, देवतारूपमेव वा।
किन्त्वर्हद्दिव्यमूर्तीज्यासम्बन्धात् पावनोऽनल:।।८८।।

अर्थात् ‘‘अग्नि में स्वयं पवित्रता नहीं है और न वह देवतारूप ही है। किन्तु अरहन्तदेव की दिव्यमूर्ति की पूजा के संबंध से वह अग्नि पवित्र हो जाती है। इसीलिए ही द्विजोत्तम लोग इसे पूजा का अंग मानकर इसकी पूजा करते हैं। अतएव निर्वाणक्षेत्र की पूजा के समान अग्नि की पूजा करने में कोई दोष नहीं है।

चन्दनामती यदि अग्नि में हवन न करके पीले चावलों से हवन विधि कर ली जावे तो क्या हानि है?

श्री ज्ञानमती माताजी पीले चावलों से पुष्पांजलि हो सकती है, हवन नहीं। हवन का अभिप्राय ही यह है कि अग्नि में आहुति डालना। यदि पुष्पों से हवन किया जा सकता तो पूर्व के आचार्य और विद्वान् अग्नि में हवन करने की विधि क्यों बताते?

चन्दनामती आजकल कुछ लोग कहते हैं कि धूप से हवन नहीं करना चाहिए क्योंकि पूर्वकाल में राजा वङ्काजंघ और रानी श्रीमती का धूप के धुएं में दम घुटने के कारण मरण हो गया था। हवन के धुएँ से भी छोटे-छोटे अनेकों जीवों का घात संभव है अत: हवन-हिंसा का कारण माना जाता है। इस बारे में आपका क्या अभिप्राय है?

श्री ज्ञानमती माताजी देखो! अपने स्वार्थ की पूर्ति करने हेतु लोग किसी भी शब्द और कथानक का अर्थ कैसा बदल देते हैं यह बड़े आश्चर्य की बात है। राजा वङ्काजंघ और रानी श्रीमती के मरण में धूप का निमित्त ही नहीं था किन्तु कर्मचारियों की असावधानी उसमें प्रबल निमित्त थी कि वे धूप जलाने के बाद खिड़कियाँ खोलना भूल गए थे जिससे कमरे में धूएं की गैस भर गई और दोनों का मरण हो गया। दूसरी बात पंचेन्द्रिय विषय भोगों के निमित्त आचार्य ने स्वयं धिक्कारा है किन्तु भगवान की पूजा से उस कथन का तात्पर्य कथमपि नहीं है। जिन आचार्यश्री जिनसेन ने आदिपुराण के पर्व ९ के छंद ३० में भोगों को बुरा कहा है उन्हीं जिनसेन स्वमी ने तो पर्व ४० में हवनविधि का विस्तृत वर्णन किया है। अज्ञानी और सरल प्रवृत्ति वाले श्रावक-श्राविकाओं को अपने मन की एक पंक्ति दिखाकर उन्हें पुण्यक्रिया से वंचित करना अपराध नहीं तो क्या है? मेरा तो श्रावकों से भी यही कहना रहता है कि प्राचीन आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों को तुम स्वयं पढ़ो ताकि दिग्भ्रमित होने की गुंजाइश ही न रहे। अरे भाई! यदि भोजन करते हुए किसी की मृत्यु हो जाती है तो सभी भोजन मात्र का त्याग कर देते हैं? नहीं, उसी प्रकार हवन आदि क्रियाओं का निषेध तो कभी किया ही नहीं जा सकता। हाँ, विवेकपूर्वक इन क्रियाओं को करने का उपदेश अवश्य देना चाहिए।

तुमने दूसरी बात कही कि ‘‘हवन हिंसा का कारण माना जाता है’’ सो इस बारे में तो आचार्यश्री समन्तभद्र स्वामी ने अपने वृहत्स्वयंभूस्तोत्र के अन्तर्गत भगवान वासुपूज्य की स्तुति करते हुए कहा है-

पूज्यं जिनं त्वार्चयतो जनस्य, सावद्यलेशो बहुपुण्यराशौ।
दोषायनालं कणिका विषस्य, न दूषिका शीतशिवाम्बुराशौ।।३।।

इसका अर्थ यह है कि ‘‘हे भगवन्! आप पूज्य हैं, जिन हैं। आपकी पूजा करने वाले मनुष्य के जो आरंभजनित थोड़ा सा पाप होता है वह बहुत बड़ी पुण्य की राशि में उसी प्रकार दोष का कारण नहीं है, जैसे शीतल जल से युक्त बहुत बड़े समुद्र में विष की कणिका डाल देने पर भी वह जल को दूषित नहीं कर सकती है।’’

अर्थात् हवन करना, पूजन विधान, मंदिर निर्माण आदि प्रत्येक शुभ कार्य करने में जो थोड़ी बहुत हिंसा होती है वह उन्हीं कार्यों से संचित हुई महान पुण्यराशि में विलुप्त हो जाती है अत: जिनेन्द्रभक्ति संबंधी कार्यों में कभी हिंसात्मक भावना भी नहीं लानी चाहिए।

इस बारे में पं. नाथूलाल जी शास्त्री-इंदौर वालों ने अपनी ‘‘जैन संस्कार विधि’’ नामक पुस्तक में अच्छा खुलासा किया है। देखें पृ. नं. २-३ पर- ‘‘संस्कार विधि’’ में प्रत्येक संस्कार में हवन करने का विधान है। लगभग १० वर्ष से यह विचारधारा प्रचारित की जा रही है कि ‘‘हवन हिंसा का कारण है’’ जबकि मंदिरों में बिजली, पंखे और बिम्ब प्रतिष्ठाओं में बड़े-बड़े भोज व बिजली आदि में उससे भी अधिक हिंसा होती है। ‘‘गृहस्थ को सभी धार्मिक कार्य सावधानी और मर्यादापूर्वक करना चाहिए।’’ क्योंकि वह संकल्पी हिंसा का सर्वथा त्यागी है। इसके पहले तो कभी किसी ने इस संबंध में किसी ग्रंथ का प्रमाण देकर हवन का निषेध नहीं बताया बल्कि सभी प्रतिष्ठा पाठों व महापुराण में हवन के मंत्र और अग्नि स्थापन के मंत्र तथा गोल, चौकोर व त्रिकोण कुण्डों का विधान बताया है। कोई भी शांतिमंत्र जपने पर जयसेन प्रतिष्ठापाठ के श्लोक ३५९-४२१ के अनुसार अग्निसंस्कार पूर्वक बिना दशांश हवन के पूर्ण नहीं माना जाता है। हवन के द्रव्यों व घृत को अग्नि में क्षेपण से वैज्ञानिकों ने अनेक लाभ बताए हैं। विविध रोगों की चिकित्सा और वातावरण की शुद्धि हवन से होती है। अभी हरिद्वार में हवन से बड़े-बड़े रोग दूर करने हेतु शोध संस्थान की स्थापना भी हो चुकी है।’’ यह बात पण्डित नाथूलाल जी शास्त्री ने लिखी है।

चन्दनामती - पूज्य माताजी! इस संबंध में एक प्रश्न और है कि हवन में प्रयुक्त होने वाली समिधा कैसे होनी चाहिए? इस बारे में भी क्या कोई प्रमाण है?

श्री ज्ञानमती माताजी - हाँ, प्रतिष्ठातिलक में एक श्लोक आया है-

क्षीरद्रुमाणां च पलाशकानां, नवांगुलायामसमिद्भिरद्य।
द्वित्रयंगुलप्रमितनाहमयी भिरग्नौ करात्करोम्यष्टशतेन होमम्।।

अर्थात् आम्रपलाशादि वृक्षों की ९ अंगुल लम्बी एवं २-३ अंगुल मोटी लकड़ियों से १०८ बार आहुति देना चाहिए (यह समिधाहुति कहलाती है) अन्यत्र कहीं १२ अंगुल लम्बी समिधा से आहुति करना भी बताया है।

चन्दनामती - आपके श्रीचरणों में वंदामि। आपने अपना अमूल्य समय देकर आज बहुत सारी ज्ञान की बातें बताई हैं। आशा है पूजा-विधान करने वाले इस चर्चा से अवश्य लाभान्वित होंगे।