ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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'प्रज्ञा' और 'प्रमाण' का ओचित्य

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‘प्रज्ञा’ और ‘प्रमाण’ का औचित्य

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लोक में अनेकों प्रसंग ऐसे होते हैं, जहाँ ‘प्रज्ञा’ का प्रयोग अपेक्षित होता है, क्योंकि परिस्थितियाँ या तो अस्पष्ट होती हैं या भ्रमोत्पादक या फिर विपरीत ही बात को सिद्ध कर रही होती हैं; ऐसी स्थिति में व्यकित अपनी प्रज्ञा एवं विवेक के आधार पर निर्णय लेता है। तथा कई घटनाक्रम ऐसे भी होते हैं कि जिनमें तथ्य इतने सुस्पष्ट एवं प्रमाणपूर्वक प्रस्तुत होते हैं कि बौद्धिक व्यायाम की जगह उसे यथावत् ग्रहण करना ही बुद्धिमत्ता का सूचक होता है, अनावश्यक तर्क-विर्तक एवं कष्टकल्पनायें उस स्पष्ट विषय को उलझातीं ही हैं। इससे व्यक्ति स्वयं तो दिग्भ्रमित होता ही है, अन्य लोगों को भी संशयग्रस्त कर देता है। अत: प्रसंग के अनुसार ही ‘प्रज्ञा’ या ‘प्रमाण’ का औचित्य स्वीकार करना ही बुद्धिमत्ता एवं व्यावहारिकता का लक्षण है।

‘उदित’ क्या है ? विद्वानों ने उचित शब्दों के पाँच प्रमुख अर्थ बताये हैं– १. योग्य, २. विदित, ३. न्यस्त (रखा हुआ), ४. परिमित (सभी हैमचन्द्राचार्य प्ररूपति), तथा ५. ग्राह्य (शब्दरत्नावली में)। इसके अनुसार ‘जो विषय प्रकरण में हितसाधन के योग्य हो– वह उचित है; जो विद्वज्जन मान्य एवं स्वीकृत हो, वह ‘उचित’ है; जो मूल प्रयोक्ता व्यक्ति ने जिस रूप में रखा या निश्चित किया हो, वह ‘उचित’ है; जो अपनी मर्यादा में सीमित हो, वह ‘उचित’ है तथा जो ग्रहण करने योग्य हो, वह ‘उचित’ है। इसी ‘उचित’ का भाव ही ‘औचित्य’ कहलाता है।

आजकल व्याकरण आदि के आधार पर पाठ-संशोधनों (वस्तुत: इसे संशोधन न कहकर ‘विकृति-निवारण’ एवं ‘मूलरूपान्वेषण’ कहा जाना चाहिए) का विरोध करने वालों के हाथ एक तुरूप का पत्ता जैसा लग गया है, और इनके द्वारा ‘इस्लाम खतरे में’ जैसे भयादोहन की प्रक्रिया अपनाकर सामान्य धर्मश्रद्धालु जनता को भड़काया एवं उत्तेजित किया जा रहा है। इसे ‘णमोकार महामन्त्र’ के ‘णमो अरिहंताणं’ पाठ के बारे में ‘णमोकार मन्त्र में फेरबदल’ जैसे आरोप लगाकर धर्मप्राणजनों को जो दिग्भ्रमित किया जा रहा है; इसके बारे में निष्पक्ष एंव प्रमाणिक निराकरण जनहित में मैं अपेक्षित समझता हूँ। जनसामान्य को इसके औचित्य का बोध कराना ही प्रस्तुत प्रयास का उद्देश्य है। प्रथमत: यह स्पष्ट कर देना अपेक्षित है कि ‘षट्खण्डागमसूत्र’ (छक्खंडागमसुत्त) के रचियता आचार्य पुष्पदन्त ने इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में ‘निबद्ध मंगल’ के रूप में ‘णमोकार महामन्त्र’ की रचना की थी। स्वयं धवलाकार आचार्य वीरसेन स्वामी भी इस तथ्य हो स्वीकारते हैं –

‘‘........ पुप्फदंताइरियो मंगलादीणं छण्हं सकारणाणं परूवणट्ठं सुत्तमाह’’–

अर्थ– पुष्पदन्त आचार्य सकारण मंगलादिक छहों अधिकारों का व्याख्यान करने के लिए मंगल-सूत्र कहते हैं–

यह णमोकार मन्त्र की उत्थानिका का वाक्य है। और इस वाक्य के बाद आगत गाथासूत्रबद्ध णमोकार महामन्त्र में जो प्रथम चरण है, उसमें ‘णमो अरिहंताणं’ ही पाठ है। इस प्रकार ‘णमो अरिहंताणं’– यह प्रयोग मूलरूप में आचार्य पुष्पदन्त ने किया है; यह बात स्पष्ट होती है। यह तथ्य डॉ. ए.एन. उपाध्ये और डॉ. हीरालाल जैन ने भी अपने सम्पादकीय वक्तव्य में स्वीकारा है–

‘‘आ० वीरसेन कृत धवला टीका से यह संकेत मिलता है कि उसके (णमोकार मंत्र के) आदिकत्र्ता आचार्य पुष्पदन्त ही हैं।’’ (धवला पु० १, भाग १, सम्पा० पृ० ५)

‘णमो अरिहंताणं’ में आगत इकारयुक्त ‘अरिहंताणं’ पद की सार्थकता सिद्ध करते हुए आचार्य वीरसेन स्वामी व्याख्या करते हैं–

‘अरि हननाद् अरिहन्ता’, ‘रजो हननाद् वा अरिहन्ता’, ‘रहस्याभावाद् वा अरिहन्ता’, अतिशय पूजार्हत्वाद् वा अर्हन्ता:।’ (षट्खण्डागम, भाग १, पृ० ४२)

यहाँ पर या तो ‘अरिहन्त’ पाठ लिया है या ‘अर्हन्त’, किन्तु ‘अरहंत’ पाठ की तो उन्होंने संभावना तक व्यक्त नहीं की है। धवलाकार की इसी व्याख्या को कविवर दौलतराम जी ने अपनी ‘देव-स्तुति’ में ज्यों का त्यों प्रयुक्त किया है–

‘‘सो जिनेन्द्र जयवन्त नित, अरि-रज-रहस-विहीन।’’

यह व्याख्या एवं चिन्तन वीरसेन स्वामी (सातवीं शता० ई०) से लेकर दौलतराम जी (उन्नीसवीं शता० ई०) तक अनवरत रूप से निर्विरोध स्वीकृत रहा कि णमोकार मन्त्र में ‘अरिहंताणं’ पाठ ही है, ‘अरहंताणं’ नहीं।

इन धुरन्धर आचार्यों एवं विद्वानों के तर्क-आगम एवं युक्तिसम्मत उक्त तथ्य को चुनौती देने का मन बीसवीं सदी के विद्वानों ने बनाया है। जो कि ‘प्रमाण’ की दृष्टि से स्पष्टत: औचित्य का उल्लंघन है। अब इनकी ‘प्रज्ञा’ के औचित्य पर भी थोड़ा विचार करें। प्रकरण है णमोकार महामन्त्र में ‘अरिहंताणं’– इस इकारयुक्त पाठ का, जिसमें ‘अरहंताणं’ विकल्प कतई उल्लेख योग्य भी नहीं है। किन्तु ये विद्वानकहीं भ्रम, असावधानी या अज्ञानवश लिखे/छपे हुए ‘अरहंताणं’ पाठ का जबरन औचित्य अपने बुद्धिबल से सिद्ध कर रहे हैं। इनके तर्क भी सुनने योग्य है। ये कहते है कि ‘‘प्राकृत ग्रन्थों में अन्यत्र (णमोकार मन्त्र के अतिरिक्त) ‘अरहंत’ रूप भी मिलता है।’’ यह तो ऐसी ही असंगत बात हुई कि जैसे कोई पूछे कि ‘एक हवाई जहाज पाँच सौ कि०मी० प्रति घंटे की गति से उड़ रहा है, तो बताओं मेरी उम्र क्या है ?’ यहाँ जैसे हवाई जहाज की गति और प्रश्नकत्र्ता की आयु इन दोनों प्रश्नों की संगति नहीं होने से यह प्रशन औचित्यरहित हैं। इसी प्रकार प्रश्न है णमोकार महामन्त्र में ‘अरिहंताणं’ पाठ होने का तथा दृष्टान्त अन्य कहीं का दिया जा रहा है। भले ही अन्यत्र ‘अरहंत’ प्रयोग मिलता हो, परन्तु इससे णमोकार महामन्त्र में ‘अरहंताणं’ प्रयोग आचार्य पुष्पदन्त ने किया था, ‘अरिहंताणं’ नहीं– यह कैसे कहा जा सकता है। अत: ऐसा अनावश्यक व असंगत प्रज्ञा-प्रयोग औचित्यहीन है।

वे अपने प्रज्ञा-प्रयोग का दूसरा नमूना प्रस्तुत करते हैं, कि ‘अरि-हननात् - अरिहंत’– ऐसी व्यख्या हिंसक व्याख्या है। क्योंकि इसमें कर्मरूपी शत्रुओं के नाश की चर्चा होने से इसमें हिंसा की बू आती है। धन्य हैं ऐसे लोग; अहिंसा महाव्रत के धनी परम तपस्वी आचार्य वीरसेन ने यह व्याख्या प्रस्तुत की है, तब तो ऐसी व्याख्या करने से इनकी दृष्टि में उनका अहिंसा महाव्रत भी अतिचारयुक्त हो गया होगा। प्रज्ञा का ऐसा दुष्प्रयोग मात्र खेद व्यक्त करने के योग्य ही कहा जा सकता है, औचित्यपूर्ण कदापि नहीं।

अत: विद्वानों से इस प्रसंग में निवेदन हे कि वे औचित्य का उल्लंघन न करें तथा ‘णमो अरिहंताणं’ इस पद का अवबोध करें और अपनी ‘प्रज्ञा’ के औचित्य का प्रदर्शन करें।

‘औचित्य’ की महिमा का गान करते हुए कविवर पं. आशाधर जी लिखते हैं–

‘‘गुणकोट्या तुलाकोटिं यदेकमपि टीकते ।

तदप्यौचित्यमेकान्त लब्धय गरलायते ।।’’ (अनगार धर्मामृत ६/२५)

अर्थ– वह अकेला ही औचित्य गुण करोड़ों गुणों की तुलना में भारी पड़ता है, और वही औचित्यगुण लोभी मनुष्य को विष के तुल्य प्रतीत होता है। योगशास्त्र १/९ में कहा हैं –

‘‘औचित्यमेकत्र गुणानां कोटिरेकत:’’

अर्थ– करोड़ों गुणों को एक ओर रखा जाय और औचित्य अकेले को एक ओर रखा जाये, तो वह अकेला ही उन सब से भारी होगा।

अत: प्रस्तुत प्रकरण में णमोकार महामन्त्रगत ‘अरिहंताणं’ प्रयोग हित-साधन (कर्मारि विनाश), विद्वज्जनमान्य (वीरसेनस्वामी द्वारा पुष्ट), मूल प्रयोक्ता के द्वारा इसी रूप में प्रयुक्त (आचार्य पुष्पदन्त द्वारा प्रयुक्त), महामन्त्र की मर्यादा में इसी रूप (अरिहंताणं रूप) में ही सीमित एवं आधुनिक विद्वानों के द्वारा भी ग्रहण करने योग्य बताया (धवला के सम्पादकद्वय द्वारा संपुष्ट) होने से औचित्यपूर्ण ही है और इसके स्वरूप पर प्रश्नचिह्न अंकित करने वाले ‘प्रज्ञा’ व ‘प्रमाण’ के सभी प्रयोग औचित्यरहित होने से उपेक्षणीय हैं।

डॉ. सुदीप जैन

प्राकृत विद्या जुलाई-सितम्बर १९९५ अंक २ पेज नं. ४ से ७