ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अंतिम संस्कार में सामाजिक संगठन की भूमिका

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अंतिम संस्कार में सामाजिक संगठन की भूमिका

हमारे देश में प्रचलित परम्पराओं के अनुसार मनुष्य के जन्म से मृत्यु पर्यन्त सोलह संस्कार किये जाते हैं। हीनाधिक रूप में यह सभी सम्प्रदायों में माने जाते हैं, जिनमें अंतिम संस्कार सर्वत्र व्याप्त है। अंतिम संस्कार की पद्धतियाँ भले ही भिन्न हों, किन्तु उद्देश्य एक ही है, मृत देह को विर्सिजत करना। धर्म, संप्रदाय एवं क्षेत्रीय सुविधाओं के अनुरूप देह जो कि पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के संयोग से र्नििमत है, का निष्प्राण होने पर इन्हीं तत्त्वों में विलीन करने के लिये पृथ्वी में गाड़ना, जल में प्रवाहित करना, अग्नि में भस्म करने की प्रथायें आम प्रचलित हैं। मनुष्य के जीवित अवस्था एवं जन्म पूर्व किये जाने वाले संस्कारों के आयोजन में परिवार, संबंधी मित्र एवं अन्य समाजजन आयोजक परिवार के आमंत्रण पर सम्मिलित होते हैं। किन्तु एकमात्र अंतिम संस्कार में लोग सामाजिक दायित्व का निर्वहन हेतु स्वत: ही सम्मिलित होते हैं। हमारे पूर्वजों ने अपने दीर्घ अनुभवों के आधार पर सामाजिक नियम एवं कर्तव्य निर्धारित किए जो आज भी यथावत परंपराओं के रूप में प्रचलित हैं। इन परंपराओं में पूर्वजों का दीर्घ अनुभव वैज्ञानिक दृष्टि एवं प्रखर िंचतन है, जो हमारी र्धािमक मान्यताओं के अनुरूप होकर सामाजिक अनुशासन एवं कर्तव्यों का बोध कराता है। किसी परिवार में जब किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तब सभी परिवारजन शोक संतप्त होकर कर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। मोह व ममत्व के वशीभूत प्रियजन की मृत देह का अंतिम संस्कार करने का न तो उनमें सोच ही उपजता है और न ही साहस। इसी अवसर पर हमारा सामाजिक कर्तव्य हमें प्रेरित करता है कि हम उस परिवार में उपस्थित दुखद प्रसंग पर परिवारजनों को धैर्य बंधावें, तथा उत्तर क्रियाओं की व्यवस्था संपन्न कराये जाने में सहभागी बनें। पूर्वजों ने इस अवसर पर की जाने वाली क्रियाओं को अत्यन्त ही विवेक एवं चतुराई से रचा है। अंतिम संस्कार के अवसर पर उपस्थित समाजजन शव स्नान के निमित्त शव को निर्वस्त्र देखकर प्रथम दृष्ठ्या ही यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि मृतक की देह पर किसी तरह की दुर्घटना, प्रताड़ना या विषादि अभक्ष्य भक्षण के चिन्ह नहीं हैं। इसकी मृत्यु स्वाभाविक ही हुई है। इसी के बाद शव के अंतिम संस्कार की तैयारियाँ उपस्थित समाजजन के द्वारा की जाती है। शवयात्रा के प्रारंभ में अर्थी में परिवारजन द्वारा पहले उठाये जाने की प्रथा है। मृतक के निकटतम नातेदार यथा पुत्र, भाई आदि अर्थी को सबसे पहले उठाकर घर से बाहर लाते हैं, तब समाजजन परस्पर सहयोग से शव को संस्कार स्थल तक ले जाते हैं। इस प्रक्रिया का आशय संभवत: इस आक्षेप से बचना है कि परिवार का कोई सदस्य यह न कह सके कि उनके संबंधी का शव समाजजन बलात उठा कर ले गये। शवदाह स्थल पहुँचने के पूर्व शव को एक स्थान पर रखकर मृतक के मुख में जल आदि डालने का उपक्रम किया जाता है। यह अंतिम परीक्षण है, जिसके द्वारा समाजजन पूरी तरह निश्चित कर लेते हैं कि मृतक में जीवन के कोई लक्षण शेष नहीं हैं। इसके बाद ही शव का अंतिम संस्कार किया जाता है। आज कई नगरों में तथा अनेक गाँवों में भी विकसित एवं ऐसे सुविधासंपन्न शवदाह स्थल बना दिये गये हैं, जहाँ शवदाह संबंधी सभी सामग्री उपलब्ध हो जाती है, पूर्व काल में ऐसी व्यवस्थाएँ एवं सुविधा न होने के कारण अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने वाले सभी जन अपने अपने घर से लकड़ी कण्डे आदि दाह की सामग्री साथ लेकर आते थे, तथा इस तरह सामाजिक सहयोग से शव का अंतिम संस्कार किया जाता था। अब इस परम्परा का निर्वाह उन्नत श्मशान स्थलों पर कण्डे के कुछ टुकड़े करके रख दिये जाते हैं, जिन्हें समाजजनों के द्वारा चिता में डाल कर किया जाता है। अंतिम संस्कार के उपरान्त समाजजन शोकाकुल परिवार के सदस्यों से सहानुभूति संवेदना प्रकट करने आते हैं। इस तरह परिवारजनों को ढाढस तथा दुखद वातावरण से उबरने का संबल मिलता है। अनन्तर समाज के प्रबुद्ध व वरिष्ठजन शोक संतप्त परिवारजन को संबोधते हैं एवं संसार की असारता तथा मृत्यु की अपरिहार्यता का बोध कराते हैं तथा एक निश्चित समय पर सामूहिक रूप से एकत्र होकर उन्हें अपने—अपने व्यवसाय कार्य पूर्ववत करने के लिये प्रेरित करते हैं। इस तरह शोक ग्रस्त परिवार में जो अकर्मण्यता और निष्क्रियता व्याप्त हो जाती है, उसे समाप्त कराते हैं, या कि जो शोक बैठक परिवार में हो गई है, उसका उठावना कराते हैं। इसी क्रिया का उठावना के रूप में प्रचलन है। अंतिम संस्कार में हमने देखा है कि समाज की भूमिका अत्यन्त प्रमुख है। किन्तु समाज में दिन ब दिन आती जा रही अनुशासनहीनता ने सामाजिक संगठनों को शिथिल बना दिया है, संगठन के प्रमुख एवं पदाधिकारीगण भी अपने दायित्व निर्वहन के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। जब हम समाचारपत्रों में किसी के निधन का उसके परिवार द्वारा दिये गये विज्ञापन को देखते हैं कि अमुक समय पर उनके यहाँ उठावना होगा तब एक विचार मन में आता है कि शोक बैठक उठाने का परिवारजन ने ही निर्णय ले लिया है, साथ ही एक प्रश्न भी उठता है कि क्या हम सब संदेवना शून्य भी होते जा रहे हैं। ऐसे विज्ञापनों को पढ़कर उक्त शोक संतप्त परिवार से किसी भी रूप से सम्बद्ध जन उठावने में जाते हैं, तथा उनसे मिलकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने स्वरूप हाथ जोड़ कर वापस आ जाते हैं, जबकि समाजजन, मित्र, संबंधी एवं संबंधितों का उस परिवार के शोक में सम्मिलित होने एवं उनसे प्रकट की गई सहानुभूति एवं संदेवनाओं से उपकृत परिवारीजन कृतज्ञतापूर्वक हाथ जोड़कर समाज के प्रति आभार प्रकट करते हैं जिसके प्रत्युत्तर में उपस्थितजन भी हाथ जोड़कर सामाजिक दायित्व बोध का आभास कराते हैं। इन्दौर में कुछेक समाज के सामाजिक संगठनों द्वारा अपने दायित्वों का निर्वाह किया जा रहा है, अन्यत्र यह व्यवस्था या परंपरा लगभग समाप्तप्राय हो चुकी है। यह कारण हमारा सामाजिक उत्तरदायित्वहीनता का बोधक है। हमने सामाजिक संगठनों के महत्व को नकार दिया है। समाज के अधिकांश वयोवृद्धजन को भली भाँति स्मरण होगा कि पूर्वकाल में हमारी पंचायतों का लगभग सभी संस्कारों के आयोजन में प्रभावी दखल हुआ करता था। काल व परिस्थितियों के परिवर्तन से यह व्यवस्थायें टूटती गर्इं, तथा हमारा अहम् तथा समाज की संगठनिक स्तर पर अवहेलना इसके मुख्य कारण रहे।


भानुकुमार जैन (गुनावाले) सन्मतिवाणी २५ अक्टूबर २०१५