ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अंधविश्वासों और परंपराओं का वैज्ञानिक विश्लेषण

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अंधविश्वासों और परंपराओं का वैज्ञानिक विश्लेषण

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एम.कृष्णा राव राज

हम भारतीय भले ही पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण कर आधुनिकतम होने का दम भरते हों पर सत्य यह है कि हम चाहकर भी अपनी संस्कृति, परम्पराओं तथा सामाजिक मान्यताओं से स्वयं को पृथक नहीं कर सकते। कुछ दशक पहले प्रकृति के अनेक अनसुलझे रहस्य थे जिन्हें हम चमत्कार ही मानते रहे। उनमें से जिन तथ्यों का हमे तक्तपूर्ण समाधान मिला, वे सामान्य होते गये और जो अनुसन्धान से वंचित रहे, वे रहस्य और अन्धविश्वास बन कर रह गए। हमारी यह नियत है कि हम किसी भी रीति रिवाज या परम्परा को धर्म से संयुक्त होने के कारण सहजता से स्वीकार कर लेते हैं। संभवत: यही विचार कर हमारे पूर्वजों ने बड़ी चतुरता एवं सूक्ष्मता से मानव कल्याण हेतु नियम बनाकर उन्हें धर्म से जोड़ दिया। वही अन्तत: रीति रिवाज या परम्परा के रूप में हमारे सामने हैं। यदि हम अंधविश्वासों या परम्पराओं को विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में रख इनका वैज्ञानिक विश्लेषण करें, तब हमें अनुभव होगा कि ये हर दृष्टि से हमारे लिए श्रेयस्कर ही हैं । कुछ अपवाद वातावरण को ध्यान में रख कर गढ़े गए। ऐसी ही कुछ परम्पराओं तथा अंधविश्वासों का वैज्ञानिक विश्लेषण हम यहां प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।

विवाह पूर्व हल्दी का उबटन—

आयुर्वेद के अनुसार हल्दी उष्ण, सौन्दर्यवर्धक व रक्तशोधक है। उष्ण होने के कारण ये उद्दीपक का कार्य करती है। हल्दी में जीवाणुओं को नष्ट करने की अपूर्व क्षमता होती है। इसी कारण एन्टीसेप्टिक गुण भी इसमें हैं। इसके कार्यशील घटक कुरकुमिन नामक यौगिक, सुगन्धित तेल, टरमेरिक ऑयल तथा टर्पीनाइड नामक पदार्थ है। हल्दी के उड़नशील तेल में एण्टी हिस्टेमिनिक एलर्जी विरोधी गुण पाए जाते हैं । हल्दी के इन्हीं गुणों के कारण वर वधू के शरीर की स्वच्छता एवं निरोगी काया हेतु इसका उपयोग विवाह पूर्व चार पांच दिन तक उबटन के रूप में किया जाता है जो कदापि निरर्थक नहीं है।

छींक द्वारा कार्य बाधित होना—

हम भली भांति जानते हैं कि संक्रामक रोगी की छींक , थूक और खांसी में उस रोग के असंख्य अदृश्य जीवाणु विद्यमान अवश्य होंगे जो संक्रामक रोगों का प्रसार करने में सक्षम होते हैं। टी.बी. इन्फ्लुएंजा, टाइफाइड, जुकाम के जीवाणुओं का प्रसार छींक अथवा खांसी द्वारा हो सकता है। सम्भवत: इसी बात को ध्यान में रखकर किसी के छींक देने पर रूक जाने का नियम बना दिया गया जो अन्धविश्वास बन गया। अब आप ऐसा न करें कि छींक की आवाज भर सुन लेने को अपशगुन मान लें।

तुलसी बिरवा सोहे हमार अंगना—

हमारे ऋषियों ने अनुभव किया कि तुलसी का पौधा एक नहीं सैकड़ों रोगों में लाभप्रद है। इसके द्वारा आस—पास का वातावरण भी शुद्ध तथा स्वास्थ्यप्रद रहता है। इसी कारण तुलसी को प्रत्येक घर में लगाना धर्म व कत्र्तव्य बताया गया। तुलसी केवल शारीरिक रोगों को ही दूर नहीं करती बल्कि मनुष्य के आन्तरिक भावों तथा विचारों पर भी कल्याणकारी प्रभाव डालती है । प्रात: दोपहर तथा संध्या के समय तुलसी का सेवन मनुष्य की काया को शुद्ध करता है । तुलसी की गंध मात्र से कृमि, खटमल व मच्छर दूर भाग जाते हैं । तुलसी पत्र का प्रयोग कफ, खांसी, ज्वर में अन्य औषधि द्रव्यों के साथ किया जाता हैं। यह दुर्गन्धनाशक है तथा दूषित कफ तथा वायु का शमन करती है । यह पित्रवद्र्धक है। इन्हीं गुणों के विद्यमान रहने से तुलसी को देवालय , तीर्थ स्थानों तथा घरों में लगाया जाता है । इसके अतिरिक्त आम्र पत्र, बेल, केला आदि को भी उनके गुणों के कारण पूजा के योग्य समझा गया।

आभूषणों का प्रयोग—

नथ, बाली, करधनी, बिछुए आदि आभूषणों का प्रयोग धर्मशास्त्रों में सिर्पâ विवाहित स्त्री के लिए किया गया।हमारे शरीर में ऐसे अनेक स्थान हैं जहां पर दबाव या बेधन द्वारा अन्य शरीर अंगों की चिकित्सा संभव है जो एक्युप्रेशर और एक्युपंक्चर चिकित्सा पद्धति का अंग हैं। इन आभूषणों के द्वारा शारीरिक क्रियाओं की असामान्यता दूर ही नहीं की जा सकती वरन् उनकी कार्य विधि को उत्प्रेरित भी किया जा सकता है। इन आभूषणों का प्रयोग स्त्रियोचित अंगों की कार्यविधि के उत्तेजक के रूप में किया जाता है, मसलन बिछुए के दबाव द्वारा गर्भाशय को उत्तेजित किया जाता है, साथ ही काम वासना को बढ़ाने में भी बिछुए का विशेष योगदान है। यही कारण है कि विधवा स्त्री को बिछुए धारण करने का अधिकार नहीं है।

पीपल के वृक्ष पर भूतों का वास—

यह एक सामान्य ज्ञान की बात है कि पीपल का पेड़ रात में सर्वाधिक कार्बनडायऑक्साइड निष्कासित करता है । सम्भवत: इसीलिए यह भय बना दिया गया ताकि रात्रि में कोई इसके समीप न जाए।

होलिका दहन—

होली का पर्व सर्वदा बसन्त ऋतु या पतझड़ के बाद ही आता है , इसी कारण पत्तों, टहनियों का ढेर लग जाता है जिसे जला देना ही उचित समझा गया ताकि आने वाली रबी की फसल के लिए साफ स्थान उपलब्ध हो सके। धीरे—धीरे यही प्रथा बन गई। बाले भून कर परस्पर वितरित करना इस बात का द्योतक है कि जिससे आने वाली फसल पकने का अनुमान लगाया जा सके। उपरोक्त तथ्यों पर विश्लेषण उदाहरण मात्र है। अगर आप हर परम्परा या अन्धविश्वास का सूक्ष्मता से अध्ययन करेंगे तब आपको उसमें निहित उद्देश्य अवश्य मिलेगा। प्रयास कीजिए, सफलता अवश्य मिलेगी।