ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अंधे के हाथ में लालटेन

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अंधे के हाथ में लालटेन

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पगडंडी गाँव की ओर जा रही थी। पगडंडी पर एक अंधा हाथों में लालटेन लिये आगे बढ़ रहा था । अंधे ने हाथ में लालटेन तो लिया है किन्तु लालटेन का प्रकाश पगडंडी पर पड़ रहा है। लेकिन अंधे के लिये प्रकाश का क्या महत्व।

तभी सामने से आते हुए राहगीर ने पूछा—बाबा आंखों से दिखता नहीं तब ये लालटेन के प्रकाश से तुम्हें क्या लाभ है ? ये तुम्हारे हाथों में लालटेन किस काम का। अंधे ने कहा—भाई मुझे तो नहीं दिखता क्योंकि आँखे नहीं है। लेकिन आजकल आंखो वालों को नहीं दिखता अतएव लालटेन लेकर चल रहा हूँ ।

अंधे के इस उत्तर से आंख वाला राहगीर चुप और अवाक् रह गया।

बच्चों! आज आंख वालों के पास आँखे तो हैं लेकिन हम देखने की दृष्टि खो चुके हैं। आंख और दृष्टि में यही भेद है। दृष्टिस्पष्ट है तो आंखे सहयोगी है। नहीं तो आँखे के होते हुए भी हम अंधे हैं।

बोलती कथाओं से साभार