ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अकालमृत्यु विजय

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अकालमृत्यु विजय

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पात्रानुक्रमणिका श्री विजय महाराजा पोदनपुर के नरेश विजयभद्र युवराज पुरोहित निमित्तज्ञानी सुमति मंत्री सुबुद्धि ’’ बुद्धिसागर ’’ मतिसागर ’’ सभासद ’’ प्रजा के लोग दो चंवरवाहक द्वारपाल सेठ-सेठपुत्र (पोदनपुर का राजदरबार लगा हुआ है। श्री विजय महाराज की दार्इं तरफ भद्रासन पर युवराज आसीन हैं। आजू-बाजू में मंत्रीगण बैठे हुए हैं और कुछ सभासद लोग भी बैठे हुए हैं।)

प्रथम दृश्य

राजा श्रीविजय—(प्रसन्नमना मंत्रियों को देखते हुए) मंत्रिवर! कहिये, अपने राज्य में सर्वत्र कुशल मंगल तो है ?

सुमति—हाँ महाराज! आपकी प्रजा आपकी न्यायनिपुणता और प्रजावत्सलता को देखकर भगवान बाहुबली के राज्य का स्मरण कर रही है।... इसी बीच में द्वारपाल आकर नमस्कार कर निवेदन करता है—

द्वारपाल—राजाधिराज! एक पुरोहित महाराज अंदर आना चाहते हैं।

राजा—ठीक है, उन्हें आने दो। द्वारपाल बाहर जाकर पुरोहित को साथ लेकर पहुँच जाता है।

पुरोहित—महाराजाधिराज की जय हो, नंदो, वर्धो। (कुछ रुककर) हे राजन्! मेरी बात ध्यान देकर सुनिये। ‘आज से सातवें दिन पोदनपुर के राजा के मस्तक पर महावङ्का गिरेगा, अत: शीघ्र ही इसके प्रतिकार का विचार कीजिये।’

युवराज—(क्रोध से आँख लाल करते हुए) यदि तू सर्वज्ञ है तो बता कि उस समय तेरे मस्तक पर क्या गिरेगा ?

पुरोहित—(गंभीर मुद्रा में) उस समय मेरे मस्तक पर अभिषेक के साथ रत्नवृष्टि पड़ेगी।

राजा—(आश्चर्य से) हे भद्र! तुम इस आसन पर बैठो और बताओ, आपका गोत्र क्या है ? आपके गुरु कौन हैं ? क्या-क्या शास्त्र पढ़े हैं ? क्या-क्या निमित्त जानते हैं ? आपका क्या नाम है ? और आपका यह आदेश किस कारण हो रहा है ?

पुरोहित—मैं ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुआ हूँ। एक दिगम्बर मुनि के पास मैंने अनेक शास्त्रों को पढ़ा है साथ ही अष्टांग निमित्त शास्त्रों का भी अध्ययन किया है। आज कुछ निमित्तों से मैंने यह निश्चय किया जो कि आपके हित की भावना से आपके समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। (सभा को विसर्जित करके राजा मंत्रशाला में मंत्रियों से वार्तालाप कर रहे हैं।)

राजा—मंत्रियों! इस निमित्तज्ञानी की बात पर विश्वास करो। चूँकि इसने दिगम्बर गुरु के पास निमित्त शास्त्र पढ़े हैं अत: अब शीघ्र ही इस अनिष्ट का परिहार सोचो। भला मूल का नाश उपस्थित होने पर विलम्ब कौन करेगा ?

सुमति—राजन्! आपकी रक्षा के लिये मैंने बहुत ही अच्छा उपाय सोचा है।

युवराज—वह क्या ?

सुमति—वह यह है कि महाराजा को लोहे की सन्दूक में बिठाकर, बन्द करके उसे समुद्र में रख दीजिये। सात दिन बाद वह सन्दूक निकालिये। भला वहाँ महावङ्का क्या कर सकेगा ?

सुबुद्धि मंत्री—नहीं, नहीं, वहाँ तो मगरमच्छ आदि का भय हो सकता है, अत: महाराज को विजयार्ध पर्वत की गुफा में रख देंगे।

बुद्धिसागर—नहीं, नहीं, वहाँ पर भी अजगर आदि िंहसक प्राणियों का भय हो सकता है। अत: ये दोनों ही उपाय हमें नहीं जँचे। (बीच में ही)

मतिसागर—देखो, निमित्तज्ञानी ने तो यही कहा है कि ‘पोदनपुर नरेश पर वङ्कापात होगा’, उसने श्रीविजय का नाम तो नहीं लिया है अत: हमको ऐसे समय धर्म की ही शरण लेनी चाहिये। किसी दूसरे मनुष्य को पोदनपुर का राजा बना दो और महाराज सात दिन तक राज्य का त्याग कर जिनमंदिर में बैठकर शांति का अनुष्ठान करें। इस विधि से तो महाराज के दोनों ही हाथ में लड्डू हैं। यदि धर्म के प्रभाव से अकालमृत्यु का योग टल गया तो महाराज पुन: राज्य सुख का अनुभव करेंगे और यदि कदाचित् मरण भी हो गया तो समाधिपूर्वक मरण होने से स्वर्ग में महद्र्धिक देवपद को प्राप्त करेंगे। इसलिये धर्म की शरण लेने में चिंता की कोई बात नहीं रह जाती है।

युवराज—(खुश होकर) वाह! मंत्री महोदय वाह!! आपने बहुत ही अच्छी राय दी है।

बुद्धिसागर—भाई! मैंने तो अनेक बार यही सुना है कि ‘‘मणि मन्त्र तन्त्र बहुत हैं पर ‘निंह’ मृत्यू कोई टाल सके। जिनवर के सिवाय न कोई है जो मृत्यू को संहार सके।’’

मतिसागर—(हँसकर) भाई! तुमने जैनाचार्यों का उपदेश नहीं सुना है इसीलिये ऐसा कह रहे हो। देखो, ‘देव नारकी’ भोगभूमिया, मनुष्य और तिर्यंच तथा चरम और उत्तम शरीरधारी कर्मभूमिया मनुष्य इनके सिवाय अन्य मनुष्य तिर्यंचों का अकालमरण हो सकता है।

युवराज—अकाल मरण क्या है ?

मतिसागर—विष से, वेदना से, रक्तक्षय हो जाने से, भयभीत हो जाने से, शस्त्र लग जाने से, संक्लेश परिणामों से, भोजन-पान न मिलने से और श्वासोच्छ्वास के निरोध से असमय में भी आयु का घात होकर अकाल मृत्यु हो जाती है अर्थात् आयु कर्म की उदीरणा हो जाती है और इस अकाल मृत्यु को टालने के लिये चिकित्साशाला, औषधिदान आदि प्रयोग हैं, अन्यथा ये सब व्यर्थ हो जावेंगे। महामृत्युंजय मंत्र, विधान आदि भी अकालमृत्यु का निवारण कर देते हैं। हाँ, यदि किसी की आयु पूर्ण ही हो चुकी है तो फिर कोई प्रयोग काम नहीं कर सकते हैं। किन्तु फिर भी जिनेन्द्र देव, धर्म और गुरु की शरण लेकर समाधिपूर्वक मरण करने वाले को नियम से स्वर्ग गति प्राप्त होती है। इसलिये कदाचित् राजा के अकाल मरण का योग होगा तो वह टल भी सकता है और नहीं टला तो परलोक में इससे भी अधिक इन्द्र का वैभव प्राप्त करेंगे।

राजा—बहुत ठीक, बहुत ठीक, मन्त्रिवर! आप की राय मुझे सर्वथा पसंद है। (सभा विसर्जित हो जाती है।) पटाक्षेप

द्वितीय दृश्य

(मंत्री लोग राज्यसिंहासन पर पाषाण की एक यक्ष प्रतिमा बनवाकर उसका राज्याभिषेक करके स्थापित कर देते हैं। चँवरवाहक चँवर ढोर रहे हैं।) मतिसागर—(प्रतिबिम्ब के सामने हाथ जोड़कर) ‘तुम्हीं पोदनपुर के राजा हो! (सभासदों की तरफ देखकर) जय हो, पोदनपुर नरेश की जय हो।’ (उधर राजा सात दिन के लिये राज्यपद छोड़कर श्वेत धोती दुपट्टा धारणकर मंदिर में नियम सल्लेखना लेकर भक्तमण्डली के साथ बैठे हुए पूजा कर रहे हैं।)

राजा—(भगवान के सामने घुटने टेककर) हे जिनेन्द्र देव! यदि मैं सात दिन जीवित रहा तो पुन: अन्न जल ग्रहण करूँगा अन्यथा मेरे चतुराहार का त्याग है। वैसे ही सात दिन के लिये मेरे ऊपर में जो परिग्रह है उसके अतिरिक्त सम्पूर्ण परिग्रह, राज्य पाट, स्त्री, पुत्र आदि का पूर्णतया त्याग है। यदि मैं इस अकाल मृत्यु से बच जाउँगा तो पुन: ग्रहण करूँगा अन्यथा सब कुछ त्याग है। (नमस्कार करके पूजा शुरू कर देता है। भक्त लोग भी साथ ही साथ पूजा बोल रहे हैं।)

श्री आदिनाथ जी के चरण कमल पर, बलि-बलि जाऊँ मन वच काय।

हे करुणानिधि भवदु:ख मेटो, याते मैं पूजूँ प्रभु पाय।।

(अकस्मात् भयंकर शब्द होता है और पाषाण की बनी राजा की मूर्ति पर वङ्कापात हो जाता है, मूर्ति के खण्ड-खण्ड हो जाते हैं। चारों तरफ हाहाकार मच जाता है। उधर मंदिर में राजा सुरक्षित बैठे हुए हैं। मंत्री लोग और तमाम प्रजाजन पहुँचकर देवदर्शन करके जय-जयकार करते हुए कहते हैं।)

सभासद—हे तीन लोक के नाथ जिनेन्द्र देव! आपकी जय हो, जय हो। आपकी भक्ति के प्रसाद से आज महाउपद्रव टल गया है।

राजा—(पूजा पूर्ण करके उठकर एक तरफ आकर) कहो मंत्रियों, कहो! क्या समाचार लाये हो ?

मंत्री—महाराज! जिनेन्द्रदेव के प्रसाद से आपके सब अमंगल दूर हो गये हैं। आज राज्यसिंहासन पर स्थापित मूर्ति पर वङ्कापात हो गया है और आप यहाँ प्रभु के चरण सान्निध्य में सुरक्षित बैठे हुए हैं। जय हो, जय हो, जैनधर्म की जय हो। अहो! धर्म की महिमा अपरम्पार है।

युवराज—(खुशी से उछलकर) अहो! आज हमारे महाराजा अकालमृत्यु पर विजयी हो गये हैं।

मतिसागर—हों भी क्यों न, जबकि वे मृत्यु के विजयी जिनेन्द्रदेव की शरण में बैठे हुए हैं। (सब लोग भगवान की स्तुति करते हैं।)

त्वामामनंति मुनय: परमं पुमांसमादित्यवर्णममलं तमस: पुरस्तात्।

त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयंति मृत्युं , नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पंथा:।।

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तृतीय दृश्य

(रथयात्रा महोत्सव हो रहा है। मध्य में नागरिक लोग चर्चा कर रहे हैं।)

सेठ—(पुत्र से) देखो बेटे! धर्म का प्रभाव देखो। आज अपने महाराजा श्रीविजय अकालमृत्यु से बचकर नये जन्म को प्राप्त हो गये हैं और इसी खुशी में सारे शहर में खुशियाँ मनाई जा रही हैं। इधर देखो, यह रथयात्रा महोत्सव हो रहा है। आज मंत्रियों ने बहुत बड़ा जिनयज्ञ महोत्सव सम्पन्न किया है।

सुभद्र—हाँ पिताजी! आज मंदिर में १००८ कलशों से देवाधिदेव भगवान का महाशांति अभिषेक किया गया है। (रथयात्रा चली जाती है। राजदरबार में राजा को राज्यपट्ट बाँधकर पुन: राजा घोषित किया जाता है।)

मतिसागर—महाराज का राज्याभिषेक सम्पन्न हो चुका है। अब आज से पुन: अपने श्रीविजय महाराज इस पोदनपुर के राज्यभार को संभालेंगे। (हाथ से महाराज के राज्यपट्ट बाँधते हुए।)

बुद्धिसागर—जय हो, पोदनपुर नरेश श्रीविजय महाराज की जय हो। (सभी सभासद एक साथ जयघोष करते हैं।)

राजा—मंत्रिवर! अब सर्वप्रथम आप उन निमित्तज्ञानी पुरोहित को बुलाइये।

मंत्री—हाँ महाराज! वे अभी आ रहे होंगे। (द्वारपाल के साथ पुरोहित जी प्रवेश करते हैं।)

राजा—(अभिवादन करते हुए) पंडितजी! आइये।

पुरोहित—(आशीर्वाद देते हुए) महाराजाधिराज की जय हो, नन्दो, वर्धो, चिरकाल तक पृथ्वी का पालन करो।

मतिसागर—पण्डितजी! आपके निमित्त से आज हमारे श्रीविजय महाराज का बहुत बड़ा अनिष्ट योग टल गया है और वे पुनर्जीवन प्राप्त करके हमारे बीच में विराजमान हैं।

युवराज—(प्रसन्नमना) अहो! विद्वन्! आपके प्रसाद से ही हमारे महाराज आज हमें दर्शन दे रहे हैं।

पुरोहित—युवराज! प्रसाद तो जिनेन्द्रदेव का ही है। मैं तो पूर्व सूचना दे देने से उसमें निमित्त मात्र हूँ।

राजा—अच्छा! मंत्रियों! पण्डितजी को पद्मिनीखेट गाँव सहित सौ गाँव भेंट में दिये जाएं। इन्हें उन गाँवों का राजा घोषित करके इनका राज्याभिषेक किया जाए और बहुत से रत्न इन्हें भेंट में दिये जाएं।

मंत्री—जो आज्ञा महाराज! (पद्मिनीखेट गाँव में पुरोहित का राज्याभिषेक करके उन्हें सौ गाँवों का अधिकार दिया जाता है और उसी समय खुश होकर उनके परिवार के लोग उनके मस्तक पर रत्नों की वर्षा करते हैं।)

युवराज—जय हो, अमोघजिह्व राजा की जय हो।

सभासद—जय हो, दिगम्बर जैन साधुओं की जय हो, जैन धर्म की जय हो।

पटाक्षेप

सूत्रधार द्वारा—बन्धुओं! आकस्मिक विमान दुर्घटना, रेल दुर्घटना, बस दुर्घटना, बाढ़, अग्नि आदि अनेक कारणों से एक साथ तमाम मनुष्यों की मृत्यु देखने-सुनने में आती रहती है। जैनागम के अनुसार प्राय: ये अकालमृत्यु कहलाती है। भयंकर युद्धों में भी अकालमरण होते थे। श्रीकृष्ण और जरासंध के युद्ध के प्रकरण में उत्तरपुराण में लिखा है कि ‘आगम में जो मनुष्यों का कदलीघात नाम का अकाल मरण बतलाया गया है उसकी उससे अधिक संख्या यदि हुई थी तो उस युद्ध में हुई थी ऐसा उस युद्ध के मैदान के विषय में कहा जाता है।’१ उसी प्रकार से ‘विसवेयणरत्तक्खय’ आदि रूप श्री कुन्दकुन्ददेव की गाथा, तत्त्वार्थसूत्र के द्वितीय अध्याय का अंतिम सूत्र ‘औपपादिकचरमोत्तमदेहासंख्येय-वर्षायुषोऽनपवत्र्यायुष:’ उपपाद से जन्म लेने वाले देव, नारकी, चरमोत्तम शरीरधारी और भोगभूमिया जीवों का अकालमरण नहीं होता है। तत्त्वार्थसूत्र की टीका करने वाले श्रीपूज्यपादाचार्य श्री अकलंक देव और आचार्य श्री विद्यानन्द महोदय ने भी अपने टीकाग्रन्थों में इस सूत्र के अर्थ में इनके अतिरिक्त अन्य जीवों का अकालमरण हो सकता है ऐसा स्पष्ट कहा है। इसलिये आज के युग में तद्भव मोक्षगामी चरमशरीरी न होने से प्रत्येक मानव का कत्र्तव्य है कि प्रवास में विमान, रेल, मोटर आदि वाहनों पर चढ़ते समय महामंत्र का स्मरण कर लेवें तथा हो सके तो जब तक वाहन में बैठें उतने समय तक चतुराहार आदि का त्याग भी कर देवें। कदाचित् कोई दुर्घटना हो गयी तो नियम से देवगति को प्राप्त करेंगे। यही कारण है कि आचार्यों ने कहा है कि ‘उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते, सोते-जागते और प्रत्येक कार्य करते हुए भी प्रतिक्षण महामन्त्र णमोकार मंत्र का स्मरण करते रहना चाहिये।