ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अकिन्चनता-

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अकिन्चनता :

भूत्वा च निस्संग:, निजभावं निगृह्य सुखदु:खम्।

निद्र्वन्द्वेन तु वर्तते, अनगार: तस्याऽऽकिन्चन्यम्।।

—समणसुत्त : १०५

जो मुनि सब प्रकार के परिग्रह का त्याग करा नि:संग हो जाता है, अपने सुखद और दु:ख भावों का निग्रह करके निद्र्वन्द्व विचरता है, उसके आिंकचन्य धर्म होता है।