ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अकृत्रिमवृक्षोंपरजिनमंदिर

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विषय सूची

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अकृत्रिम वृक्षों पर जिनमंदिर

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जम्बूद्वीप में जम्बूवृक्ष पर जिनमंदिर (त्रिलोकसार से)

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नील कुलाचल के समीप, सीता नदी के पूर्व तट पर सुदर्शन मेरु की ईशान दिशा में उत्तर कुरुक्षेत्र में जम्बूवृक्ष की स्थली है जिसका तलव्यास पाँच सौ योजन है ।।६३९।।१ वह स्थली अन्त में आधा योजन ऊँची,बीच में आठ योजन ऊँची , गोल आकार वाली और स्वर्णमयी है। उसके बीच में आठ योजन ऊँचा , बारह योजन भूव्यास एवं चार योजन मुख व्यास वाला एक पीठ या पीठिका है।।६४०।। उस स्थली के उपरिम भाग में बारह-बारह एक दूसरे को वेष्टित करती हुई स्वर्ण वलय सदृश आधे योजन ऊँची और ऊँचाई के आठवें भाग प्रमाण अर्थात् १/१६ योजन चौड़ी बारह अम्बुज वेदिकाएँ हैं ।।६४१।। वे १२ वेदियां चार-चार गोपुरों (दरवाजों) से युक्त हैं। बाह्य वेदिका की ओर से प्रारम्भ करके प्रथम और द्वितीय अन्तराल में शून्य अर्थात् परिवार वृक्षादि कुछ नहीं हैं । तीसरे अन्तराल की आठों दिशाओं में उत्कृष्ट यक्षदेवों के १०८ वृक्ष हैं।।६४२।। चौथे अन्तराल में पूर्व दिशा में यक्षी देवाङ्गनाओं के चार जम्बूवृक्ष हैं। पाचवें अन्तराल में वन हैं और उन वनों में चौकोर और गोल आकार वाली बावड़ियाँ हैं । छठे अन्तराल में किसी तरह की रचना नहीं है, वहाँ शून्य है।।६४३।। सातवें अन्तराल की चारों दिशाओं में (प्रत्येक दिशा में चार-चार हजार ) सोलह हजार वृक्ष तनुरक्षकों के हैं तथा आठवें अन्तराल में ईशान, उत्तर और वायव्य दिशाओं में सामानिक देवों के चार हजार वृक्ष हैंं।।६४४।। सातवें अन्तराल में चारों दिशाओं के मिलाकर कुल सोलह हजार वृक्ष उन्हीं उपर्युक्त यक्षों के अङ्गरक्षक देवों के वृक्ष हैं। नवमत्रये अर्थात् नौवें, दसवें और ग्यारहवें अन्तराल में आग्नेय, दक्षिण और नैऋत्य दिशाओं में अभ्यन्तर, मध्यम और बाह्य पारिषद देवों के क्रमश: बत्तीस हजार, चालीस हजार और अड़तालीस हजार जम्बूवृक्ष है।।६४५।।

विशेषार्थ :-नवम अन्तराल की आग्नेय दिशा में अभ्यन्तर पारिषद देवों के ३२००० वृक्ष, दसवें अन्तराल की दक्षिण दिशा में मध्यम पारिषद देवों के चालीस हजार वृक्ष और ग्यारहवें अन्तराल की वायव्य दिशा में बाह्य पारिषद देवों के ४८००० जम्बूवृक्ष हैं। बारहवें अन्तराल की पश्चिम दिशा में सेना महत्तरों के सात वृक्ष हैं। एक मुख्य वृक्ष सहित सर्व परिवार वृक्षों का प्रमाण पद्म वे परिवार पद्मों के प्रमाण से पाँच अधिक हैं।।६४६।।

विशेषार्थ :-बारहवें अन्तराल में पश्चिम दिशा में सेना महत्तरो के सात ही जम्बूवृक्ष हैं । इस प्रकार एक मुख्य जम्बूवृक्ष से युक्त सम्पूर्ण परिवार जम्बूवृक्षों का प्रमाण पद्मद्रह में स्थित श्रीदेवी के पद्म परिवारों के प्रमाण से पाँच अधिक हैं। यहाँ चौथे अन्तराल में चार अग्र देवांगनाओं के चार और एक मुख्य जम्बूवृक्ष इस प्रकार पाँच अधिक है। इस प्रकार-१±१०८ ± ४ ± १६००० ± ४००० ± ३२००० ± ४०००० ± ४८००० ± ७ · १,४०,१२० अर्थात् सम्पूर्ण जम्बूवृक्षों का प्रमाण एक लाख चालीस हजार एक सौ बीस है।

अर्ध योजन गहरी और एक कोश चौड़ी जड़ से युक्त तथा पीठ से दो योजन ऊँचे मरकत मणिमय, सुदृढ़ स्कन्ध से सहित जम्बूवृक्ष है। अपने स्कन्ध से ऊपर वङ्कामय, अर्ध योजन चौड़ी और आठ योजन लम्बी उसकी चार शाखाएँ हैं।।६४७।।

विशेषार्थ :-पीठ के बहुमध्य भाग में पादपीठ सहित मुख्य जम्बूवृक्ष है, जिसका मरकत मणिमय सुदृढ़ स्कन्ध पीठ से दो योजन ऊँचा, एक कोस चौड़ा और अर्ध योजन अवगाह (नींव) सहित है। स्कन्ध से ऊपर वङ्कामय, अर्ध योजन चौड़ी और आठ योजन लम्बी उसकी चार शाखाएँ हैं। वह जम्बूवृक्ष नाना प्रकार की रत्नमयी उपशाखाओं से युक्त, प्रवाल (मूँगा) सदृश वर्ण वाले पुष्प और मृदङ्ग सदृश फल से संयुक्त पृथ्वीकायमय है (वनस्पतिकाय नहीं) उसकी सम्पूर्ण ऊंचाई दस योजन है। मध्य भाग की इसकी चौड़ाई ६ योजन और अग्रभाग की चौड़ाई चार योजन प्रमाण है।।६४८।। उस जम्बूवृक्ष की जो शाखा उत्तरकुरुगत नील कुलाचल की ओर गई है, उस पर जिनमन्दिर है। अवशेष तीन शाखाओं पर यक्षकुलोत्पन्न आदर-अनादर नामक देवों के आवास हैं।।६४९।।

परिवारवृक्षों का प्रमाण और उनका स्वामित्व कहते हैं-

जम्बूवृक्ष का जो प्रमाण कहा गया है, उसका अर्धप्रमाण परिवार जम्बूवृक्षों का कहा गया है। ये सभी परिवार जम्बूवृक्ष आदर-अनादर देवों के परिवारों के आवासस्वरूप हैं।।६५०।।

विशेषार्थ :-परिवार जम्बूवृक्षों का प्रमाण मुख्य जम्बूवृक्ष के प्रमाण का आधा है तथा परिवार जम्बूवृक्षों की जो शाखाएँ हैं उन पर आदर-अनादर यक्ष परिवारों के आवास बने हुए हैं।

जम्बूद्वीप में शाल्मलीवृक्ष पर जिनमंदिर

सीतोदा नदी के पश्चिम तट पर, निषध कुलाचल के समीप, सुदर्शन मेरु की नैऋत्य दिशागत देवकुरुक्षेत्र में शाल्मली वृक्ष की मनोहारिणी रूप्यमयी स्थली है । वहाँ अपने १,४०,११९ परिवार शाल्मली वृक्षों सहित मुख्य शाल्मली वृक्ष है।।६५१।। शाल्मली वृक्ष का वर्णन भी जम्बूवृक्ष सदृश ही है। शाल्मली की दक्षिण शाखा पर जिनभवन और शेष तीन शाखाओं पर गरुड़कुमारों के स्वामी वेणु और वेणुधारी देवों के भवन हैं।।६५२।।

जम्बूद्वीप में जम्बूवृक्ष एवं शाल्मली वृक्ष की परिवार वृक्षों सहित संख्या

(१) जम्बूवृक्ष संबंधी कुल वृक्ष · १,४०,१२०

(२) शाल्मली वृक्ष संबंधी कुल वृक्ष · १,४०,१२० जम्बूद्वीप के कुल वृक्ष · २,८०,२४० (दो लाख अस्सी हजार दो सौ चालीस)

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धातकीखण्ड द्वीप में धातकीवृक्ष एवं शाल्मली वृक्षों पर जिनमंदिर (तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ से)

धातकीखण्डद्वीप के भीतर उत्तरकुरु और देवकुरु क्षेत्रों में धातकीवृक्ष स्थित हैं, इसी कारण इस द्वीप का ‘धातकीखण्ड’ यह सार्थक नाम है।।२६००।। इस द्वीप में उन धातकी वृक्षों के परिवार वृक्ष पांच लाख साठ हजार चार सौ अस्सी हैं।।२६०१।। ५,६०,४८०। उन वृक्षों पर सम्यक्त्वरूपी रत्न से संयुक्त और उत्तम भूषणों से भूषित आकृति को धारण करने वाले प्रियदर्शन और प्रभास नामक दो अधिपति देव निवास करते हैं।।२६०२।। इन दोनों देवों के परिवार देव आदर और अनादर देवों के परिवारदेवों की अपेक्षा दुगुणे हैं जो पूर्वोक्त वर्णन से संयुक्त हैं१।।२६०३।।

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अढ़ाई द्वीप में जम्बूवृक्ष आदि दस ही महावृक्ष हैं (लोकविभाग से)

अढ़ाई द्वीप में मेरु पर्वत को छोड़कर शेष जो पर्वत, वृक्ष , वक्षार और वेदिकायें स्थित हैं उनका अवगाढ अपनी ऊंचाई के चतुर्थ भाग १/४ प्रमाण है।।१३।। कुण्डों का विस्तार अपने अवगाह से छह गुणा (जैसे १०²६·६०, २०²६·१२०, ४०²६·२४०) तथा द्रह और नदियों का विस्तार अपने अवगाह से पचास गुणा है।।१४।।

चैत्यवृक्ष की ऊँचाई अपने अवगाह से डेढ़ सौ गुणी होती है। अढ़ाई द्वीपों में स्थित दस ही महावृक्ष जंंबूवृक्ष के समान कहे गये हैं ।।१५।। तालाब, कुण्ड, महानदियां तथा पद्मह्रद भी, ये अवगाह की अपेक्षा पूर्व अर्थात् जंबूद्वीपस्थ तालाब आदि के समान हैं परन्तु विस्तार में वे जंबूद्वीप के तालाब आदि से दूने-दूने हैं२।।१६।।

धातकीखण्ड द्वीप में वृक्षों की संख्या

पूर्व धातकीखण्ड द्वीप

(१) धातकी वृक्ष संबंधी कुल वृक्ष · २,८०,२४०

(२) शाल्मलि वृक्ष संबंधी कुल वृक्ष · २,८०,२४०

कुल मिलाकर · २,८०, २४० ± २,८०,२४० · ५,६०,४८० वृक्ष

पश्चिम धातकीखण्ड द्वीप

(१) धातकी वृक्ष संबधी कुल वृक्ष · २,८०,२४०

(२) शाल्मलि वृक्ष संबंधी कुल वृक्ष ·२,८०,२४०

कुल मिलाकर · २,८०, २४० ± २,८०,२४० · ५,६०,४८० वृक्ष

धातकीखण्डद्वीप संबंधी कुल वृक्ष ·२,८०,२४० ± २,८०,२४० ± २,८०,२४०± २,८०,२४० · ११,२०,९६० (ग्यारह लाख बीस हजार नौ सौ साठ) पुष्करार्धद्वीप में

  1. अनुप्रेषित लक्ष्य पृष्ठ नाम

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पुष्करवृक्ष एवं शाल्मली वृक्षों पर जिनमंदिर (जम्बूद्वीपपण्णत्ति से)

दोण्हं गिरिरायाजणं दोण्हं इसुगारणामसेलाणं।
सामलितरूण दोण्हं दोण्हं वरपउमरुक्खाणं।।७५।।

पुष्करवरद्वीप सम्बन्धी दो मेरु, दो इष्वाकार नामक शैल, दो शाल्मली वृक्ष, दो श्रेष्ठ पद्म (पुष्कर) वृक्ष हैं।।७५।।

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पुष्करार्ध द्वीप में पुष्कर वृक्ष (तत्त्वार्थर्वाितक से)

सूत्र-पुष्करार्धे च।।३४।।

यत्र जम्बूवृक्षस्तत्र पुष्करं सपरिवारं वेदितव्यम्।
तन्निवासी द्वीपाधिपतिः, तत एव तस्य द्वीपस्य नाम रूढं पुष्करद्वीप इति।

सूत्रार्थ — आधे पुष्करद्वीप में भी भरतादिक्षेत्र एवं हिमवन् आदि पर्वत दो-दो हैं।।३४।।

जम्बूद्वीप में जिस प्रकार जम्बूवृक्ष हैं उसी प्रकार परिवार, ऊँचाई आदि वाला पुष्करार्ध में पुष्कर नामक वृक्ष है। उस वृक्ष पर पुष्करद्वीप का अधिपति देव रहता है। पुष्करवृक्ष की अपेक्षा या रूढ़ि से इस द्वीप को पुष्कर कहते हैं।।५।।

पुष्करार्ध द्वीप में पुष्करवृक्ष एवं शाल्मली वृक्ष के परिवार वृक्षों सहित संख्या

पूर्व पुष्करार्ध द्वीप

(१) पुष्करवृक्ष संबंधी कुल वृक्ष · ५,६०,४८०

(२) शाल्मलिवृक्ष संबंधी कुल वृक्ष · ५,६०,४८०

कुल योग · ११,२०,९६०

पश्चिम पुष्करार्ध द्वीप

(१) पुष्करवृक्ष संबंधी कुल वृक्ष · ५,६०,४८०

(२) शाल्मलिवृक्ष संबंधी कुल वृक्ष · ५,६०,४८०

कुल योग · ११,२०,९६०

पुष्करार्धद्वीप संबंधी कुल वृक्ष · ५,६०,४८०± ५,६०,४८०± ५,६०,४८० ± ५,६०,४८० · २२,४१,९२० (बाईस लाख इकतालीस हजार नौ सौ बीस)

ढाई द्वीप के कुल वृक्षों की संख्या

२,८०,२४० ±११,२०,९६०± २२,४१,९२० ·३६,४३,१२०

(छत्तीस लाख तैतालीस हजार एक सौ बीस वृक्ष)

ये जितने वृक्ष हैं उतने ही जिनमंदिर हैं। इन सभी अकृत्रिम जिनमंदिर और उनमें विराजमान जिन-प्रतिमाओं को मेरा कोटि-कोटि नमस्कार होवे।