ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्ज एप पर मेसेज करें|

अकेलापन

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अकेलापन :

प्रत्येकम् प्रत्येकम् निजभाव्, कर्मफलमनुभवताम्।

क: कस्य जगति स्वजन:? क: कस्य वा परजनो भणित:।।

—समणसुत्त : ५१५

यहाँ प्रत्येक जीव अपने—अपने कर्मफल को अकेला ही भोगता है। ऐसी स्थिति में यहाँ कौन किसका स्वजन है और कौन किसका परजन ?

एगो य मरदि जीवो एगो य जीवदि सयं।

एगस्स जादि मरणं एगो सिज्झदि णीरयो।।

—नियमसार : १०१

जीव अकेला ही मरता है, अकेला ही जन्म लिया करता है। जन्म—मरण अकेले का ही होता है और वह अकेला ही कर्म—रज—रहित सिद्ध हुआ करता है।