ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अक्षय तृतीया पर्व का महत्त्व

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अक्षय तृतीया पर्व का महत्त्व

'लेखिका - आर्यिका श्री चंदनामती माताजी'
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ब्राह्मी-माताजी वंदामि! आज मैं आपसे अक्षयतृतीया पर्व के विषय मे जानना चाहती हूं। युगप्रवर्तक भगवान आदिनाथ को हुए करोड़ों-करोड़ों साल व्यतीत हो गए किन्तु क्या कारण है कि उनके प्रथम आहार दिवस अक्षयतृतीया को आज भी संपूर्ण भारतवासी विशेष पर्व के रूप में मनाते चले आ रहे हैं ?

माताजी-तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया। तृतीय काल में इस आर्यखंड मे भोगभूमि की व्यवस्था थी। लोगों को कोई कार्य नहीं करना पड़ता था। सभी कल्पवृक्षों के द्वारा मुंहमांगी वस्तु को प्राप्त कर आनन्दपूर्वक जीवन बिताते थे किन्तु जब तृतीय काल के अन्त में भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ और चतुर्थकाल प्रारभ्भ होते ही कल्पवृक्ष समाप्त होने लगे तब जनता घबराई कि किस प्रकार से हम लोग जीवन बितायेंगे।

ऐसे समय में ऋषभदेव ने मानवमात्र को जीने की कला सिखाई। उन्होंने कहा- अब इस धरती पर भोगभूमि समाप्त होकर कर्मभूमि आ गई है अतः आप लोगों को असि, मसि, कृषि आदि षट्कर्म करने पड़ेंगे। प्रकाश के लिए अब ज्योतिरांग कल्पवृक्ष नहीं बल्कि सूर्य और चन्द्रमा आ गए जिन्हें देखकर सब डरने लगे। युगप्रवर्तक भगवान ऋषभदेव ने उन्हें बताया कि अब दिन में सूर्य और रात्रि मे चन्द्रमा आपको प्रकाश देंगे।

ब्राह्मी-माताजी! ऋषभदेव को स्वयं ही यह सब कैसे ज्ञात हो गया ?

माताजी-वे तो भगवान् के अवतार ही थे। जैनधर्म के अनुसार प्रथम तीर्थंकर और वैदिकधर्म मे उन्हें अष्टम अवतार माना जाता है । इन्हें तो जन्म लेते ही मति,श्रुत और अवधि ये तीन ज्ञान थे इसीलिए विदेह क्षेत्र में कर्मभूमि की व्यवस्था को जानकर यहां वही व्यवस्था बताई । पूर्वापरविदेहेषु....आदिनाथ के राज्य में सारी प्रजा बहुत सुखी थी। भरत, बाहुबली आदि उनके १०१ पुत्र और ब्राह्मी—सुन्दरी कन्याओं के क्रिया— कलापों से इतिहास भरा पड़ा है।

ब्राह्मी-अच्छा! तो इन्हीं भरत के नाम से हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा है ?

माताजी-हां,यही युग के प्रथम तीर्थंकरी उसी प्रकार भरत प्रथम चक्रवर्ती थे। आदिनाथ ने दीक्षा लेते समय भरत को अपना राज्यातभिषेक किया था। दीक्षा लेकर वे तो ६ महीने का उपवास ग्रहण कर योगमुद्रा में खड़े हो गये किन्तु उनके साथ दीक्षित राजा लोग भूख—प्यास की बाधा सहन न होने के कारण भ्रष्ट हो गये, तब ६ महीने का योग समाप्त करके भगवान आदिनाथ ने मुनिचर्या बताने के लिए आहारार्थ भ्रमण किया। आदिनाथ आहार के लिए प्रतिदिन गांव और नगरों मे घूम रहे थे लेकिन किसी को पता ही नहीं था कि ये क्यों भ्रमण कर रहे हैं और इन्हें चाहिए क्या ?

ब्राह्मी-जब इस पृथ्वी पर मुनि आदिनाथ ६ महीने तक विहार कर रहे थे तब तो सभी लोगोंं को पहले से ही पता लग जाता होगा और बड़ी धूमधाम से बैन्ड बाजे पूर्वक लोग उन्हें नगर में प्रवेश कराते होंगे ?

माताजी-नहीं,ऐसा नहीं था क्योंकि उस समय जनता को साधुचर्या का बिल्कुल ज्ञान ही नहीं था। इस कृतयुग में तो ये सबसे पहले मुनि बने इसीलिए तो आदिनाथ के सामने कोेई वस्त्र, अलंकार लाते कि शायद प्रभु को वस्त्रों की आवश्यकता होगी, कोई अपनी कन्याओं को लाते—भगवन्! इन्हें ग्रहण करो औेर कोई अच्छे—अच्छे पकवान बनाकर भोजन सामग्री लाते और कहते कि आप भोजन कर लीजिए लेकिन ऋषभदेव को क्या चाहिए इसकी वे कल्पना भी नहीं कर सके।

महामुनिराज ऋषभदेव को तो मात्र नवधाभक्तिपूर्वक शुद्ध प्रासुक आहार चाहिए था जिसके लिये वे एक वर्ष तक घूमते रहे।

ब्राह्मी-क्यों माताजी! बड़ा आश्चर्य होता है कि इनको भोजन हेतु इतने दिन घूमने की क्या आवश्यकता थी ? वे एक दिन किसी को अपनी इच्छा बता देते तुरन्त ही उनके मन माफिक आहार मिल जाता ?

माताजी-अरे! दिगम्बर साधुओं की यही तो वीरचर्या है। यूं तो आदिनाथ यदि सारे जीवन भी आहार नहीं लेते तो उनके शरीर को कोई हानि पहुचने वाली नहीं थी किन्तु चतुर्थकाल और पंचमकाल के अन्त तक यह चर्या निर्बाध रूप से चलती रहे इसीलिए स्वयं उस मार्ग पर चलकर आहार विधि को बताया क्योंकि तीर्थंकर के समान सभी साधारण मनुष्य तो अधिक दिन भूखे रहकर नहीं निकाल सकते इसीलिये कोई साधु पद ही नहीं धारण करता और मोक्ष की परम्परा कैसे चलती ?

ब्राह्मी-आज तो हम देखते हैं कि जब कोई मुनि या आर्यिकाएं हमारे नगरों में आते हैं तो उन्हें कोई दिक्कत ही नहीं पड़ती। श्रावक लोग स्वयं आहारादि की व्यवस्था करते हैं ?

माताजी-आज इसीलिए समस्त चर्या सुलभ दिख रही है चूँकि आदिनाथ ने बताया, उसके बाद तीर्थंकर की परम्परा चलती रही। सभी ने उसी विधि से आहार ग्रहण किया। आज के मुनि, आर्यिकायें भी ठीक उसी प्रकार अपनी निर्दोष चर्या का पालन करने में समर्थ होते हैं। यदि ऋषभदेव ने नहीं बताया होता तो आप लोगों को भी ज्ञात नहीं हो सकती थी।

मुनि आदिनाथ १ वर्ष पूर्ण कर जब हस्तिनापुर नगरी में आने वाले थे ; उसी की पूर्व रात्रि में हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस ने सुमेरूपर्वत, कल्पवृक्ष, सिंह, बैल, समुद्र, चन्द्रमा और मंगल द्रव्य हाथों में लिये व्यंतरदेव ये ७ स्वप्न देखे। उन्होंने प्रात:काल राजपुरोहित से स्वप्नों का फल पूछा। पुरोहित ने बताया राजन! स्वप्न में आपने जो सुमेरू पर्वत देखा है उससे यह फलित होता है कि आपकी नगरी में कोई ऐसे महापुरुष पधारने वाले हैं जिनका सुमेरू पर्वत पर अभिषेक हुआ हो।

किन्तु यह क्या! इन जिनेन्द्र प्रभु को देखते ही श्रेयांस को आठवें भव पूर्व की बात याद आ गई जिसे जातिस्मरण कहते हैं। वे समझ गए कि इन्हें नवधाभक्तिपूर्वक आहार चाहिये। तुरन्त आगे बढ़कर उन्होंने कहा—हे स्वामी! नमोऽस्तु ३, अत्र तिष्ठ २, आहार जल शुद्ध है। इस प्रकार मुनि की पड़गाहन विधि करके श्रेयांस उन्हें अपने चौके में लाए जहां उच्चासन पर विराजमान करके भगवान के चरण प्रक्षालपूर्वक अष्ट द्रव्यों से उनकी पूजा की।

ब्राह्मी-माताजी! तीर्थंकर जैसे महापुरुष को अपनी पूजा की इच्छा जागृत हुई। भोजन तो बिना पूजा कराए भी लिया जा सकता था। इससे तो ख्याति-पूजा की परम्परा को प्रश्रय मिलता है ?

माताजी-नहीं,ऐसी बात नहीं है। बात यह है कि यह तो श्रावक के कर्तव्यों में नवधाभक्ति आती है। साधु को इनसे कुछ लेना देना नहीं रहता लेकिन यदि वे अपनी चर्या में शिथिल होकर पूजा आदि नवधाभक्ति की क्रियाओं में ढिलाई करते हैं तो मोक्षमार्ग दूषित होता है। उनकी तो प्रत्येक चर्या वीरचर्या होती है इसीलिए आज भी उसी परम्परा का पालन करते हुए आचार्य श्री कुन्दकुन्द स्वामी ने मुनिचर्या में इन सब बातों का उल्लेख किया है अतः यह ख्याति, पूजा का प्रश्रय नहीं अपनी मुद्रा का स्वाभिमान है।

पूजन करके राजा सोमप्रभ, लक्ष्मीमती रानी सहित राजा श्रेयांस भगवान के सामने शुद्ध इक्षुरस लाकर बोले—स्वामी ! मन शुद्धि, वचन शुद्धि, कायशुद्धि, आहार जल शुद्ध है आहार ग्रहण कीजिए। तभी आदिनाथ ने खड़े होकर अपने हाथों की अंजुलि बनाई और इक्षुरस का आहार लिया।

ब्राह्मी—माताजी! ऐसा लगता है कि राजा श्रेयांस ने करोड़ों वर्ष पूर्व स्वप्न में सुमेरू पर्वत देखा था इसीलिये आपने यहीं पर सुमेरू पर्वत बनाने का निर्णय लिया ?

माताजी—यह तो एक संयोग ही है। यहां तो केवल सुमेरू पर्वत ही क्यों पूरा जम्बूद्वीप ही बन गया है जिसके द्वारा समस्त मानव अपनी प्राचीन संस्कृति को समझ सकते हैं। बात यह है कि स्वप्न तो भविष्य में होने वाले शुभ—अशुभ की सूचना देते हैं तीर्थंकर जैसे महापुरुष को आहारदान देने से पूर्व राजा श्रेयांस को इतना उत्तम स्वप्न हुआ। अरे! आश्चर्य तो इस बात का था कि मुनिराज को आहार देने के बाद उनके चौके में उस दिन इक्षुरस अक्षय हो गया। पूरे राज्य की प्रजा आ करके इक्षुरस पीने लगी लेकिन इक्षुरस समाप्त ही नहीं हुआ।

ब्राह्मी—यह तो आज भी हम देखते हैं कि हमारे चोैके में जब साधुओं का आहार होता है तब भोजन में बहुत वृद्धि हो जाती है।

माताजी—हां, यही बात है। हस्तिनापुर में वह दिन इतना महान हो गया कि आहार का समाचार जानकर अयोध्या से चक्रवर्ती भरत आ गए और राजा श्रेयांस की बहुत प्रशंसा करते हुए उन्हें दानतीर्थ प्रवर्तक की उपाधि से अलंकृत किया। इसीलिए करोड़ों-करोड़ों वर्ष बीत जाने के बाद भी लोग उसे विशेष पर्व के रूप में मनाते हैं। ठीक भी है जैसे ऋषभदेव इस युग में धर्मतीर्थ प्रवर्तक हुए उसी प्रकार राजा श्रेयांस दानतीर्थ प्रवर्तक प्रसिद्ध हुए। इससे यह भी ज्ञात होता है कि मोक्ष की परम्परा को अक्षुण्ण बनाने में साधु और श्रावक दोनों परम्पराएं कारण हैं क्योंकि बिना दान के त्याग संभव नहीं।

ब्राह्मी—ठीक है माताजी! अब मैं समझ गई कि इसीलिए इस अक्षयतृतीया का दिन सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त के रूप में माना जाता है।

वंदामि माताजी ! ...........।