ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

India 120-animated-flag-gifs.gif 71 वाँ स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावनायै नमः"

अखंडता

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अखण्डता :

भाजन भेद कहावत नाना, एक मृत्तिका रूप री।

तैसे खण्ड कल्पना रोपित, आप अखण्ड सरूप री।।

—आनन्दघन ग्रंथावली, पद : ६५

जिस प्रकार मिट्टी एक होकर भी पात्र—भेद से अनेक नामों से पुकारी जाती है, उसी प्रकार एक अखण्ड रूप परमतत्त्व (शुद्धात्मा) में विभिन्न कल्पनाओं के कारण, अनेक नामों की कल्पना कर ली जाती है, किन्तु वस्तुत: वह तो अखण्ड स्वरूप ही है। अचौर्य/अस्तेय/अक्ष्त :

चित्तवदचित्तवद्वा, अल्पं वा यदि वा बहु (मूल्यत:)।

दन्तशोधनमात्रमपि, अवग्रहे अयाचित्वा (न गृह्णन्ति)।।

—समणसुत्त : ३७१

सचेतन अथवा अचेतन, अल्प अथवा बहुत, यहाँ तक कि दांत साफ करने की सींक तक भी साधु बिना दिए ग्रहण नहीं करते।

भक्खणे देव—दव्वस्स, परत्थी—गमणेण य।

सत्तमं नरइयं इंति, सत्तवाराओ गोयमा।।

—कामघट कथानक : १२४