ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अज्ञानी :

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अज्ञानी :

जो अप्पणा दु मण्णदि दुक्खिदसुहिदे करेमि सत्तेति।

सो मूढो अण्णाणी, णाणी एत्तो दु विवरीदो।।

—समयसार : २५३

‘जो ऐसा मानता है कि मैं दूसरों को दु:खी या सुखी करता हूँ’, वह वस्तुत: अज्ञानी है। ज्ञानी ऐसा कभी नहीं मानते।

अनुशोचत्यन्यजनमन्यभवान्तरगतं तु बालजन:।

नैव शोचत्यात्मानं, क्लिश्यमानं भवसमुद्रे।।

—समणसुत्त : ५१८

अज्ञानी मनुष्य अन्य भवों में गए हुए दूसरे लोगों के लिए तो शोक करता है, किन्तु भवसागर में कष्ट भोगने वाली अपनी आत्मा की चिन्ता नहीं करता।

हा ! जह मोहियमइणा, सुग्गइमग्गं अजाणमाणेणं।

भीमे भवकन्तारे, सुचिरं भमियं भयकरम्मि।।

—मरण—समाधि : ५९०

हा ! खेद है कि सुगति का मार्ग न जानने के कारण मैं मूढ़मति भयानक और घोर संसार—रूपी अटवी में चिरकाल तक भ्रमण करता रहा।

जल बालुयाए बाला, पुलिणे कीलंति अलिय—कयघरया।

अलिय—वियप्पिय—माया—पिय—पुत्त—परंपरा—मूढा।।

—कुवलयमाला : ६६

नदी के किनारे बालक रेती का नकली घर बनाकर क्रीड़ा करते हैं, उसी तरह मूढात्मा संसार में माता—पिता पुत्र की अयथार्थ परम्परा को मानता है।

अंधो णिवडइ कुवे बहिरो ण सुणेदि साधु—उपदेसं।

पेच्छंतो णिसुणंतो णिरए जं पडइ तं चोज्जं।।

—तिलोयपण्णत्ति

अंध कूप में गिर जाता है और बहरा साधु (सज्जन) का उपदेश नहीं सुनता, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं। आश्चर्य यही है कि यह जीव देखता और सुनता हुआ भी नरक कूप जा पड़ता है।

जह निन्बदुमुपन्नो कीडो कडुअंपि मन्नए महुरं।

तह सिद्धिसुरूवपरुक्खा, संसारदुहं सुहं विंति।।

—इन्द्रियपराजयशतक : १२

जिस तरह नीम के वृक्ष में उत्पन्न क्रीड़ा नीम की कटुता को भी मीठा मानता है, उसी तरह मोक्ष—सुख से परांगमुख व्यक्ति संसार के दु:ख को भी सुख मानता है।