ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अज्ञान :

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अज्ञान :

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अज्ञान :

अज्ञानात् ज्ञानी, यदि मन्यते शुद्धसम्प्रयोगात्।

भवतीति दु:खमोक्ष:, परसमयरतो भवति जीव:।।

—समणसुत्त : १९४

अज्ञानवश यदि ज्ञानी भी ऐसा मानने लगे कि शुद्ध सम्प्रयोग अर्थात् भक्ति आदि शुभभाव से दु:ख—मुक्ति होती है, तो वह भी राग का अंश होने से परसमयरत होता है।

जल बुब्बयसारिच्छं धनजोव्वण जीवियं पि पेच्छंता।

मण्णंति तो वि णिच्चं अइवलिओ मोहमाहप्पो।।

—द्वादशअनुप्रेक्षा : २१


धन, यौवन और जीवन को जल के बुलबुले के समान देखते हुए भी मनुष्य उन्हें नित्य मानता है, यह बड़ा आश्चर्य है। मोह का माहात्म्य अति बलवान है।