ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अट्ठाईस मूलगुण'

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मुनिधर्म

अट्ठाईस मूलगुण-मूलगुण और उत्तरगुण जीव के परिणाम हैं। महाव्रतादिक मूलगुण अट्ठाईस हैं। बारह तपश्चरण और बाईस परीषह इनको उत्तरगुण कहते हैं, ये चौंतीस हैं।’’ इन उत्तरगुणों का वर्णन आगे करेंगे।

अट्ठाईस मूलगुणों के नाम-पंच महाव्रत, पंच समिति, पंच इन्द्रियों को वश करना, छह आवश्यक क्रिया, लोच, आचेलक्य, स्नान का त्याग, क्षितिशयन, दंत धावन न करना, खड़े होकर आहार करना, दिन में एक बार आहार करना, ये २८ मूलगुण हैं।

पांच महाव्रत-मुख्य व्रतों को महाव्रत कहते हैं। मोक्ष प्राप्ति के लिए कारणभूत हिंसादि के त्याग को व्रत कहते हैं। जिनको तीर्थंकर आदि महापुरुष ग्रहण करते हैं अथवा जो पालन करने वाले को महान् बना देते हैं, वे महाव्रत कहलाते हैं। इसके पाँच भेद हैं-

अहिंसा महाव्रत-कषाययुक्त मन, वचन, काय की प्रवृत्ति को प्रमत्त योग कहते हैं, प्रमत्त योग से दश प्राणों का वियोग करना हिंसा है, ऐसी हिंसा से विरत होना, सर्व प्राणियों पर पूर्ण दया का पालन करना अहिंसा महाव्रत है।

सत्य महाव्रत-प्राणियों को जिससे पीड़ा होगी ऐसा भाषण, चाहे विद्यमान पदार्थ विषयक हो अथवा न हो, उसका त्याग करना।

अचौर्य महाव्रत-अदत्तवस्तु को ग्रहण नहीं करना।

ब्रह्मचर्य महाव्रत-पूर्णतया मैथुन का-स्त्रीमात्र का त्याग कर देना।

परिग्रह त्याग महाव्रत बाह्य-अभ्यंतर परिग्रहों का त्याग करना, मुनियों के अयोग्य समस्त वस्तुओं का त्याग करना। ये पाँच महाव्रत सर्व सावद्य-पापों के त्याग के कारण हैं।

पांच समिति-सम्यक् प्रकार से प्रवृत्ति करना समिति है। उसके पाँच भेद हैं-

ईर्या समिति-अच्छी तरह देखकर मन को स्थिर कर गमन-आगमन करना।

भाषा समिति-आगम से अविरुद्ध, पूर्वापर सम्बन्ध से रहित, निष्ठुरता, कर्वश, मर्मच्छेदक आदि दोषों से रहित भाषण करना।

एषणा समिति-लोकनिंद्य आदि कुलों को छोड़कर और सूतक, पातक, जाति संंकर आदि दोषों से रहित घरों में छ्यालीस दोष और बत्तीस अंतराय टालकर आहार ग्रहण करना।

आदाननिक्षेपण समिति-आँखों से देखकर और पिच्छिका से शोधन कर यत्नपूर्वक वस्तु को रखना और उठाना।

प्रतिष्ठापन समिति-जन्तु रहित प्रदेश में ठीक से देखकर मलमूत्रादि का त्याग करना।

इस प्रकार ये पाँच समितियाँ हैं।

पंच इन्द्रिय निरोध-स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण इन पंच इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को हटाना-नियंत्रण करना इन्द्रिय निरोध है।

छह आवश्यक क्रियाएँ-अवश्य करने योग्य क्रियाएँ आवश्यक क्रियाएँ कहलाती हैं।

समता-राग-द्वेष, मोह से रहित होना अथवा त्रिकाल पंचपरमेष्ठी को नमस्कार करना।

स्तव-ऋषभादि चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति करना।

वन्दना-एक तीर्थंकर का दर्शन या वंदन करना अथवा पंचगुरुभक्तिपर्यन्त दर्शन, वंदना करना।

प्रतिक्रमण-अशुभ मन, वचन और काय के द्वारा जो प्रवृत्ति हुई थी, उससे परवृत्त होना अथवा किये हुए दोषों का शोधन करना। इस प्रतिक्रमण के दैवसिक, रात्रिक, ऐर्यापथिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, वार्षिक और उत्तमार्थ ऐसे सात भेद हैं।

प्रत्याख्यान-अयोग्य द्रव्य का त्याग करना अथवा योग्य वस्तु का भी त्याग करना।

व्युत्सर्ग-देह से ममत्वरहित होकर जिनगुण चिन्तनयुक्त कायोत्सर्ग करना, ऐसे छह आवश्यक हैं।

इन्द्रिय, कषाय, राग-द्वेषादि के वश में जो नहीं हैं वे अवश हैं, उनकी क्रियाएँ आवश्यक क्रियाएँ हैं, ये छह आवश्यक क्रियाएँ मुनियों को नित्य ही करनी चाहिए।

लोच-अपने हाथों से मस्तक और दाढ़ी-मूंछ के केशों को उखाड़ कर पेंक देना। यह केशलोच उत्कृष्ट दो महीने में, मध्यम तीन और जघन्य चार महीने में होता है।

आचेलक्य-चेल-वस्त्र, मुनिपने से अयोग्य सर्व परिग्रहों का त्याग कर देना।

अस्नान-स्नान का त्याग।

क्षितिशयन-घास, लकड़ी का फलक, शिला इत्यादि पर सोना।

अदंत धावन-दांतौन के लिए दन्त मंजन, काष्ठादि का उपयोग नहीं करना।

स्थिति भोजन-खड़े होकर पैरों को चार अंगुल अन्तर से रखकर भोजन करना।

एकभक्त-दिन में एक बार आहार लेना।

इस प्रकार ये अट्ठाईस मूलगुण कहलाते हैं।