ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अणुव्रती नियम से देवगति प्राप्त करता है

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अणुव्रती नियम से देवगति प्राप्त करता है

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इस नश्वर संसार में मनुष्य पर्याय प्राप्त करने के बाद सर्वश्रेष्ठ सम्यग्दर्शन है-

न सम्यक्त्वसमं किञ्चित्, त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि। श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नाम्यत्तनूभृताम्।।

आचार्यों ने कहा है कि सम्यक्त्व के समान तीनों लोकों व तीनों कालों में कोई वस्तु श्रेष्ठ नहीं है तथा मिथ्यात्व के समान अकल्याणकारी शत्रु नहीं है।

इस हुण्डावसर्पिणी काल के तृतीय काल के अंत में भगवान ऋषभदेव के पोते एवं सम्राट भरत चक्रवर्ती के पुत्र मरीचि कुमार हुए हैं जिन्होंने मिथ्यात्व का पोषण किया और मिथ्यात्व के कारण एक कोड़ाकोड़ी सागर तक संसार परिभ्रमण किया, यहाँ तक कि नरक निगोद में भी गये अंततः सिंह की पर्याय में अमितगति एवं अजितञ्जय मुनि के द्वारा सम्बोधन प्राप्त कर सम्यग्दर्शन ग्रहण किया तब दश भवों के पश्चात् तपस्या आदि के प्रभाव से तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर चतुर्थ काल के अंत में वर्तमान चौबीसी के चौबीसवें एवं अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर हुए हैं। महानुभावों! सम्यग्दर्शन के बल पर कोई भी मनुष्य स्वयं को भगवान आत्मा बना सकता है और मिथ्यात्व से चतुर्गति भ्रमण तो करता ही है, अगर कदाचित् निगोद में चला जाए तो मनुष्य पर्याय पाना बहुत कठिन है।

सम्यग्दृष्टि की चार पहचान हैं

  1. प्रशम अर्थात् कषायों की मन्दता
  1. संवेग अर्थात् संसार से डरकर तथा संसार, शरीर, भोग से वैराग्य के साथ ही पंचपरमेष्ठी की शरण
  1. अनुकम्पा - प्राणी मात्र पर दया भाव
  1. आस्तिक्य - तीर्थंकर भगवन्तों की वाणी पर विश्वास करना, जैसे-सुमेरु पर्वत कहाँ है? आत्मा, ईश्वर, शरीर, परलोक आदि का अस्तित्व स्वीकार करना इत्यादि। जिनधर्म में वर्णित प्रत्येक वस्तु तत्व पर श्रद्धान करना आस्तिक्य है।

आज जैन धर्मावलम्बियों को निरीश्वरवादी कहकर यह आरोप लगाया जाता है कि जैनों ने ईश्वर को स्रष्टा नहीं माना अत: वह नास्तिक हैं किन्तु ऐसा नहीं है, वह ईश्वरवादी हैं, उन्होंने अनन्त तीर्थंकरों का अस्तित्व स्वीकार किया है। प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों का कर्ता-भोक्ता है तथा हमारी आत्मा भी शक्ति रूप में भगवान आत्मा है। जैन पूर्णरूपेण आस्तिक हैं, ईश्वरवादी हैं, वह नरक, निगोद, परलोक को मानते हैं जबकि नास्तिक लोग नरक, निगोद, परलोक, आत्मा, ईश्वर आदि को नहीं मानते हैं। अगर जैन नास्तिक होते तो वे अणुव्रत, महाव्रत आदि भी नहीं लेते और न ही आत्मा की सिद्धि हेतु तपश्चरण आदि ही करते। जैनधर्म सर्वथा अहिंसा स्वरूप है। पुरुषार्थसिद्धि उपाय नामक ग्रंथ में अहिंसा का अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन है। आचार्य श्री अमृतचन्द्रसूरि ने अहिंसा का लक्षण बताते हुए कहा है कि-

धर्ममहिंसारूपं संशृण्वन्तोपि ये परित्यक्तुम् ।
स्थावरहिंसामसहास्त्रसहिंसां तेऽपि मुञ्चन्तु।।

अर्थात् धर्म अहिंसा रूप है, परम रसायन है। जो जीव अहिंसारूप धर्म को अच्छी प्रकार समझते हुए भी स्थावर हिंसा को छोड़ने में असमर्थ हैं वे भी त्रस जीवों की हिंसा का त्याग करें, अणुव्रत ग्रहण करें। अणुव्रत क्या हैं? हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांचों पापों के अणु अर्थात् एकदेश त्याग को अणुव्रत कहते हैं। मन,वचन, काय, और कृत, कारित, अनुमोदना से संकल्पपूर्वक (इरादापूर्वक) किसी त्रस जीव को नहीं मारना अहिंसा अणुव्रत है। स्वयं स्थूल झूठ न बोले, न दूसरों से बुलवाए और ऐसा सच भी नहीं बोले कि जिससे धर्म आदि पर संकट आ जावे सो सत्याणुव्रत है। किसी का रखा हुआ, पड़ा हुआ, भूला हुआ अथवा बिना दिया हुआ धन-पैसा आदि द्रव्य नहीं लेना और न उठाकर किसी को देना अचौर्याणुव्रत है। अपनी विवाहित स्त्री के सिवाय अन्य स्त्री के साथ कामसेवन नहीं करना ब्रह्मचर्य अणुव्रत अथवा शीलव्रत कहलाता है। यह व्रत सभी व्रतों में अधिक महिमाशाली है। इसके पालन करने वाले को मनुष्य तो क्या देवता भी नमस्कार करते हैं तथा धन, धान्य, मकान आदि वस्तुओं का जीवन भर के लिए परिमाण कर लेना, उससे अधिक की इच्छा नहीं करना परिग्रह परिमाण अणुव्रत है। इस व्रत के पालन करने से आशाएं सीमित हो जाती हैं तथा नियम से सम्पत्ति बढ़ती है। वैसे आचार्यों ने पाक्षिक श्रावक के लिए कहा है कि उसे पहले अष्टमूलगुण का पालन करना चाहिए।

आचार्य श्री अमृतचंद्रसूरी के अनुसार अष्ट मूलगुण

अष्टमूलगुण की परिभाषा बताते हुए आचार्यश्री अमृतचंद्रसूरि ने कहा है-

अष्टावनिष्टदुस्तरदुरितायतनान्यमूनि परिवर्ज्य।
जिनधर्मदेशनाया भवन्ति पात्राणि शुद्धधियः।।

अर्थात् मद्य, मांस, मधु और पांच उदुम्बर फल ये आठों पदार्थ महापाप के कारण हैं, इस कारण इनका त्याग करने पर ही पुरुष किसी उपदेश के सुनने के योग्य पात्र होता है अर्थात् इनके त्याग के बिना श्रावक नहीं हो सकता, इसी कारण इनके त्याग को अष्टमूलगुण माना है। और भी कहा है-

मद्यं मांसं क्षौद्रं पञ्चोदुम्बरफलानि यत्नेन।
हिंसाव्युपरतिकामैर्मोक्तव्यानि प्रथममेव।।


अर्थात् हिंसा त्याग करने की कामना करने वाले पुरुषों को प्रथम ही यत्नपूर्वक शराब, मांस, शहद और ऊमर, कठूमर, पीपल, बड़, पाकर ये पांचों उदुम्बर फल छोड़ देना चाहिए।

सागारधर्मामृत में पण्डित श्री आशाधर जी ने अष्टमूलगुण के बारे में बताते हुए कहा है-

मद्यपलमधुनिशासन पंचफलीविरतिपंचकाप्तनुतिः।
जीवदयाजलगालनमिति च क्वचिदष्टमूलगुणाः।।
  1. मद्य
  1. मांस
  1. मधु
  1. रात्रि भोजन
  1. पंच उदुम्बर फल, इनका त्याग
  1. जीव दया का पालन
  1. जल छानकर पीना एवं
  1. पंच परमेष्ठी को नमस्कार करना ये अष्टमूलगुण हैं।

एक और प्रकार से अष्टमूलगुणों के बारे में बताते हुए आचार्य श्री समन्तभद्रस्वामी ने रत्नकरण्डश्रावकाचार में कहा है-

मद्यमांसमधुत्यागैः सहाणुव्रतपंचकम्।
अष्टौ मूलगुणानाहुर्गृहिणां श्रमणोत्तमाः।।

अर्थात् मद्य, मांस, मधु इन तीन मकारों का त्याग और पांच अणुव्रतों का पालन तृतीय प्रकार का अष्टमूलगुण है। इस प्रकार तीन रूपों में इस अष्टमूलगुण के बारे में बताया है जिसमें रत्नकरण्ड श्रावकाचार में अणुव्रत को भी लिया है। इन पांचों अणुव्रतों की बड़ी महिमा है। अणुव्रत वही ले सकता है जिसके नरक व तिर्यंच आयु नहीं बंधी है। अणुव्रती नियम से देवगति प्राप्त करने का अधिकारी होता है। ‘‘अणुवद महव्वदाइं ण लहइ देवाउगं मोत्तुं’’ अर्थात् इसको पालन करने वाला देवायु का ही बंध करता है। आचार्य समन्तभद्र ने कहा है-

पञ्चाणुव्रतनिधयो, निरतिक्रमणाः फलन्ति सुरलोकम्।
यत्रावधिरष्टगुणा, दिव्यशरीरं च लभ्यन्ते।।

निधिस्वरूप ये पांच अणुव्रत यदि निरतिचार पाले जाते हैं तो ये नरक, पशु और मनुष्यगति से रहित देवपद को प्राप्त कराते हैं फिर वहाँ वे देव वैक्रियिक शरीर, अणिमा, महिमा आदि आठ ऋद्धियाँ और अवधिज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तथा कई सागर तक दिव्य सुखों का उपभोग करते हैं। इसका एक उदाहरण मैं आपको सुनाती हूँ- मैंने पहले आपको अग्निभूति और वायुभूति की कथा सुनाई थी कि किस प्रकार अग्निभूति के दीक्षित हो जाने पर उसकी पत्नी सोमदत्ता ने अपने देवर वायुभूति से उन्हें वापस लाने की प्रार्थना की पर उसके द्वारा लात मारे जाने पर उसने निदान बंध कर लिया और वह वायुभूति जिसने मुनि की तीव्र निन्दा की थी जिसके कारण अग्निभूति ने दीक्षा ली, उस को तीव्र पापकर्म का बंध होने से बहुत जल्दी ही उसका फल मिल गया।

सच्चे गुरु की निन्दा करने वाला व्यक्ति महान कष्टों को सहन करता है

यह नियम है कि सच्चे गुरु की निन्दा करने वाला व्यक्ति महान कष्टों को सहन करता है अतः उस वायुभूति के भी सात दिन के अंदर ही कुष्ट रोग हो गया और वह अत्यन्त कष्ट से मरकर कभी गधा तो कभी जंगली सुअर हुआ, पुन: कुयोनियों में भटकता हुआ चम्पापुरी में एक चाण्डाल के घर कुत्ती हुआ और वहाँ से मरकर दूसरे चाण्डाल के यहाँ एक लड़की हुई जो कि जन्म से अंधी और दुर्गन्धित थी। अत: इसके माता-पिता ने इसे छोड़ दिया, पर भाग्य सभी का बलवान होता है इसलिए इसकी भी किसी तरह रक्षा हुई। वह एक जामुन वृक्ष के नीचे पड़ी हुई जामुन खाया करती थी।

इधर चम्पापुरी की ओर विहार करते हुए सूर्यमित्र मुनि अग्निभूति के साथ उधर आ निकले। उस दुखियारी कन्या को देखकर अग्निभूति के हृदय में कुछ मोह व कुछ दुःख हुआ। उन्होंने गुरु से पूछा कि प्रभो! इसकी वैसी कष्टमयी दशा है? इसे वैसे शांति मिलेगी? तब अवधिज्ञानी सूर्यमित्र गुरु ने कहा कि यह तुम्हारा पूर्व जन्म का भाई है यह अल्पजीवी है, तुम इसे सम्बोधित करो। साथ ही उसके अन्य जन्मों की बात भी बताई। तब अग्निभूति मुनि ने उस चाण्डाल कन्या को पाँच अणुव्रत देकर उसको सन्यास दिलवा दिया और वह कन्या मरकर व्रत के प्रभाव से चम्पापुरी में ही नागशर्मा ब्राह्मण की नागश्री नाम की कन्या हुई। एक दिन नागश्री वन में नागपूजा करने अपनी सखियों के साथ गई थी। पुण्ययोग से सूर्यमित्र और अग्निभूति मुनि भी विहार करते हुए इस ओर आ गए। उन्हें देखकर नागश्री के मन में उनके प्रति अत्यन्त भक्ति हो गई और वह उनके पास जाकर हाथ जोड़कर बैठ गई। उन अग्निभूति मुनि को उस कन्या को देख पुनः अपनत्व जगा तब गुरु से पूछने पर उन्होंने पूर्व जन्म का भ्रातृ-भाव बताया। तब अग्निभूति ने उसे धर्म का उपदेश देकर सम्यक्त्व तथा पंचाणुव्रत ग्रहण करवा दिया और कहा कि अगर तेरे पिता नाराज हों तो तू आकर मुझे मेरे व्रत वापस दे जाना। सच है, मुनि लोग दीर्घदृष्टा व सच्चे मार्गदर्शक होते हैं।

जब नागश्री उन मुनिराजों को भक्तिपूर्वक नमस्कार कर घर वापस आ गई तब उसकी सहेलियों ने व्रतादि की सभी बातें नागशर्मा को बता दीं। उस समय नागशर्मा क्रोधित होता हुआ उसे समझाने लगा कि हम पवित्र ब्राह्मण कुल के लोग इन नंगे मुनियों के दिये हुए व्रत नहीं लेते। तू इन व्रतों को छोड़ दे तब पिता के डांटने से नागश्री व्रत छोड़ने को तैयार हो गई और मुनि के कहे अनुसार पिता को साथ लेकर उन व्रतों को वापस करने के लिए चल दी, नागशर्मा भी क्रोधित होता हुआ साथ चल दिया। रास्ते में नागश्री ने एक जगह देखा कि कुछ लोग एक बंधे हुए मनुष्य को क्रूरतापूर्वक मार रहे हैं तब उसने पिता से पूछा कि पिताजी, इस बेचारे को इतनी निर्दयतापूर्वक क्यों मारा जा रहा है? तब नागशर्मा बोला कि बेटी, इसने एकर् बनिये के लड़के से कुछ रुपये लिए थे जो उसने मांगे तब इस पापी ने उसे रुपये न देकर जान से मार डाला अतः उस अपराध में राजा ने इसे प्राणदण्ड की सजा दी है तब नागश्री ने जरा जोर देकर कहा कि पिताजी यही व्रत तो उन मुनियों ने मुझे दिया है फिर आप उसे छुड़ाने के लिए क्यों कहते हैं। नागशर्मा निरुत्तर होकर बोला कि ठीक है तू यह व्रत न छोड़, बाकी के व्रत तो उन्हें देना ही पड़ेगा। आगे चलकर नागश्री ने एक और पुरुष को बंधा हुआ देखा तब पिताजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि यह झूठ बोलकर लोगों को ठगता था अतः इसकी जीभ काटकर इसे सजा दी जा रही है। तब फिर नागश्री बोली कि पिताजी, यही व्रत तो मैंने भी लिया है, मैं इसे भी नहीं छोडूंगी। इसी प्रकार चोरी, परस्त्रीसेवन तथा लोभ आदि से दुख पाते हुए मनुष्यों को देखकर नागश्री ने व्रत न छोड़ने की बात कहकर पिता को निरुत्तर कर दिया। तब पिता ने कहा कि अच्छा ठीक है, तू उन व्रतों को मत छोड़, पर तू मुझे उन मुनियों के पास तो ले चल। मैं उनसे इतना तो पूछूं कि किस अधिकार से उन्होंने मेरी लड़की को बिना पूछे व्रत दिये? और उन मुनियों के पास पहुँचकर क्रोधित होते हुए बोला-क्यों रे नंगों! तुमने मेरी लड़की को व्रत देकर क्यों ठग लिया? बतलाओ, तुम्हें यह अधिकार किसने दिया?

नागशर्मा के सब कुछ कहने पर भी मुनि शांत रहे पुनः विनोद में कहा कि यह बेटी तो मेरी है। तब ब्राह्मण देवता घबरा गए। वे ‘अन्याय-अन्याय’ चिल्लाते हुए राजा के पास पहुँचे तब सारी बात सुनकर राजा भी सोच में पड़ गए और उन मुनिराज के पास पहुँचकर नमस्कार कर बैठ गए। पुनः जब वहीं झगड़ा उपस्थित हो गया और भीड़ लग गई तब राजा ने मुनि से कौतुकवश पूछा तो मुनि बोले कि अच्छा, नागशर्मा! तूने इसे क्या पढ़ाया है? यदि यह तेरी लड़की है तो बताए और सुन, मैंने इसे सब शास्त्र पढ़ाये हैं इसलिए यह लड़की मेरी है। तब राजा बोले कि प्रभो! आप इसकी परीक्षा कर हमें विश्वास दिलावें। तब मुनि बोले-नागश्री! अभी तक मैंने तुम्हें वायुभूति की पर्याय में जो कुछ पढ़ाया है सो बता दे। इतना कहते ही नागश्री ने जन्म-जन्मान्तर का पढ़ा सारा विषय सुना दिया। जिसे सुनकर राजा तथा सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। यह सब देखकर राजा ने सम्पूर्ण विषयों का खुलासा करने की प्रार्थना की तब अवधिज्ञानी सूर्यमित्र ने वायुभूति के भव से लगाकर नागश्री के जन्म तक सारी घटना उसे सुनाई जिसे सुनकर राजा को बहुत आश्चर्य हुआ और मोह को इसका मूल कारण जान उन्हें वैराग्य हो गया और उन्होंने बहुत से राजाओं के साथ दीक्षा ले ली उनके साथ नागशर्मा ने भी जैनधर्म का उपदेश सुन दीक्षा ले ली। वहां से विहार कर सूर्यमित्र एवं अग्निमित्र यह दोनों मुनि अग्निमंदिर नामक पर्वत पर पहुँचे और तपस्या द्वारा घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। नागश्री भी आर्यिका दीक्षा ले सम्यक्त्व के प्रभाव से स्त्रीलिंग का छेदकर कालांतर में मुक्ति को प्राप्त हुई, ऐसी इस सम्यक्त्व व पंच अणुव्रतों की महिमा है।

सम्यकदृष्टि जीव कहाँ जन्म लेता है

यह नियम है कि सम्यग्दृष्टि जीव एकेन्द्रिय स्थावरों में, विकलत्रय में, असंज्ञी, अपर्याप्तक और सम्मूर्च्छन जीवों में, अल्पायु में, दरिद्र और नीचकुलों में, नरकगति और तिर्यंचगति में, भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवों में, स्त्रीवेद और नपुंसकवेद में तथा सर्वदेवियों में जन्म नहीं लेते हैं और सम्यग्दृष्टि स्त्री कभी भी नरक व पशुयोनि में नहीं जाएगी, अणुव्रती स्त्री तो नियम से प्रथम तो देवपद प्राप्त करेगी और कालान्तर में मोक्ष जाएगी अगर कदाचित् कोई गति बंध कर लिया तो अणुव्रती होने पर नरक व पशुगति नहीं बंधेगी। अतः आप भी अणुव्रती बन परम्परा से मोक्षपद प्राप्त करें यही मेरा मंगल आशीर्वाद है।


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