ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अतिथिसंविभाग या वैयावृत्य

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अतिथिसंविभाग या वैयावृत्य

वैयावृत्य के भेदों का वर्णन करते हुए श्री समंतभद्रस्वामी कहते हैं-

आहारौषधियोरप्युपकरणावासयोश्च दानेन।
वैयावृत्यं यावानुपग्रहोन्योऽपि संयमिनां।।

हिन्दी अनुवाद-

आहारदान औषधीदान, उपकरणदान आवासदान।

वैयावृत्ती के चार भेद, से कहलाते ये चार दान।।
प्रासुक भोजन औषधियों से, श्रावकजन मुनि को स्वस्थ करें।

पिच्छी शास्त्रादिक दे उनको, वसती दे निज को धन्य करें।।११७।।

आहारदान, औषधिदान, उपकरणदान और वसतिकादान ये वैयावृत्य के चार भेद यहाँ माने गये हैं। श्रावक, मुनि आदि साधुओं को प्रासुक भोजन और शुद्ध औषधि देकर उनको स्वस्थ रखने में सहयोगी बने। उन्हें पिच्छी, कमंडलु, शास्त्र आदि संयम, शौच तथा ज्ञान के उपकरण देकर एवं ठहरने के लिए वसतिका आदि स्थान देकर अपने जीवन को धन्य कर लेवे। श्री पूज्यपादस्वामी भी ‘सर्वार्थसिद्धि’ नामक ग्रंथ में अतिथिसंविभागव्रत का लक्षण इसी प्रकार से कर रहे हैं-

‘अतिथि के लिए जो सम्यक् प्रकार से विभाग किया जाता है वह अतिथि-संविभाग है। वह आहार, उपकरण, औषध और प्रतिश्रय-आवास के भेद से चार प्रकार का है।’ श्रीसमंतभद्रस्वामी इन चार दानों में ख्यातिप्राप्त के नाम उल्लेख करते हुए कहते हैं-

श्रीषेण नृपति आहारदान, के फल से शांति जिनेश हुए।

दे औषधिदान वृषभसेना, तनु जल से पर दुख दूर किये।।
कौण्डेश शास्त्र देकर मुनि को, श्रुतज्ञान पूर्णकर ख्यात हुआ।

शूकर मुनि को दे अभयदान, यशपूर्वक सुर पद प्राप्त किया।।११९।।

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इन चारों की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है

-रत्नपुुर के राजा श्रीषेण के सिंहनन्दिता और अनिंदिता नाम की दो रानियाँ थीं। इनके इन्द्रसेन और उपेन्द्रसेन ऐसे दो पुत्र थे। किसी दिन राजा ने आदित्यगति और अरिंजय नाम के दो चारण मुनियों को आहारदान देकर पंचाश्चर्यवृष्टि प्राप्त की तथा दान के प्रभाव से उत्तरकुरु भोगभूमि की आयु बाँध ली। कालांतर में अपने पुत्रों के आपसी झगड़े में राजा ने दुःखी होकर विष पुष्प सूँघकर अपना अपघात मरण कर लिया। फिर भी आहारदान के प्रभाव से वे उत्तम भोगभूमि में आर्य हो गये। ये ही श्रीषेण आगे चलकर सोलहवें तीर्थंकर और पाँचवे चक्रवर्ती ऐसे श्री शांतिनाथ भगवान हुए हैं।

एक मुनिदत्त योगिराज के ऊपर एक नौकरानी ने कूड़ा डाल दिया पुनः राजा के द्वारा उनकी विनय और सेवा की जाने पर नौकरानी नागश्री ने भी पश्चात्ताप करके उन मुनिराज के शरीर में घाव आदि पर औषधि लगाकर भरपूर सेवा की। अन्त में मरकर वह एक सेठ की पुत्री वृषभसेना हुई। इसके स्नान किये जल से सभी के बड़े से बड़े कष्ट, रोग आदि नष्ट हो जाते थे यह पूर्वजन्म में किये गये औषधिदान का ही प्रभाव था। इस पुण्य से यह राजा की पट्टरानी हो गई और शील के माहात्म्य से देवों द्वारा भी पूजा को प्राप्त हुई है।

कुरुमरी गाँव के एक ग्वाले ने वृक्ष की कोटर में एक जैन ग्रन्थ देखा, उसे घर लाकर उसकी पूजा करता रहा अनंतर उस ग्रन्थ को एक मुनिराज को दान कर दिया। मरकर वह एक चौधरी का पुत्र हुआ, उन्हीं मुनि से बोध प्राप्त कर मुनि हो गये। कालांतर में वही जीव राजा कौंडेश होकर मुनि दीक्षा ग्रहण कर द्वादशांग का पारगामी हो गया है।

एक जंगल की गुफा में मुनिराज विराजमान थे। एक व्याघ्र उन्हें खाने को दौड़ा तो एक जंगली सुअर ने मुनि रक्षा के भाव से व्याघ्र से युद्ध शुरू कर दिया, गुफा के बाहर दोनों ही लहूलुहान होकर मर गये। भक्षण के भाव से व्याघ्र नरक गया और पूर्वजन्म में मुनि को धर्मशाला में ठहराने के संस्कार से तथा तत्काल में मुनि रक्षा के भाव से सूकर मरकर स्वर्ग में चला गया। इन कथाओं का विस्तार आराधना कथाकोश से पढ़ना चाहिए।

ये एक-एक दान भी जीवों की उन्नति के लिए कारण हैं और परम्परा से मोक्ष को प्राप्त कराने वाले हैं पुनः जो श्रावक धन से सम्पन्न हैं उनका कर्तव्य है कि वे प्रतिदिन मुनि, आर्यिकाओं को आहार आदि दान देकर अपने गृहस्थाश्रम को सफल कर लेवें। इन चारों दानों में भी आहारदान ऐसा महत्त्वशाली है कि जिसके देने पर देवगण भी पंचाश्चर्य वृष्टि करने लगते हैं ऐसा समझकर आहारदान देने में सदा ही आदर भाव रखना चाहिए।

श्री समंतभद्रस्वामी इसी वैयावृत्य नामक शिक्षाव्रत में अर्हंत देव की पूजा को कहते हैं-

देवाधिदेव अर्हंतों के, चरणों की पूजा करने से।

संपूर्ण दुःख स्वयमेव नशें, इच्छित फल आप स्वयं फलते।।
सब विषयवासना की इच्छा, को नष्ट करे अर्हत्पूजा।

आदर से नित करिये पूजा, नहिं इस सम अन्य कार्य दूजा।।११८।।

देवाधिदेव श्री अर्हंतदेव के चरणों की पूजा करने से संपूर्ण दुःख दूर हो जाते हैं और मनवांछित फल स्वयं प्राप्त हो जाते हैं। यह पूजा संपूर्ण विषय वासनाओं की इच्छाओं का भी शमन करने वाली है इसलिए आदरपूर्वक नित्य ही जिनपूजा करनी चाहिए क्योंकि इसके सदृश अन्य कोई दूसरा उत्तम कार्य नहीं है। जिनपूजन के माहात्म्य को बतलाते हुए कहते हैं-

मेंढक प्रमोद से मुदितमना, बस एक पुष्प को ले करके।

जिनवर की पूजा हेतु चला, जब राजगृही में भक्ती से।।
हाथी के पैर तले दबकर, तत्क्षण ही सुरपद को पाया।

अर्हंत चरण की पूजा का, माहात्म्य सभी को दिखलाया।।१२०।।

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राजगृही में भगवान महावीर के समवसरण

राजगृही में भगवान महावीर के समवसरण के आने पर सभी जनों को दर्शन करने के लिए जाते देख एक मेंढक भी जिनभक्ति से एक कमल की पांखुडी को मुख में दबाकर चल पड़ा। मार्ग में राजा श्रेणिक के हाथी के पैर तले दबकर मर गया। जिनपूजा की भावना से मरा हुआ वह मेंढक का जीव तत्क्षण ही देव हो गया और राजा श्रेणिक के पहले ही समवसरण में पहुँचकर भगवान महावीर के दर्शन करके उनकी भक्ति में नाचने लगा।

इस प्रकार से जब मेंढक जिनपूजन की भावना मात्र से ही देवपद प्राप्त कर सकता है तब तो जो सदा ही भक्तिभाव से जिनेंद्रदेव के चरणों की पूजा करते हैं उन्हें क्या-क्या उत्तम फल नहीं मिलेंगे ? अर्थात् सब कुछ अभ्युदय प्राप्त होंगे और परम्परा से निर्वाणपद भी मिलेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

एक बार आचार्यश्री वीरसागर जी के सामने एक श्रावक ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव! श्रावक के बारह व्रतों में जिनपूजन का विधान तो नहीं है अतः व्रती श्रावक जिनपूजन नियम से करे, ऐसा क्यों ? इस पर आचार्यश्री ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार का प्रमाण सुनाया और कहा, भाई! श्रावक के अतिथिसंविभाग शिक्षाव्रत में जिनपूजा करने का आदेश है अतः बारह व्रतों के अन्तर्गत जिनपूजा समाविष्ट है ऐसा निश्चित समझो।

किन्हीं-किन्हीं ग्रन्थों में सामायिकव्रत में भी जिनपूजा का वर्णन किया गया है। भावसंग्रह ग्रंथ में लिखा है- ‘जिनपूजां बिना सर्वा, दूरा सामायिकी क्रिया।’ अतः सामायिक शिक्षाव्रत में भी देवपूजा करने का विधान है यह बात स्पष्ट हो जाती है।