ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अत्तिमब्बे

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अत्तिमब्बे

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डॉ. हंपा नागराजय्य

कर्नाटक के इतिहास में दसवीं शताब्दी, सुवर्णयुग कहलाती है। राजकीय, साहित्य, संस्कृति, कला, धर्म इस प्रकार अनेक क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण घटनाएं इसी समय में घटी हैं। गंग, राष्ट्रकूट, पश्चिम चालुक्यों के दो चक्रवर्ती इसी शताब्दी में विराजमान थे। इम्मड़ि बूतुग, मारसिंह, चावुंडराय ने गंगवंश को प्रज्वलित किया।

मुम्मड़ि कृष्ण ने राष्ट्रकूटों को राष्ट्रीय सम्मान से सुशोभित किया। तैलप और उनके पुत्र सत्याश्रय इरिव बेडंग, दोनों ने पश्चिम चालुक्य साम्राज्य शुरू किया। आप दोनों अखिल भारत में सम्मान के पात्र रहे। राजकीय क्षेत्र में आप सभी एक नई शक्ति के रूप में उभर आए। सारे भारत की दृष्टि कर्नाटक की और आकृर्षित हुई।

साहित्य क्षेत्र में, दसवीं शताब्दी का अपना ही एक महत्वपूर्ण स्थान है। आदि कवि पंप ने विक्रमार्जुन विजय (पंपभारत), आदि पुराण नाम के दो महाकाव्यों की रचना की। पंप के छोटे भाई जिनवल्लभ ने इतिहास प्रसिद्ध गंगाधरं शिलालेख लिखवाए। पोत्र कवि ने भुवनैक रामाभ्युदयं और शांति पुराणं नाम के दो श्रेष्ठ चंपूकाव्यों की रचना की। नागवर्मा ने छंदोबुधि और कर्नाटक कादंबरि नाम की दो कृतियों की रचना की। इसी परंपरा को समर्थ रूप से आगे बढ़ाते हुए कवि रत्न ने परशुराम चरिते, चरिते, अजित तीर्थंकर पुराण तिलकं, साहस भीम विजयं (दगायुद्ध) नाम की चार महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की। कन्नड़ साहित्य इन कवियों से, इन कृतियों से समृद्ध हुआ। एक नया आयाम पाया। चावुंडराय का चावुंडराय पुराण भी इसी काल की गद्यकृति होने के कारण, कन्नड गद्य क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण उपलब्धि मा्ना जाती है।

राष्ट्रकूटों क चक्रवर्ती मुम्मडि कृष्ण के मंत्री भरत के आश्रय में महाकवि पुष्पदंत, राजधानी मान्यखेट में रहते थे। मंत्री भरत और उनके पुत्र रत्न के आश्रय में रहकर पुष्पदंत ने प्राकृत भाषा में ‘महापुराण’, ‘यशोधर चरिते’, ‘नागकुमार चरिते’, नाम की महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की।

चावुंडराय के गुरू, नेमिचंद्राचार्य जी जैन सिद्धान्त चक्रवर्ती माने जाते थे। नेमिचन्द्राचार्य जी ने, चाबुंडराय के लिए सम्पूर्ण जैन सिद्धान्त का सार संग्रह करके, गोम्मटसार नामक ग्रन्थ की; प्राकृत में द्रव्य संग्रह आदि और भी अनेक कृतियों की रचना करके प्राकृत भाषा की अभिव्यक्ति को समृद्ध बनाया है। शिल्पकला के क्षेत्र में कर्नाटक का विशिष्ट स्थान है, कर्नाटक की देनों में गोम्मटमूर्ति शिल्प श्रेष्ठ है। श्रवणबेलगोल के इन्द्रगिरि पर्वत पर विराजमान बाहुबलि (गोम्मटेश) की मूर्ति—जगत् प्रसिद्ध है। चंद्रगिरी पर स्थित चाबुंडराय जिनमंदिर, वास्तुकला की दृष्टि से प्रसिद्ध है।चाबुंडराय युद्धवीर होते हुए धर्मवीर भी थे। गोम्मटेश विग्रह का निर्माण करवाकर गोम्मटराय कहलाए।

दसवीं शताब्दी कर्नाटक के धार्मिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी समय जैन धर्म अपने अत्युन्नत शिखर पर विराजमान था। गंग और राष्ट्रकूट वंश के राजाओं ने जैन धर्म को अपने राष्ट्रधर्म के रूप में घोषित किया था। उत्तर में कोलार नंदिबेट्ट के दक्षिण में तलकाड़ में इन दोनों के बीच बेंगलूर नेलमंगल के समीप मन्ने (मन्यपुर) में गंग राजाओं ने जिन मंदिरों का निर्माण करवाकर जैनधर्म की प्रभावना की थी । नंदिबेट्ट पर स्थित देवालय गंगवंश के राजाओं का पट्ट जिनालय था। अण्णिगेरे, कोप्पल पुलिगेरे (लक्ष्मेश्वर) बनवासि, सौदत्त, श्रवणबेलगोल, हलसि, बलिलगावे, लक्कुंडि, मुलुगुंद, ऐहोले, पट्टदकल्लु, कोंगलि, बादामि, होंबुज (बोंबुच्चपुर), मान्यखेट, आदि स्थान जैन संस्कृति के केन्द्र थे। प्रजाओं से चक्रवर्ती तक सब जैन थे। इतिहासकार मानते है कि दसवीं शताब्दी में समूचे कर्नाटक भर में राष्ट्रकूट साम्राज्य की प्रजाकोटी में संख्या की दृष्टि से आधा भाग जैनों की संख्या थी। अण्णिगेरि में गंग वंश के पेम्र्माडि इम्माड़ि बूतुगराय द्वारा निर्मित जिनालय बहुत कलात्मक है। वह विशाल जिनालय आज भी सुस्थिति में है और दर्शनीय है।

इन सभी परंपरा और आधारों के साथ और एक महत्वपूर्ण अंश है, वह है इसी दसवीं शताब्दी में जो स्त्री जाग्रती की लहर उठी, वह भी स्मरणीय है। गंगों के राष्ट्रकूटों के सौदत्ति के रट्रटों की रानियाँ, राजकुमारियाँ अपने योगदान के साथ प्रसिद्ध रही हैं। इस काल की राजकुमारियाँ मंत्री और प्रधान सेनानियों की पत्नियाँ, पुत्रियाँ अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व और अधिकारों के कारण से प्रशंसा योग्य हैं। बड़ी रानी, छोटी रानी, सामान्य प्रजा की पत्नी आदि किसी तरह के पक्षपात के बिना कई महिलाओं ने प्रशंसनीय कार्य किये हैं, अपने अपने देवालय, गुरूमठ, आदि को दान दिया है, तालाबों का निर्माण करवाया है, वुँâए निर्माण करवाए हैं, आहार, अभय, भैषज, और शास्त्र दान किए हैं। कई स्त्रियों ने अपने अधिकार में शासन किया है। इन सब विषयों के समर्थन में कई शिलालेख हैं। युद्ध भूमि में पुरूषों से भी अधिक धैर्य से युद्ध किया है। ऐसी महिलाओं की वीर गाथाएँ भी है।

दान चिंतामणि अत्तिमब्बे; इस दसवीं श्ताब्दी और सम्पूर्ण दो हजार वर्ष के कर्नाटक के इतिहास में अनन्य स्त्री शक्ति के रूप में उभर आई है। उसका अद्वितीय गौरीशंकर सदृश व्यक्तित्व अमर रहा है। कर्नाटक के सर्व क्षेत्रों में उनका पात्र और प्रभाव है। इतिहासकारों के अनुसार सभी क्षेत्रों में उनकी पहचान है। अत्तिमब्बे अन्यतम व्यक्तित्व की कांति कर्नाटक के इतिहास में प्रज्वलित है।

जैन धर्म कर्नाटक में ई.पू. चौथी शताब्दी से ही विकसित होकर एक प्रभावशाली धर्म के रूप में रहा है। मौर्य और सतवाहन इस धर्म के आधारस्तम्भ थे। उसके बाद कन्नड़ के श्रेष्ठ जैन राजाओं ने शासन किया है। बादामि चालुक्यों ने जैन धर्म को अधिक गौरव के साथ देखा। उनमें कुछ राजा—रानी जैन थे। पुलिगेरे उनके वंश के देवता का क्षेत्र था। आदि कदंबो ने जैन धर्म के प्रचार के लिए उदारता से राजाश्रय दिया। । कदंब वंश के कई राजा स्वयं जैन थे; उन्होंने जिनमंदिरों का निर्माण भी करवाया था। हलसि— (पलाशिका—हलसिगे) कदंबों के कुलदेवता का पुण्यक्षेत्र था।राष्ट्रकूट राजाओं में कई राजा जैन थे, जिन्होंने स्वंतंत्र शासन करने वाले गंगराजाओं को अपने आधीन किया था। अमोघवर्ष नृपतुंग तो आदर्श जैन श्रावक थे। जैन आगम ग्रन्थों के धवल जयधवल कृतियों की रचना के पोषक धवल कहलाए। श्री विजय महावीराचार्य, शाकटायन, जिनसेन गुणभद्र आदि जैनाचार्यों के कृपापात्र बने रहे। जिनसेनाचार्य जी नृपतुंग के पुत्र इम्मड़ि कृष्ण के गुरू थे। जिनभक्त बंकरस, नृपतुंग के दंडाधिपति थे। नृपतुंग ने प्रश्नोत्तर रत्न मालिका के बाद जैन —संन्यास की दीक्षा ली। राष्ट्रकूट साम्राज्य, जिनका शासन कर्नाटक में उन्नत स्थिति में था। उनके भी संकट के दिन आए। नृपतुंग के पौत्र मुम्मड़ि कुण्ण विख्यात चक्रवर्ती थे। तैलपय्य, उनके महासामंत होकर तर्गवाडि से शासन करते थे। कृष्ण की मृत्यु के बाद कोई भी शक्तिशाली नहीं रहा। साम्राज्य के चारों ओर शत्रु तैयार थे। परमार के सीयक हर्ष ने राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेट जलाकर लूट ली। रट्टों के कोट्टिग और कर्क भी दुर्बल होकर हार गए। गंगराज मारसिंह ने चतुर्थ इन्द्र को राष्ट्रकूटों के सिंहासन पर बिठाकर रट्टराज्य की पुन: स्थापना की कोशिश की, लेकिन विफल हो गए।

महत्वाकांक्षी तैलप ऐसे संदर्भ की रहा देख रहा था। अवसर मिलते ही कार्योन्मुख हुआ। स्वयं राजा घोषित करके राजधानी मान्यखेट को अपने वश में कर लिया। राज्य के चारों ओर जो शत्रु राजा थे उन पर आक्रमण किया। युद्धों में विजयी होकर नए साम्राज्य के संस्थापक बन गए। इस प्रकार दसवीं शताब्दी में एक नया साम्राज्य पश्चिम चालुक्य का उदय हुआ। इस राज वंश का और एक नाम कल्याणि चालुक्य भी है। ई. स.९७३—७४ में तैलप ने इसकी स्थापना की । और वर्षों तक चक्रवर्ती होकर राज्य किया । दो महान जैन वंश—परिवार ही इस तैलप (ई.स.९७३—९९७) के राज्यशासन में — साथी और सहायक थे। उनमें श्रेष्ठ हैं मल्यपय्य, पुन्नमयय, गुंडमय्य, आहवमल्ल, धल्लपय्य, नागदेव, अण्णिगदेव। आप सभी अत्तिमब्बे के परिवार के ही थे।

आज के आंध्रप्रदेश का बेंगी प्रदेश हजार वर्ष से पहले कर्नाटक का था। बेंगी, बेडंगी, बोंगि, बेंगि आदि नामों से यह एक छोटा सा प्रसिद्ध देश था। उस समय यह वेंगी प्रदेश जैन धर्म का केन्द्र होकर जिनमंदिरों का श्रेष्ठ स्थान था। इस छोटे से देश के जैन राजा, राजपूजित, राजाश्रितों ने जैन संस्कृति साहित्य कला, इतिहास के प्रचार—प्रसार के लिए अपना योगदान दिया। कन्नड साहित्य के श्रेष्ठ साहित्यकार पंप, पोन्न, नागवर्म आदि वेंगी प्रदेश के ही हैं। पोन्नकवि ने वेंगी प्रदेश का वर्णन इस प्रकार किया है ‘वेंगी देश इस त्रिलोक में अतिशय है’, वहाँ सभी प्रकार के फल, वृक्ष अमूल्य वस्तु संपदा मिलते हैं। वह भूदेवी के तिलक के समान, मुख कमल के समान नवतारूण्य से, तिरछी नजरों सा होठों के शृ्रंगार—सा श्रेष्ठ है—यह बेंगी देश। सिर्फ विद्याधरलोक मात्र इसकी समानता कर सकता है। इस प्रदेश का सुन्दर नगर है पुंगनूर। महाकवि रत्न ने कहा मिगिलेनिकुं विषयदोलगे वेंगी विषयं। वेंगी प्रदेश के समान और कोई प्रदेश नहीं है।

जलधितरंग ताड़ित महीतलदोल , नेगलदन्तु बेंगि मं

डलमदरोल् जितान्य विषयं नेगलिदहर्ददु कंमेदेऽशम
ग्र्गालिकेय कंमेदेऽशमनलंकरि दर्ददु पुंगनूर जग
त्तिलक मदवर्वे मुख्यमेने पेंपेसेदिर्ददुदु नागमय्यना।।

(वेंगी मंडल, समुद्र की लहरों से छुए जाने वाले प्रदेश में प्रसिद्ध था। अन्य देशों से भी बढ़कर प्रसिद्ध था, वह कीर्तिशाली कम्मेदेश इसी प्रकार प्रसिद्ध कम्मेदेश का अलंकार सा था— पुंगनूर,। पृथ्वी के तिलक सा सुन्दर दिखाई देते थे वहाँ नागमय्य। नागमय्य की महिमा श्रेष्ठ थी। नागमय्य— मयूरों को वर्षा देने वाले मेघ से थे। सज्जनों की भलाई करते थे। वे जिनभक्त थे। दिग्गजों के सामना करते, मंगल लक्षणों के साथ ख्यात थे।

इस जैन परिवार के ज्येष्ठ नागम्मय्य के कल्पवृक्ष के समान दो पुत्र थे। अग्रसुत का नाम था— मल्लपय्य, इस विद्यानिधि मल्लपय्य के अनुज थे पोन्नमय्य, गुणधर पोन्नमय्य भाई के भक्त थे। कृष्ण—बलराम, राम—लक्ष्मण, भीम—अर्जुन के समान ही आप दोनों भाई राज्य भर में प्रसिद्ध थे। पुराण पुरूषों के समान भ्रातृत्व था। इन चरित्र पुरूषों का सौंदर्य आर्दश और प्रत्यक्षदर्शी होने के कारण से यही श्रेष्ठ लगने लगा। इन अपूर्व भाईयों का व्यक्ति चित्रण, पोन्न और रन्न ने अपने काव्यों में बहुत आकर्षक रूप से चित्रित किया है। आज भी इनके पद्य प्रभाव पूर्ण हैं।

राज्यशास्त्र निपुणता, युद्धकुशलता, सदाचार संपन्नता, गंभीर चरित्र, पात्र के अनुसार उदारता, कला साहित्य आदि को अधिक आश्रय देना आदि गुण और व्यक्त्वि से मल्लप—पुत्रमय्य—सभी के प्रिय बन गये थे। पंड़ित और कवियों को इनका घर मायके सा रहता था। भूत—भविष्यत और वर्तमान को जानने की कुशलता थी। शत्रु कितना भी पराक्रमी क्यों न हो उसे हराने का शौर्य था। इस प्रकार दान देनें और रक्षा करने के श्रेष्ठ गुण इनमें थे।

पिता नागमय्य के काल से ही आपके कुलदेवता—शांतिनाथ तीर्थंकर और कुलगुरू आचार्य जिनचंद्र मुनि थे। जिनचंद्र मुनि के स्वर्गामन के बाद उनके परोक्ष विनय के लिए, इन्होंने पोन्न कवि से शांति पुराण की रचना करवाई, और शास्त्रदान किए। कन्नड साहित्य के लिए इन भाइयों का यह एक श्रेष्ठ योगदान रहा है।

तैलप ने अपने आत्मीय स्वमतीय—मल्लपय्य—और पोत्रमय्य को अपने प्रधान सेनापति के स्थान पर नियुक्ति की थी। और एक महाशूर विवेकी, बृहस्पति धल्लपय्य की नियुक्ति राजसभा में प्रमुख व्यक्ति के रूप में की थी।चालुक्य राज्य के मंत्रि धल्लपय्य—सम्यक्त्व चूड़ामणि जिनभक्त थे। जैन धर्म के यह राजमंत्री, दंडनायक कर्नाटक के एक महासाम्राज्य को संघटित करने में व्यस्त रहे। दो दशकों तक का इनका परिश्रम और त्याग चरितार्थ है। तैलप—समस्त—भुवनाश्रय— श्री पृथ्वीवल्लभ महाराजधिराज परमेश्वर परमभट्टारक सत्याश्रय कुलतिलक चालुक्याभरण कहलाकर अजर—अमर कीर्ति के पात्र रहे। तैलप को इस कीर्ति शिखर तक पहुँचाने में, धल्लप और मल्लप के परिवारों ने जो त्याग किया है उसका वर्णन शिलालेखों में चित्रित है। धल्लप—मल्लप के परिवार वालों ने ही तैलप के राज्य की अभिवृद्धि में अपना श्रेष्ठ योगदान दिया है।

धल्लप तैलप के वङ्काकोटि के समान थे। धल्लप, चालुक्य राज्य के राजशासन के दस्तावेजों के भंड़ार के अधिकारी थे। धल्लप ही रणरंगाभिमुख वीर भटों के मार्गदर्शक थे। धल्लप एक श्रेष्ठ योद्धा भी थे। साहस समय प्रज्ञा, तर्क आदि कारणों से धल्लप, तैलप के श्रेष्ठ साथी थे। कोंकण की सेना यह जानकर पीछे हट गई कि अगर धल्लप की दृष्टि में जा पड़े तो अपनी हालत हाथियों से कुचली जानेवाली चूड़ियों के समान होगी। वेंगी की सेना चकित हो गई । शत्रु सेना भाग गई। भीषण, अतिरौद्र अदभुत, अतितेजस्वी धल्लप को तैलप ने पूर्ण स्वातंत्र्य दिया। इन दोनों में—तैलप और धल्लप में सिर्फ सिंहासन का भेद था, और सब कुछ समान था।

‘‘तित्थयर’’ मासिक
जून—२०१४