ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अत्यंत सरल है जैनधर्म

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अत्यंत सरल है जैनधर्म

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बहुत से लोग कहते हैं कि जैनधर्म एक बड़ा ही कठिन धर्म है, उसके लिए अमुख—अमुख प्रकार से बड़ी कठिन साधना करनी पड़ती है, बहुत भारी ज्ञान—चारित्रादि का गहन अभ्यास करना पड़ता है। कितने ही तो जैनधर्म के विद्वान होकर भी ऐसा कहते देखे जाते हैं कि जैनधर्म को समझना और पालना कोई आसान कार्य नहीं है, उसके लिए बहुत अधिक समय देना पड़ता है, अनेक ग्रंथों का बहुत गहरा अध्ययन करना होता है, अमुख—अमुख विषयों की बड़ी गूढ़—गम्भीर चर्चा समझनी पड़ती है, इत्यादि—इत्यादि। इसी प्रकार और भी अनेक प्रकार से लोग जैनधर्म को को बड़ा ही कठिन धर्म प्ररूपित करते हैं। परन्तु यदि जैन—ग्रंथो का ही सिंहावलोकन किया जाए तो वस्तुस्थिति बिल्कुल ऐसी नहीं प्रतीत होती है। वहाँ तो जैनधर्म को समझना और पालना—दोनों ही अत्यंत सरल बताया गया है। जरा देखिए, जो सम्यग्दर्शन अत्यंत महिमावंत है, मोक्षमार्ग का मूलाधार है, अत्यंतय दुर्लभ कहा गया है, बड़े— बड़े पंडितों को भी नहीं हो पाता है, वह सम्यदर्शन चारों ही गतियों में सभी संज्ञी जीवों को किसी भी साधारण निमित्त से सहज ही प्राप्त हो जाता है। जैसा कि कविवर पं. बनारसीदास जी ने स्पष्ट लिखा है—‘चहु गति सैनी जीव को, सम्यक् दरशन होई।’—(समयसार नाटक २८) विचारणी है कि पशु पक्षी आदि तिर्यन्च, भील, चोर, किसान आदि मनुष्य, अत्यंत प्रतिकुलता मेें रहने वाले नारकी और अत्यंत अनुकूलता में रहने वाले सभी प्रकार के देव—सभी जिस सम्यग्दर्शन को प्राप्त कर सकते हैं वह कठिन कैसे हो सकता है? वह तो अत्यंत सरल ही हुआ न! और देखिए, शास्त्रों में कैसे—कैसे प्रसंग घटित भी हुए है। १. एक अंजन नाम का चोर था। उसे भेदविज्ञान हो गया और आगे चलकर वह मुनि दीक्षा धारण कर कैलाश पर्वत से मोक्ष भी चला गया। यथा— ‘अंजन चोर का आणं ताणं शेठी वाक्य प्रमाणं से भेद विज्ञान हुआ और मोक्ष भी कैलाश पर्वत से गया’। ‘ततश्चारणमुनिसन्निधौ तपो गृहीत्वा केवलमुत्पाद्य मोक्षं गत:।’

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आचार्य प्रभाचंद्र टीका, रत्नकरण्डक श्रावकाचार, १/१९

तदन्तर चारण ऋद्धि धारी मुनिराज के पास दीक्षा लेकर उसने पर्वत पर तप किया और केवलज्ञान प्राप्त कर वहीं मोक्ष प्राप्त किया। २. एक शिवभूति नामक सेठ था। बहुत कोशिश करने पर भी वह जीवादि सात प्रयोजनभूत तत्वों का नाम तक वंâठस्य नहीं कर सकता था और मात्र ‘तुष माष भिन् नं’ ही रटने लगा, किन्तु उसे इसी के द्वारा शरीर और आत्मा का भेदविज्ञान हो गया और आगे चलकर वह वीतराग—सर्वज्ञ भी बन गया। ‘‘शिवभूति मुनि जीवादिकका नाम न जानैं था, अर तुषमाषभिन्न ऐसा घोषने लगा तो यहु सिद्धान्तका शब्द था नाहीं, परन्तु आपा परका भावरूप घ्यान किया, तातै केवल भया।’’ (पं. टोडरमल, मोक्षमार्ग प्रकाशक, ७/३३०) इसी प्रकार के और भी सैकड़ो नहीं हजारों प्रसंग शास्त्रों में से बताये जा सकते हैं, जिनमें यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि जैनधर्म कठिन नहीं है, अपितु अत्यंत सरल है। फिर भी यदि हमें यह अत्यंत कठिन लगता है तो समझना चाहिए कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ अवश्य है। और वह गड़बड़ भी हमारे ही अंदर होनी चाहिए। अन्यथा ऐसा कैसे हो सकता था कि इतने साधारण से जीवों को तो भेद विज्ञान, सम्यग्दर्शन या मोक्षमार्ग यहाँ तक कि मोक्ष की भी प्राप्ति हो जाए और हमें निमित्त—उपादान, द्रव्य—गुण पर्यायादि की सूक्ष्म—सूक्ष्मय चर्चाऐं करते अथवा ढेर सारा व्रत—तपादि चारित्र पालते हुए पच्चीस—पचासों वर्ष बीत गये और अभी तक कुछ नहीं हुआ। जरूर कहीं न कहीं कुछ बड़ी विकृति हमारे अंदर अवश्य है। किसी ने सच ही कहा लगता है कि बड़े—बड़ेय पंडित उलझे रहते हैं और विशुद्ध भाव वाला साधारण जीव भी संसार से तिर जाता है। यद्यपि यह बात एकदम सत्य है कि मोक्ष एवं मोक्षमार्ग की प्राप्ति भेदविज्ञान से ही होती है, उसके बिना कथमपि नहीं हो सकती ‘भेदविज्ञानता सिद्धा: सिद्धा ये किला केचन।’—( आचार्य अमृतचन्द, समयसार कलश, १३१) जो कोई सिद्ध हुए है, वे इस भेद विज्ञान से ही हुए है। तथापि वह भेद विज्ञान भी कोई हौआ नहीं है वह तो मुनिराज से उपदेश सुने बिना ही,मात्र उनके दर्शन से ही भव्य जीवों को उत्पन्न हो सकता है। राजा श्रेणिक आदि अनेकानेक जीवों को उत्पन्न हुआ ही है। ‘सर्वार्थसिद्धि’ में लिखा है कि मुिनराज बिना बोले ही, अपनी मुद्रा से ही मोक्षमार्ग का प्रतिपादन करते हैं— ‘मूर्तमिव मोक्षमार्गमवाग्विसर्गं वपुषा निरूपयन्तम्ं’ —(आचार्य पूज्यपाद, सर्वार्थसिद्धि प्रथम अध्याय, प्रथम अनुच्छेद) इतना ही नहीं, अचेतन पाषाणमयी कृत्रिम जिन प्रतिमा के दर्शन मात्र से भी भेदविज्ञान की प्राप्ति होने की बात कही गई है। ‘मध्यलोकविषैं विधिपूर्वक कृत्रिम जिनिंबब विराज है जिनके दर्शनादिकवै स्व—पर भेद—विज्ञान होय है, कषाय मंद शांतभाव होय हैं।’—(पं. टोडरमल, मोक्षमार्ग प्रकाशक, पृष्ठ ८) विचारणीय है कि इससे सरल स्थिति और क्या हो सकती? अरे भाई, भेदविज्ञान करने में कोई पहाड़ थोड़े ही उठाने है, मात्र जीव और अजीव की भिन्नता ही तो पहचाननी है। यथा

‘जीवोऽन्य: पुद्गलश्चान्य: इत्यसौ तत्त्वसंग्रह:।

यदन्यदुच्यते किंचिस्तोऽस्तु तस्यैव विस्तर:।।’’

आचार्य पूज्यपाद इष्टोपदेश, ५०

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हिन्दी पद्यानुवाद

‘‘जीव जुदा, पुद्गल जुदा, यही तत्त्व का सार। अन्य कुछ व्याख्यान जो, याही का विस्तार।।’’ दरअसल, जैनधर्म या भेदविज्ञान कठिन नहीं है, उसे कठिन हमनें बना दिया है यदि परिणाम में भद्रता हो, सरलता हो, काललब्धि आ गई हो तो सारा मोक्षमार्ग सरल ही है, और यदि परिणामों में वक्रता हो, कुटिलता हो, अभी दीर्ध संसार बाकी हो तो सारा मोक्षमार्ग कठिन ही है। मात्र भेदविज्ञान और सम्यदर्शन ही नहीं, आगे का सारा मोक्षमार्ग भी सरल ही है, तभी तो बादल, बिजली,सपेâद बाल आदि जरा—सा कुछ भी देखकर ही अनगिनत जीवों को वैराग्य हो गया था, उन्होंने मुनि—दीक्षा अंगीकार कर ली थी। जैनधर्म को कठिन कहने वालों ने जैनघर्म के प्रचार—प्रसार को भी बड़ा भारी नुकसान पहँुचाया है, जबकि पर्ववर्ती समस्त जैनाचार्यों ने कहीं भी उसे कठिन रूप में प्रस्तुत नहीं किया। संयम तप—त्याग की बात को भी उन्होंने सर्वत्र ‘यथाशक्ति’ या ‘शक्तित:’ शब्द लगाकर ही समझाय है—शक्तितस्त्याग, शक्तितस्तप, इत्यादि। सभी जैनाचार्य ने एक स्वर से यह उद्धोष किया हैं कि—

‘‘ जं सक्कदि तं कीरइ जं च ण सक्कदि तहेव सद्दणं।

सद्दहमाणो जीवो पावदि अजरामरं ठाणं।।’’

(आचार्य कुन्दकुन्द, दर्शनपाहुड,२२)

अर्थ—जितना शक्य हो उतना करो और यदि शक्य न हो तो उसकी श्रद्धा अवश्य करों। श्रद्धावान् जीव अजर—अमर पर को प्राप्त कर लेता है। इस गाथा का हिन्दी—पद्यानुवाद कविवर द्यानतरायजी ने इस प्रकार किया है।

‘‘कीजे शक्ति प्रमान, शक्ति बिना सरधा धरै।

द्यानत सरधावान् , अजर—अमर पर भौगवै।।’’

(देव—शास्त्र—गुरू—पूजा, जयमाला)

विचारणीय हे कि इनमें कठिन क्या है? हमसे जितना पाप छूटे उतना ही छोड़ना है और शेष की ‘यह पाप है’—ऐसी सच्ची श्रद्धा करनी है बस! इसमें कठिनाई क्या है। किसी भी व्यक्ति को ‘जैन’ होने के लिए मात्र श्रद्धा ही तो समीचीन करनी है, और अन्य क्या करना है? ‘श्रावक’ होने के लिए भी मात्र इतनी—सी शर्त बताई गई कि एक तो अरिहंत देव में अटल श्रद्धा होना चाहिए और दूसरा मात्र शाकाहारी जीवन होना चाहिए।

‘‘हृदय में तो एक अटल हो, श्रद्धा श्री अरिहंत की।

दूजा शाकाहार रही, बस यह परिभाषा ’जैन’ की।।’’

‘‘जैन’ होने के लिए दुनिया भर के लौकिक क्रिया—कलापों के त्याग की या उन पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध लगाने की भी जैन आचार्यों ने कोई शर्त नहीं बतायी है। बस इतना कहा है। कि—

‘‘सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधि:।

यत्र सम्यक्त्सवहानिर्न न चापि व्रतदूषण्।।

(सोमदेवसूरि, यशस्तिलचम्पू , ८/३४)

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जैनों को वह समस्त ही लोकव्यवहार (लोकाचार) मान्य है

जिससे सम्यक्त्व की हानि नहीं हो और व्रतों को भी दोष नहीं लगे। दरअसल, जैनाचार्य बड़ी ही उदार एवं व्यापक दृष्टिकोण वाले थे। वे जानते कि क्षेत्र—काल के अनुसार लोकाचार में बहुत सारे परिवर्तन आते ही हैं सभी क्षेत्र —कालों में हमारा बाहरी क्रिया—कलाप एक—सा—नहीं हो सकता। अत: उन्होंने उस सबका कोई हठाग्रह प्रस्तुत नहीं किया और इसलिए हमें भी उस सब पर कोई हठा ग्रह नहीं रखना चाहिए तथा और भी इधर—उधर की फालतू बातें छोड़कर सम्यग्दर्शन—ज्ञान—चारित्र रूप मूलभूत मोक्षमार्ग की साधना पर ही विशेष ध्यान देना चाहिए। इस प्रकार हम देखते हैं कि जैनधर्म जो अत्यंत सरल है, आवश्यकता सिर्क हमें स्वयं को सरल बनाने की है। यदि हम स्वयं को सरल बनाकर जैनधर्म को समझेंगे और पालेंगे तो वह सरलतापूर्वक ही हमारा जीवन में सहज प्रकट हो जाएगा, कहीं कोई बाधा नहीं होगी। जैनधर्म को कठिन बताने के कारण ही आज विश्वव्यापी जैनधर्म के अनुयायियों की संख्या अत्यंत अल्प रह गयी है, अत: आज के समय की यह सख्त आवश्यकता है कि हम जैनधर्म को अत्यन्त सरल रूप में प्रस्तुत करें।समस्त आडम्बरों से दूर, विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक तथा एकदम एवं व्यावहारिक जैनधर्म से सरल धर्म भला अन्य कौन—सा होगा?

प्रो.डॉ.वीरसागर जैन, दिल्ली