ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अथ मुखशुद्धिमुक्तकरण विधि

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अथ मुखशुद्धिमुक्तकरण विधि

दीक्षा के दिन दीक्षा लेने वाले मुनि या आर्यिका आदि का उपवास रहता है। अगले दिन आहार के पहले अपनी वसतिका में आचार्यदेव शुद्ध गर्म जल ब्रह्मचारी या गृहस्थ श्रावक से मंगवाकर ‘मुखशुद्धिमुक्तकरणविधि’ करावें।

पं. पन्नालाल जी सोनी, ब्यावर वालों ने इस विधि का ऐसा अर्थ किया था कि आज तक सप्तम प्रतिमाधारी आदि श्रावक बिना मुखशुद्धि किये पूजा नहीं करते थे, न आहारदान देते थे अत: अब आहार से पूर्व मुखशुद्धि का त्याग करने के लिए यह विधि कराई गई। इस विधि को करने के बाद प्रथम आहार करेंगे पुन: आगे अब साधु बिना मुखशुद्धि-बिना कुल्ला किए ही आहार को जावेंगे अत: यह विधि आवश्यक है।

त्रयोदशसु पंचसु त्रिषु वा कच्चोलिकासु लवंग-एला-पूगीफलादि निक्षिप्य ता: कच्चोलिका: गुरोरग्रे स्थापयेत्। ‘मुखशुद्धिमुक्तकरणपाठ-क्रियायामित्याद्युच्चार्य सिद्ध-योगि-आचार्य-शान्ति-समाधिभक्तीर्विधाय तत: पश्चान्मुखशुद्धिं गृह्णीयात्।


त्रयोदश पाँच अथवा तीन कटोरियों में लवंग-इलायची-सुपाड़ी-आदि को डालकर वह कटोरियाँ गुरू के सामने स्थापित करें। (इसमें गर्म जल भर देवें)
 
अथ मुखशुद्धिमुक्तकरणपाठ-क्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भावपूजा-वंदनास्तवसमेतं सिद्धभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहं।

णमो अरहंताणं इत्यादि दंडक, कायोत्सर्ग, थोस्सामि स्तव पढ़े, ‘‘सिद्धानुद्धूत....’’ आदि सिद्धभक्ति का या हिन्दी सिद्ध भक्ति का पाठ करें।

अथ मुखशुद्धिमुक्तकरणपाठक्रियायां..........योगिभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहं।

(पूर्वदंडकादि करके योगिभक्ति संस्कृत या हिन्दी की पढ़ें।)

अथ मुखशुद्धिमुक्तकरणपाठ क्रियायां.......आचार्यभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं।

(दंडकादि करके आचार्यभक्ति संस्कृत या हिन्दी की पढ़ें।)

अथ मुखशुद्धिमुक्तकरणपाठ क्रियायां..........शांतिभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहं।

(दंडकादि करके शांतिभक्ति संस्कृत या हिन्दी की पढ़ें।)

अथ मुखशुद्धिमुक्तकरणपाठक्रियायां पूर्वा.........सिद्ध-योगि-आचार्य-शांति-भक्ती: कृत्वा तद्धीनाधिकदोषशुद्ध्यर्थं समाधिभक्ति-कायोत्सर्गं करोम्यहं। (दंडकादि करके समाधिभक्ति पढ़ें)

पश्चात् मुखशुद्धि ग्रहण करें (गर्मजल से दो-तीन कुल्ला करें)

अर्थात् श्रावक जब तक दीक्षित नहीं होता, आचमन से मुखशुद्धि करता रहता है। दीक्षा के अनंतर आचमनादि से होने वाली शुद्धि को ही छोड़ते हुए (मुखशुद्धि मुक्तकरण) ऐसी विधि करता है। पुन: आगे उसे मुखशुद्धि (जलादि के द्वारा आचमन) करने की आवश्यकता नहीं रहती है।

विशेष - जो यह मुनि दीक्षा की विधि यहाँ कही गई है, आर्यिका दीक्षा में यही विधि करने का विधान है।