ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अध्यात्म — पीयूष

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अध्यात्म — पीयूष

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हिन्दी पद्य — शुद्धात्मभावना—

मेरा तनु जिन मंदिर उसमें, मन कमलासन शोभे सुन्दर।
उस पर मैं ही भगवान् स्वयं, राजित हूँ चिन्मय ज्योति प्रवर।।
मैं शुद्ध बुद्ध हूँ सिद्ध सदृश, कर्मांजन का कुछ लेप नहीं ।
मैं स्वयं स्वयंभू परमात्मा, मेरा पर से संश्लेष नहीं।।१।।

मैं भाव कर्म औ द्रव्यकर्म, नो कर्म रहित शुद्धात्मा हूँ ।
मैं अरस अगंध अरूपी हूँ, स्पर्श रहित सिद्धात्मा हूँ ।।
संस्थान शरीर वचन मन से, विरहित पुद्गल से भिन्न कहा।
मैं आयु श्वासोच्छ्वास रहित, जीवन और मरण विविक्त रहा।।२।।

मैं आधि व्याधि शोकादि रहित, मद मोह विषाद विवर्जित हूँ।
क्रोधादि कषायों से विरहित , विषयादिक सौख्य विवर्जित हूँ।।
मैं निर्मम हूँ एकाकी हूँ, मेरा अणुमात्र नहीं कुछ भी।
मैं ज्ञायक एक स्वभावी हूँ , पर में अनुराग नहीं कुछ भी।।३।।

मैं वीतमोह मैं वीतराग , मैं वीतद्वेष मैं भव विरहित ।
मैं इन्द्रिय सुख औ दु:ख रहित, मैं इन्द्रिय ज्ञान रहित हूँ नित।।
मैं सकल विमल केवलज्ञानी, परमाल्हादैक सुखास्वादी।
मैं चिन्मय मूर्ति अमूर्तिक हूँ , निज समरस भाव सुधास्वादी।।४।।

मैं हूँ अपने में स्वयं सिद्ध, पर की भक्ति का काम नहीं।
मैं भक्त नहीं भगवान् स्वयं , मेरा निजपद शिवधाम सही।।
मैं हूँ अनंत गुणपुँज अतुल, अविनाशी ज्योति स्वरूपी हूँ ।
मैं हूँ अखंड चित्पिंड परम, आनंद सौख्य चिद्रूपी हूँ ।।५।।

मैं नित्य निरंजन परं ज्योति, मैं चिच्चैतन्य चमत्कारी।
मैं ब्रह्मा विष्णु महेश्वर हूँ, मैं बुद्ध जिनेश्वर सुखकारी ।।
मैं ही निज का कर्ता धर्ता, मैं अनवधि सुख का भोक्ता हूँ।
मैं रत्नत्रय निधि का स्वामी, अगणित गुणमणि का भर्ता हूँ।।६।।

मैं सकल निकल हूँ अमल अचल, अविकारी अनुपम गुणकारी ।
मैं जन्म रहित हूँ अजर अमर, मैं अरुज अशोक भर्महारी ।।
मैं परम पुरुष हूँ परम हंस, समता पीयूष रसास्वादी ।
मैं ज्ञायक टंकोत्कीर्ण एक, चिन्मय चिज्ज्योति महाभागी।।७।।
                          
मैं लोकालोक प्रकाशी हूँ, निजज्ञान किरण से व्यापक हूँ।
मैं भूत भविष्यत वर्तमान, अनवधि पर्यय का ज्ञायक हूँ।।
मैं इन्द्रिय बल उच्छ्वास आयु, आदि दश प्राणों से विरहित।
सुख सत्ता दर्शन ज्ञानमयी, चेतन प्राणों से नित अन्वित।।८।।

मैं हूँ संसारातीत सदा, मैं देहातीत निराला हूँ ।
मैं हूँ अनंत दृग ज्ञान वीर्य, सुखरूप चतुष्टय वाला हूँ ।।
मैं दोष विखंडित गुण मंडित, मैं निश्चय से त्रिभुवन गुरु हूँ।
मैं अर्हत् सिद्ध सूरि पाठक, साधु मैं पंच परम गुरु हूँ ।।९।।
यद्यपि जड़कर्म अनादि से, मेरे संग बंधे हुए फिर भी।

निश्चय नय से मैं मुक्ति रमा—पति बंध मोक्ष से रहित सही।।
जब मैं सदृष्टि ज्ञान चरणरत , बहिरंतर परिग्रह त्यागी।
निश्चय से निज में निश्चल हो, निज को ध्याऊं निज में रागी।।१०।।

माया मिथ्यादिक शल्य रहित, अविरति आस्रव बंधादि रहित।
मैं संयत हूँ मैं महाश्रमण, यति मुनि ऋषि हूँ व्रत गुण भूषित।।
निज शुद्धात्मा मैं सम्यक्रुचि, सुज्ञान चरण मय सुस्थिर हूँ।
मैं निश्चय रत्नत्रय परिणत , शुद्धोपयोग में स्थिर हूँ ।।११।।

परिषह उपसर्ग भले ही हों , मैं किंचित् नहिं घबराऊँगा।
परमानंदामृत पी करके , निज में ही तृप्ति पाउँगा।।
उस समय स्वयं ही मैं तत्क्षण, सब कर्मों से छुट जाऊँगा ।
निज ज्ञान सूर्य प्रगटित होगा, मैं त्रिभुवन पति कहलाऊँगा।१२।।

बहिरात्मदशा को छोड़ स्वयं , अंतर आत्मा शुद्धात्मा हूँ ।
मैं ज्ञान चेतनामय परिणत , निश्चयनय से परमात्मा हूँ ।।
मैं सुख—दुख जीवन — मरण महल—वन कनक—कांच में समभावी।
मैं लाभ—अलाभ मित्र —शत्रु, परिजन—पुरजन में समभावी ।।१३।।

मैं इष्ट वियोग अनिष्ट योग, से रहित इष्ट आराध्य स्वयं ।
पर में अपनत्व यही बुद्धि, है नित्य अनिष्टमयी दुखदं ।।
मेरी आत्मा विश्वस्त स्वयं, पर में विश्वास करू फिर क्या ?
पर जन लौकिकजन मुझसे फिर, विश्वासघात कर सकते क्या ?।।१४।।

मैं त्रयगुप्ति से गुप्त सदा, आक्रोश वाण कर सकते क्या ?
पर के निन्दा वच कर्णपूर, भूषण होवें फिर उनसे क्या ?
पर के बंधन पीड़न यंत्रों , के पीलन आदि उपद्रव भी।
कटु कर्म उदीर्ण करें क्षण में, वे बंधन मुक्त करे झट ही।।१५।।

मैं क्षमा मूर्ति हूँ गुणग्राही , क्रोधादि पुन:कैसे होंगे ?
मैं इच्छा रहित तपोधन हूँ , फिर कर्म नहीं क्यों छोड़ेंगे ?
मैं हूँ निश्चय से कर्म रहित , फिर कर्मोदय कर सकते क्या ?
मैं हर्षविषाद विभाव रहित, मुझको परिणत कर सकते क्या ?।।१६।।

मुझमें कषाय का उदय नहीं, संक्लेश भला कैसे होगा ?
मैं हूँ अमूर्त यह कर्ममूर्त , संश्लेश भला कैसे होगा ?
यद्यपि निज आत्म प्रदेशों से, ये कर्म एकता किये हुए।
हैं क्षीर नीरवत् एकमेक, फिर भी निश्चय से भिन्न कहे।।१७।।

वे कर्म स्वयं हैं जड़ पुद्गल, इनके औपाधिक भाव प्रगट ।
वे भी जब मुझसे भिन्न कहे, फिर तनु आदिक तो स्वयं पृथक्।।
तनु से संबंधित शिष्यादिक, वे तो सचमुच में पृथक् पृथक्।
उनमें ममता कैसे करना, यह ममता ही निजसुख घातक ।।१८।।

मेरे हृदयाम्बुज में नित प्रति, चिन्मय भगवान् विराज रहे।
मेरे अंतर में आनंदघन, अमृतमय पूर्ण प्रवाह बहे।।
वह ही आनन्द घनाघन हो, कलिमल को दूर करे क्षण में ।
सब दुरित सूर्य का ताप शमन, कर शाश्ववत शांति भरे मुझमें।।१९।।

मैं सब संकल्प विकल्प शून्य , मैं अहंकार ममकार रहित ।
मैं निर्विकल्प शुचि वीतराग—मय परम समाधि में सुस्थित।।
मैं ध्याता ध्यान ध्येय विरहित, मैं हूँ एकाग्र परम निश्चल ।
मैं ध्यान अग्नि से नाश करूं , निज के सब बाह्याभ्यंतर मल।।२०।।

मैं आर्तरौद्र से रहित सदा, हूँ धर्म शुक्ल ध्यानी ज्ञानी।
मैं आशा तृष्णा रहित सदा, हूँ स्वपर भेद का विज्ञानी।।
मैं निज के द्वारा ही निज को, निज से निज हेतु स्वयं ध्याकर।
निज में ही निश्चल हो जाऊं, पाऊं स्वात्मैक सिद्धि सुन्दर।।२१।।

पत्थर खनि से पत्थर प्रगटे, हीरे की खनि से हीरा ही ।
निज को अशुद्ध समझे जब तक, तब तक यह जीव अशुद्ध सही।।
जब निज को शुद्धात्मा समझे, ध्यावे शुद्धात्मा बन जावे।
निज को परमात्मा ध्या—ध्या कर, निज में परमात्मा प्रगटावे।।२२।।

सब जीव अनंतानंत कहे, वे मुक्त तथा संसारी हैं।
मैं उन सबसे हूँ भिन्न सदा, वे निज सत्ता के धारी हैं।।
पुद्गल भी नंतानंत कहे, उनसे कुछ भी संबंध नहीं।
हैं धर्म अधर्म अचेतन ही, उनसे फिर क्या संबंध सही।।२३।।

आकाश अनंतानंत रहा, इससे भी मैं अस्पर्शित ही।
कालाणु असंख्यातों छमिलकर, मुझमें परिवर्तन करें नहीं।।
नोकर्म वर्गणायें मिलकर, मन वच काया को रचा करें।
सब कर्म वर्गणायें आकर, मुझमें सम्बन्धित हुआ करें।।२४।।

सब भावकर्म एकत्रित हो, मुझ में वैभाविक भाव भरें।
फिर भी मैं ज्ञाता दृष्टा हूँ, ये मेरा नहीं बिगाड़ करें।।
मेरे घर में ही रहते ये, फिर भी मुझमें कुछ गंध नहीं।
ये निज अस्तित्व लिये हैं सब, इनका मुझसे सम्बन्ध नहीं।।२५।।

एवेंद्रिय आदि निगोद जीव, से लेकर पंचेन्द्रिय तक भी।
है आत्मा सब की एक सदृश, गुण पुंज असंख्य प्रदेशी ही।।
यद्यपि ये कर्म करें अन्तर, फिर भी निश्चय से भेद नहीं ।
सब सिद्ध सदृश शुद्धात्मा हैं, व्यवहार करे सब भेद सही ।।२६।।

ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य शूद्र, ये वर्ण जिनागम भाषित हैं।
फिर भी निश्चय से वर्ण रहित, आत्मा ज्ञानैक प्रभावित है।।
जाति कुल गोत्र सभी माने, यद्यपि मुक्ति पथ में साधक।
फिर भी व्यवहार नयाश्रित ये, निश्चय से शुद्धातम साधक।।२७।।

जो स्त्री पुरुष नपुंसक भी, हैं वेद कहे सिद्धान्तों में ।
व्यवहार नयाश्रित ये सच्चे, निश्चय से क्या इन बातों में ।।
व्यवहार बिना निश्चय यद्यपि , निश्चय एकांत कहाता है।
व्यवहार बिना उत्पन्न न हो, फिर भी व्यवहार मिटाता है।।२८।।

यह निश्चयनय जब निश्चित ही, ध्यानस्थ अवस्था पाता है।
तब दोनों नयके भेद रहित, आत्मा शुद्धात्मा कहाता है।।
यह स्वपर भेद विज्ञान तभी, स्वात्मैक्य अभेद प्रगट करता।
भव—भव के कल्मष धोकर के, झट केवलसूर्य उदित करता।।२९।।

चारों गतियों के दु:ख यद्यपि, यह जीव सहन करता जग में ।
फिर भी इनको यदि अपना नहिं, माने तब पहुँचे शिवपथ में।।
जब देह स्वयं पुद्गलमय है, फिर उसके दु:ख में क्या दु:ख है।
जब मैं तनु से हूँ भिन्न सदा, फिर उसके निर्मम में सुख है।।३०।।

चाहे तन को बहुरोगादिक, पीड़े चाहे तन नाश करें।
चाहे कोई अग्नि ज्वालें, चाहे तन छेदें घात करें।।
चाहे मच्छर सर्पादिक भी, डसलें सिंहादिक प्राण हरें।
फिर भी मैं अचल रहूँ निज में, मेरा मन समरस पान करे।।३१।।

चाहे सुरनर पशुगण मिलकर, उपसर्ग अनेकों बार करें।
मैं स्वयं स्वयं में लीन रहूँ, मुझको नहिं हो कुछ भान अरे।।
चाहे सुरनर आदिक मिलकर , सत्कार करें बहु भक्ति सहित।
नहिं राग रहे उन पर मेरा, मैं हूँ रागादि विकार रहित ।।३२।।

तन धन यौवन इन्द्रिय सुख ये, सब क्षण भंगुर हैं नित्य नहीं।
मैं नित्य अचल अविनश्वर हूँ, स्वाभाविक शक्ति अचिंत्य कही।।
मैं नित्य नमूँ निज आत्मा को, अविनश्वर पद के पाने तक।
मैं ज्ञाता दृष्टा बन जाऊं, सर्वज्ञ अवस्था आने तक।।३३।।

जग में क्या शरण कोई देगा, सब शरण रहित अशरणजन हैं।
आत्मा इक शरणागत रक्षक, उस ही का शरण लिया मैनें।।
यद्यपि अर्हत् जिन पंचगुरु, हैं शरणभूत निज भक्तों के ।
पर निश्चय से निज आत्मा ही, रक्षा करती भव दु:खों से।।३४।।

हैं द्रव्य क्षेत्र औ काल तथा, भव भाव पंच विध परिवर्तन ।
निज आत्मा के अन्दर रमते, ही रुक जाते सब परिभ्रमण।।
मैं हूँ निश्चय से भ्रमणरहित, शिवपुर में ही विश्राम मेरा ।
मैं निज में स्थिर हो जाऊँ, फिर होवे भ्रमण समाप्त मेरा।।३५।।

मैं हूँ अनादि से एकाकी, एकाकी जन्म मरण करता ।
फिर भी अनंतगुण से युत हूँ, मैं जन्म मृत्यु भय का हर्ता।।
स्वयमेक आत्मा को ध्याऊँ, पूजूँ वंदूँ गुणगान करूँ।
एकाकी लोकशिखर जाकर, स्थिर हो निज सुख पान करूँ ।।३६।।

मेरी आत्मा से भिन्न सभी, किंचित् अणुमात्र न मेरा है।
मैं सबसे भिन्न आलौकिक हूँ , बस पूर्ण ज्ञान सुख मेरा है।।
मैं अन्य सभी पर द्रव्यों से, सम्बन्ध नहीं रख सकता हूँ।
वे सब अपने में स्वयं सिद्ध, मैं निज भावों का कत्र्ता हूँ ।।३७।।

यह देह अपावन अशुचिमयी, सब शुचि वस्तु अपवित्र करे।
इस तन में राजित आत्मा ही, रत्नत्रय से तन शुद्ध करे।।
तन सहित तथापि अशरीरी, आत्मा को ध्याऊं रुचि करके।
चैतन्य परम आल्हादमयी, परमात्मा बन जाऊँ झट से।।३८।।

मिथ्या अविरती कषायों से, कर्मास्रव हैं आते रहते।
पर ये जड़ अशुचि अचेतन हैं, जड़ ही इनको रचते रहते ।।
मेरा है चेतन रूप सदा, मैं इन कर्मों से भिन्न कहा।
मैं निज आत्मा को भिन्न समझ, इन कर्मास्रव से पृथक् किया।।३९।।

गुप्ति समिति युत संयम ही, कर्मों का संवर करते हैं।
निश्चय से निज में गुप्त रहूँ , तब कर्मास्रव भी रुकते हैं।।
मैं निर्विकल्प निज परमध्यान, में लीन रहूँ परमारथ में।
फिर कर्म कहो आते कैसे, ये भी रूक जाते मारग में।।४०।।

ध्यानाग्नि से सब कर्मपुंज, को जला जला निर्जरा करूँ ।
बहिरंतर तप तपते—तपते, निज से कर्मों को जुदा करूँ।।
मैं कर्मरहित निज आत्मा को, जब निज में स्थिर कर पाऊँ।
तब कर्म स्वयं ही झड़ जावें मैं मुक्तिश्री को पा जाऊँ।।४१।।

यह लोक अनादि अनिधन है, यह पुरुषाकार कहा जिन ने।
नहिं किंचित् सुख पाया क्षण भर, मैं घूम घूमकर इस जग में।।
अब मैं निज का अवलोकन कर, लोकाग्रशिखर पर वास करूं ।
मैं लोकालोकविलोकी भी, निज का अवलोकन मात्र करूं।।४२।।

दुर्लभ निगोद से स्थावर, त्रस पंचेन्द्रिय होना दुर्लभ।
दुर्लभ उत्तम कुल देश धर्म, रत्नत्रय भी पाना दुर्लभ ।।
सबसे दुर्लभ निज को पाना, जो नित प्रति नित के पास सही।
दुर्लभ निज को पाकर निज में, स्थिर हो पाऊं सौख्य मही।।४३।।

जो भव समुद्र में पतित जनों, को निज सुखपद में धरता है।
है धर्म वही मंगलकारी, वह सकल अमंगल हर्ता है।।
वह लोक में है उत्तम सबमें, औ वही शरण है सब जन को।
निज धर्ममयी नौका चढ़कर, मैं शीघ्र तिरूं भव सिंधू को।।४४।।

इस विध एकाग्रमना होकर, जो निजगुण कीर्तन करते हैं।
वे भव्य स्वयं अगणित गुण मणि, भूषित शिवलक्ष्मी वरते हैं।।
वे निज में रहते हुए सदा, आनन्द सुधारस चखते हैं।
आर्हंत्यश्री ‘सज्ज्ञानमती’, पाकर निज में ही रमते हैं।।४५।।