ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अनंतनाथ पूजा

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भगवान श्री अनंतनाथ जिनपूजा

अथ स्थापना-नरेन्द्र छंद
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श्री अनंत जिनराज आपने, भव का अंत किया है।

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दर्शन ज्ञान सौख्य वीरजगुण, को आनन्त्य किया है।।
अंतक का भी अंत करें हम, इसीलिए मुनि ध्याते।
आह्वानन कर पूजा करके, प्रभु तुम गुण हम गाते।।१।।

ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

अथ अष्टक-अडिल्ल छंद

सरयूनदि को नीर कलश भर लाइये।
जिनवर पद पंकज में धार कराइये।।
भव अंतक श्री जिन अनंत पद को जजूँ।
रोग शोक भय नाश सहज निज सुख भजूँ।।१।।

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ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

मलयज चंदन गंध सुगंधित लाइये।
तीर्थंकर पद पंकज अग्र चढ़ाइये।।भव.।।२।।

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ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

उज्ज्वल अक्षत मुक्ता फल सम लाइये।
जिनवर आगे पुंज चढ़ा सुख पाइये।।भव.।।३।।

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ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

वकुल कमल बेला चंपक सुमनादि ले।
मदनजयी जिनपाद पद्म पूजूँ भले।।भव.।।४।।

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ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

कलावंद मोदक घृतमालपुआ लिये।
क्षुधाव्याधि क्षय हेतू आज चढ़ा दिये।।भव.।।५।।।

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ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

घृतदीपक की ज्योति जले जगमग करे।
तुम पूजा तत्काल मोह तम क्षय करे।।भव.।।६।।।

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ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

अगर तगर सित चंदन आदि मिलाय के।
अग्नि पात्र में खेऊँ भाव बढ़ाय के।।भव.।।७।।।

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ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

अनंनास अंगूर आम आदिक लिये।
महामोक्षफल हेतु तुम्हें अर्पण किये।।भव.।।८।।।

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ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

जल गंधादिक अघ्र्य लिया भर थाल में।
‘ज्ञानमती’ निधि हेतु जजूँ त्रयकाल में।।भव.।।९।।।

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ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

दोहा

श्री अनंत जिनराज के, चरणों धार करंत।
चउसंघ में भी शांति हो, समकित निधि विलसंत।।१०।।।

शांतये शांतिधारा।

बेला कमल गुलाब ले, पुष्पांजली करंत।
मिले आत्म सुख संपदा, कटें जगत दु:ख पंद।।११।।।

दिव्य पुष्पांजलि:।

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पंचकल्याणक अर्घ्य

सखी छंद

सिंहसेन अयोध्यापति थे, जयश्यामा गर्भ बसे थे।
कार्तिक वदि एकम तिथि में, प्रभु गर्भकल्याणक प्रणमें।।१।।।

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ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णाप्रतिपदायां श्रीअनंतनाथजिनगर्भकल्याणकाय अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

तिथि ज्येष्ठ वदी बारस में, सुर मुकुट हिले जिन जन्में।
अठ एक हजार कलश से, जिन न्हवन किया सुर हरषें।।२।।।

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ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाद्वादश्यां श्रीअनंतनाथजिनजन्मकल्याणकाय अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

तिथि ज्येष्ठ वदी बारस थी, उल्का गिरते प्रभु विरती।
तप लिया सहेतुक वन में, पूजत मिल जावे तप मे।।३।।।

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ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाद्वादश्यां श्रीअनंतनाथजिनदीक्षाकल्याणकाय अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

वदि चैत अमावस्या के, पीपल तरु तल जिन तिष्ठे।
केवल रवि उगा प्रभू के, मैं जजूँ त्रिजग भी चमके।।४।।।

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ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णाअमावस्यायां श्रीअनंतनाथजिनकेवलज्ञानकल्याणकाय अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

चैत आमावसी यम नाशा, शिवनारि वरी निज भासा।
सम्मेद शिखर को जजते, निर्वाण जजत सुख प्रगटे।।५।।।

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ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णाअमावस्यायां श्रीअनंतनाथजिनमोक्षकल्याणकाय अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

पूर्णार्घम् (दोहा)

श्री अनंत भगवंत के, चरणकमल सुखवंद।
पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय के, पाऊँ परमानंद।।६।।।

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ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथपंचकल्याणकाय पूर्णार्घम् निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।
जाप्य-ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय नम:।

जयमाला

बसंततिलका छंद

देवाधिदेव तुम लोक शिखामणी हो।
त्रैलोक्य भव्यजन वंज विभामणी हो।।
सौ इन्द्र आप पद पंकज में नमे हैं।
साधू समूह गुण वर्णन में रमे हैं।।१।।
जो भक्त नित्य तुम पूजन को रचावें।
आनंद वंद गुणवृंद सदैव ध्यावें।।
वे शीघ्र दर्शन विशुद्धि निधान पावें।
पच्चीस दोष मल वर्जित स्वात्मध्यावें।।२।।
नि:शंकितादि गुण आठ मिले उन्हीं को।
जो स्वप्न में भि हैं संस्मरते तुम्हीं को।।
शंका कभी नहिं करें जिनवाक्य में वो।
कांक्षें न ऐहिक सुखादिक को कभी वो।।३।।
ग्लानी मुनी तनु मलीन विषे नहीं है।
नाना चमत्कृति विलोक न मूढ़ता है।।
सम्यक्चरित्र व्रत से डिगते जनों को।
सुस्थिर करें पुनरपी उसमें उन्हीं को।।४।।
अज्ञान आदि वश दोष हुए किसी के।
अच्छी तरह ढक रहें न कहें किसी से।।
वात्सल्य भाव रखते जिनधर्मियों में।
सद्धर्म द्योतित करें रुचि से सभी में।।५।।

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वे द्वादशांग श्रुत सम्यग्ज्ञान पावें।
चारित्रपूर्ण धर मनपर्यय उपावें।।
वे भक्त अंत बस केवलज्ञान पावें।
मुक्त्यंगना सह रमें शिवलोक जावें।।६।।
गणधर जयादिक पचास समोसृती में।
छ्यासठ हजार मुनि संयमलीन भी थे।।
थी सर्वश्री प्रमुख संयतिका वहाँ पे।
जो एक लाख अरु आठ हजार प्रमिते।।७।।
दो लाख श्रावक चतुर्लख श्राविकाएँ।
संख्यात तिर्यक् सुरादि असंख्य गायें।।
उत्तुंग देह पच्चास धनू बताया।
है तीस लाख वर्षायु मुनीश गाया।।८।।
‘‘सेही’’ सुचिन्ह तनु स्वर्णिम कांति धारें।
वंदूँ अनंत जिन को बहु भक्ति धारें।।
पूजूँ नमूँ सतत ध्यान धरूँ तुम्हारा।
संपूर्ण दु:ख हरिये भगवन्! हमारा।।९।।
हे नाथ! कीर्ति सुन के तुम पास आया।
पूरो मनोरथ सभी जो साथ लाया।।
सम्यक्त्व क्षायिक करो सुचरित्र पूरो।
वैवल्य ‘ज्ञानमति’ दे, यम पाश चूरो।।१०।।

दोहा

तुम पद आश्रय जो लिया, सो पहुँचे शिवधाम।
इसीलिए तुम चरण में, करूँ अनंत प्रणाम।।११।।।

ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घम् निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।

सोरठा

श्री अनंत भगवंत, नमूँ नमूँ तुम पदकमल।
मिले भवोदधि अंत, क्रम से निजसुख संपदा।।१।।।

।।इत्याशीर्वाद:।।

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