ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अनादिनिधन जैनधर्म

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अनादिनिधन जैनधर्म

नमो नम: सत्त्वहितंकराय, वीराय भव्याम्बुजभास्कराय ।
अनंतलोकाय सुरार्चिताय, देवाधिदेवाय नमो जिनाय ।।।

जैनधर्म के ग्रंथों में लोक को-संसार को अनादिनिधन माना है ।

जैसे कि-

लोगो अकिट्ठिमो खलु अणाइणिहणो सहावणिव्वत्तो ।[१]

इसी लोक में मध्यलोक में जम्बूद्वीप नाम से प्रथम द्वीप है । इसके अन्तर्गत भरतक्षेत्र और ऐरावतक्षेत्र के आर्यखण्ड में षट्काल परिवर्तन होता रहता है । प्रथमत: काल के अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी नाम से दो भेद हैं । उनमें प्रत्येक के अर्थात् अवसर्पिणी के सुषमासुषमा, सुषमा, सुषमादु:षमा, दु:षमासुषमा, दु:षमा और अतिदु:षमा ये छह भेद हैं तथा उत्सर्पिणी काल के भी अतिदु:षमा, दु:षमा, दु:षमासुषमा, सुषमादु:षमा, सुषमा और सुषमासुषमा ये छह भेद हैं ।

वर्तमान की अवसर्पिणी काल में तृतीय काल के अंत में पल्य का आठवाँ भाग अवशिष्ट रहने पर चौदह कुलकर उत्पन्न हुये हैं । उनके नाम क्रमश: प्रतिश्रुति, सन्मति, क्षेमंकर, क्षेमंधर, सीमंकर, सीमंधर, विमलवाहन, चक्षुष्मान्, यशस्वी, अभिचंद्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित् और नाभिराय,[२] हैं ।

इनमें से अंतिम कुलकर नाभिराय से प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव उत्पन्न हुए हैं ।

चौबीस तीर्थंकरों के नाम

  1. ऋषभदेव
  2. अजितनाथ
  3. संभवनाथ
  4. अभिनंदननाथ
  5. सुमतिनाथ
  6. पद्मप्रभ
  7. सुपार्श्वनाथ
  8. चन्द्रप्रभ
  9. पुष्पदंतनाथ
  10. शीतलनाथ
  11. श्रेयांसनाथ
  12. वासुपूज्यनाथ
  13. विमलनाथ
  14. अनंतनाथ
  15. धर्मनाथ
  16. शांतिनाथ
  17. कुंथुनाथ
  18. अरहनाथ
  19. मल्लिनाथ
  20. मुनिसुव्रतनाथ
  21. नमिनाथ
  22. नेमिनाथ
  23. पार्श्वनाथ
  24. महावीर स्वामी ।

इस भरत क्षेत्र में उत्पन्न हुये इन चौबीस तीर्थंकरों को नमस्कार हो, ये ज्ञानरूपी फरसे से भव्य जीवों के संसाररूपी वृक्ष को छेदने वाले हैं ।[३]

आगे आने वाले उत्सर्पिणी के चतुर्थकाल में जो चौबीस तीर्थंकर होवेंगे, उनके नाम निम्न प्रकार हैं-

  1. श्री महापद्म
  2. सुरदेव
  3. सुपार्श्व
  4. स्वयंप्रभ
  5. सर्वप्रभ
  6. देवपुत्र
  7. कुलपुत्र
  8. उदंकनाथ
  9. प्रोष्ठिलनाथ
  10. जयकीर्ति
  11. मुनिसुव्रत
  12. अरनाथ
  13. अपापनाथ
  14. निष्कषायनाथ
  15. विपुलनाथ
  16. निर्मलनाथ
  17. चित्रगुप्त
  18. समाधिगुप्त
  19. स्वयंभूनाथ
  20. अनिवृत्तिनाथ
  21. जयनाथ
  22. विमलनाथ
  23. देवपाल और
  24. अनंतवीर्य

ये चौबीस तीर्थंकर होवेंगे[४] । इनमें से राजा श्रेणिक जो कि भगवान महावीर के समय उन्हीं के समवसरण में मुख्य श्रोता हुए हैं ये आगे प्रथम तीर्थंकर महापद्म होंगे ।[५]

वर्तमान में अवसर्पिणी का पाँचवां दु:षमा नाम का काल चल रहा है । इस अवसर्पिणी का हुंडावसर्पिणी भी नाम है। इसमें कुछ अघटित घटनाएँ हुई हैं ।

इस वर्तमान अवसर्पिणी से पूर्व जो उत्सर्पिणी काल हो चुका है, उसमें भी चौबीस तीर्थंकर हो चुके हैं । उनके नाम क्रमश:-

  1. श्रीनिर्वाण
  2. सागरनाथ
  3. महासाधु
  4. विमलनाथ
  5. श्रीधरनाथ
  6. सुदत्तनाथ
  7. अमलप्रभनाथ
  8. उद्धरनाथ
  9. अंगिरनाथ
  10. सन्मतिनाथ
  11. सिंधुनाथ
  12. कुसुमाञ्जलिनाथ
  13. शिवगणनाथ
  14. उत्साहनाथ
  15. ज्ञानेश्वर
  16. परमेश्वर
  17. विमलेश्वर
  18. यशोधर
  19. कृष्णमतिनाथ
  20. ज्ञानमतिनाथ
  21. शुद्धमतिनाथ
  22. श्रीभद्रनाथ
  23. अतिक्रांतनाथ और
  24. शान्तनाथ

ये भूतकालीन तीर्थंकर हो चुके हैं ।

अधिकतम तीर्थंकर संख्या

मध्यलोक में ढाई द्वीप में एक सौ सत्तर कर्मभूमियाँ मानी हैं । उनमें से एक सौ साठ विदेहक्षेत्र की हैं और पाँच भरतक्षेत्र तथा पांच ऐरावत क्षेत्र की, ऐसे १७० कर्मभूमि हैं । इन्हीं में से एक कर्मभूमि जम्बूद्वीप के दक्षिण में स्थित भरतक्षेत्र में है जिसके आर्यखंड की कर्मभूमि में हम और आप रह रहे हैं । इस प्रकार सब १७० कर्मभूमियों में अधिकतम १७० तीर्थंकर एक साथ हो सकते हैं और कम से कम २० होते हैं[६] जो कि आजकल-वर्तमान में विदेहक्षेत्र में श्रीसीमंधर, श्रीयुगमंधर आदि नाम वाले हैं, इन बीस तीर्थंकरों के नाम प्रसिद्ध हैं ।

वैदिक ग्रंथों में भी चौदह कुलकरों से मिलते-जुलते नाम वाले अवतार माने हैं । जैसे कि मनुस्मृति में कहा है-

कुलादिबीजं सर्वेषां प्रथमो विमलवाहन: ।

चक्षुष्मान् यशस्वी वाभिचन्द्रोऽय प्रसेनजित् ।।

मरुदेवश्च नाभिश्च भरते कुलसत्तमा:।[७]

अष्टमो मरुदेव्यां तु , दूसरे चक्षुष्मान्, तीसरे यशस्वी, चतुर्थ अभिचंद्र, पाँचवें प्रसेनजित् छठे मरुदेव और सातवें नाभिराज भरतक्षेत्र में ये कुलोत्तम-कुलकर हुए हैं। इसी में से सातवें कुलकर नाभिराज से मरुदेवी के गर्भ में आठवें अवतार ऋषभदेव हुए हैं ।

भागवत् में भी ऋषभदेव को आठवाँ अवतार माना है-

भगवान परमर्षिभि: प्रसादितो नाभे: प्रियचिकीर्षया तदवरोधायने मेरुदेव्यां धर्मान् दर्शयितुकामो वातरशनानां श्रमणानामृषीणामूध्र्वमंथिनां शुक्लया तनुवावतार ।[८]

यज्ञ में महर्षियों द्वारा इस प्रकार प्रसन्न किये जाने पर श्रीभगवान् महाराज नाभिराज को प्रिय करने के लिए उनके रनिवास में महारानी मेरुदेवी के गर्भ से दिगम्बर सन्यासी और ऊध्र्वचेता मुनियों का धर्म प्रगट करने के लिए शुद्धसत्त्वमय विग्रह-शरीर से प्रगट हुये ।

वायुपुराण में भी कहा है-

नाभिस्त्वजनयत् पुत्रं, मेरुदेव्यां महाद्युति: ।

ऋषभं पार्थिवं श्रेष्ठं, सर्वक्षत्रस्य पूर्वजम् ।।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे, वीर: पुत्रशताग्रज: ।
सोऽभिषिच्याथ भरतं, पुत्रं प्राव्राज्यमास्थित: ।।
हिमाह्वं दक्षिणं वर्षं, भरताय न्यवेदयत् ।[९]

तस्माद् भारतं वर्षं, तस्य नाम्ना विदुर्बुधा: ।।

अभिप्राय यह है कि नाभिराजा की पत्नी मरुदेवी ने ऋषभ पुत्र को जन्म दिया। ऋषभदेव ने सौ पुत्रों में अग्रणी भरत को जन्म दिया और भरत का राज्याभिषेक कर उन्हें हिमाचल से लेकर दक्षिण तक राज्य देकर स्वयं दीक्षा ले ली । इन्हीं भरत सम्राट के नाम से यह देश भारत कहलाया है ।

अन्य भी प्रमाण वैदिक ग्रंथों के देखे जाते हैं-

येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठ: श्रेष्ठगुण आसीद् येनेदं वर्षं भारत-मिति व्यपदिशन्ति ।[१०]
ऋषभाद् भरतो भरतेन चिरकालं धर्मेण पालितत्वादिदं भारतं वर्षमभूत् ।।[११]

ऋग्वेद आदि वेदों में भी ऋषभदेव को तो माना ही है, कहीं-कहीं चौबीस तीर्थंकरों को भी स्वीकार किया है।

यथा-

ॐ त्रैलोक्यप्रतिष्ठितान् चतुर्विंशतितीर्थकरान् ऋषभाद्यान वद्र्धमानान्तान् सिद्धान् शरणं प्रपद्ये ।

ॐ तीन लोक में प्रतिष्ठित ऋषभदेव से लेकर वर्धमानपर्यंत चौबीस तीर्थंकरों की और सिद्धों की मैं शरण लेता हूँ ।

अन्यत्र भी-

ॐ नमो अर्हते ऋषभाय ।[१२]

बौद्धदर्शन के प्रसिद्ध आचार्य धर्मकीर्ति लिखते हैं-

ऋषभो वर्धमानश्च तावादौ यस्य स ऋषभवर्धमानादि: दिगंबराणां शास्ता सर्वज्ञ आप्तश्चेति ।[१३]

इससे स्पष्ट है कि आठवीं शताब्दी में भी जैनेतर विद्वान् जैनधर्म के प्रथम उपदेशक भगवान् ऋषभदेव को और अंतिम उपदेशक सर्वज्ञ वर्धमान भगवान को मानते थे ।

इन सभी उद्धरणों से यह स्पष्ट है कि जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को सभी ने किसी न किसी रूप मे स्वीकार किया है और बौद्धग्रंथ में जैन के प्रथम तीर्थंकर ही कह दिया है तथा इन्हीं के प्रथम पुत्र भरत के नाम से इस देश का भारत नाम स्वीकार किया है।

जैनधर्म स्वतंत्र है

यह जैन एक स्वतंत्र धर्म है न कि किसी धर्म की शाखा, इसके लिए भी प्रबल प्रमाण हैं ।

षट्दर्शन के नामों में-

जैना मीमांसका बौद्धा:, शैवा वैशेषिका अपि ।
नैयायिकाश्च मुख्यानि, दर्शनानीह सन्ति षट् ।।[१४]

जैन, मीमांसक, बौद्ध, शैव, वैशेषिक और नैयायिक ये छह प्रमुख दर्शन इस देश में हैं ।

वायुपुराण में भी लिखा है-

उपासनाविधिश्चोक्त: कर्मसंशुद्धिचेतसाम् ।

ब्राह्मं शैवं वैष्णवं च, सौरं शात्तंâ तथार्हतम् ।।
षट्दर्शनानि चोक्तानि, स्वभावनियतानि च ।

एतदन्यच्च विविधं, पुराणेषु निरूपितम् ।।

इन छहों दर्शन वालों की उपासना विधि भी स्वतंत्र हैं और ये छहों दर्शन स्वभाव से निश्चित-स्वतंत्र हैं ।

अतएव इस जैनधर्म को किसी धर्म की शाखा नहीं माना जा सकता ।

जैनधर्म में असंख्यात तीर्थंकर

तिलोयपण्णत्ति में लिखा है कि ये अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल अनंत होते रहते हैं। असंख्यातों अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी के बीत जाने पर एक ‘हुण्डावसर्पिणी’ काल आता है[१५] इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी में चौबीस-चौबीस तीर्थंकर होने से असंख्यातों चौबीसी हो चुकी हैं अत: भगवान महावीर स्वामी जैनधर्म के संस्थापक हैं यह कथन कथमपि उचित नहीं है ।

सिंधु सभ्यता में जैनधर्म

सिंधु घाटी की सभ्यता के नाम से प्रसिद्ध हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो नामक स्थलों पर उत्खनन से प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों का सूक्ष्म अध्ययन कर पुरातत्त्ववेत्ताओं ने सिद्ध कर दिया है कि उस समय श्रमण संस्कृति-जैनसंस्कृति का व्यापक प्रभाव था । जैनों के आराध्य देव की मूर्ति भी उसकी मुद्राओं-सीलों पर उत्कीर्णित मिली हैं।

इसी उत्खनन में लगभग तीन हजार ई. पू. की एक मानवमूर्ति मिली है, जिसे विद्वानों ने प्रथम तीर्थंकर श्रीऋषभदेव के पिता अंतिम कुलकर नाभिराय की मूर्ति माना है। यह मूर्ति उस समय की है कि जब उन्होंने अपने पुत्र ऋषभदेव को अपना राजमुकुट पहनाकर स्वयं दीक्षा लेने का निर्णय कर लिया था। श्रीमद्भागवत में इसका स्पष्ट उल्लेख आता है-

विदितानुरागमहापौर-प्रकृतिजनपदो राजा नाभिराजात्मजं समयसेतुरक्षायामभिषिच्य सह मरुदेव्या विशालायां प्रसन्ननिपुणेन तपसा समाधियोगेन महिमानमवाप्त ।[१६]

अर्थ-

नाभिराज ने अपने पुत्र ऋषभदेव को राज्य देकर मरुदेवी के साथ तपपूर्वक वैराग्य-दीक्षा समाधि को धारण कर महिमा को प्राप्त किया।

इस उद्धरण से भी भगवान ऋषभदेव अतीव प्राचीन सिद्ध होते हैं पुन: उनका जैनधर्म भी अति प्राचीन सिद्ध हो ही जाता है ।

जैनधर्म की व्याख्या

जो कर्म शत्रुओं को जीत लेते हैं वे जिन कहलाते हैं। यथा कर्मारातीन् जयतीति जिन: तथा ये जिनदेव जिनके आराध्य देव हैं वे जैन कहलाते हैं- जिनो देवतास्येति जैन:

धर्म की व्युत्पत्ति है- उत्तमे सुखे धरतीति धर्म: जो प्राणियों को स्वर्ग-मोक्षरूप उत्तम सुख में ले जाकर धरे-पहुँचावे, वही सर्वोत्तम धर्म है और वह धर्म अहिंसामय ही है ।

श्री गौतमस्वामी-इन्द्रभूति गणधर देव ने कहा है-

धर्म: सर्वसुखाकरो हितकरो धर्मं बुधाश्चिन्वते ।

धर्मेणैव समाप्यते शिवसुखं धर्माय तस्मै नम:।।१।।[१७]
धर्मान्नास्त्यपर: सुहृद् भवभृतां धर्मस्य मूलं दया ।

धर्मे चित्तमहं दधे प्रतिदिनं हे धर्म!मां पालय।।२।।

धर्म सम्पूर्ण सुखों की खान है और हितकारी है, विद्वान् जन धर्म का संचय करते हैं, धर्म से ही मोक्ष सुख प्राप्त होता है ऐसे धर्म के लिए मेरा नमस्कार हो। संसारी जीवों के लिए धर्म से बढ़कर अन्य कोई मित्र नहीं है, धर्म का मूल दया है, ऐसे धर्म को मैं अपने हृदय में नित्य ही धारण करता हूँ। हे धर्म! तुम मेरी नित्य ही रक्षा करो।

अन्यत्र भी-

अहिंसा परमोधर्म: यतो धर्मस्ततो जय:।

अहिंसा सर्वश्रेष्ठ परम धर्म है और जहाँ धर्म है, वहाँ सर्व प्रकार से जय होती है।

पाँच अणुव्रत

इस अहिंसा धर्म के पालन हेतु श्रावक-गृहस्थ के लिए पाँच अणुव्रत माने हैं-

  1. अहिंसाणुव्रत
  2. सत्याणुव्रत
  3. अचौर्याणुव्रत
  4. ब्रह्मचर्याणुव्रत और
  5. परिग्रहपरिमाण अणुव्रत

१. संकल्पपूर्वक-अभिप्रायपूर्वक-जानबूझकर दो इंद्रिय आदि त्रसजीवों को नहीं मारना अहिंसाणुव्रत है ।

हिंसा के चार भेद हैं-
संकल्पी हिंसा, आरंभी हिंसा, उद्योगिनी हिंसा और विरोधिनी हिंसा। अभिप्रायपूर्वक जीवों की हिंसा संकल्पी हिंसा है । गृहस्थाश्रम में चूल्हा जलाना, पानी भरना आदि कार्यों में जो हिंसा होती है वह आरंभी हिंसा है । व्यापार में जो यत्किंचित हिंसा होती है वह उद्योगिनी हिंसा है और धर्म, देश, धर्मायतन आदि की रक्षा के लिए जो युद्ध में हिंसा होती है वह विरोधिनी हिंसाहै । इन चारों ही हिंसा में गृहस्थ लोग मात्र संकल्पी हिंसा का ही त्याग कर सकते हैं, शेष तीनों हिंसा से सावधानी और विवेक अवश्य रखते हैं इसीलिए यह व्रत श्रावकों का अहिंसाणुव्रत कहलाता है ।

२. ऐसे ही स्थूलरूप से झूठ का त्याग करना सत्याणुव्रत है । इस व्रती को ऐसा सत्य भी नहीं बोलना चाहिए कि जिससे धर्म की हानि हो या किसी पर विपत्ति आ जावे अथवा किसी जीव का घात हो जावे ।

३. पर के धन की चोरी का त्याग करना अचौर्याणुव्रत है ।

४. परस्त्री सेवन का त्याग करना ब्रह्मचर्याणुव्रत है । स्त्रियों के लिए परपुरुष का त्याग करना होता है जैसे कि सती सीता ने अपने इस ब्रह्मचर्याणुव्रत-शीलव्रत के प्रभाव से अग्नि को जल बना दिया था ।

५. अपने धन-धान्य का परिमाण करके इच्छाओं को सीमित करना परिग्रह परिमाण अणुव्रत है ।

इन पाँचों व्रतों के पालन करने वाले अणुव्रती कहलाते हैं ।

ये अणुव्रती गृहस्थ इस भव में सदा सुखी एवं यशस्वी होते हैं और परभव में नियम से स्वर्ग के वैभव को प्राप्त करते हैं।

पाँच महाव्रत

जो महापुरुष हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाँचों पापों का पूर्णरूपेण त्याग कर देते हैं वे महाव्रती कहलाते हैं। वे महामुनि, महासाधु, महर्षि, दिगम्बर मुनि आदि कहलाते हैं ।

युग की आदि में अयोध्या में भगवान ऋषभदेव जन्मे थे । ये इक्ष्वाकुवंशीय कहलाये थे । इन भगवान ने कल्पवृक्ष के अभाव में प्रजा के लिए असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन षट् क्रियाओं का उपदेश देकर जीने की कला सिखाई । विदेहक्षेत्र के अनुसार क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्ण व्यवस्था बनाई । महामंडलीक राजा बनाकर पुन: उनके आश्रित अनेक राजा-महाराजा बनाकर राजनीति का उपदेश दिया । अनन्तर जैनेश्वरी दीक्षा लेकर केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्षमार्ग का उपदेश दिया ।

जब भगवान ऋषभदेव दीक्षा के सन्मुख हुए, तब अपने बड़े पुत्र भरत को राज्य देकर दीक्षा ली। आगे भरत चक्रवर्ती ने अपने बड़े पुत्र अर्ककीर्ति को राज्य देकर जैनेश्वरी दीक्षा ली। अर्ककीर्ति ने अपने पुत्र स्मितयश को राज्य सौंपकर मुनिपद धारण किया। इसी तरह इस इक्ष्वाकुवंश में अनेकों राजा अपने-अपने पुत्रों को राज्य दे-देकर दीक्षा ले-लेकर मोक्ष को प्राप्त कर चुके हैं। यह परम्परा चौदह लाख राजाओं तक अविच्छिन्न चलती रही है ऐसा हरिवंश पुराण में लिखा है।[१८]

तात्पर्य यह समझना कि चतुर्थकाल में तो यह जैनधर्म ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों तक में विस्तार को प्राप्त था। पंचमकाल में भी दक्षिण में मैसूर आदि में जैन राजा होते रहे थे।

आज यह जैनधर्म वैश्यों में सिमट कर रह गया है।

जैन धर्म है जाति नहीं

जैन धर्म है, जाति नहीं है। जाति, गोत्र और धर्म इन तीनों को समझना अति आवश्यक है। वर्तमान में जैनधर्मानुयायियों में चौरासी जातियाँ सुनी जाती हैं। अग्रवाल, पोरवाड़, खंडेलवाल, पद्मावती पुरवाल, परवार, लमेचू, चतुर्थ, पंचम, बघेरवाल,शेतवाल आदि। गोत्रों में प्रत्येक जाति के गोत्र अलग-अलग हैं। जैसे कि अग्रवाल में गोयल, सिंगल, मित्तल आदि। खण्डेलवाल में सेठी, रांवका, गंगवाल आदि।

अतएव जाति और गोत्र अलग हैं तथा धर्म अलग है। फिर भी कुछ व्यवस्था की दृष्टि से जनगणना में जाति के कालम में जैन लिखाना आवश्यक हो गया है।

मेरा तो यही कहना है कि सभी जैनकुल में जन्मे लोगों को अपने नाम के साथ जैन लगाना अति आवश्यक है। प्राय: मारवाड़ में और दक्षिण में श्रावक नाम के साथ गोत्र लगाते हैं जैन नहीं लगाते हैं तो जैन जनगणना में जैन अतीव अल्प दिखते हैं।

एक बार तीर्थंकर पत्रिका में छपा था-

जैन जो जैन नहीं लिखते, उनकी संख्या एक करोड़ चौदह लाख है।

ऐसे जैन, जो अपने नाम के साथ जैन शब्द का प्रयोग नहीं करते, प्रादेशिक उपनाम लिखते हैं, कोई आंचलिक भाषा बोलते हैं तथा सामान्यत: काश्तकार-खेती करने वाले हैं, संख्या में एक करोड़ चौदह लाख हैं। ये पूरे देश में फैले हुए हैं और किस्म-किस्म के उपनामों से पहचाने जाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार ये महाराष्ट्र में १५ लाख, बिहार, बंगाल, उड़ीसा में ३५ लाख, कर्नाटक में १५ लाख, गुजरात में १२ लाख, तमिलनाडु में २ लाख, मध्यप्रदेश में १५ लाख, राजस्थान में १० लाख तथा अन्य राज्यों में १० लाख हैं।

इसलिए नाम के साथ जैन लगाना चाहिए। जैसे कि-कैलाशचंद जैन, गोयल। हीरालाल जैन, गंगवाल आदि।

णमोकार महामंत्र

जैनधर्म का अनादिनिधन अपराजित महामंत्र णमोकार मंत्र है। इस महामंत्र का हमेशा जाप्य करते रहना चाहिए। प्रत्येक जैनमंदिर के मुख्यद्वार के ऊपर व शिखर पर बड़े-बड़े अक्षरों में इसे लिखना चाहिए या पत्थर पर उत्कीर्ण कराकर लगा देना चाहिए, जिससे कि दूर से ही यह जैन मंदिर है ऐसी पहचान हो जावे।

प्रत्येक जैन श्रावक को अपने मकान, दुकान, कार्यालय तथा अन्य सभी प्रतिष्ठानों के मुख्यद्वार के ऊपर इस णमोकार मंत्र को अवश्य लिखना चाहिए। इससे जैनत्व की पहचान तो है ही, साथ ही भूत, प्रेत, चोर, डाकू, सर्प, बिच्छू आदि से भी सुरक्षा होगी और यह महामंत्र रक्षामंत्र होने से कवच का काम करेगा।

इस प्रकार जैनधर्म को अनादिनिधन-शाश्वत सार्वभौम धर्म मानकर इसकी छत्रछाया में आकर सर्व जीवों पर दया भाव रखते हुए प्राणीमात्र में परस्पर में सौहार्द भाव धारण कर अपने मनुष्य जन्म को सार्थक करो, यही मंगलकामना है।

टिप्पणी

  1. त्रिलोकसार गाथा
  2. त्रिलोकसार गाथा ७९२-७९३।
  3. तिलोयपण्णत्ति अ. ४, पृ. २०६।
  4. तिलोयपण्णत्ति अ. ४, पृ. ३५०
  5. त्रिलोकसार एवं तिलोयपण्णत्ति अ. ४, पृ. ३५१।
  6. तित्थयरसयल चककी सट्ठिसयं पुह वरेण अवरेष। वीसं वीसं सयले खेत्ते सत्तरिसयं वरदो।।६८१।।
  7. मनुस्मृति।
  8. भागवत स्कंध ५, अ. ३।
  9. वायुपुराण ३१, ५०५२।
  10. भागवत स्वंâध, अ. ४।
  11. नृसिंहपुराण ३०-७।
  12. यजुर्वेद।
  13. न्यायबिंदु ३/१३१, पृ. १२६।
  14. शारदीयाख्य नाममाला, १४७
  15. तिलोयपण्णत्ति अ. ४, पृ. ३५४ (गाथा १६१४, १६१५)।
  16. भागवत संस्कृत टीका ५/४/५।
  17. वीरभक्ति
  18. हरिवंशपुराण, सर्ग ६०।