ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अनादिनिधन जैन धर्म

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अनादिनिधन जैनधर्म

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णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं ।।

अरिहंतो को नमस्कार हो, सिद्धों को नमस्कार हो, आचार्यों को नमस्कार हो, उपाध्यायों को नमस्कार हो और लोक में सर्व साधुओं को नमस्कार हो। इसे पंच नमस्कार मंत्र, महामंत्र और अपराजित मंत्र भी कहते हैं।

एसो पंचणमोयारो, सव्वपावप्पणासणो।

मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं।।

यह पंच नमस्कार मंत्र सर्व पापों का नाश करने वाला है और सर्व मंगलों में पहला मंगल है। अत: इस मंत्र को प्रतिदिन जपना चाहिए। ‘‘कर्मारातीन् जयतीति जिन:’’ जो कर्मरूपी शत्रुओं को जीत लेता है वही ‘जिन’ है और ‘जिनो देवता अस्येति जैन:’ जिन हैं देवता जिसके वह जैन कहलाते हैं। ‘संसार दु:खत: सत्वान् यो उत्तमे सुखे धरतीति धर्म:’ जो संसार के दु:ख से जीवों को निकाल कर उत्तम सुख में पहुँचा देता है वह धर्म है। इस प्रकार से जिनदेव के अनुयायी का धर्म जैन धर्म है अथवा जिनदेव द्वारा कथित धर्म जैन धर्म है। यह धर्म प्राणिमात्र का कल्याण करने वाला है अत: इसे ‘सर्वधर्म’ या ‘सर्वोदय तीर्थ’ भी कहते हैं। यह धर्म अनादिनिधन है और प्राकृतिक है।

यह सम्पूर्ण चराचर विश्व अनादिनिधन है और इसमें परिभ्रमण करने वाले जीव भी अनादिनिधन हैं। जब कोई जीव संसार के दु:खों से घबरा जाता है तब वह धर्म की छत्रछाया में आकर सुखी होना चाहता है। उसके लिए यह जैनधर्म कल्पवृक्ष के समान है। जितने भी सांसारिक सुख हैंं वे भी इस धर्म से ही मिलते हैं। आज कालपरिवर्तन से लेकर आत्मा को परमात्मा बनाने का उपाय तक अति संक्षेप में जैनधर्म की कुछ मूल-मूल बातों को मैं बता रही हूँ। चार अनुयोग हैं-प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग। उसमें पहला है-

[सम्पादन] प्रथमानुयोग

जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र के आर्यखंड में अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल के दो विभाग होते हैं। दस कोड़ा कोड़ी सागर की अवसर्पिणी और इतनी ही बड़ी उत्सर्पिणी है। जिसमें मनुष्यों एवं तिर्यंचों की आयु, शरीर की ऊँचाई, वैभव, सुख आदि घटते है, वह अवसर्पिणी एवं जिसमें बढ़ते जाते हैं वह उत्सर्पिणी कहलाती है। इन दोनो को मिलाकर बीस कोड़ाकोड़ी सागर का एक कल्पकाल होता है। अवसर्पिणी के छ: भेद हैं-सुषमासुषमा, सुषमा, सुषमदु:षमा, दु:षमसुषमा, दु:षमा और अतिदु:षमा। उत्सर्पिणी के अंतिम से लेकर ये ही छ: भेद हैं। इनमें प्रथम सुषमसुषमा काल चार कोड़ाकोड़ी सागर का है, दूसरा तीन कोड़ाकोड़ी सागर का, तीसरा दो कोड़ाकोड़ी सागर का, चौथा बयालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर का, पांचवां इक्कीस हजार वर्ष का और छठा इक्कीस हजार वर्ष का है। ऐसे ही उत्सर्पिणी में अंत से लेना चाहिये।

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सुषमा-सुषमाकाल

इस काल में पृथ्वी रज, धूम, अग्नि, हिम, कंटक आदि से रहित एवं बिच्छू, शंख, मक्खी आदि विकलत्रय जीवों से रहित होती है। इस काल में दस प्रकार के कल्पवृक्ष होते हैं जो कि पृथ्वीकायिक हैं। इनसे वहाँ के लोग भोग-उपभोग की सामग्री प्राप्त करते हैं। पानांग, तूर्यांग, भूषणांग, वस्त्रांग, भोजनांग, आलयाँग, दीपांग, भाजनांग, मालांग और तेजांग ये दश प्रकार के कल्पवृक्ष हैं। ये अपने नाम के अनुसार ही वस्तुओं को देते रहते हैं। जैसे-पानांग दूध, जल आदि पेय द्रव्य, तूर्यांग वीणा आदि वादित्र, भूषणांग कंकण, मुकुट आदि आभूषण, वस्त्रांग नाना प्रकार के वस्त्र, भोजनांग अनेक प्रकार के भोजन, आलयाँग अनेक प्रकार के मकान, दीपांग दीपक, भाजनांग बर्तन और मालांग जाति के कल्पवृक्ष मालायें देते हैं तथा तेजांग कल्पवृक्ष सूर्य-चंद्र से भी अधिक कांति विस्तारते हैं।

उस समय वहाँ पर जन्म लेने वाले मनुष्य युगल ही उत्पन्न होते हैं। उनके जन्म लेते ही पिता छींक आने से और माता जंभाई लेकर के मरण को प्राप्त हो जाते हैं। पुन: ये युगल शय्या पर सोते हुए अंगूठा चूसकर तीन दिन निकाल देते हैं। पुन: बैठना, अस्थिर गमन, स्थिर गमन, कला गुणों की प्राप्ति, तारूण्य और सम्यग्दर्शन की योग्यता ये छहों बातें क्रमश: तीन-तीन दिन में पूर्ण हो जाती हैं। तब ये युगल तरूण होकर इच्छानुसार कल्पवृक्षों से भोगादि सामग्री मांगकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। इस प्रथम काल में मनुष्यों की आयु तीन पल्य और शरीर की ऊँंचाई तीन कोश की कही है। सो इस काल के अंत में घटते-घटते दो पल्य की व ऊँचाई दो कोश की हो जाती है।

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सुषमाकाल

इस काल के प्रारंभ में मनुष्यों की आयु दो पल्य की और ऊँचाई दो कोश की रह जाती है। इस काल के मनुष्य युगल अंगूठा चूसना, बैठना आदि में ५-५ दिन लेते हैं।,

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सुषमादु:षमाकाल

इस तृतीय काल के प्रारंभ में मनुष्यो की आयु एक पल्य की एवं ऊँचाई एक कोश की रहती है। इसमें मनुष्य युगल अंगूठा चूसना, बैठना आदि क्रियाओं में ७-७- दिन ग्रहण करते हैं। इन तीनों कालों में क्रम से उत्तम भोगभूमि, मध्यम भोगभूमि और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था मानी गई है।

इस तृतीय काल में जब कुछ पल्य का आठवां भाग काल शेष रह गया था तब प्रथम कुलकर उत्पन्न हुये थे। उनका नाम ‘प्रतिश्रुति’ था। इनके शरीर की ऊँचाई एक हजार आठ सौ धनुष, आयु पल्य के दशवें भाग प्रमाण थी और इनकी भार्या का नाम स्वयंप्रभा था। उस समय आषाढ़ सुदी पूर्णिमा के दिन आकाश में सूर्य-चंद्रमण्डलों को देखकर सभी भोगभूमिज मनुष्य व्याकुल हो उठे। तब प्रतिश्रुति ने कहा-

डरो मत! कालवश तेजांग जाति के कल्पवृक्ष मंद हो जाने से आकाश में ये ज्योतिषी देवों के विमान सूर्य मंडल, चंद्र मंडल दिखाई दे रहे हैं। ये पहले भी थे किन्तु तेजांग कल्पवृक्ष के तेज से दिखते नहीं थे अत: डरने की कोई बात नहीं है। इतना सुनकर सभी लोग निर्भय होकर उन्हें अपना कुलकर स्वीकार कर उनकी पूजा स्तुति करने लगे ।

अनंतर इन कुलकर की मृत्यु के बहुत दिन बाद दूसरे कुलकर उत्पन्न हुये जिनका नाम सन्मति था। ऐसे ही क्रम से क्षेमंकर, क्षेमंधर, सीमंधर, विमलवाहन, चक्षुष्मान्, यशस्वी, अभिचंद्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित् और नाभिराय उत्पन्न हुए हैं। प्रतिश्रुति से लेकर नाभिराय पर्यन्त ये चौदह कुलकर माने गये हैं। क्रम-क्रम से इनकी आयु और शरीर की ऊँचाई घटती चली आई है। इन कुलकरों ने क्रम से चंद्र, सूर्योदय से भय मिटाना, अन्धकार व तारागण से भय हटाना, व्याघ्रादि हिंसक जन्तु की संगति त्याग कराना, सिंहादि से रक्षा के उपाय बताना, कल्पवृक्षों की सीमा करना, तरू गुच्छादि चिन्हों से सीमा करना, हाथी आदि की सवारी का उपदेश, बालक का मुख देखना, बालक का नामकरण करना, बालकों का रोना दूर करना, ठंडी आदि से रक्षा करना, नाव आदि द्वारा नदी आदि पार करना, बालकों के जरायुपटल दूर करना और नाभि की नाल काटना कार्य प्रजा को सिखाये हैं। इसीलिए इन्हें कुलकर, कुलधर और मनु आदि नामों से पुकारा गया है। अंतिम कुलकर नाभिराज की आयु एक पूर्व कोटि वर्ष (एक लाख वर्ष को चौरासी से गुणा करने पर पूर्वांग होता है और पूर्वांग को चौरासी लाख से गुणा करने पर एक पूर्व होता है। ऐसे एक करोड़ पूर्व वर्षों की आयु थी।) और शरीर की ऊँचाई पांच सौ पच्चिस धनुष थी।

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भगवान ऋषभदेव का गर्भ-जन्म कल्याणक एवं विवाह

जब कल्पवृक्षों का अभाव हो गया तब नाभिराय और मरूदेवी से अलंकृत स्थान में उनके पुण्य से इंद्र ने आकर वहाँ पर अयोध्या नगरी की रचना कर दी। पुन: कुछ दिन बाद इंद्र ने अवधिज्ञान से जान लिया कि ‘छह महीने बाद प्रथम तीर्थंकर इनके यहाँ स्वर्ग से अवतीर्ण होंगे अत: आदर से नाभिराय के आंगन में रत्नों की वर्षा कराना शुरू कर दिया। किसी दिन महारानी मरूदेवी ने पिछली रात्रि में सोलह स्वप्न देखे, उसी दिन इंद्र ने असंख्य देव-देवियों के साथ आकर माता-पिता की पूजा करके गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया ।


इस अवसर्पिणी के तृतीय काल में जब चौरासी लाख पूर्व वर्ष तीन वर्ष आठ मास और एक पक्ष बाकी रह गया था तब आषाढ़ कृष्णा द्वितीया के दिन सर्वार्थसिद्धि से च्युत होकर अहमिंद्र का जीव माता मरूदेवी के गर्भ में आ गया। इसके छह माह पूर्व से श्री ह्री आदि देवियाँ माता की सेवा में तत्पर थीं, नव महीने बाद चैत्र कृष्णा नवमी के दिन माता मरूदेवी ने पुत्ररत्न को जन्म दिया। इंद्रादि देवों ने आकर तीर्थंकर शिशु को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर जन्माभिषेक किया पुन: ऋषभदेव यह नाम रखकर वापस लाकर माता-पिता को सौंप दिया। इन्द्र के द्वारा भेजे गये देव बालकों के साथ क्रीड़ा करते हुए तीर्थंकर ऋषभदेव का बाल्यकाल व्यतीत हो गया। युवावस्था में महाराज नाभिराय ने तीर्थंकर ऋषभदेव का विवाह यशस्वती और सुनन्दा के साथ सम्पन्न कर दिया।

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भगवान ऋषभदेव द्वारा पुत्र-पुत्रियों को विद्याध्ययन

रानी यशस्वती ने क्रम से भरत, वृषभसेन, आदि सौ पुत्र और ब्राह्मी पुत्री को जन्म दिया तथा रानी सुनन्दा ने बाहुबली पुत्र और सुन्दरी पुत्री को जन्म दिया। क्रम-क्रम से सभी पुत्र-पुत्री किशोरावस्था को प्राप्त हो गये । एक समय प्रभु ऋषभदेव ने ब्राह्मी को ‘ अ आ इ ई ’ आदि वर्णमाला और सुन्दरी को १, २ आदि अंक विद्या सिखाई तथा दोनों कन्याओं को व्याकरण, छंद आदि सर्व विद्या और कलाओं में निष्णात कर दिया। पुन: भरत, बाहुबली आदि पुत्रों को भी सम्पूर्ण विद्या, कलाओं में प्रवीण कर दिया।

इसी बीच एक दिन प्रजा के कुछ प्रमुख लोग भगवान की शरण में आये और बोले-‘भगवन्! कल्पवृक्ष के नष्ट हो जाने से हम लोग भूख-प्यास से व्याकुल हो रहे हैं। अत: आप हमें अब जीवन का उपाय बतलाइये।’ प्रजा के दीन वचन सुनकर प्रभु ऋषभदेव का हृदय करुणा से आर्द्र हो गया और मन में सोचने लगे-

"पूर्व पश्चिम विदेह क्षेत्र में जो स्थिति वर्तमान में है वही स्थिति आज यहाँ प्रवृत्त करने योग्य है, उसी से यह प्रजा जीवित रह सकती है। वहाँ जिस प्रकार असि, मषि, आदि छह कर्म हैं, जैसे क्षत्रिय आदि वर्णों की स्थिति है और जैसी ग्राम, घर आदि की पृथक-पृथक रचना है उसी प्रकार यहाँ पर भी होना चाहिए।"

प्रभु के स्मरण मात्र से उसी क्षण सौधर्म इंद्र आ गया और उसने प्रभु की आज्ञानुसार देश, नगर, ग्राम, घर आदि की व्यवस्था बना दी। पुन: प्रभु ने स्वयं प्रजा के लिए असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह कर्मों का उपदेश दिया। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन प्रकार के वर्ण की व्यवस्था बनाई और भोजन बनाना से लेकर विवाह विधि तक सम्पूर्ण गृहस्थाश्रम की क्रियाओं का उपदेश दिया। चूंकि उस समय प्रभु सरागी थे, गृहस्थाश्रम में महाराजा थे वीतरागी नहीं थे।

कितने ही समय बाद इंद्र सहित देवों ने आकर श्री ऋषभदेव का सम्राट पद पर अभिषेक कर दिया। इसके बाद श्री ऋषभदेव सम्राट ने हरि, अकंपन, काश्यप और सोमप्रभ इन चार क्षत्रियों को बुलाकर उनका राज्याभिषेक कराकर उन्हें महामण्डलीक राजा बना दिया। ये राजा हजार अन्य छोटे-छोटे राजाओं के अधिपति थे। सोमप्रभ सम्राट् प्रभु से ‘‘कुरूराज’’ नाम पाकर कुरूदेश के राजा हुए। हरि प्रभु से ‘‘हरिकांत’’ नाम को पाकर हरिवंश को अलंकृत करने लगे। ‘‘अकंपन’’ भी प्रभु से ‘‘श्रीधर’’ नाम पाकर नाथवंश के नायक हुए और ‘‘काश्यप’’ भी जगत्गुरू से ‘‘मधवा’’ नाम पाकर अग्रवंश के तिलक हुये हैं।’’

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भगवान ऋषभदेव का वैराग्य

किसी समय इंद्र ने सभा में नृत्य-संगीत आदि का आयोजन किया था, नीलांजना नाम की अप्सरा नृत्य कर रही थी, मध्य में ही उनकी आयु खत्म हो जाने से वह विलीन हो गई और उसी क्षण इंद्र ने दूसरी अप्सरा खड़ी कर दी, नृत्य ज्यों की त्यों चालू रहा, कोई भी सभासद इस रहस्य को जान नहीं सके, किन्तु अवधिज्ञानी प्रभु ऋषभदेव ने जान लिया। तत्क्षण ही उन्हें वैराग्य हो गया। तब लौकांतिक देवों ने आकर उनकी स्तुति की, तत्पश्चात् इंद्रादि देवों ने आकर प्रभु को ‘‘सुदर्शना’’ नाम की पालकी पर विराजमान किया। प्रभु ने सिद्धार्थक नामक वन में जाकर संपूर्ण वस्त्राभरणों को त्याग कर पंचमुष्टि केंशलोच किया और ‘‘ॐ नम: सिद्धेभ्य:’’ इस मंत्र का उच्चारण करते हुए सिद्धों की साक्षीपूर्वक जैनेश्वरी दीक्षा ले ली। इंद्र ने प्रभु का तपकल्याणक महोत्सव मनाया पुन: स्व स्व स्थान चले गये। प्रभु का दीक्षा स्थान प्रयाग नाम से प्रसिद्ध है।

तीर्थंकर ऋषभदेव छह महीने का योग लेकर ध्यान में निश्चल खड़े हो गये। उस समय प्रभु की देखादेखी बिना कुछ समझे-बूझे ही मात्र उनकी भक्ति से प्रेरित हो कच्छ, महाकच्छ आदि चार हजार राजाओं ने भी नग्न वेष बना लिया और वहीं ध्यान में खड़े हो गये। किन्तु कुछ दिन बाद वे सब राजा (साधु) भूख-प्यास से व्याकुल हो वन में घूमने लगे। वन के फल आदि खाकर निर्झर का जल पीने लगे। तब वनदेवता ने कहा ‘‘इस अर्हन्त मुद्रा में तुम लोगों को अपने हाथ से इस प्रकार फल, जलादि ग्रहण करना उचित नहीं है।’’ तब वे लोग डर गये और नग्नवेष में वैसा न कर नाना वेष बना लिये। किसी ने वल्कल पहना, किसी ने लंगोटी पहन ली, किसी ने जटायें बढ़ा लीं, तो किसी ने भस्म लपेट ली, वे सब नाना प्रकार की चेष्टा करते हुये वहीं वन में रहने लगे। श्री ऋषभदेव के बड़े पुत्र सम्राट भरत थे। उनका एक पुत्र मरीचिकुमार था। वह भी दीक्षित हो गया था सो वह उन सब तापसियों में अगुआ बन गया।

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भगवान ऋषभदेव का प्रथम आहार-अक्षयतृतीया पर्व प्रारम्भ

छह माह का योग समाप्त कर जब महायोगी ऋषभदेव आहार के लिये निकले तब किसी को भी दिगम्बर मुनि को आहार देने की विधि न मालूम होने से पुन: उन्हें छह महीने का उपवास हो गया। अनंतर वैशाख शुक्ला तृतीया के दिन हस्तिनापुर के राजकुमार श्रेयाँस को जातिस्मरण द्वारा आहारविधि का ज्ञान हो जाने से उन्होंने महामुनि ऋषभदेव का पड़गाहन कर विधिवत् उन्हें इक्षुरस का आहार दिया। उसी दिन से वह तिथि अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध हो गई है। तत्पश्चात् एक हजार वर्ष के तपश्चरण के फलस्वरूप प्रभु को केवलज्ञान प्रगट हो गया जिससे उन्होंने अपनी दिव्यध्वनि के द्वारा असंख्य भव्यों को धर्मोपदेश दिया। अंत में सर्व कर्मों का नाश कर कैलाशपर्वत से निर्वाण पद को प्राप्त किया है। ऐसे ऋषभदेव इस युग की आदि में गृहस्थधर्म और मुनिधर्म के विधाता होने से आदिब्रह्मा कहलाये हैं। जब चतुर्थ काल के प्रारंभ होने में तीन वर्ष, आठ माह और एक पक्ष शेष रहा था तभी भगवान ऋषभदेव ने निर्वाण प्राप्त किया था। यह हुण्डावसर्पिणी काल के दोष का ही प्रभाव है कि जो पहले तीर्थंकर तृतीय काल में ही होकर मोक्ष चले गये हैं।

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चक्रवर्ती सम्राट भरत

भगवान ऋषभदेव ने दीक्षा के पहले अपने बड़े पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनाया था और शेष सौ पुत्रों को यथायोग्य राज्य बांट दिया था। जब भगवान को केवलज्ञान हुआ उसी दिन भरत के आयुधगृह में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ था। उससे भरत ने सम्पूर्ण छहखंड पर विजय प्राप्त कर चक्रवर्ती का पद प्राप्त किया। कालांतर में उन्होंने ब्राह्मण वर्ण की उत्पत्ति की थी तथा प्रजा में अनुशासन व दण्ड के अनेक प्रकार स्थापित करते हुए राज्य संचालन किया था। आज उन्हीं सम्राट् भरत के नाम से यह देश भारतवर्ष कहलाता है।

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दु:षमसुषमाकाल

इस चतुर्थकाल में कर्मभूमि की व्यवस्था रहती है। मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु एक कोटि पूर्व वर्ष और शरीर की ऊँचाई ५२५ धनुष प्रमाण रहती है पुन: घटते-घटते अंत में आयु १२० वर्ष एवं शरीर की ऊँचाई ७ हाथ मात्र ही रह जाती है। श्री ऋषभदेव के मोक्ष जाने के बाद पचास लाख करोड़ सागरों के बीत जाने पर श्री अजितनाथ तीर्थंकर हुए हैं। इसी तरह इस बयालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर के चतुर्थ काल में क्रम-क्रम से अजितनाथ आदि महावीर पर्यन्त तेईस तीर्थंकर हुए हैं। भरत आदि बारह चक्रवर्ती, नव बलभद्र, नव नारायण, नव प्रतिनारायण और चौबीस तीर्थंकर ये त्रेसठ शलाका पुरुष माने गये हैं जो कि प्रत्येक चतुर्थकाल में होते हैं। जब पंचमकाल प्रवेश होने में तीस वर्ष, आठ माह और एक पक्ष काल शेष रह गया था तभी श्री महावीर स्वामी कार्तिक कृष्णा अमावस्या के प्रभात में पावापुरी से मोक्ष पधारे थे।

श्री ऋषभदेव के शरीर की ऊँचाई ५०० धनुष प्रमाण थी। अजितनाथ की ४५०, संभवनाथ की ४००, अभिनंदननाथ की ३५०, सुमतिनाथ की ३००, पद्मप्रभ की २५०, सुपार्श्वनाथ की २००, चंद्रप्रभ की १५०, पुष्पदंत की १००, शीतलनाथ की ९०, श्रेयाँसनाथ की ८०, वासुपूज्य की ७०, विमलनाथ की ६०, अनंतनाथ की ५०, धर्मनाथ की ४५, शांतिनाथ की ४०, कुन्थुनाथ की ३५, अरहनाथ की ३०, मल्लिनाथ की २५, मुनिसुव्रत की २०, नमिनाथ की १५ और नेमिनाथ की १० धनुष प्रमाण थी। पार्श्वनाथ के शरीर की ऊँचाई ९ हाथ एवं महावीर स्वामी के शरीर की ऊँचाई ७ हाथ प्रमाण थी। इसी प्रकार से इस अवसर्पिणी के चतुर्थकाल में आयु, शरीर की ऊँचाई आदि घटते रहे हैं।

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दुषमाकाल

इस पंचमकाल के प्रथम प्रवेश में मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु एक सौ बीस वर्ष और ऊँचाई सात हाथ होती है। यह काल इक्कीस हजार वर्ष का है। इसमें आयु, ऊंचाई आदि घटते-घटते अंत में आयु मात्र बीस वर्ष की और शरीर की ऊँचाई तीन या साढ़े तीन हाथ मात्र रहती है।

चतुर्थकाल के जन्में हुए कुछ महापुरुष इस काल में निर्वाण प्राप्त कर लेते हैं जैसे कि गौतम स्वामी , जम्बूस्वामी आदि किन्तु पंचमकाल के जन्में हुए कोई भी मनुष्य पंचमकाल में मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकते हैं।

आज यहाँ भरतक्षेत्र के आर्यखंड में यह दु:षमा नाम का पंचमकाल चल रहा है।

भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष जाने के बाद गौतम स्वामी से लेकर क्रम से अंग, पूर्व और मात्र आचारांग के धारी महामुनि ६८३ वर्ष तक हुए हैं। पुन: श्री गुणधराचार्य, श्री धरसेनाचार्य, श्री कुंदकुंदाचार्य, श्री यतिवृषभाचार्य ,श्री उमास्वामी आचार्य, श्री समन्तभद्र, श्री अकलंकदेव, श्री पूज्यपाद आदि महान-महान आचार्य धर्म की परम्परा को और श्रुत की परम्परा को अक्षुण्ण रखने में समर्थ होते रहे हैं विक्रम की इस बीसवीं शताब्दी में चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महामुनि, श्रीवीरसागराचार्य आदि महान संघ धुरन्धर आचार्य हुए हैं।

श्री यतिवृषभाचार्य ने कहा है कि-‘‘गौतम स्वामी से लेकर आचारांगधारी का काल ६८३ वर्ष है। इसके आगे श्री श्रुततीर्थ धर्मतीर्थ प्रवर्तन का कारण है, वह बीस हजार तीन सौ सत्रह वर्षों में काल दोष से व्युच्छेद को प्राप्त हो जायेगा अर्थात् ६८३±२०३१७·२१००० वर्ष तक धर्मतीर्थ चलता रहेगा। यहाँ स्पष्ट अर्थ है कि भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष जाने के बाद २१ हजार वर्ष प्रमाण इस पंचमकाल के बराबर धर्मतीर्थ चलता रहेगा। धर्मतीर्थ का मतलब है कि चातुर्वर्ण्य मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका रूप चतुर्विध संघ जन्म लेता रहेगा।

इस पंचमकाल के अंत में वीरागंज नामक एक मुनि, सर्वश्री नाम की आर्यिका, अग्निदत्त श्रावक और पंगुश्री श्राविका होंगे। अंतिम कल्की राजा की आज्ञा से मंत्री द्वारा मुनिराज के हाथ का प्रथम ग्रास शुल्क रूप से मांगे जाने पर मुनिराज अंतराय मानकर आहार छोड़कर चले आयेगें और आर्यिका तथा श्रावक-श्राविका को बुलाकर आदेश देंगे कि अब पंचम काल का अंत आ चुका है। हमारी और तुम्हारी आयु भी मात्र तीन दिन शेष है और यह अंतिम कल्की राजा हुआ है अत: अब सल्लेखना ग्रहण करना है। इतना कहकर वे चारों जन चतुराहार का जीवन पर्यन्त त्यागकर विधिवत् सल्लेखना ग्रहण कर लेंगे और वे कार्तिक कृष्णा अमावस्या के दिन प्रात: शरीर छोड़कर सौधर्म स्वर्ग के देव उत्पन्न हो जावेंगे। उसी दिन मध्यान्ह काल में क्रोध को प्राप्त हुआ कोई असुरकुमार जाति का देव कल्की राजा को मार डालेगा और सूर्यास्त के समय अग्नि नष्ट हो जावेगी|

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दु:षम दु:षमा काल

उपर्युक्त पंचम काल के तीन वर्ष, आठ माह और एक पक्ष काल के व्यतीत हो जाने पर यह छठा काल प्रवेश करेगा। उस समय मनुष्यों की आयु बीस वर्ष और शरीर की ऊँचाई तीन या साढ़े तीन हाथ प्रमाण रहेगी। यह काल भी इक्कीस हजार वर्ष का होगा। इस काल में अग्नि के अभाव में लोग मत्स्य आदि का कच्चा ही मांस खा जायेंगे। उस समय मकान, वस्त्र आदि नहीं होंगे। सभी मनुष्य क्रूर, अन्धे या बहरे, गूंगे आदि दुखी होंगे। दिन पर दिन मनुष्यों की ऊँचाई, शक्ति आदि घटते रहेंगे। उनचास दिन कम इक्कीस हजार वर्षों के बीत जाने पर घोर प्रलय होगा।

उस समय महाभयंकर संवर्तक वायु चलेगी, जो सात दिन तक सम्पूर्ण वृक्ष, पत्थर, पर्वतों को चूर्ण कर डालेगी। तब मनुष्य और तिर्यंच बहुत दुखी होकर प्राय: मरण को प्राप्त हो जावेंगे। उस समय पृथक्-पृथक् बहत्तर युगल गंगा, सिंधु नदियों की वेदियों और विजयार्ध वन के मध्य में प्रवेश करेंगे। इसके अतिरिक्त कुछ देव और विद्याधर दयार्द्र होकर मनुष्य और तिर्यंचों में से संख्यात जीवराशि को उन सुरक्षित प्रदेशों में ले जाकर रख देंगे। इसके बाद आकाश से मेघों द्वारा सात-सात दिन तक क्रम से शीत जल, क्षार जल, विष, धुंआ, धूलि, वज्र और अग्नि की वर्षा होती रहेगी जिससे यह भरतक्षेत्र की आर्यखंड के ऊपर स्थित, वृद्धिंगत एक योजन पर्यन्त भूमि जलकर खाक हो जावेगी। उस छठे काल के अंत में मनुष्यों की आयु १६ या १५ वर्ष तथा शरीर की ऊँचाई एक हाथ मात्र की रह जाती है। इस प्रकार महाप्रलय के बाद यह अवसर्पिणी समाप्त हो जावेगी। उत्सर्पिणी के छहों काल क्रम-क्रम से आवेंगे। इसमें सर्वप्रथम दु:षमदु:षमा नाम वाला छठा काल आयेगा। उस काल के प्रारंभ से उसे पहला कहेंगे।

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दु:षम दु:षमाकाल

उत्सर्पिणी के प्रारंभ में पुष्कर मेघ सात दिन तक अच्छा जल बरसाते हैं जिससे वज्र और अग्नि से जली हुई संपूर्ण पृथ्वी शीतल हो जाती है पुन: मेघों द्वारा क्षीर, अमृत और दिव्यरस की वर्षा होती है। तब पृथ्वी पर लता, गुल्म, घास आदि उगने लगती हैं। पृथ्वी की अच्छी सुगंधि पाकर विजयार्ध की गुफा आदि में सुरक्षित रहे मनुष्य और तिर्यंच बाहर आ जाते हैं पुनरपि उन्हीं से सृष्टि चलती है। इस काल की सारी व्यवस्था अवसर्पिणी के छठे काल के समान चलती है। इस काल की सारी व्यवस्था अवसर्पिणी के छठे काल के समान रहती है। यह काल भी इक्कीस हजार वर्ष प्रमाण है।

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दु:षमाकाल

दु:षमा नाम के द्वितीय काल के प्रारंभ में मनुष्यों की आयु बीस वर्ष और शरीर की ऊँचाई तीन या साढ़े तीन हाथ प्रमाण रहती है। यह काल भी इक्कीस हजार वर्ष प्रमाण है।

इस काल के एक हजार वर्ष शेष रहने पर क्रम से चौदह कुलकर उत्पन्न होंगे। पहले कुलकर का नाम कनक और अंतिम का पद्मपुंगव होगा। इस काल में भी आयु, ऊँचाई आदि बढ़ते-२ अंत में अंतिम कुलकर की ऊँचाई सात हाथ हो जावेगी। ये कुलकर अग्नि उत्पन्न करके भोजन बनाना आदि सिखाते हैं तथा विवाह परम्परा आदि का उपदेश देते हैं।

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दु:षमासुषमाकाल

इस तीसरे काल के प्रवेश में मनुष्यों की आयु एक सौ बीस वर्ष और ऊँचाई सात हाथ प्रमाण हो जाती है। इस काल में चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती, नव बलभद्र, नव नारायण और नव प्रतिनारायण ये त्रेसठ शलाका पुरूष उत्पन्न होते हैं। इनमें से प्रथम तीर्थंकर ‘महापद्म’ नाम का होगा जो कि अंतिम कुलकर पद्मपुंगव का पुत्र होगा। इन प्रथम तीर्थंकर की आयु ११६ वर्ष और शरीर की ऊँचाई ७ हाथ प्रमाण होगी। पुन: इस काल में बढ़ते- बढ़ते अंतिम तीर्थंकर अनंतवीर्य की आयु एक पूर्व कोटि वर्ष और ऊँचाई ५०० धनुष प्रमाण होगी, यह काल बयालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है।

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सुषमादु:षमा

इसके बाद चतुर्थ काल प्रवेश करता है। इसके प्रारंभ में मनुष्यों की आयु पूर्व कोटि वर्ष और ऊँचाई ५०० धनुष की रहती है। पुन: बढ़ते-बढ़ते अंत में आयु एक पल्य की और ऊँचाई एक कोश प्रमाण हो जाती है। इस काल में दश प्रकार के कल्पवृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था हो जाती है। यह काल दो कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है।

सुषमाकाल-इस पांचवें काल के प्रवेश में चतुर्थकाल के अंत जैसी व्यवस्था है। पुन: आयु बढ़ते हुए दो पल्य और शरीर की ऊँचाई दो कोश हो जाती है। यहाँ पर मध्यम भोगभूमि की व्यवस्था रहती है। यह काल तीन कोड़ाकोड़ी सागर का है। सुषमसुषमाकाल-इस छठे काल के प्रारंभ में पांचवें काल के अंत जैसी व्यवस्था रहती है। पुन: बढ़ते-बढ़ते मनुष्यों की ऊँचाई तीन कोश और आयु तीन पल्य प्रमाण हो जाती है। यहाँ पर उत्तम भोगभूमि की व्यवस्था रहती है यह काल भी चार कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है। इस प्रकार से उत्सर्पिणी के षट्कालों का परिवर्तन पूर्ण होकर पुन: अवसर्पिणी काल आ जाता है।

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हुण्डावसर्पिणी काल

असंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल की शलाकाओं के बीत जाने पर प्रसिद्ध एक हुंडावसर्पिणी आती है। इसमें कुछ अघटित बातें हो जाया करती हैं। वर्तमान में यह अवसर्पिणी काल हुंडावसर्पिणी ही चल रहा है। इस हुंडावसर्पिणी काल में तृतीय काल में कुछ काल अवशिष्ट रहने पर ही वर्षा का होना, विकलेन्द्रिय जीवों की उत्पत्ति का होना, कल्पवृक्षों का अभाव होकर कर्मभूमि का प्रारंभ हो जाना, इसी काल में प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का हो जाना आदि हो गये हैं तथा प्रथम चक्रवर्ती का विजय भंग, मध्य के सात तीर्थों में धर्म का व्युच्छेद आदि हुए हैं। ग्यारह रूद्र और कलहप्रिय नव नारद हुए हैं तथा सातवें, तेईसवें और अंतिम तीर्थंकरपर उपसर्ग भी हुआ है। विविध प्रकार के दुष्ट, पापिष्ठ, कुदेव और कुलिंगी भी इसकी ही देन हैं। चांडाल, शवर, किरात, श्वपच आदि जातियाँ व कल्की, उपकल्की भी इसी में होते हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, वज्राग्नि का गिरना आदि नाना दोष इसी काल की देन हैं। इस प्रकार भरत और ऐरावत क्षेत्र में हट घटिका के समान अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल अनंतानंत होते हैं।व ये भरत और ऐरावत क्षेत्र कहाँ कहाँ हैं,वह मैं आपको बताती हूँ -


अलोकाकाश के मध्य में पुरूषाकार लोकाकाश है। यह १४ राजू ऊंचा और ७ राजू मोटा है। इसकी चौड़ाई नीचे ७ राजू है पुन: घटते हुए मध्य में १ राजू पुन: ऊपर बढ़ते हुए ब्रह्मस्वर्ग के पास ५ राजू एवं आगे पुन: घटते हुए लोक के अंत में १राजू रह गई है। इसके बीचोंबीच एक राजू चौड़ी और इतनी ही मोटी त्रसनाली है। जिसमें ही त्रस जीव रहते हैं बाकी सर्वत्र लोक में स्थावर जीव हैं। एक राजू प्रमाण चौड़े मध्यलोक के नीचे ७ राजू एक अधोलोक है जिसमें ७ नरक भूमियाँ हैं और बिल्कुल नीचे निगोद स्थान है। मध्यलोक के ऊपर १६ स्वर्ग, नव ग्रैवेयक, नव अनुदिश और पांच अनुत्तर हैं। उसके ऊपर सिद्धशिला है। उसके भी ऊपर लोक के अग्रभाग में सिद्ध जीवों का निवास है।

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मध्यलोक का वर्णन

मध्यलोक १ राजू चौड़ा और १ लाख ४० योजन ऊंचा है। इसके ठीक बीच में सबसे पहला जम्बूद्वीप है जो कि एक लाख योजन विस्तृत गोलाकार है। इसको चारोें ओर से वेष्टित कर दो लाख योजन विस्तृत लवण समुद्र है। इसे वेष्टित कर धातकीखंड द्वीप है। इसे वेष्टित कर कालोदधि समुद्र है। इसे वेष्टित कर पुष्करद्वीप है। इसी प्रकार एक द्वीप और एक समुद्र ऐसे असंख्यात द्वीप समुद्र हैं जो कि एक दूसरे को वेष्टित किये हुए हैं तथा प्रमाण में अगले द्वीप-समुद्र, पूर्व-पूर्व से दूने-दूने प्रमाण वाले होते गये हैं। अंत के द्वीप का नाम स्वयंभूरमण द्वीप और समुद्र का भी नाम स्वयंभूरमण समुद्र है।

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जम्बूद्वीप

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जम्बूद्वीप के बीचों-बीच में १० हजार योजन विस्तृत और एक लाख ४० योजन ऊंचा सुदर्शन मेरुपर्वत है। इसकी नींव पृथ्वी में एक हजार योजन है तथा चूलिका ४० योजन की है। यह पर्वत घटते हुए अग्रभाग में ४ योजन मात्र रह गया है। इसमें पृथ्वी पर भद्रसाल वन है। इसमें ऊपर नन्दन, सौमनस और पांडुकवन हैं। प्रत्येक वन की चारों दिशाओं में एक-एक जिनमंदिर होने से १६ जिनमंदिर हैं। पांडुकवन की विदिशाओं में पांडुक आदि शिलायें हैं जिन पर तीर्थंकर बालक का जन्माभिषेक होता है।

इस जम्बूद्वीप में दक्षिण से लेकर पूर्व-पश्चिम लम्बे ऐसे छह पर्वत हैं जिनके नाम हिमवान, महाहिमवान, निषध, नील रूक्मी और शिखरी हैं। इन छह पर्वतों से विभाजित सात क्षेत्र हैं जिनके नाम भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक्, हैरण्यवत और ऐरावत हैं। छह पर्वतों पर क्रम से पद्म, महापद्म, तिगिंछ, केसरी, महापुंडरीक और पुंडरीक ऐसे छह सरोवर हैं। उनसे गंगा, सिंधु, रोहित, रोहितास्या, हरित-हरिकांता, सीता-सीतोदा, नारी-नरकांता, सुवर्णकूला-रूप्यकूला और रक्तारक्तोदा ये चौदह नदियाँ निकली हैं जो कि दो-दो मिलकर सात क्षेत्रों में बहती हैं।

भरतक्षेत्र के बीचोंबीच में विजयार्ध पर्वत हैं तथा हिमवान पर्वत से गंगा-सिंधु नदी निकलकर नीचे गिरकर बहती हुई विजयार्ध पर्वत की गुफा से बाहर निकलकर आगे क्षेत्र में बहकर लवणसमुद्र मेंं प्रवेश कर जाती हैं। इस निमित्त से इस भरतक्षेत्र के छह खंड हो गये हैं। इनमें से दक्षिण के मध्य का आर्यखंड है शेष पांच म्लेच्छखंड हैं। इसी प्रकार से ऐरावतक्षेत्र में भी छह खंड हैं।

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षट्काल परिवर्तन कहाँ-कहाँ

इन भरत-ऐरावत के आर्यखंडों में ही पूर्व में कथित षट्काल परिवर्तन होता रहता है। हैमवत, हरि, विदेह के अंतर्गत मेरु के दक्षिण में देवकुरू और उत्तर में उत्तर कुरू, रम्यक तथा हैरण्यवत इन छहों क्षेत्रों में भोगभूमि की व्यवस्था है जो सदा काल एक सदृश रहती है।

विदेहक्षेत्र में मेरू के निमित्त से पूर्व-पश्चिम ऐसे दो भेद हो गये हैं। उनमें भी १६ वक्षार पर्वत और १२ विभंगा नदियों के निमित्त से ३२ विदेह हो गये हैं। प्रत्येक विदेह में भी छह खंड हैं उनमें से आर्यखंड में कर्मभूमि की व्यवस्था है। जैसे यहाँ भरतक्षेत्र में चतुर्थकाल के प्रारंभ में व्यवस्था थी वैसे ही वहाँ सतत बनी रहती है। अथवा यों कहिये कि श्री ऋषभदेव ने अपने अवधिज्ञान से वहीं की वर्णव्यवस्था ग्राम, नगर व्यवस्था आदि को जानकर युग की आदि में यहाँ पर वैसी व्यवस्था बनाई थी।

इस प्रकार इस जम्बूद्वीप में भरत-ऐरावत क्षेत्र के सिवाय अन्यत्र कहीं भी षट्काल परिवर्तन नहीं हैं ऐसा समझना।

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लवण समुद्र

इस जम्बूद्वीप के चारों ओर दो लाख योजन विस्तृत लवणसमुद्र हैै। इसका जल ११००० योजन ऊँचाई शिखाऊ ढेर के समान है और वह शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा में १६००० योजन ऊंचा हो जाता है। इसके अंदर टापू के समान गौतम द्वीप, हंस द्वीप, लंका द्वीप आदि अनेकों द्वीप हैं। रावण की लंका इसी समुद्र के लंका द्वीप में थी।

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धातकीखण्ड

लवणसमुद्र को वेष्टित करके चार लाख योजन विस्तृत धातकीखण्ड द्वीप है। इसके दक्षिण-उत्तर में एक-एक लम्बे इष्वाकार पर्वत हैं। उनके निमित्त से इस द्वीप मे पूर्व धातकीखण्ड और पश्चिम धातकीखण्ड ऐसे दो भेद हो गये हैं। पूर्व धातकीखण्ड के ठीक बीच में ‘विजय’ नाम के मेरू हैं और पश्चिम धातकी खंड में ‘अचल’ नाम का मेरु पर्वत है। दोनों तरफ भरत, हैमवत आदि सात क्षेत्र, हिमवान् आदि छह पर्वत, पद्मादि सरोवर और गंगादि नदियाँ हैं। अत: धातकीखण्ड में दो भरत, दो ऐरावत हैं। अंतर इतना ही है कि वहाँ के क्षेत्र आरे के समान आकार वाले हैं। इस द्वीप को वेष्टित कर आठ लाख योजन विस्तृत कालोदधि समुद्र है।

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पुष्करार्धद्वीप

कालोदधि समुद्र को वेष्टित कर १६ लाख योजन विस्तृत कालोदधि द्वीप है। इसके बीच में चूड़ी के समान आकार वाला मानुषोत्तर पर्वत है। इस पर्वत के इधर ही दक्षिण-उत्तर में इष्वाकार पर्वत है। इनके निमित्त से वहाँ भी पूर्व पुष्करार्ध और पश्चिम पुष्करार्ध ऐसे दो भेद हो जाते है। यहाँ पूर्व में ‘मंदर’ नामक मेरु है और पश्चिम में ‘विद्युन्माली’ नाम का मेरु है। दोनो तरफ ही भरत आदि क्षेत्र, हिमवान् आदि पर्वत हैं। यहाँ पर भी दो भरत, दो ऐरावत हैं। जंबूद्वीप का एक भरत, एक ऐरावत, धातकीखण्ड के २ भरत २ ऐरावत, पुष्करार्ध द्वीप के २ भरत, २ ऐरावत ऐसे ५ भरत और ५ ऐरावत के आर्यखंडों में ही सदा सुषमासुषमा आदि षट्काल का परिवर्तन होता रहता है।

एक जम्बूद्वीप, दूसरा धातकी खंड और पुष्कर का आधा हिस्सा पुष्करार्ध ये ढाई द्वीप हैं। इनमें हैमवत आदि क्षेत्रों की व्यवस्था ज्यों की त्यों रहती हैं। वहाँ काल परिवर्तन नहीं है। ‘ताभ्यामपराभूमयोवस्थिता:’ इस सूत्र के अनुसार भरत-ऐरावत से अतिरिक्त सभी भूमियाँ अवस्थित हैं।

मानुषोत्तर पर्वत के इधर ही मनुष्य रहते हैं। इस पर्वत के उधर असंख्यातों द्वीपों में मात्र तिर्यंच युगल रहते हैं उन सबमें जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था है। आखिरी स्वयंभूरमण द्वीप में भी बीच में चूड़ी के समान आकार वाला एक स्वयंप्रभ पर्वत है। उससे परे उस आधे द्वीप में और स्वयंभूरमण समुद्र में कर्मभूमियाँ तिर्यंच हैं।

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नन्दीश्वरद्वीप

ढाईद्वीप से परे आठवां नंदीश्वरद्वीप है। वहाँ बावन जिनमंदिर हैं जिनकी आष्टान्हिक पर्व में पूजा की जाती है। ऐसे ही ग्यारहवें और तेरहवें द्वीप में भी चार-चार जिनमंदिर हैं। इस प्रकार तेरह द्वीपों तक अकृत्रिम जिनमंदिर हैं जोकि सब ४५८ हैं इनको मेरा नमस्कार होवे।

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गति एवं उनके आने जाने के द्वार

महानुभावों! भव से भवांतर को प्राप्त करना गति है। इसके चार भेद हैं-नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति, और देवगति। हिंसा आदि पाप करके जीव नरकगति में चले जाते हैं वहाँ पर असंख्य दुखों को भोगते रहते हैं । ये नरक धरा मध्यलोक से नीचे है। मायाचारी आदि के निमित्त से जीव तिर्यंच योनि में जन्म लेता है। इसमें वृक्ष, जल, वेंचुआ, चींटी, भ्रमर, हाथी, घोड़ा आदि हो जाता है। दो इन्द्रिय आदि सभी तिर्यंच मध्यलोक मेे रहते हैं।

सरल परिणामों से मनुष्य योनि मिलती है। ये सब मनुष्य मानुषोत्तर पर्वत के इधर में ही हैं। उत्तम पुण्य, दान, पूजन, तपश्चरण और अहिंसा पालन आदि से देवगति मिलती है।

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देवों के भेद

देवों के चार भेद हैं-भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी और वैमानिक। भवनवासी देवों के विमान इस मध्यलोक की चित्रा पृथ्वी से नीचे और नरक भूमियों के ऊपर बने हुए हैं। व्यतंर देव नीचे तथा मध्यलोक में सर्वत्र रहते हैं। वैमानिक देव ऊपर स्वर्गों में रहते हैं और ज्योतिषी देव मध्यलोक में हैं। इन देवों के ५ भेद हैं-सूर्य, चंद्र, गृह, नक्षत्र और तारे। इनके विमान चमकीले होने से इन्हें ज्योतिषी देव कहते हैं। इस चित्रा पृथ्वी से ७९० योजन के ऊपर ९०० योजन तक इनके विमान आकाश में अधर हैं। ये विमान सतत मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा देते हुए घूमते रहते हैं। इन्हीं के भ्रमण से यहाँ पर दिन-रात का विभाग होता है। इस प्रकार यह अति संक्षेप में तीन लोक का वर्णन मैंने बताया है। इस चतुर्गति रूप संसार में अनंतानंत प्राणी जन्म-मरण के दु:ख उठाते रहे हैं। पुन: संसार के दु:खों से छूटने का क्या उपाय है! सो सुनिये-

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संसार के दु:खों से छूटने का उपाय


‘‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:’’

सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों की एकता ही मोक्ष मार्ग है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति का उपाय है। इनसे विपरीत मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र ये संसार में भ्रमण कराने के कारण है- सच्चे देव, शास्त्र, गुरू का श्रद्वान करना सम्यग्दर्शन है। यह तीन मूढ़ता, आठ मद रहित और आठ अंग सहित होना चाहिए। जो क्षुधा, तृषा आदि अठारह दोषों से रहित वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी हैं वे ही सच्चे आप्त देव हैं। सच्चे देव द्वारा कहा हुआ, प्रत्यक्ष अनुमान आदि प्रमाणों से बाधा रहित, जीवादि तत्वों को कहने वाला शास्त्र ही सच्चा शास्त्र है। जो विषयों की आशा से रहित, आरम्भ और परिग्रह से रहित दिगम्बर वेषधारी हैं, ज्ञान, ध्यान और तप में सदा लीन रहते हैं वे ही सच्चे गुरु हैं। संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय रहित पदार्थों को जैसा का तैसा जानना सम्यग्ज्ञान है। इसके ग्यारह अंग और चौदह पूर्वरूप से दो भेद माने गये हैं। अथवा प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग के भेद से चार भेद भी होते हैं। इन चारों अनुयोगों में सम्पूर्ण द्वादशांग का सार आ जाता है।

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जैनागम में वर्णित चार अनुयोग,चारित्र एवं अणुव्रत

महापुरूषों के चरित, पुराण आदि ग्रंथ प्रथमानुयोग हैं। लोक-अलोक को, षट्काल परिवर्तन को और चारों गतियों को बतलाने वाले ग्रंथ करणानुयोग हैं।

गृहस्थ और मुनियों के चरित्र को कहने वाला चरणानुयोग है। जीव, पुद्गल आदि द्रव्यों को, पुण्य पाप को तथा बन्ध मोक्ष को बतलाने वाला द्रव्यानुयोग है। जिसका अाचरण किया जाता है वह चारित्र है। अथवा हिंसा आदि पापों से विरक्त होना सम्यक्चारित्र है। इसके दो भेद हैं-सकल चारित्र और विकल चारित्र। जो हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांचों पापों का सर्वथा त्याग कर देते हैं और सम्पूर्ण आरंभ परिग्रह छोड़कर निग्र्रन्थ मुनि हो जाते हैं उन्हीं के यह सकल चारित्र होता है।

इन पांचों पापों का अणुरूप-एक देश त्याग करने वाला अणुव्रत रूप विकल चारित्र होता है, यह विकल चारित्र गृहस्थों के होता है। जो मन, वचन, काय से और कृत, कारित, अनुमोदना से संकल्पपूर्वक त्रसजीवों का घात नहीं करता है वह अहिंसा अणुव्रत है। इस व्रत के पालन करने वालों के लिये श्री अमृतचंद्रसूरि कहते हैं-

मद्यं मांसं क्षौद्रं पंचोदुम्बर फलानि यत्नेन।
हिंसा व्युपरतकामैर्मोक्तव्यानि प्रथममेव।।६०।।

‘ हिंसा त्याग के इच्छुक पुरूषों को सर्वप्रथम यत्नपूर्वक मद्य (शराब) मांस, मधु (शहद) और ऊमर, कठूमर, और पीपल बड़, पाकर ये पांचों उदुम्बर फल छोड़ देना चाहिए। इसी बात को और पुष्ट करते हुए कहते हैं कि-ये आठ पदार्थ अनिष्ट, दुस्तर और पाप के स्थान हैं अत: इनका त्याग करके ही निर्मल बुद्धि वाले पुरूष जिन धर्म के उपदेश के पात्र होते हैं। आगे और भी कहते हैं- चूंकि रात्रि में भोजन करने वालों के हिंसा अनिवारित है ही है इसलिए हिंसा से विरत पुरूषों को रात्रि भोजन का त्याग कर देना चाहिए। इन्हीं सबको समाविष्ट करते हुए अन्यत्र ग्रंथों में कहा है-

‘‘मद्य, मांस, मधु, रात्रि भोजन, पंच उदुम्बर फल इनका त्याग, पंचपरमेष्ठी को नमस्कार, जीवदया पालन और जलगालन-पानी छानकर पीना ये आठ मूलगुण हैं जो कि श्रावक को पालन करने जरूरी हैं। गृहस्थ के दैनिक जीवन में यह श्रावक है,दयालु है,ऐसी पहचान के लिए देवदर्शन करना,रात्रि भोजन नहीं करना और पानी छानकर पीना,ये स्थूल बातें परम्परा से भी प्रसिध्द हैं|उन सबको इस अष्ट मूलगुण में ले लिया गया है| अहिंसाणुव्रती गृहस्थ इन अष्ट मूलगुणों को सर्वप्रथम ही ग्रहण करके संकल्पी त्रस हिंसा का जीवन भर के लिए त्याग कर देता है। जो स्थूल असत्य स्वयं नहीं बोलता है न दूसरों से बुलवाता है और ऐसा सत्य भी नहीं बोलता है कि जो धर्म की हानि या पर की विपत्ति के लिये हो जावे, वह एक देश सत्य-सत्याणुव्रती है।

जो पर की कोई भी धन, सम्पत्ति या वस्तु रखी हुई हो, भूली हुई हो या गिर गई हो उसको उसके मालिक के बिना दिये नहीं ग्रहण करना वह अचौर्य अणुव्रत है। जो पाप के भय से पर-स्त्री का त्याग कर देता है अर्थात् अपने से छोटी को पुत्री, बराबर को बहन और बड़ी को माता के समान समझता है अपनी विवाहित स्त्री मे ही संतोष रखता है वह ब्रह्मचर्याणुव्रती है। धन, धान्य आदि परिग्रह का परिमाण करके उससे अधिक में इच्छा नहीं रखना परिग्रह परिमाण अणुव्रत है। ये पांच अणुव्रत नियम से स्वर्ग को प्राप्त कराने वाले हैं अर्थात् इस भव में नाना सुख, संपत्ति और यश को देकर परभव में स्वर्ग को देने वाले हैं क्योंकि अणुव्रत और महाव्रतों को धारण करने वाला जीव देवायु का ही बन्ध करता है। शेष तीन आयु के बन्ध हो जाने पर ये व्रत हो ही नहीं सकते हैं। इन पांच अणुव्रतों की रक्षा के लिए तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत भी गृहस्थों के लिए पालन योग्य हैं।

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श्रावक के षट् आवश्यक कर्तव्य

गृहस्थों वे छ: आर्य कर्म होते हैं-इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम और तप।

अर्हन्त भगवान की पूजा को इज्या कहते हैं। इनके पांच भेद हैं-नित्यमह, चतुर्मुख, कल्पवृक्ष, आष्टान्हिक और ऐन्द्रध्वज। प्रतिदिन शक्ति के अनुसार अपने घर से गंध, पुष्प, अक्षत आदि अष्टद्रव्य सामग्री ले जाकर अर्हन्त देव की पूजा करना, जिनमंदिर, जिनप्रतिमा आदि का निर्माण कराना और मुनियों की पूजा करना आदि नित्यमह है।

मुकुटबद्ध राजाओें के द्वारा जो जिनेन्द्र देव की पूजा की जाती है वह चतुर्मुख है। इसे महाभद्र या सर्वतोभद्र भी कहते हैं। समस्त याचकों को किमिच्छकदान-क्या चाहिए? ऐसा उनकी इच्छानुसार दान देते हुए जो चक्रवर्ती द्वारा जिनपूजा की जाती है वह कल्पवृक्ष पूजा है। नंदीश्वर द्वीप में जाकर कार्तिक, फाल्गुन, आषाढ़ में इंद्रों द्वारा होने वाली पूजा आष्टान्हिक पूजा है। इंद्र, प्रतीन्द्र आदि के द्वारा की गई पूजा ऐन्द्रध्वज है। असि, मषि, कृषि, वाणिज्य, विद्या और शिल्प इन छ: कार्यों में से किसी भी कार्य द्वारा आजीविका करके धन कमाना वार्ता है। दान देना दत्ति है। इनके चार भेद हैं-दयादत्ति, पात्रदत्ति, समदत्ति और सकलदत्ति। दुखी प्राणियों को दयापूर्वक अभय आदि दान देना दयादत्ति है। रत्नत्रयधारक मुनि, आर्यिका आदि को नवधाभक्तिपूर्वक आहार देना, ज्ञान, संयम आदि के उपकरण शास्त्र, पिच्छी, कमण्डलु आदि देना, औषधि तथा वसतिका आदि देना पात्रदत्ति है। अपने समान गृहस्थों के लिए कन्या, भूमि, सुवर्ण आदि देना समदत्ति है। अपनी संतान परम्परा को कायम रखने के लिए अपने पुत्र को या दत्तक पुत्र को धन और धर्म समर्पण कर देना सकलदत्ति है। इसे अन्वय दत्ति भी कहते हैं। तत्वज्ञान को पढ़ना, पढ़ाना, स्मरण करना स्वाध्याय है। पांच अणुव्रतों में अपनी प्रवृत्ति करना संयम है।

उपवास आदि बारह प्रकार का तपश्चरण करना तप है।आर्यों के इन षट्कर्म में तत्पर रहने वाले गृहस्थ होते हैं। उत्तम, क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य, इन धर्मों का पूर्णतया तो पालन मुनि ही कर सकते हैं किन्तु गृहस्थ भी एक देशरूप से पालन करते हैं।यहाँ उत्तम शब्द सबके साथ लगाना चाहिये। क्रोध के कारण दूसरों के द्वारा निन्दा आदि किये जाने पर भी क्रोध न कर क्षमा धारण करना उत्तम क्षमा है। जाति आदि मदों के आवेशवश अभिमान न करना उत्तम मार्दव है। मन, वचन, काय की कुटिलता न कर सरल परिणाम रखना उत्तम आर्जव है। प्रकर्ष प्राप्त लोभ का त्याग करना और मन को पवित्र रखना उत्तम शौच है। साधु सज्जन पुरूषों के साथ साधु-उत्तम वचन बोलना उत्तम सत्य है। प्राणी की हिंसा और इंद्रियों के विषयों का परिहार करना उत्तम संयम है। कर्म क्षय के लिए बारह प्रकार का तपश्चरण करना उत्तम तप है। संयत आदि के योग्य ज्ञानादि का दान करना उत्तम त्याग है। शरीर आदि के प्रति भी यह मेरा है इस ममकार का त्याग करना आकिंचन्य है। स्त्री मात्र का त्याग कर देना और स्वतंत्र वृत्ति का त्याग करने के लिए गुरूकुल में निवास करना उत्तम ब्रह्मचर्य है।

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इसी प्रकार तीर्थंकर प्रकृति का बंध कराने वाली सोलहकारण भावनाएं हैं

  1. दर्शनविशुद्धि - पच्चीस मल दोष रहित विशुद्ध सम्यग्दर्शन को धारण करना।
  1. विनयसंपन्नता - देव, शास्त्र, गुरू तथा रत्नत्रय का विनय करना।
  1. शीलव्रतों में अनतिचार - व्रतों और शीलों में अतिचार नहीं लगाना।
  1. अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग - सदा ज्ञान के अभ्यास में लगे रहना।
  1. संवेग - धर्म और धर्म के फल में अनुराग होना।
  1. शक्तितस्त्याग - अपनी शक्ति के अनुसार आहार, औषधि, अभय और शास्त्रदान देना।
  1. शक्तितस्तप - अपनी शक्ति को न छिपाकर अंतरंग-बहिरंग तप करना।
  1. साधु समाधि - साधुओें का उपसर्ग दूर करना या समाधि सहित वीर मरण करना।
  1. वैयावृत्यकरण - व्रती, त्यागी, साधर्मी की सेवा करना, वैयावृत्ति करना।
  1. अर्हतभक्ति - अरिहंत भगवान की भक्ति करना।
  1. आचार्य भक्ति - आचार्य की भक्ति करना।
  1. बहुश्रुत भक्ति - उपाध्याय परमेष्ठी की भक्ति करना।
  1. प्रवचन भक्ति - जिनवाणी की भक्ति करना।
  1. आवश्यक अपरिहाणि - छह आवश्यक क्रियाओं का सावधानी से पालन करना।
  1. मार्ग प्रभावना - जैन धर्म का प्रभाव फैलाना।
  1. प्रवचन वत्सलत्व - साधर्मी जनों में अगाध प्रेम करना।

इन सोलह कारण भावनाओं में दर्शनविशुद्धि का होना बहुत जरूरी है फिर उसके साथ दो तीन आदि कितनी भी भावनाएं हो या सभी हों तो भी तीर्थंकर प्रकृति का बंध हो सकता है अर्थात् कोई भी मनुष्य इन भावनाओं को अपने जीवन में उतारकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके मोक्षमार्ग का नेता तीर्थंकर भगवान बन जाता है। पुन: इंद्रो द्वारा पंचकल्याणक पूजा को प्राप्त कर और असंख्य भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देकर परमात्मपद को प्राप्त कर लेता है।

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छह द्रव्य

अब मैं आपको छह द्रव्य और सात तत्वों के बारे में बताती हूँ-

‘‘सद्द्रव्य लक्षणम् ’’ द्रव्य का लक्षण सत् है। और ‘‘उत्पादव्ययध्रौव्य युक्तं सत्’’ इस लक्षण से जो उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य लक्षण वाला है वह ‘‘सत्’’ है। द्रव्य में नवीन पर्याय की उत्पत्ति को उत्पाद कहते हैं जैसे जीव की देव पर्याय का होना। पूर्व पर्याय के विनाश को व्यय कहते हैं। जैसे जीव की मनुष्य पर्याय का नष्ट होना तथा पूर्व पर्याय का नाश और नवीन पर्याय का उत्पाद होने पर भी सदा बने रहने वाले मूल स्वभाव को ध्रौव्य कहते हैं जैसे जीव की मनुष्य तथा देव दोनों पर्यायों में जीवत्व का रहना। ये तीनों अवस्थायें एक समय में होती हैं।

द्रव्य का दूसरा लक्षण ‘‘गुणपर्ययवद्द्रव्यम्’’ गुण और पर्यायों के समुदाय को द्रव्य कहते हैं, जो द्रव्य के साथ रहें वे गुण कहलाते हैं। जैसे जीव का अस्तित्व या ज्ञानादि और पुद्गल के रूपरसादि। जो क्रम से हों वे पर्याय हैं। जैसे जीव की नर, नारकादि पर्यायें हैं।

द्रव्य के ६ भेद हैं-जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, और काल। ‘‘उपयोगो लक्षणम्’’ जीव का लक्षण उपयोग है। उपयोग के ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग ऐसे दो भेद हैं। अथवा जो इंद्रिय, बल, आयु और श्वासोच्छ्वास इन बाह्य प्राणों से तथा चेतना (ज्ञानदर्शन) लक्षण अंतरंग प्राणों से जीता है, जीता था और जीवित रहेगा वह जीव है। इस जीव के संसारी और मुक्त की अपेक्षा दो भेद हैं-जो संसार में भ्रमण करते हैं वे संसारी हैं और जो कर्मों के बंधन से छूटकर मुक्त हो गये हैं वे मुक्त हैं। संसारी जीव के भी त्रस-स्थावर ऐसे दो भेद हैं। दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय और पंचेंद्रिय जीव त्रस कहलाते हैं। जो रूप, रस, गंध और स्पर्श से सहित हो वह पुद्गल है। अथवा जिसमें हमेशा पूरण गलन होता रहे वह पुद्गल है। इसके दो भेद हैं-अणु (परमाणु) और स्कंध पुद्गल के सबसे छोटे अविभागी हिस्से को अणु या परमाणु कहते हैं। दो, तीन आदि से लेकर संख्यात, असंख्यात और अनंत परमाणुओं से बने हुए पुद्गल पिण्ड को स्कंध कहते हैं। जो जीव और पुद्गलों को चलाने में सहकारी हो वह धर्मद्रव्य है। जैसे मछली को चलाने में जल सहकारी है।

जो जीव और पुद्गल के ठहरने में सहकारी हो वह अधर्मद्रव्य है। जैसे-चलते हुए पथिक को ठहरने में वृक्ष की छाया सहकारी है। जो समस्त द्रव्यों को आकाश-स्थान देता है वह आकाश द्रव्य है। इसके दो भेद हैं-लोकाकाश और अलोकाकाश। जिसमें जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल द्रव्य पाये जाते हैं वह लोकाकाश है। उसके बाहर चारों तरफ अनंतानंत अलोकाकाश है। जो सभी द्रव्यों को परिणमन परिवर्तन में सहायक हो वह काल द्रव्य है। इसके दो भेद हैं-निश्चयकाल और व्यवहार काल। वर्तना लक्षण वाला निश्चय काल है और घड़ी, घण्टा, दिन, महीना, आदि व्यवहार काल हैं। एक जीव, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य और लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश हैं। पुद्गल के एक से लेकर संख्यात-असंख्यात और अनंत प्रदेश होते हैं। अलोकाकाश के अनंत प्रदेश हैं और कालद्रव्य एक प्रदेशी हैं। जो अस्ति-विद्यमान हो अर्थात् सत् लक्षण वाला हो उसे ‘‘अस्ति’’ कहते हैं और बहुप्रदेशी को काय कहते हैं। प्रारंभ के पांच अस्तिकाय हैं। कालद्रव्य अस्ति तो है किन्तु काय बहुप्रदेशी न होने से ‘‘अस्तिकाय’’ नहीं है अत: पांच द्रव्य ही अस्तिकाय कहलाते हैं।

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सात तत्व

वस्तु के यथार्थ स्वभाव को तत्व कहते हैं। इसके सात भेद हैं-जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष। चेतना लक्षण वाला जीव है। इससे भिन्न अजीव है। आत्मा में कर्मों का आना आस्रव है। आत्मा के प्रदेशों में कर्मों का एकमेक हो जाना बंध है। आते हुए कर्मों का रुक जाना संवर है। आत्मा के कर्मों का एकदेश क्षय होना निर्जरा है और आत्मा के संपूर्ण कर्मों का छूट जाना मोक्ष है। इन्हीं सात तत्वों में पुण्य पाप को मिला देने से नव पदार्थ हो जाते हैं। जो आत्मा को पवित्र या सुखी करे वह पुण्य है और जिसके उदय से आत्मा को दुखदायक सामग्री मिले वह पाप है।

इन सात तत्वों में से आस्रव और बंध तत्व संसार के कारण हैं तथा संवर और निर्जरा तत्व मोक्ष के कारण हैं ऐसा समझकर संसार के कारणों से दूर हटकर मोक्ष के कारणों को प्राप्त करना चाहिए ।

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आत्मा के भेद

आत्मा के तीन भेद हैं-बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा। शरीर को ही आत्मा समझने वाला बहिरात्मा है। वह जीव मिथ्यात्व परिणाम से सहित होकर कर्मों को बांधता रहता है और संसार में परिभ्रमण करता रहता है।

तत्वों पर श्रद्धान करने वाला सम्यग्दृष्टि जीव अंतरात्मा है। यह जीव अपनी आत्मा को ज्ञान-दर्शनमय समझता है और शरीर को अचेतन तथा अपने से भिन्न समझता है। यह अंतरात्मा सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र के बल से अपनी आत्मा को परमात्मा बनाने के प्रयत्न में लगा रहता है।

जब यही अन्तरात्मा घातिया कर्मों का नाश कर अर्हन्त, केवली हो जाता है, तब वह सकल परमात्मा कहलाता है। पुन: अष्ट कर्मों से रहित नित्य, निरंजन सिद्ध हो जाता है तब वह निकल परमात्मा हो जाता है। ये परमात्मा पुन: कभी भी संसार में नहीं आते हैं। वहाँ लोक के अग्रभाग में विराजमान हुए अनंत-अनंत काल तक अव्याबाध, अचिन्त्य सुख का अनुभव करते रहते हैं।

इस जैन धर्म में प्रत्येक प्राणी को परमात्मा बनने का अधिकार प्राप्त है। चाहे जो भी क्यों न हो, वह रत्नत्रय रूप पुरूषार्थ के बल से अपनी आत्मा को परमात्मा बनाकर संसार के दु:खों से सदा के लिए छूट कर अविनाशी सुख को प्राप्त कर सकता है। उसी की भावना करते हुए आप सभी अपने मनुष्य पर्याय को सार्थक करें, यही मंगल आशीर्वाद है।



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