ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अनादि जैन धर्म के कथंचित् प्रवर्तक

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अनादि जैन धर्म के कथंचित् प्रवर्तक

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जैन धर्म का बानी कौन था ? अजैन व्यक्ति साधारणतया भगवान महावीर को ही जैन धर्म का बानी मानते हैं। डा. राधाकृष्णन् ने Indian Philosphy पुस्तक में भगवान आदिनाथ को जैन धर्म का जन्मदाता बताया है परन्तु जैन ग्रंन्थों में जैन धर्म को अनादिकालीन बताया है। फिर भी यह शंका उठती है आखिर इस धर्म का चलाने वाला कौन था ?

इस शंका के निवारण के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि धर्म के स्वरूप को समझा जाय अर्थात् धर्म किसको कहते हैं? ‘‘वस्थु सहावो थम्मो’’ अर्थात् जिस वस्तु का जो स्वभाव है वही उसका धर्म हैं। जैन ज्ञान—दर्शन आत्मा का स्वभाव है, उष्णता अग्नि का स्वभाव है, द्रवण करना जल का स्वभाव है स्पर्श, रस, गन्ध और वर्थ पुद्गल का स्वभाव है आदि प्रत्येक द्रव्य अनादि अनन्त है अतएव उसका स्वभाव अर्थात् धर्म भी अनादि अनन्त है। कोई भी द्रव्य न कभी उत्पन्न हुआ है और न कभी उसका नाश ही हो सकता है। केवल उसकी पर्याय समय समय बदलती (उत्पन्न व नष्ट होती) रहती है। विज्ञान अर्थात् साइन्स ने भी यही सिद्ध किया है कि इससे यह सिद्ध हो जाता है कि द्रव्य किसी का बनाया हुआ नहीं है क्योंकि जो वस्तु अनादि है वह किसी की बनाई हुई नहीं हो सकती । यदि बनाई हुई हो तो उसका आदि हो जाएगा क्योंकि जब वह बनाई गई तभी से उसकी आदि हुई। जब द्रव्य अनादि है तो उसका धर्म (स्वभाव) भी अनादि ही है क्योंकि स्वभावरहित कोई भी वस्तु नहीं हो सकती। अत: धर्म भी अनादि है और किसी का बनाया हुआ नहीं है।

जैन धर्म भी यही कहता है कि प्रत्येक द्रव्य का जैसा स्वभाव है उसको वैसा ही जानो और वैसा ही श्रद्धान करो। इसी का नाम सम्यग्दर्शन व सम्यग्ज्ञान है अर्थात् सच्चा श्रद्धान व सच्चा ज्ञान है। जब वस्तु स्वभाव का सच्चा श्रद्धान व ज्ञान हो जाएगा तो किसी वस्तु को भी इष्ट—अनिष्ट मानकर उसमें रागद्वेष नहीं किया जा सकता है किन्तु आत्मा का उपयोग आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और परम वीतरागता हो जाती है। उसी का नाम सम्यक्चारित्र है अत: सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र को भी धर्म कहा गया है। दो द्रव्य अर्थात् जीव व पुद्गल ऐसे भी हैं जो बाह्य निमित्त विभावरूप भी हो जाते हैं । जीव अनादिकाल से विनावरूप होता चला आ रहा है।यह विभावता उपर्युक्त ज्ञान चारित्र द्वारा दूर की जाकर जीव अपने पूर्ण धर्म (स्वभाव) को प्राप्त कर सकता है। इसी कारण उनको भी धर्म कहा गया है अत: परमात्मा द्वारा धर्म नहीं बताया जाता प्रत्युत धर्म द्वारा परमात्मा बनता है। धर्म का दूसरा लक्षण यह भी है कि धर्म उसको कहते हैं कि जो जीव को संसार के दु:खों से निकालकर मोक्ष में पहुंचा दे। उपयुक्त कथानुसार सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्ररूप ही ऐसा धर्म है जो जीव को संसार के दु:खों से निकालकर मोक्ष में पहुंचा देता है। जब वस्तु अनादि है तो उसका उपर्युक्त श्रद्धान–ज्ञान व चारित्र भी सन्ततिरूप से अनादि ही है।

अब प्रश्न यह होता है कि जब धर्म अनादि है तो उसके साथ जैन विशेषण क्यों लगाया जात है? इसका उत्तर यह है कि अनादि सिद्धान्त का भी जो कोई महानुभव ज्ञान करके साधारण जनता को बतलाया है। वह सिद्धान्त उसी के नाम से पुकारा जाता है जैसे माल्थस थ्योरी, न्यूटन थ्योरी। इसका अर्थ यह हरगिज नहीं है कि उस सिद्धान्त या स्वभाव को ही उन महानुभाव ने बोया या उत्पन्न किया है स्वभाव का सिद्धान्त तो अनन्त ही है जैसे गुरूत्वाकर्षण या गुण वस्तु में तो अनादि अनन्त ही है वह किसी का बनाया हुआ नहीं है। इसी प्रकार धर्म से अनादि व अनन्त ही है। वह किसी का बनाया हुआ या उत्पन्न किया हुआ नहीं है किन्तु जिन ने उसका ज्ञान करके साधारण जनता को बतलाया अतएव वह जैन धर्म कहलाने लगा। जो सर्वत्र है अर्थात् जो अपने केवल (पूर्ण) ज्ञान द्वारा तीन लोक व तीन काल की सब चराचर वस्तुओं को उनके अनन्त गुण व अनन्त पर्यायों सहित जानते हैं उनको जिन कहते हैं। जिन भी सन्तति रूप से अनादि है।

युगों (ण्ब्म्त दf ऊग्स) का परिवर्तन होता रहता है। प्रत्येक युग में (यहां युग से आशय व उत्सवर्पिणी काल का है) ऐसी महानात्मायें पैदा होती हैं जो पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर अपनी दिव्यध्वनि द्वारा उस अनादि धर्म का प्रचार करती है । उन्हीं को जिन कहते हैं। वर्तमान युग की आदि में सर्वप्रथम श्री भगवान आदिनाथ (ऋषभनाथ) ने ही केवल पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर इस अनादि धर्म का प्रवर्तन किया था। इस युग के वह सर्वप्रथम जिन हुए हैं अत: इस अपेक्षा से उनको इस युग में जैन धर्म के प्रवर्तक कहा गया है। इस युग में २ तीर्थंकर हुए हैं जिनमें से भगवान श्री महावीर स्वामी अन्तिम तीर्थंकर थे। साधारण जनता उन्ही को जैन का प्रवर्तक मानती थी और पूर्व के २३ तीर्थंकरों की सत्ता या उनका ऐतिहासिक पुरूष होना स्वीकार नहीं करती थी। डा. श्री राधाकृष्णन् ने घ्ह्ग्aह झ्प्ग्त्देदज्प्ब् पुस्तक द्वारा इस मत का खण्डन किया है और जैन धर्म की प्राचीनता सिद्ध की है।

जैनगजट, ११ अगस्त, २०१४
—कपूरचन्द जैन पाटनी, सम्पादक