ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अनादि तीर्थ-अयोध्या

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अनादि तीर्थ-अयोध्या

प्रस्तुति - गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी
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इस मध्यलोक में असंख्यात द्वीप समुद्र हैं। उनमें सर्वप्रथम द्वीप का नाम जम्बूद्वीप है। इसमें दक्षिण दिशा में भरतक्षेत्र के छह खण्डों में एक आर्य खण्ड है। इसमें अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी के द्वारा छह काल तक परिवर्तन होते रहते हैं। सुषमा, सुषमा, सुषमा और सुषमा-दु:षमा इन तीन कालों में उत्तम, मध्यम और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था रहती है। आगे के दु:षमासुषमा, दु:षमा और दु:षमादु:षमा इनमें अर्थात् चौथे, पांचवें और छठे कालों में कर्मभूमि की व्यवस्था रहती है। इस चालू अवसर्पिणी में कुछ अघटित घटनाओं के हो जाने से इसे ‘हुण्डावसर्पिणी’ नाम दिया है। यह असंख्यातों अवसर्पिणी के बाद आती है।

जब तृतीय काल में पल्य का आठवां भाग शेष रह गया था, तब क्रम से प्रतिश्रुति, सन्मति, क्षेमंकर, क्षेमंधर, सीमंकर, सीमंधर, विमलवाहन, चक्षुष्मान, यशस्वी, अभिचंद्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित् और नाभिराज ये चौदह कुलकर हुए हैं। भोगभूमि में युगलिया जन्म लेते हैं और वे ही पति-पत्नी का जीवन व्यतीत करते हैं। बारहवें मरुदेव कुलकर के प्रसेनजित् नाम के अकेले पुत्र हुए थे। पुन: पिता ने अपने पुत्र का कुलवती कन्या के साथ विवाह किया था। ऐसे ही प्रसेनजित् के एक अकेले नाभिराय हुए थे। इन्द्र ने नाभिराय का विवाह मरुदेवी कन्या के साथ कराया था। हरिवंशपुराण में मरुदेवी को शुद्धकुल की कन्या माना है।[१] जब कल्पवृक्ष का अभाव हो गया, तब नाभिराय और मरुदेवी से अलंकृत पवित्र स्थान में इन्द्र ने एक नगरी की रचना करके उसका नाम ‘‘अयोध्या’’ रख दिया। इसके ‘‘साकेता, विनीता और सुकौशल’’ ऐसे तीन नाम और हैं।[२] वैदिक ग्रंथों के रुद्रयामल ग्रंथ में इसे विष्णु भगवान का मस्तक माना है[३] हरिवंशपुराण के अनुसार महाराज नाभिराय का कल्कल्पवृक्षप प्रासाद-भवन बना रह गया। यह इक्यासी खन का ऊंचा था। इसका नाम ‘‘सर्वतोभद्र’’ था। इसी भवन में भगवान ऋषभदेव ने जन्म लिया था।

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अनादि तीर्थ अयोध्या -

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अनादिकाल से इस अयोध्या में अनंत-अनंत तीर्थंकर जन्म ले चुके हैं। क्योंकि प्रत्येक चतुर्थकाल में चौबीस-चौबीस तीर्थंकर यहीं अयोध्या में ही जन्म लेते हैं और आगे भविष्यकाल में भी भरतक्षेत्र की प्रत्येक चौबीसी यहीं पर होवेंगी। वर्तमान में हुंडावसर्पिणी नाम के काल दोष से यहाँ पर श्री ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ और अनंतनाथ ये पाँच तीर्थंकर ही जन्में हैं। शेष उन्नीस तीर्थंकरों ने अन्यत्र जन्म लिया है। फिर भी पुन: इसी भूमि पर ‘‘अयोध्या’’ नगरी की रचना की जाती है। यह रचना इन्द्र की आज्ञा से देवगण करते हैं।

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भगवान ऋषभदेव -

छह माह बाद ‘‘सर्वार्थसिद्धि’’ विमान से च्युत होकर अहमिन्द्र का जीव यहाँ माता मरुदेवी के गर्भ में आयेंगे। ऐसा जानकर इन्द्र ने कुबेर को अयोध्या में माता के आंगन में रत्नों की वर्षा करने के लिए आज्ञा दी थी। आषाढ़ कृष्णा द्वितीया के दिन अहमिन्द्र का जीव माता के गर्भ में आया था, तब इन्द्रों ने भगवान का गर्भ महोत्सव मनाया था। श्री, ह्री, धृति आदि देवियों ने माता की सेवा की थी।

चैत्र कृष्णा नवमी के दिन भगवान का जन्म हुआ था। तब इन्द्रों के आसन कंपित हुए थे। इन्द्रगण ने असंख्य देवों के साथ मिलकर भगवान का जन्माभिषेक सुमेरुपर्वत की पांडुक शिला पर किया था और जन्मजात शिशु का नाम ‘‘वृषभदेव’’ या ‘‘ऋषभदेव’’ रखा था। भगवान के आदिनाथ, आदीश्वर, पुरुदेव, नाभिनंदन और आदिब्रह्मा ऐसे नाम भी प्रसिद्ध हुए हैं।

इन्द्र की आज्ञा से अनेक देवगण तीर्थंकर बालक के साथ क्रीड़ा करते रहते थे।

भगवान के युवा होने पर महाराजा नाभिराय ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, तब भगवान ने ‘‘ओम्’’ कहकर स्वीकृति दे दी। तब श्री नाभिराय ने इन्द्र की अनुमति लेकर कच्छ, महाकच्छ की बहनें यशस्वती और सुनंदा कन्याओं के साथ तीर्थंकर ऋषभदेव की विवाह विधि सम्पन्न की थी। तभी इन्द्रों ने और देवों ने मिलकर बहुत बड़ा उत्सव मनाया था। उस विवाहोत्सव में मनुष्य तो क्या देवों ने भी बहुत ही आनंद का अनुभव किया था।

महारानी यशस्वती ने चैत्र कृष्णा नवमी के दिन ‘‘भरत’’ पुत्र को जन्म दिया था पुन: वृषभदेव आदि निन्यानवें पुत्रों को जन्म दिया था। इसके बाद ‘‘ब्राह्मी’’ पुत्री को जन्म दिया था, अर्थात् यशस्वती रानी ने सौ पुत्र, एक पुत्री को जन्म दिया था तथा दूसरी रानी सुनंदा ने ‘बाहुबली पुत्र और सुंदरी पुत्री को जन्म दिया था। इनमें से ‘‘भरत’’ प्रथम चक्रवर्ती और बाहुबली प्रथम कामदेव हुए हैं।

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विद्याओं का उद्भव स्थल -

किसी समय तीर्थंकर ऋषभदेव ने किशोरावस्था को प्राप्त ब्राह्मी और सुंदरी पुत्री को ‘अ आ’ आदि अक्षर विद्या एवं इकाई, दहाई आदि गणित विद्या पढ़ाकर विद्या अध्ययन को जन्म दिया। तभी से ‘अ आ’ आदि अक्षर विद्या को ब्राह्मी लिपि कहने की परम्परा हो गई थी। भगवान ने अपने भरत आदि पुत्रों को भी सम्पूर्ण विद्याओं और कलाओं में निपुण बना दिया था। अत: सर्वविद्याओं का उद्भव स्थल यह अयोध्या ही है।

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जीने की कला का उपदेश -

भोगभूमि समाप्त होने वाली थी, तभी महौषधि आदि कल्कल्पवृक्षल नहीं देने वाले हो गये, तब प्रजा के लोग क्षुधा-तृषा से व्याकुल हो महाराजा नाभिराज की आज्ञा से भगवान के समीप आये और जीने का उपाय जानने के लिए प्रार्थना करने लगे, तभी प्रजा के दीन वचन सुनकर भगवान ने अपने अवधिज्ञान से पूर्वविदेह, पश्चिमविदेह की सारी व्यवस्था जानकर और यहाँ भी ऐसी व्यवस्था बनाना उचित है, ऐसा चिंतन कर इन्द्र का स्मरण किया। उसी क्षण सौधर्म इन्द्र अनेक देवों के साथ उपस्थित हो गया।

भगवान को नमस्कार कर उनकी इच्छानुसार उसने मांगलिक विधिपूर्वक सर्वप्रथम अयोध्या नगरी के मध्य में एक जिनमंदिर की रचना करके नगरी के पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर ऐसी चारों दिशाओं में भी एक-एक जिनमंदिर बना दिये। पुन: कौशल, काशी आदि महादेश और अयोध्या, हस्तिनापुर, उज्ज्यिनी, बनारस आदि नगरियों को रचकर गांव, खेड़ा, वन, उद्यान आदि की रचना कर दी। इस प्रकार सौधर्म इन्द्र ने अनेक देश, नगर आदि को बनाकर यत्र-तत्र रहते हुए जनों को भगवान की आज्ञानुसार यथायोग्य स्थानों में बसाकर प्रभु की आज्ञा ले अपने स्वर्ग को चला गया।

तत्पश्चात् भगवान ने प्रजा को असि, मषि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प और विद्या इन छह क्रियाओं का उपदेश देकर भोजन बनाने आदि की विधि बताई और खाने योग्य, न खाने योग्य धान्य फल आदि बताकर भूख प्यास दूर करने की शिक्षा दी। अनंतर क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण स्थापित कर उन-उनके योग्य रक्षा करना, व्यापार करना, सेवा करना आदि कर्तव्यों का उपदेश दिया। वह तिथि आषाढ़ कृष्णा प्रतिपदा थी, उसी दिन कर्मभूमि की सृष्टि का प्रारंभ हुआ था। तभी से प्रजा ने भगवान को युगादिपुरुष, युगस्रष्टा, ब्रह्मा, विधाता आदि अनेक नामों से पुकारा था।

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राज्य व्यवस्था -

किसी समय स्वर्ग से इन्द्र ने आकर महाराजा नाभिराज की अनुमति लेकर भगवान का राज्याभिषेक कर दिया। उस समय इस भरतक्षेत्र में महामुकुटबद्ध राजाओं के अधिपति तीर्थंकर ऋषभदेव ही हैं, ऐसा कहकर उनके मस्तक पर मुकुट बांध दिया। इन्द्र ने उस समय महामहोत्सव मनाया था।

तत्पश्चात् कर्मभूमि में न्याय करने वाले राजाओं की आवश्यकता समझकर भगवान ने चार महाभाग्यशाली क्षत्रियों को बुलाकर राज्याभिषेक विधि से उन्हें महामाण्डलीक राजा बना दिया। सोमप्रभ, हरिकांत, श्रीधर और मघवा उनके नाम थे एवं कुरुवंश, हरिवंश, नाथवंश और उग्रवंश, क्रम से ये उनके वंश थे। भगवान प्रजा को इक्षुरस निकालने की विधि बतलाने से, सभी के द्वारा वे इक्ष्वाकु कहलाये थे। अत: भगवान इक्ष्वाकुवंशी माने गये हैं। भगवान के पुत्र भरत चक्रवर्ती के बड़े पुत्र का नाम अर्ककीर्ति होने से यहीं से अर्व नाम से सूर्यवंश चला है।

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भगवान की दीक्षा -

एक समय इन्द्र ने राज्य सभा में नीलांजना अप्सरा का नृत्य प्रारंभ किया था। उसी समय नीलांजना की आयु समाप्त होते ही वह विलीन हो गई और उसी क्षण इन्द्र ने दूसरी अप्सरा उपस्थित कर दी। नृत्य बराबर चालू रहा किन्तु भगवान ने अवधिज्ञान से यह सब जान लिया अत: वे उसी क्षण, संसार, शरीर और भोगों से विरक्त हो गये। भरत को राज्य देकर एवं अन्य पुत्रों को यथायोग्य राज्य देकर वन में जाने के लिए तैयार हुए, कि लौकांतिक देवों ने आकर प्रभु के वैराग्य की अनुमोदना की। सौधर्म इन्द्र आदि देवगण आ गये।

भगवान इन्द्र द्वारा लाई सुदर्शना पालकी में बैठकर अयोध्या से बाहर निकले। जहाँ भगवान ने दीक्षा ली थी, उसे ‘‘प्रयाग[४]’’ इस नाम से जाना जाता है। भगवान ने सर्व वस्त्राभूषण त्याग कर अपने केशों को उखाड़कर फेंक दिया और ‘‘नम: सिद्धेभ्य:’’ कहकर दैगम्बरी दीक्षा ले ली। पुन: षट्मास का योग लेकर ध्यान में लीन हो गये।

प्रभु की देखादेखी उन्हीं का अनुसरण करते हुए चार हजार राजाओं ने भी मुनि दीक्षा लेकर नग्न अवस्था धारण कर ली। किन्तु कुछ ही दिनों में वे भूख-प्यास से व्याकुल हो झरने का पानी पीने लगे और वन के फल खाने लगे तब वनदेवता ने आप लोगों को दिगम्बर मुनिमुद्रा में यह स्वच्छंद प्रवृत्ति करना उचित नहीं है। ऐसा कहकर मना किया, तब इन लोगों ने दिगम्बर वेष छोड़कर बल्कल आदि धारण कर नाना वेष बना लिये।

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आहारचर्या -

भगवान ऋषभदेव छह महीने बाद योग समाप्त कर इस युग में मुनिचर्या बतलाने के लिए आहार हेतु निकले किन्तु किसी को दिगम्बर जैन मुनि की आहारविधि का ज्ञान न होने से भगवान के छह माह और व्यतीत हो गये। पुन: हस्तिनापुर पहुँचते ही वहाँ के राजा सोमप्रभ के भ्राता श्रेयांसकुमार को भगवान के श्रीचरणों में नमस्कार करते ही उन्हें आठ भव पूर्व का जातिस्मरण हो गया, तब राजकुमार श्रेयांस ने नवधाभक्ति करके भगवान को इक्षुरस का आहार दिया। देवों ने पंचाश्चर्य वृष्टि की। वह दिन वैशाख शुक्ला तृतीया का था, जो कि आज भी अक्षयतृतीया के नाम से प्रसिद्ध है।

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भगवान को केवलज्ञान -

एक हजार वर्ष तक तपश्चरण करते हुए भगवान ने एक दिन शुक्लध्यान के बल से घातिया कर्मों को नष्ट कर केवलज्ञान प्रगट कर लिया। तभी कुबेर ने आकर अर्धनिमिष में आकाश में अधर समवसरण की रचना कर दी। उसी समय पुरिमतालपुर के राजा वृषभदेव भगवान के तृतीय पुत्र वहाँ आये और भगवान से जैनेश्वरी दीक्षा लेकर भगवान के प्रथम गणधर हो गये।

राजा भरत ने उसी क्षण तीन समाचार विदित किये। भगवान को केवलज्ञान, चक्ररत्न की उत्पत्ति और पुत्ररत्न की प्राप्ति। सर्वप्रथम राजा भरत ने भगवान के केवलज्ञान की पूजा करके दिव्यध्वनि को सुना, पुन: चक्ररत्न की पूजा कर पुत्र का जन्मोत्सव मनाया।

इधर जो चार हजार राजा दीक्षित होकर स्वैराचारी बन गये थे। उनमें से मरीचिकुमार, भरत के पुत्र को छोड़कर शेष सभी भगवान के समवसरण में आकर पुन: मुनिदीक्षा लेकर स्वर्ग-मोक्ष के पात्र बन गये किन्तु मरीचिकुमार अनेक पाखण्डमतों का प्रवर्तन करता ही रहा।

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भगवान का निर्वाण -

जब तृतीय काल में तीन वर्ष साढ़े आठ मास बाकी थे, तब भगवान ऋषभदेव सभी अघातिया कर्मों का नाश करके कैलाशपर्वत से मोक्ष चले गये। तभी इन्द्रों ने आकर तीन अग्नि स्वरूप तीन कुण्डों की स्थापना करके भगवान के शरीर का संस्कार किया और महामहोत्सव मनाकर स्वस्थान चले गये। जैनसिद्धान्त के अनुसार मोक्ष गये जीवों का पुन: अनंत-अनंत काल के बाद भी संसार में आगमन- पुनरागमन नहीं होता है। वे भगवान अनंत-अनंत काल तक अनंत सुख का अनुभव करते रहते हैं। वे जन्ममरण से रहित ज्ञानशरीरी अनंतगुणों के पुंज हो जाते हैं।

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भगवान ऋषभदेव एक दृष्टि में-

  1. जन्मभूमि-अयोध्या, दीक्षास्थल-प्रयाग, केवलज्ञान स्थल-पुरिमतालपुर का उद्यान, मोक्षस्थान-कैलाशपर्वत
  1. पिता-नाभिराय, माता-मरुदेवी, पत्नी-यशस्वती, सुनंदा, पुत्र-भरत, बाहुबली आदि १०१, पुत्री-ब्राह्मी, सुन्दरी ।
  1. शरीर की ऊँचाई-दो हजार हाथ, आयु-चौरासी लाख वर्ष पूर्व, वर्ण-स्वर्णसदृश, वंश-इक्ष्वाकु, चिन्ह-बैल ।
  1. गर्भतिथि-आषाढ़ कृष्णा द्वितीया, जन्मतिथि और दीक्षातिथि-चैत्र कृष्णा नवमी, केवलज्ञान तिथि-फाल्गुन कृष्णा ग्यारस, निर्वाण तिथि-माघ कृष्णा चतुर्दशी ।
  1. समवसरण में गणधर-८४, मुनि-८४८००, आर्यिका-३५००००, श्रावक-३००००००, श्राविका-५०००००।

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इक्ष्वाकुवंश में मुक्तिगमन की परम्परा -

भगवान के मोक्षगमन के बाद चक्रवर्ती भरत मोक्ष गये हैं। पुन: उनके पुत्र अर्ककीर्ति ने दैगंबरी दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त किया है। इस प्रकार इस अयोध्या के चौदह लाख राजा अपने-अपने पुत्रों को राज्य देकर मोक्ष गये हैं।

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चक्रवर्ती भरत -

राजा भरत ने चक्रवर्ती होकर छह खण्ड पृथ्वी का एक छत्र शासन किया था। इन्होंने ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की थी। दीक्षा लेते ही इन्हें अंतर्मुहूर्त-४८ मिनट के अंदर में ही केवलज्ञान प्रगट हो गया था। इन्होंने भी वैलाशपर्वत से मोक्ष प्राप्त किया है।

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कामदेव बाहुबली -

श्री बाहुबली ने भरत को पराजित कर पुन: विरक्त होकर जैनेश्वरी दीक्षा ले ली। वन में जाकर एक वर्ष का योग लेकर ध्यान में लीन हो गये। उनके मन में एक यह विकल्प था कि भरत को मेरे द्वारा कष्ट हो गया, अत: उन्हें निर्विकल्प ध्यान नहीं हो सका, फिर भी ये भावलिंगी, नि:शल्य, महामुनि थे, मन:पर्ययज्ञानी थे व नाना ऋद्धियों से सहित थे। एक वर्ष बाद भरत ने आकर इनकी पूजा की और ये केवलज्ञान बन गये। इनके शल्य नहीं थी, ऐसा महापुराण में वर्णित है। एक वर्ष के ध्यान में इनके शरीर में बेलें लिपट गई थीं, सर्पों ने वामी बना ली थीं। अत: इनकी प्रतिमा में आज भी ये चिन्ह बने दिखते हैं। इन्होंने भी कैलाशपर्वत से मोक्ष प्राप्त किया है। ऐसे ही भगवान ऋषभदेव के वृषभसेन आदि सभी पुत्रों ने मोक्ष प्राप्त किया है।

ब्राह्मी-सुन्दरी आर्यिका दीक्षा लेकर स्त्रीपर्याय को छेदकर स्वर्ग गई थीं। पुन: वहाँ से च्युत होकर मनुष्य पर्याय में दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त कर चुकी हैं। इसी तरह भरत सम्राट के नौ सौ तेईस पुत्र जन्म से गूंगे थे। इन्होंने पहले कभी त्रसपर्याय पाई ही नहीं थी। ये भगवान के समवसरण में पहुँचे, बोल पड़े और वहाँ पर जैनेश्वरी दीक्षा लेकर तपश्चरण के बल से कर्मों को नष्ट कर मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं।[५]

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भगवान अजितनाथ-

  1. जन्मभूमि - अयोध्या, मुक्तिस्थल-सम्मेदशिखर पर्वत
  1. पिता - जितशत्रु, माता-विजया
  1. शरीर की ऊँचाई - अठारह सौ हाथ, आयु-बहत्तर लाख पूर्व वर्ष, वर्ण-स्वर्णसदृश, वंश-इक्ष्वाकु, चिन्ह-हाथी ।
  1. गर्भ - ज्येष्ठ कृ. अमावस्या, जन्म-माघ शु. १०, दीक्षा-माघ शु. ९, केकेवलज्ञानपौष शु. ११, निर्वाण-चैत्र शु. ५ ।
  1. समवसरण में गणधर - ९०, मुनि-१०००००, आर्यिका-३२००००, श्रावक-३०००००, श्राविका-५०००००
  2. इनके गर्भ, जन्म, तप और ज्ञान ये चारों कल्याणक अयोध्या में ही हुए हैं ।


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भगवान अभिनंदननाथ

  1. जन्मभूमि - अयोध्या, मुक्तिस्थल-सम्मेदशिखर पर्वत
  1. पिता - राजा स्वयंवर, माता-सिद्धार्था
  1. शरीर की अवगाहना - चौदह सौ हाथ, आयु-पचास लाख पूर्व वर्ष, वर्ण-स्वर्ण सदृश, वंश-इक्ष्वाकु, चिन्ह-बंदर ।
  1. गर्भ तिथि - वैशाख शु. ६, जन्म-माघ शु. १२, दीक्षा-माघ शु. १२, केवलज्ञान-पौष शु. १४, निर्वाण-वैशाख शु. ६ ।
  1. समवसरण में गणधर - १०३, मुनि-३०००००, आर्यिका-३३०६००, श्रावक-३०००००, श्राविका-५००००० ।


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भगवान सुमतिनाथ

  1. जन्मभूमि - अयोध्या, मुक्तिस्थल-सम्मेदशिखर पर्वत ।
  1. पिता - मेघरथ, माता-सुमंगला ।
  1. शरीर की अवगाहना - बारह सौ हाथ, आयु-चालीस लाख पूर्व वर्ष, वर्ण-स्वर्ण सदृश, वंश-इक्ष्वाकु, चिन्ह-चकवा ।
  1. गर्भ तिथि - श्रावण शु. २, जन्म-चैत्र शु. ११, दीक्षा-वैशाख शु. ९, केवलज्ञान-चैत्र शु. ११, निर्वाण-चैत्र शु. ११ ।
  1. समवसरण में गणधर - ११६, मुनि-३२००००, आर्यिका-३३००००, श्रावक-३०००००, श्राविका-५०००००

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भगवान अनंतनाथ

  1. जन्मभूमि - अयोध्या, मुक्तिस्थल-सम्मेदशिखर पर्वत
  1. पिता - सिंहसेन, माता-जयश्यामा ।
  1. शरीर की अवगाहना - २०० हाथ, आयु-३० लाख वर्ष, वर्ण-स्वर्ण सदृश, वंश-इक्ष्वाकु, चिन्ह-सेही
  1. गर्भतिथि - कार्तिक कृ. १, जन्म-ज्येष्ठ कृ. १२, दीक्षा-ज्येष्ठ कृ. १२, केवलज्ञान-चैत्र कृ. अमावस्या, निर्वाण-चैत्र कृ. अमावस्या
  1. समवसरण में गणधर -
    ५०, मुनि-६६०००, आर्यिका-१०८०००, श्रावक-२००००००, श्राविका-४०००००

इस प्रकार पाँच तीर्थंकरों का संक्षेप से वर्णन किया गया है ।

[सम्पादन] टिप्पणी

  1. हरिवंशपुराण सर्ग ७।
  2. महापुराण पर्व १२।
  3. एतद् ब्रह्मविदो वदन्ति मुनयोऽयोध्यापुरी मस्तकम्।
  4. पद्मपुराण पर्व ३।
  5. हरिवंशपुराण सर्ग-१२ ।