ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अनुपम त्यागमूर्ति पन्नाधाय -1

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अनुपम त्यागमूर्ति पन्नाधाय

बनवीर शैया की ओर बढ़ा तथा तलवार के एक ही वार से चंदन को उदयसिंह मान कर उसकी हत्या कर दी और अट्टहास कर यह कहते हुए चला गया कि अब उसके राजसिंहासन पर बैठने के मार्ग में कोई कांटा शेष नहीं रहा।

पन्ना का हृदय कराहते हुए चिल्ला उठा, बनवीर तेरे लिए यह चार दिन की चांदनी सिद्ध होगी; फिर इसी अंधेरी रात’ में जीने के लिए तू विवश हो जायेगा।

पन्ना धाय ने अन्य दास दासियों के साथ मिलकर अपने प्राणप्रिय चंदन का उसी समय अंतिम संस्कार कर दिया । फिर अपने मायके जाने के लिए यह कहकर महल छोड़ दिया कि जब कुंवर उदयसिंह ही नहीं रहा तब मैं यहां रहकर क्या करूं ! वह फूट—फूट कर रोने लगी। सबने उसे ढांढस बंधाया और विदा दी। चंदन के बारे में पूछने पर बताया कि वह अपने ननिहाल गया है। वहाँ पन्नाधाय पर किसी को संदेह नहीं हुआ। पन्ना शीघ्रता से वीरा नदी के तट पर उदयसिंह और बारी से मिली। कुंवर को गले लगाकर खूब रोई। फिर उदय सिंह के रोने पर वह चुप हो गई उसे समझा दिया तथा रात होते कुंवर को लेकर देवला के शासक सिंहराव के पास गई। उनको समग्र स्थिति समझा कर राजकुमार को वयस्क होने तक संरक्षण देने का निवेदन किया।

बनवीर की व्रूरता से घबरा कर राव ने आशंका व्यक्त की, यदि बनवीर को कुंवर उदयसिंह की भनक लग गई तो वह मेरे राज्य पर आक्रमण करके सब कुछ नष्ट—भ्रष्ट कर देगा। अत: उदयसिंह को यहां संरक्षण देना संभव नहीं है। लगभग इसी आशय के उत्तर आसपास के अन्य शासकों ने दिए। भटकते—भटकते वह कुम्भलनेर के जैन राजपूत शासक आशा शाह के पास पहुंची और अपना मन्तव्य स्पष्ट किया। उन्होंने भी उत्तर दिया— मैं इतनी बड़ी धरोहर की रक्षा नहीं कर सकूगा। निकट बैठी राजमाता ने करूण स्वर में कहा, इस सामान्य दिखने वाली अकल्पनीय त्याग एवं साहस की मूर्ति इस स्त्री ने अपने राज्य के भावी शासक को, राक्षस के पंजे से बचाने के लिए, अपनी आँखों के तारे प्राणप्रिय पुत्र की बलि देकर महान कार्य किया है और तुम धन—धान्य परिपूर्ण राज्य में इस बालक को शरण देने योग्य भी नहीं हो ?

तत्पश्चात् वे पन्ना की ओर मुड़कर बोली, ‘‘बेटी ! तू निश्चित हो जा। आज से इस बालक का दायित्व मेरा है।‘‘ पन्ना ने उनके चरण छू कर आभार व्यक्त करते हुए जाने की अनुमति मांगी। राजमाता ने पन्ना को भी वहीं रहने के लिए कहा परन्तु पन्ना ने कहा ‘मेरे यहां रहने से बनवीर को संशय हो सकता है। अत: कृपया अनुमति दीजिए। पन्ना को जाते देख उदयसिंह ने उसका आंचल पकड़ लिया। यह देख आशाशाह ने उदयसिंह को गोद में उठा लिया और प्यार से कहा, ‘बेटा! जब तुम्हारी इच्छा होगी हम तुम्हारी मां को शीघ्र यहां बुला लेंगे।’’ पन्ना उदयसिंह को निहार कर बाहर निकल गई। मार्ग में पन्ना के लिए चलना दूभर हो गया।

हिन्दू विश्व पत्रिका
फरवरी १६—२८, २०१५