ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अनुभवी की सलाह

श्री सुरेश जैन सरल
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बड़ों का विश्वास करना उचित कहा गया है। विवेकवान व्यक्ति ही विश्वास करते हैं, विवेक शून्य नहीं। वृद्ध या अनुभवी पर विश्वास कर लेने की एक कथा सदियों से मानव—मन को दिशा प्रदान कर रही है। कथा है कि— एक जंगल में एक विशाल वृक्ष पर कुछ हंस अपने घोंसले बनाकर शांति से निवास करते थे। उनमें एक अति वृद्ध हंस भी था जो समय—समय पर शेष हंसों को परामर्श देकर उनका जीवन निरापद करता था। दो युवा—हंस भी थे वे चाहे जिस हंस की खिल्ली उड़ाते रहते थे।

एक बार वृद्ध हंस ने देखा कि जिस वृक्ष पर वे सब रहते हैं, उसकी जड़ों के समीप से लता अंकुरित हो आई है। वृद्ध ने अवसर देखकर सभी को बतलाया कि यदि यह लता बढ़कर उपर तक आयेगी तो एक दिन हम सभी की मृत्यु का कारण बनेगी। अत: उचित यही होगा कि आप लोग अपनी चोंच से अंकुर को नष्ट कर दें । वृद्ध के परामर्श पर एक युवा हंस बोल पड़ा अरे, इन दादाजी को तो मौत ही मौत दिखती है। मरने से डरते हैं। वह सुकोमल लता हमारा क्या बिगाड़ सकती है।

अनुभवी का परामर्श उन्हें पसंद नहीं आया। बात आगे न बढ़ सकी । वृद्ध समझता था कि बकरों को दर्पण दिखलाने जैसा ही है— मूर्खों को उपदेश देना।

कुछ वर्षों के बाद लता बढ़कर वृक्ष के उच्च शिखर तक पहुंच गई। तभी वहां से एक बहेलिया निकला। उसने विशाल वृक्ष को देखकर अंदाज लगा लिया कि इस पर अनेक पक्षी बसेरा करते होंगे। फिर उसकी दृष्टि मजबूत लता पर पड़ी। वह तत्काल जाल कंधे पर डालकर लता के सहारे पेड़ की सर्वोच्च डाल पर चढ़ गया फिर उसने जाल फैलाया और नीचे आ गया।

सांध्य—बेला में हंस समूह, वृक्ष की ओर लौटा। विभिन्न शाखाओं पर बैठ गया। बैठते ही सभी हंस जाल में फंस गये। युवा हंसों ने अधिक हाथ—पैर चलाये अत: वे अधिक मजबूती से फंस चुके थे। जब बचने की कोई राह न बची तो व्यंग्य करने वाला हंस गिडगिड़ा कर वृद्ध से बोला दादाजी आपका परामर्श न मानने का फल सामने आ चुका है। मैं अपने उन्मादपूर्ण वक्तव्य पर शर्मिन्दा हूँ, कृपया अब इस संकट से उबरने का मार्ग बतलाईए। वृद्ध हंस ने उसके विलाप पर कोई ताना नहीं कसा, सहज मुद्रा से बोला आयु मेरे साथियों आप सब नेत्र बंदकर मरण की मुद्रा में आ जाईए विलम्ब न कीजिए।

सभी ने वैसा ही किया । सुबह तक बहेलिया आ गया। उसने दर्जन भर से अधिक हंसों को पाया तो सुख हो गया। मगर विचार करने लगा कि ये तो सब मर गये हैं। अत: उसने एक— एक को जाल से निकाला और टोकनी में रखा। वह टोकनी सिर पर रखकर नीचे उतर रहा था तभी वृद्ध हंस ने अपने साथियों को संकेत किया—मित्रों नेत्र बंद किए हुए लेटे मत रहो, एक साथ उड़ चलो। परामर्श सुनते ही सब हंस उड़ गये।

एक अनुभवी की सीख से अनेकों की जान बच गई। उसी दिन उन सभी हंसों में विश्वास जागा कि हमें अपने अनुभवी—वृद्धों की बात बिना नू—नूकुर किए हुए शिरोधार्य करना चाहिए। किसी ने सच ही कहा है कि जहां न जावें रवि वहां जावे कवि और जहां न जावे कवि, वहां पहुंचे अनुभवी।

जैन गजट,११ अगस्त, २०१४