ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावनायै नमः"

अनेकांत क्या है

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अनेकान्त क्या है ?

प्रस्तुति- गणिनीप्रमुख श्री ग्यानमती माताजी
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(एक चर्चा-वार्ता)

माधुरी- बहन श्रीकांता ! आप स्वाध्याय खूब करती हैं । बताइए, अनेकांत किसे कहते हैं ?

श्रीकांता- बहन! जैन धर्म का मूल सिद्धान्त अनेकांत ही है, इसलिए इसको समझना बहुत ही जरूरी है, सुनो, मैंने जितना समझा है, उतना तुम्हें समझाती हूँ। प्रत्येक वस्तु में अनेकों धर्म हैं। ‘‘अनैक अंता:धर्मा: यस्मिन् असौ अनेकांता:’’ जिसमें अनेकों अंत-धर्म पाये जाते हैं उसे अनेकांत कहते हैं। जैसे जीव में अस्ति-नास्ति, नित्य-अनित्य, एक-अनेक आदि अनन्तों धर्म विद्यमान हैं। अथवा जैसे आप किसी की बहिन हैं, किसी की पुत्री हैं, किसी की माता हैं, किसी की मौसी हैं, किसी की भानजी हैं, इत्यादि अनेकों धर्म आपमें मौजूद हैं। कथंचित् की शैली में सभी धर्मों को जाना जाता है। जैसे जीव कथंचित् नित्य है, कथंचित् अनित्य है।

माधुरी- बहन! यदि जैनधर्म अनेकांत रूप है, तब तो अनेकांत में भी अनेकांत लगाना पड़ेगा और यदि अनेकांत में अनेकांत नहीं घटित करोगी, तब तो आपके जैनधर्म का मूल सिद्धान्त बाधित हो जावेगा ?

श्रीकांता- हाँ, अनेकांत में भी अनेकांत लगता है, ऐसा श्रीसमन्तभद्र स्वामी ने स्पष्ट कहा है-

अनेकांतोऽप्यनेकांत: प्रमाणनयसाधन:।
अनेकांत: प्रमाणात्ते तदेकांतोऽर्पितान्नयात् ।।

अर्थ- अनेकांत भी अनेकांतरूप है, वह प्रमाण और नय से सिद्ध होता है। हे भगवन्! आपके यहाँ प्रमाण से अनेकांत सिद्ध होता है और अर्पित नय से एकांत सिद्ध होता है। अन्यत्र अष्टसहस्री ग्रंथ में भी कहा है- अनेकांतात्मक वस्तु को प्रमाण विषय करता है, अर्पित एकांत को नय ग्रहण करता है और सर्वथा पर की अपेक्षा न करके एकांत को ग्रहण करने वाला दुर्नय कहलाता है।

माधुरी- इस कथन को उदाहरण देकर समझाइए ।

श्रीकांता- जीव नित्यानित्यात्मक है, यह द्रव्यदृष्टि से नित्य है क्योंकि जीवद्रव्य का त्रैकालिक नाश नहीं होगा, वैसे ही जीव पर्यायदृष्टि से अनित्य है क्योंकि मनुष्यपर्याय का नाश होकर नूतन देवपर्याय का उत्पाद प्रसिद्ध है। इन नित्यानित्यात्मक जीवद्रव्य को प्रमाणज्ञान जानता है। प्रमाण के द्वारा गृहीत वस्तु के एक-एक धर्म अंश को जानने वाला नय है। जैसे द्रव्यार्थिकनय जीव को नित्य कहता है और पर्यायार्थिकनय जीव को अनित्य कहता है। जब ये नय परस्पर मे सापेक्ष रहते हैं, तब सम्यक्नय कहलाते हैं और जब एक-दूसरे की अपेक्षा न रखकर स्वतंत्र एकांत से हठपूर्वक वस्तु के एक धर्म को ग्रहण करते हैं तब मिथ्या कहलाते हैं। तभी इन्हें कुनय अथवा दुर्नय भी कहते हैं। इस प्रकार प्रमाण की अपेक्षा रखने से अनेकांत कथंचित् अनेकांतरूप हैं और सम्यक्नय की अपेक्षा रखने से वही अनेकांत कथंचित् एकांतरूप हैं ऐसा समझो ।

माधुरी- तब तो यह सिद्धान्त किसी पर न टिकने से छहरूप हो जावेगा या संशय रूप कहलायेगा।

श्रीकांता- नहीं, इसमें छल का लक्षण घटित नहीं होता है, देखो! जैसे किसी ने कहा कि ‘‘नववंबल:’’ सामने वाले ने यदि ऐसा अर्थ किया कि-‘‘नववंबल’’ तब उसने कहा नहीं जी, नव का अर्थ नूतन न होकर नव संख्यावाची है अत: नो वंबल ऐसा अर्थ है और यदि सामने वाले ने कहा कि ‘‘नौ वंबल’’ अर्थ है, तब वह बोल पड़ा कि नहीं जी, यहाँ नव का अर्थ नूतन है। यह है छल की परिभाषा किन्तु अनेकांत में छल की कोई गुंजाइश नहीं है। यह द्रव्यार्थिकनय से वस्तु को नित्य ही कहता है और पर्यायार्थिक नय से अनित्य ही कहता है। जैसे आप अपनी माता की पुत्री ही हैं, इसमें छल कहाँ है? यहाँ तो अपेक्षा से निर्णय है ही है। ऐसे ही यह अनेकांत संशयरूप भी नहीं है क्योंकि ‘‘उभयकोटिस्पर्शिज्ञानं संशय:’’ दोनों कोटि के स्पर्श करने वाले ज्ञान को संशय कहते हैं। जैसे शाम के समय टहलते हुए दूर से एक ठूँठ को देखा। मन में विचार आया कि यह ठूँठ है या पुरुष? किन्तु अनेकांत में ऐसा दोलायमान ज्ञान नहीं होता है बल्कि अपेक्षाकृत निर्णय रहता है।

माधुरी- जैसे आपने अनेकांत में कथंचित् लगाकर एकांत सिद्ध किया है, वैसे ही जीव हिंसा, रात्रि भोजन में भी अनेकांत लगाने में क्या बाधा है? और तब तो कथंचित् जीवहिंसा धर्म है, कथंचित् अधर्म है। ऐसे ही कथंचित् रात्रि भोजन करना धर्म है, कथंचित् अधर्म है, इसमें भी अनेकान्त लगा लेना चाहिए ?

श्रीकांता- बहिन! यह तो अनेकांत का उपहास है । देखो! अनेकांत वस्तु के स्वभावरूप धर्म में घटित होता है। ये उदाहरण तो चारित्रसंबंधी हैं। दूसरी बात जहाँ ‘‘सप्तभंगी’’ का लक्षण किया है, वहाँ पर ‘‘एकस्मिन् वस्तुनि अविरोधेन विधिप्रतिषेध विकल्पना सप्तभंगी’’ ऐसा कहा है। अष्टसहस्री ग्रंथराज में श्री आचार्यवर्य विद्यानंद महोदय ने स्पष्ट किया है कि प्रत्यक्ष अनुमान और आगम से अविरुद्ध में सप्तभंगी घटित करना, ऐसा इस ‘अविरोधेन’ पद के ग्रहण में समझा जाता है। ‘जीव हिंसा आदि धर्म है’, यह आगम से विरुद्ध है, इसमें विधिनिषेध की कल्पनारूप सप्तभंगी नहीं घटेगी।

माधुरी- प्रमाण, नय और सप्तभंगी का स्वरूप हमें अच्छी तरह समझाइए ।

श्रीकांता- आज इतना ही विषय याद रखो फिर कभी प्रमाण आदि के विषय में चर्चा करूँगी , क्योंकि वे विषय जरा क्लिष्ट हैं। थोड़ा-थोड़ा समझकर अवधारण करना ही सुंदर है।

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