ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अन्तरातमा

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अंतरात्मा :

अन्तरबाहिरजप्पे, जो वट्टइ सो हवेइ बहिरप्पा।

जप्पेसु जो ण वट्टइ, सो उच्चइ अंतरंगप्पा।।

जो अंदर और बाहर के जल्प (विचन—विकल्प) में रहता है वह बहिरात्मा है। और जो किसी भी जल्प में नहीं रहता, वह अन्तरात्मा कहलाता है।

अक्खाणि बहिरप्पा, अंतरअप्पा हु अप्पसंकप्पो।
—मोक्खपाहुड : ५

इन्द्रियों में आसक्ति बहिरात्मा है और अंतरंग में आत्मानुभव रूप आत्मसंकल्प अन्तरात्मा है।

जे जिण—वयणे कुसला भेयं जाणंति जीवदेहाणं।

णिज्जय—दुट्ठट्ठमया अंतरअप्पा य ते तिविहा।।

—कार्तिकेयानुप्रेक्षा  : १९४

अंतरात्मा त्रिविध है—जो जिन—वचनों में कुशल है, जीव और देह के भेद को जानता है और आठ दुष्ट मदों—अभिमानों को जीत चुका है, वह अंतरात्मा है, जो (जघन्य—मध्यम—उत्तम भेद से) तीन प्रकार का है।

सिविणे वि ण भुंजइ, विसयाइं देहाइभिण्णभावमई।

भुंजइ णियप्परूवो, सिवसुहरत्तो दु मज्झिमप्पो सो।।

—रयणसार : १३३

शरीर आदि से स्वयं को भिन्न समझने वाला जो मनुष्य स्वप्न में भी विषयों का भोग नहीं करता अपितु निजात्मा का ही भोग करता है तथा शिव—सुख में रत रहता है, वह मध्यम—अंतरात्मा है।