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मंगलाचरणम्
श्रीअजितनाथस्तोत्रम्
प्रीतिछन्द:-(५ अक्षरी) कर्मजित्योऽभूत्, सोऽजित: ख्यात:।

तीर्थकृन्नाथ:, तं नुवे भक्त्या।।१।।
सतीछन्द:-(५ अक्षरी) पुरी विनीता, भुवि प्रसिद्धा।
त्रिलोक-पूज्या, सुरेन्द्रवंद्या।।२।।
मन्दाछन्द:-(५ अक्षरी) माता विजया, धन्या भुवने।
देवैर्महितं, पुत्रं जनिता।।३।।
तनुमध्याछन्द:-(६ अक्षरी)
इक्ष्वाकुकुलस्य, सूर्यो गजचिन्ह:।
स्वर्णाभतनु: स:, मां रक्षतु पापात्।।४।।
शशिवन्दनाछन्द:-(६ अक्षरी)
खयुगदिशैक:, करतनुतुंग:।
भुवि जितशत्रु:, तव जनक: स्यात्।।५।।
सावित्रीछन्द:-(६ अक्षरी)
द्वासप्तत्या लक्ष-पूर्वाण्यायु: प्राप्त:।
ज्ञानानंदापूर्ण:, पायात् मे संसारात्।।६।।
अनुष्टुप्छन्द:-
ज्येष्ठेऽमावस्या शुभदा, दशमी माघ-शुक्लके।
तन्मासे नवमी, पुण्यै-कादशी पौषशुक्लके।।७।।
पंचमी चैत्रशुक्ला च, पंचकल्याणकै: क्रमात्।
तिथयोऽजितनाथस्य ,ता मे दद्यु: परां गतिं।।८।।
मालिनीछन्द:-
नुद नुद भवदु:खं, रोगशोकादिजातं।
कुरु कुरु शिवसौख्यं, वीतबाधं विशालं।
तनु तनु मम पूर्ण-ज्ञानसाम्राज्यलक्ष्मीं।
भव भव सुखसिद्ध्यै, ज्ञानमत्यै जिनेश!।।९।।

सिद्धा: कर्मसमुत्पन्न - वेदनावारिधिं स्वत:।
तीत्र्वा लोकाग्रभागं ये, प्राप्तास्तेभ्यो नमो नम:।।१।।

अथ द्वितीयतीर्थंकरश्रीअजितनाथ स्तवनं विधाय कृतिवेदनादि चतुर्विंशत्यनुयोगद्वारेषु वेदनानुयोगद्वारनाम द्वितीयानुयोगद्वारमस्मिन् नवमग्रन्थे कथ्यते।
अथ तावत् षट्खण्डागमस्य विषया: प्रदश्र्यन्ते-
षट्खण्डागमस्य सार्थका: षट्खंडा: सन्ति-जीवस्थान-क्षुद्रकबंध-बंधस्वामित्वविचय-वेदनाखंड-वर्गणाखण्ड-महाबंधाश्चेति।
एषु षट्खण्डग्रन्थेषु सर्वं जैनवाङ्मयसारं समागतमस्ति। एभ्यो ग्रन्थेभ्य एव साराणि गृहीत्वा गोम्मटसार- जीवकाण्ड-कर्मकाण्ड-लब्धिसार-क्षपणासार-त्रिलोकसार नामधेया ग्रन्था: समर्पिता: भव्यपुंगवसाधुभ्य: साध्वीभ्य:, श्रावकेभ्य: श्राविकाभ्यश्च श्रीमत्सिद्धान्तचक्रवर्तिश्रीनेमिचंद्राचार्यदेवै:। पुनश्च—
जयउ धरसेणणाहो जेण महाकम्मपयडिपाहुडसेलो।
बुद्धिसिरेणुद्धरिओ समप्पिओ पुप्फयंतस्स।।
एतेषां श्रीधरसेनाचार्यवर्याणां एषां शिष्ययो: श्रीमत्पुष्पदन्तभूतबलिमहामुनीन्द्रयोरुपकारो जगति अनन्तोऽस्ति। येषां आचार्याणां कृपाप्रसादेनैवास्माकं मोक्षमार्गो दृश्यते, एतेभ्योऽनन्तशो नमोऽस्तु।
संप्रति तावत्प्रथमखण्डे जीवस्थाने सत्प्ररूपणा-द्रव्यप्रमाणानुगम-क्षेत्रानुगम-स्पर्शनानुगम-कालानुगम-अन्तरानुगम-भावानुगम-अल्पबहुत्वानुगमा अष्टौ अधिकारा: नवचूलिकाश्च सन्ति वर्तमानकाले विभत्तेषु षट्ग्रन्थेषु।
द्वितीयखण्डे क्षुद्रकबंधनाम्नि सप्तमग्रन्थे एकादशानुयोगद्वाराणि कथितानि।
तृतीयखण्डे बंधस्वामित्वविचयनाम्नि अष्टमे ग्रन्थे बंधबंधकादीनां प्ररूपणास्ति।
चतुर्थखण्डे वेदनानाम्नि नवमग्रंथे कृति-अनुयोगद्वारं कथितमस्ति।
अस्मिन् वेदनानामखण्डान्तर्गते दशमग्रन्थादारभ्य वेदनानुयोगद्वारमस्ति, द्वादशग्रन्थपर्यंतमिति।
अस्मिन् वेदनानामानुयोगद्वारे षोडशाधिकारा: कथ्यन्ते-
तत्र तावत् तेषां नामानि—वेदनानिक्षेप-वेदनानयविभाषणता-वेदनानामविधान-वेदनाद्रव्यविधान-वेदनाक्षेत्रविधान-वेदनाकालविधान-वेदनाभावविधान-वेदनाप्रत्ययविधान-वेदनास्वामित्वविधान-वेदनावेदनविधान-वेदनागतिविधान-वेदनाअनंतरविधान-वेदनासन्निकर्षविधान-वेदनापरिमाणविधान-वेदनाभागाभागविधान-वेदनाल्पबहुत्वानि चेति।
अस्मिन् दशमे ग्रन्थे आद्या: पञ्चाधिकारा: गृहीष्यन्ते।
एकादशे ग्रन्थे वेदनाकालविधान-वेदनाभावविधाननामानौ द्वौ अर्थाधिकारौ कथयिष्येते। पुनश्च द्वादशे ग्रंथे वेदनाप्रत्ययविधानादि-शेषनवार्थाधिकारा: वक्ष्यन्ते। इमे षोडशभेदा अपि अस्मिन्नेव ग्रन्थे प्रथमसूत्रे। अनुयोगद्वारनामभिरेव कथिता: सन्ति।
एतेषु अयं वेदनाखंड: पूर्यते।
ततश्चाग्रे-स्पर्श-कर्म-प्रकृत्यादि-द्वाविंशत्यनुयोगद्वाराणि चतुर्षु ग्रन्थेषु विभक्तानि दर्शयिष्यन्ति। अयं वर्गणाखंडनाम्ना गीयते।
वर्तमानषोडशग्रन्थेषु पंचखण्डा एव धवलाटीकासमन्विता: भवन्ति।
षष्ठखण्डे महाबंधनाम्नि ग्रन्थे महाधवलाटीका: प्रसिद्धा:। तत्रापि षष्ठखण्डे सप्त ग्रन्था: विद्वद्भि: विभाजिता: सन्ति।
एषामुत्पत्तिर्दश्र्यते—
अथाग्रायणीयनामद्वितीयपूर्वस्य पंचमवस्तुन: चयनलब्धेरन्तर्गत-विंशतिप्राभृतेषु ‘कर्मप्रकृति’ नाम चतुर्थं प्राभृतमस्ति। अस्मिन प्राभृते कृति-वेदना-स्पर्श-कर्म-प्रकृति-बंधन-निबंधन-प्रक्रम-उपक्रम-उदय-मोक्ष-संक्रम-लेश्या-लेश्याकर्म-लेश्यापरिणाम-सासासात-दीर्घह्रस्व-भवधारणीय-पुद्गलात्त-निधत्तानिधत्त-निकाचितानिकाचित-कर्मस्थिति-पश्चिमस्कंध-अल्पबहुत्वनामानि चतुर्विंशत्यनुयोगद्वाराणि सन्ति। एषु चतुर्विंशतिषु कृति-वेदनानामनी द्व्यनुयोगद्वारे वेदनाखण्डे चतुर्थे स्त:। तत्र कृत्यनुयोगद्वारं नवमग्रन्थे वेदनाखण्डेऽस्ति। द्वितीयं वेदनानुयोगद्वारं दशम-एकादशम-द्वादशमग्रन्थेषु अस्ति।
शेषद्वाविंशत्यनुयोगद्वाराणि वर्गणाखण्डे गृहीतानि।

हिन्दी टीका

मंगलाचरण
श्री अजितनाथ स्तोत्र

श्लोकार्थ-जो कर्मों को जीत चुके हैं, वे ‘अजित’ इस नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। वे तीर्थंकर स्वामी-भगवान् हैं, उन अजितनाथ जिनवर को मैं भक्ति से नमस्कार करता हूँ।।१।।

यह पाँच अक्षरी ‘‘प्रीति’’ छंद में निबद्ध भगवान अजिनताथ की स्तुति का प्रथम श्लोक है।

इस धरती पर अयोध्या नगरी सर्वजन प्रसिद्ध-शाश्वत तीर्थ है, वह तीनों लोकों में पूज्य है और देव-इन्द्रों के द्वारा वंद्य है।।२।। इस श्लोक में पाँच अक्षरी ‘‘सती’’ छंद का प्रयोग किया गया है।

विजया देवी माता इस संसार में धन्य हैं, क्योंकि उन्होेंने देवों द्वारा पूज्य पुत्र को जन्म दिया है।।३।। ‘‘मन्दा’’ नामक पाँच अक्षरी छंद से निर्मित यह श्लोक है।

जो इक्ष्वाकुवंश के भास्कर हैं, जिनका चिन्ह हाथी हैं और जिनके शरीर का वर्ण स्वर्ण के समान है ऐसे वे अजितनाथ भगवान पापों से मेरी रक्षा करें।।४।।

यह छह अक्षर वाला ‘‘तनुमध्या’’ छंद में निबद्ध श्लोक है।

हे अजितनाथ भगवान्! आपका शरीर चार सौ पचास धनुष अर्थात् अठारह सौ हाथ ऊँचा था। इस पृथ्वी पर शत्रुओं के विजेता ‘‘जितशत्रु’’ नाम के राजा आपके पिता हुए हैं।।५।।

यह छह अक्षरी ‘‘शशिवंदना’’ छंद है।

आपकी आयु बहत्तर लाख पूर्व वर्ष की थी, आप केवलज्ञान और अव्याबाध सुख-पूर्ण आनन्द से सहित हैं, ऐसे हे अजितनाथ भगवान्! आप संसार के दु:खों से मेरी रक्षा करें।।६।।

यह छह अक्षर वाला ‘‘सावित्री’’ छंद है।

ज्येष्ठ मास की अमावस्या शुभदायक तिथि है अर्थात् भगवान अजितनाथ ने जेठ वदी अमावस को गर्भ में आकर वह तिथि शुभ कर दी। माघ शुक्ला दशमी तिथि उनके जन्म से पवित्र हो गई। उसी माघ मास की सुदी नवमी तिथि पुण्यमयी है क्योंकि उस दिन भगवान ने जैनेश्वरी दीक्षा धारण की थी। पौष शुक्ला एकादशी तिथि शुभ हुई, जिस दिन उन्हें केवलज्ञान प्रगट हुआ था तथा चैत्र शुक्ला पंचमी तिथि शुभ है, क्योंकि उस दिन भगवान् ने मोक्ष पद को प्राप्त किया था।

अजितनाथ भगवान् के पंचकल्याणकों से पवित्र ये पाँचों तिथियाँ मुझे श्रेष्ठमोक्ष गति प्रदान करें।।७-८।।

आठ अक्षर वाले अनुष्टुप् छंद से निर्मित ये दोनों श्लोक हैं।

हे जिनेश्वर अजितनाथ! आप मेरे रोग, शोक आदि से उत्पन्न होने वाले संसार दु:खों को दूर कीजिए-दूर कीजिए। अव्याबाध और विशाल ऐसे मोक्षसुख को दीजिए-दीजिए। केवलज्ञानरूप सर्वश्रेष्ठ साम्राज्य को प्रदान कीजिए-कीजिए और ज्ञानमतीरूप परम सौख्य की सिद्धि के लिए होइए-होइए।।९।।

यह पन्द्रह अक्षरी ‘‘मालिनी’’ छंद में निबद्ध अंतिम श्लोक है।

पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने ‘‘कल्याणकल्पतरु श्लोक’’ में एकाक्षरी छंद से लेकर ३२ अक्षरी छंद तक में चौबीस तीर्थंकर भगवन्तों के स्तोत्र रचे हैं, उन्हें क्रमश: षट्खण्डागम में चौबीस अनुयोगद्वारों के प्रारंभिक मंगलाचरण में निबद्ध किया है। इसी शृँखला में यहाँ इस चतुर्थखण्ड की दसवीं पुस्तक ‘‘प्रथमानुयोगद्वार’’ नामक द्वितीय अनुयोगद्वार के प्रारंभ में द्वितीय तीर्थंकर श्री अजितनाथ भगवान का यह स्तोत्र है।

जिन्होंने सम्पूर्ण कर्मों से उत्पन्न वेदनारूपी समुद्र को स्वयं ही तिर करके पार करके लोक के अग्रभाग को प्राप्त कर लिया है अर्थात् सिद्धशिला पर जाकर जो विराजमान हो गये हैं, ऐसे उन सिद्ध भगवन्तों को मेरा बारम्बार नमस्कार है।।१।।

यहाँ द्वितीय तीर्थंकर श्री अजितनाथ भगवान का स्तवन करके अब कृति वेदना आदि चौबीस अनुयोगद्वारों में वेदनानुयोगद्वार नाम के द्वितीय अनुयोगद्वार को इस दसवें ग्रंथ में कहा जा रहा है।

अब सर्वप्रथम षट्खण्डागम का विषय प्रदर्शित करते हैं-

षट्खण्डागम नाम को सार्थक करने वाले छह खण्ड हैं-

१. जीवस्थान,

२. क्षुद्रकबंध,

३. बंधस्वामित्वविचय,

४. वेदनाखण्ड,

५. वर्गणाखण्ड और

६. महाबंध।

इन छह खण्ड में विभक्त ग्रन्थों में सम्पूर्ण जैन वाङ्मय का सार समाविष्ट है। इन ग्रंथों से ही सार ग्रहण करके श्रीमान् नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती आचार्यदेव ने गोम्मटसार जीवकाण्ड-कर्मकाण्ड-लब्धिसार-क्षपणासार-त्रिलोकसार नाम के ग्रंथ रचकर भव्यपुंगव साधु-मुनि, साध्वी-आर्यिकावर्ग, श्रावक और श्राविकाओं के लिए प्रदान किये हैं। पुनश्च-

गाथार्थ-जिन्होंने महाकर्मप्रकृतिप्राभृतरूपी पर्वत को उठाकर मस्तक पर धारण करके श्री पुष्पदन्तमुनिराज को समर्पित किया था, वे श्रीधरसेनाचार्यवर्य सदा जयशील होवें।

उन आचार्यश्री धरसेन स्वामी का एवं उनके शिष्यद्वय श्रीपुष्पदन्त और भूतबली मुनिराजों का इस जगत पर अनन्त उपकार है। जिन आचार्यों की कृपा प्रसाद से ही हम सभी को मोक्षमार्ग दिख रहा है, उन सभी के लिए मेरा अनन्तबार नमस्कार होवे।

यहाँ उन छहों खण्डों में से जीवस्थान नामक प्रथम खण्ड में सत्प्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, कालानुगम, अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम नाम के आठ अधिकार और नौ चूलिकाओं का वर्तमानकाल के विभक्त छह ग्रन्थों में वर्णन किया गया है। क्षुद्रकबंध नामक द्वितीयखण्ड रूप सप्तम ग्रंथ में ग्यारह अनुयोगद्वार कहे गये हैं।

बंधस्वामित्वविचय नामक तृतीय खण्डरूप आठवें ग्रंथ में बंध और बंधक आदिकों का वर्णन है।

वेदनानामक चतुर्थखण्ड नवमें ग्रंथ में कृति-अनुयोगद्वार कहा गया है। इस वेदना नामक खण्ड के अन्तर्गत दशवें ग्रंथ से लेकर बारहवें ग्रंथ तक तीन ग्रंथों में वेदनानुयोगद्वार वर्णित है।

इस वेदनानामक अनुयोगद्वार में सोलह अधिकार कहते हैं-

इन सोलहों अनुयोगद्वारों के नाम इस प्रकार है-

१. वेदनानिक्षेप,

२. वेदनानयविभाषणता,

३. वेदनानामविधान,

४. वेदनाद्रव्यविधान,

५. वेदनाक्षेत्रविधान,

६. वेदनाकालविधान,

७. वेदनाभावविधान,

८. वेदनाप्रत्ययविधान,

९. वेदनास्वामित्वविधान,

१०. वेदनावेदनविधान,

११. वेदनागतिविधान,

१२. वेदनाअनंतरविधान,

१३. वेदनासन्निकर्षविधान,

१४. वेदनापरिमाणविधान,

१५. वेदनाभागाभागविधान और

१६. वेदनाअल्पबहुत्व।

इन सोलहों भेदों में से इस दशवें ग्रंथ में प्रारंभ के पाँच अधिकार ग्रहण करेंगे अर्थात् पाँच अधिकारों का वर्णन इस ग्रंथ में किया जायेगा।

ग्यारहवें ग्रंथ में वेदनाकालविधान और वेदनाभावविधान नाम के दो अर्थाधिकारों का कथन करेंगे। पुन: बारहवें ग्रंथ में वेदनाप्रत्ययविधान आदि शेष नौ अर्थाधिकार कहेंगे। ये सोलह भेद भी इसी ग्रंथ के प्रथम सूत्र में वर्णित हैं, जो अनुयोगद्वार के नाम से ही कहे गये हैं।

इन सोलहों अनुयोगद्वारों में यह वेदनाखण्ड पूर्ण हुआ है।

उसके आगे स्पर्श-कर्म-प्रकृति आदि बाईस अनुयोगद्वारों को चार ग्रंथों में विभक्त करके दिखाएंगे। यह वर्गणाखड नाम से कहा गया है।

वर्तमान के सोलह ग्रंथों में धवलाटीका समन्वित पाँच खण्ड ही उपलब्ध होते हैं। छहे खण्डरूप महाबंध नामक ग्रंथ पर महाधवला टीका प्रसिद्ध है। उसमें विद्वानों ने छहे खण्ड को सात ग्रंथों में विभाजित किया है।

इनकी उत्पत्ति बताते हैं-

अग्रायणीय नामक द्वितीय पूर्व के पंचमवस्तु की चयनलब्धि के अन्तर्गत बीस प्राभृतों में ‘कर्मप्रकृति’ नाम का चतुर्थ प्राभृत है। इस प्राभृत में कृति-वेदना-स्पर्श-कर्म-प्रकृति-बंधन-निबंधन-प्रक्रम-उपक्रम-उदय-मोक्ष-संक्रम-लेश्या-लेश्याकर्म-लेश्यापरिणाम-सातासात-दीर्घह्रस्व-भवधारणीय-पुद्गलात्त-निधत्तानिधत्त-निकाचितानिकाचित-कर्मस्थिति-पश्चिमस्कंध-अल्पबहुत्व नामके चौबीस अनुयोगद्वार हैं। इन चौबीसों अनुयोगद्वारों में से चतुर्थ वेदनाखण्ड में कृति और वेदना नाम के दो अनुयोगद्वार हैं। उनमें से वेदनाखण्ड नामक नवमें ग्रंथ में कृति अनुयोगद्वार का वर्णन है। दशवें-ग्यारहवें और बारहवें ग्रंथ में वेदना अनुयोगद्वार का वर्णन है।

शेष बाईस अनुयोगद्वार वर्गणाख्ण्ड में ग्रहण किये गये हैं।

संप्रति दशमग्रंथस्य पातनिका कथ्यते—

अस्मिन् दशमे ग्रंथे त्रयोविंशत्यधिकत्रिशतसूत्रेषु त्रयो महाधिकारा: वक्ष्यन्ते। तत्र प्रथममहाधिकारे वेदनानिक्षेप-वेदनानयविभाषणता-वेदनानामविधानै: त्रिभिरधिकारै: एकादशसूत्राणि। द्वितीयमहाधिकारे त्रयोदशाधिकद्विशतसूत्रेषु द्वौ अधिकारौ विभक्तीकृतौ। प्रथमोेऽधिकार: वेदनाद्रव्यविधाननाम्नास्ति। द्वितीयोऽधिकार: चूलिकानामधेयेन कथित:। तृतीये महाधिकारे वेदनाक्षेत्रविधाने नवनवतिसूत्राणि सन्ति। इति दशमग्रन्थस्य समुदायपातनिका कथितास्ति।

तत्र तावत् प्रथमे महाधिकारे त्रयोऽधिकारा:। तेषु प्रथमेऽधिकारे त्रीणि सूत्राणि। द्वितीयेऽधिकारे चत्वारि सूत्राणि। तृतीये वेदनानामविधाने चत्वारि सूत्राणि सन्तीति ज्ञातव्यम्।
संप्रति श्रीमद्भगवद्धरसेनाचार्येण संप्राप्तसिद्धान्तबोधेन श्रीमद्भूतबलिसूरिवर्येण वेदनानियोगद्वारस्य षोडशानियोगद्वारप्रतिपादनपरं सूत्रमवतार्यते—
वेदणा त्ति। तत्थ इमाणि वेयणाए सोलस अणुयोगद्दाराणि णादव्वाणि भवंति-वेदणाणिक्खेवे वेदणाणयविभासणदाए वेदणाणामविहाणे वेदणादव्वविहाणे वेदणाखेत्तविहाणे वेदणाकालविहाणे वेदणाभावविहाणे वेदणापच्चयविहाणे वेदणासामित्तविहाणे वेदणा-वेदणविहाणे वेदणागइ-विहाणे वेदणाअणंतरविहाणे वेदणासण्णियासविहाणे वेदणापरिमाणविहाणे वेदणाभागाभागविहाणे वेदणाअप्पाबहुगे त्ति।।१।।
सिद्धांतचिन्तामणिटीका—पूर्वोक्तार्थाधिकारस्य स्मरणं कारयितुं सूत्रे ‘वेदना’ इति प्ररूपितं। एतानि षोडशनामानि प्रथमाविभक्त्यन्तानि ज्ञातव्यानि भवन्ति।
कश्चिदाह-कथं पुन: अत्रान्ते-प्रत्येकपदान्ते एकारप्रयोग: ?
श्रीवीरसेनाचार्य: प्राह-‘‘एए छच्च समाणा’’ इत्येतेन सूत्रेण कृतैकारत्वात्।
अधुना एतेषामधिकाराणां विषयदिशादर्शनार्थं समुदयार्थ उच्यते—
१. वेदनाशब्दस्यानेकार्थेषु वर्तमानस्याप्रकृतार्थान् अपसार्य प्रकृतार्थज्ञापनार्थं वेदनानिक्षेपानियोग-द्वारमागतं।
२. लोके सर्वो व्यवहारो नयमाश्रित्यावस्थित इति एषो नामादिनिक्षेपगतव्यवहार: किं किं नयमाश्रित्य स्थित: इत्याशंकितस्य जनस्य शंकानिराकरणार्थमव्युत्पन्नजनव्युत्पादनार्थं वेदना-नयविभाषणता आगता।
३. बंधोदयसत्त्वरूपेण जीवे स्थितपुद्गलस्कंधेषु कस्य कस्य नयस्य क्व क्व कीदृश: प्रयोगो भवतीति नयमाश्रित्य प्रयोगप्ररूपणार्थं वेदनानामविधानमागतम्।
४. वेदनाद्रव्यमेकविकल्पं न भवति, किन्तु अनेकविकल्पमिति ज्ञापनार्थं संख्यातासंख्यातपुद्गलप्रतिषेधं कृत्वा अभव्यसिद्धैरनंतगुणा: सिद्धेभ्योरनंतगुणहीना: पुद्गलस्कंधा जीवसमवेता वेदनाभवन्तीति ज्ञापनार्थं वा वेदनाद्रव्यविधानमागतं।
५. वेदनाद्रव्याणामवगाहना संख्यातक्षेत्रं नास्ति, किन्तु अंगुलस्यासंख्येयभागमादिं कृत्वा घनलोकपर्यंत-मिति ज्ञापनार्थं वेदनाक्षेत्रविधानमागतं।
६. वेदनाद्रव्यस्कंधो वेदनाभावमत्यक्त्वा जघन्योत्कृष्टेण चैतावत्कालं तिष्ठतीति ज्ञापनार्थं वेदनाकालविधानमागतम्।
७. वेदनाद्रव्यस्कंधे संख्यातासंख्यातानन्तगुणप्रतिषेधं कृत्वा अनंतानंतभावविकल्पप्रतिबोधनार्थं वेदनाभावविधानमागतम्।
८. वेदनाद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावा न निष्कारणा:, किन्तु सकारणा इति प्रज्ञापनार्थं वेदनाप्रत्ययविधान-मागतम्।
९. एकादिसंयोगेन अष्टभंगा जीवा नोजीवा वेदनाया: स्वामिनो भवन्ति, न भवन्ति वेति नयानाश्रित्य प्रज्ञापनार्थं वेदनास्वामित्वविधानं कथितम्।
१०. एकादिसंयोगगतेन बध्यमान-उदीर्ण-उपशांतप्रकृतिभेदेन नयानाश्रित्य वेदनाविकल्पप्रतिपादनार्थं वेदनावेदनाविधानमागतम्।
११. द्रव्यादिभेदाभिन्नवेदना: किं स्थिता: किमस्थिता: किं स्थितास्थिता इति नयमासाद्य प्रज्ञापनार्थं वेदनागतिविधानं कथितम्।
१२. एकैकसमयप्रबद्धा नाम अनंतरबंधा:, नानासमयप्रबद्धा नामपरंपराबंधा:, तौ द्वावपि तदुभयबंधा:, एतेषां त्रयाणामपि नयसमूहमाश्रित्य प्रज्ञापनार्थं वेदनानन्तरविधानमागतम्।
१३. द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावानामुत्कृष्टानुत्कृष्टजघन्याजघन्येषु एकं निरूद्धं कृत्वा शेषपदप्रज्ञापनार्थं वेदनासन्निकर्षविधानमधिकारकथितम्।
१४. प्रकृतिकालक्षेत्राणां भेदेन मूलोत्तरप्रकृतीनां प्रमाणप्ररूपणार्थं वेदनापरिमाणविधानाधिकारं कथितम्।
१५. प्रकृत्यर्थता-स्थित्यर्थता-क्षेत्रप्रत्याश्रयेषु उत्पन्नप्रकृतय: सर्वप्रकृतीनां कियन्त्यो भाग इति ज्ञापनार्थं वेदनाभागाभागविधानमागतम्।
१६. एतासां चैव त्रिविधाणां प्रकृतीनामन्योन्यमपेक्ष्य अल्पबहुत्वप्रतिपादनार्थं वेदनाल्पबहुत्वविधान-मागतम्। एवं षोडशानामनुयोगद्वाराणां समुदायार्थप्ररूपणा कृता भवति।
अत्र सूत्रे ‘सोलस अणुयोगद्दाराणि’ इत्येतद् देशामर्शकवचनं ज्ञातव्यम्। अन्येषामप्यनुयोगद्वाराणां मुक्तजीवसमवेतादीनामुपलंभात्।
तात्पर्यमत्र-कर्मवेदनाभि:पीडितमन:शान्त्यर्थं शुद्ध्यर्थं च रत्नत्रयमवलंबनीयं। तेनैव मुच्यंते जीवा: कर्मभ्य: संसारेभ्यश्चेति ज्ञात्वा स्वहितोपाये प्रमादो न कर्तव्य:।
एवं प्रथमस्थले वेदनाया: षोडशनामकथनत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
संप्रति एतेष्वनुयोगद्वारेषु वेदनानिक्षेपनाम-प्रथमानुयोगद्वारप्ररूपणार्थं सूत्रद्वयमवतार्यते-
वेयणाणिक्खेवे त्ति। चउव्विहे वेयणाणिक्खेवे।।२।।
णामवेयणा ट्ठवणवेयणा दव्ववेयणा भाववेयणा चेदि।।३।।
सिद्धांतचिन्तामणिटीका —‘वेयणणिक्खेवे’ इति पूर्वकथितार्थाधिकारस्मरणकारणार्थं भणितं, अन्यथा सुखेनावगमाभावात्। अत्रापि पूर्वमिव ओकारस्य स्थाने ‘ए ए छच्च समाणा’ सूत्रेण एकारादेशो द्रष्टव्य:। अत- एव ‘वेयणाणिक्खेवो चउव्विहो।’ इति एतदपि देशामर्शकवचनं, पर्यायार्थिकनये अवलम्ब्यमाने क्षेत्रकालादिवेदनानां दर्शनात्।
तत्राष्टविधबाह्यार्थालम्बनविरहितो वेदनाशब्दो नामवेदना कथ्यते।
अत्र कश्चिदाह-
आत्मन आत्मनि प्रवृत्ति: कथं भवति ?
आचार्य: प्राह-
नैतद् वक्तव्यं, प्रदीप-सूर्येन्दु-मणीनामात्मप्रकाशकानामुपलंभात्।
संकेतनिरपेक्ष: शब्द आत्मानं कथं प्रकाशयति ?
नैतद् वक्तव्यं, तथैवोपलब्धिर्दृश्यते। न चोपलभ्यमानेऽनुपपन्नता, अव्यवस्थापत्ते:। न च शब्द: संकेतबलेनैव बाह्यार्थप्रकाशक इति नियमोऽस्ति, शब्देन विना शब्दार्थयोर्वाच्य-वाचकभावेन संकेतकरणानुपपत्ते:। न च शब्दे शब्दार्थयो: संकेत: क्रियते, अनवस्थाप्रसंगात्। शब्दे सत्यां शक्तौ परत उत्पत्तिविरोधात् च, अतएवात्रानेकान्तो योजयितव्य:।
‘सा वेदना एषा’ इति अभेदेन अध्यवसितार्थ: स्थापना। सा द्विविधा सद्भावासद्भावस्थापनाभेदेन। तत्र प्रायेण अनुकुर्वद्द्रव्यभेदेन इच्छितद्रव्यस्थापना सद्भावस्थापनावेदना, अन्या असद्भावस्थापनावेदना।
द्रव्यवेदना द्विविधा-आगम-नोआगमद्रव्यवेदनाभेदेन। वेदनाप्राभृतज्ञायकोऽनुपयुक्त आगमद्रव्यवेदना। ज्ञायकशरीर-भावितद्व्यतिरिक्तभेदेन नोआगमद्रव्यवेदना त्रिविधा। तत्र ज्ञायकशरीरं भावि-वर्तमान-त्यक्तभेदेन त्रिविधं।
वेदनानियोगद्वाराज्ञायकस्य उपादानकारणत्वेन भविष्यरूपेण सहितो येन नोआगमभाविद्रव्यवेदना। तद्व्यतिरिक्तनोआगमद्रव्यवेदना कर्मनोकर्मभेदेन द्विविधा। तत्र कर्मवेदना ज्ञानावरणादिभेदेन अष्टविधा। नोकर्मनोआगमद्रव्यवेदना सचित्त-अचित्त-मिश्रभेदेन त्रिविधा। तत्र सचित्तद्रव्यवेदना सिद्धजीवद्रव्यं। अचित्तद्रव्यवेदना पुद्गल-कालाकाश-धर्माधर्मद्रव्याणि। मिश्रद्रव्यवेदना संसारिजीवद्रव्यं, कर्म-नोकर्मजीव-समवायस्य जीवाजीवेभ्य: पृथग्भावदर्शनात्।
भाववेदना आगम-नोआगमभावभेदेन द्विविधा।
तत्र वेदनानुयोगद्वारज्ञायक: उपयुक्त आगमभाववेदना। अपरा द्विविधा जीवाजीवभाववेदनाभेदेन। तत्र जीवभाववेदना औदयिकादिभेदेन पंचविधा। अष्टकर्मजनिता औदयिका वेदना, तदुपशमजनिता औपशमिका, तत्क्षयजनिता क्षायिका। तेषां क्षयोपशमजनिता अवधिज्ञानादिस्वरूपा क्षयोपशमिका। जीवत्व-भव्यत्व-उपयोगादिस्वरूपा पारिणामिका।
सुवर्ण-पुत्र-ससुवर्णकन्यादिजनितवेदना: एतास्वेव पंचसु प्रविशन्ति इति पृथग्नोक्ता:।
या सा अजीवभाववेदना सा द्विविधा-औदयिका पारिणामिका चेति। तत्र एकैका पंचवर्ण-पंचरस-द्विगंधाष्टस्पर्शादिभेदेनानेकविधा। एवमेतेषु अर्थेषु वेदनाशब्दो वर्तते।
अत्र केनार्थेण प्रकृतमिति चेत् ?
नात्र एतज्ज्ञायते। सोऽपि प्रकृतार्थो नयग्रहणे निलीन:, इति तावन्नयविभाषा क्रियते।
अत्र तात्पर्यमेतज्ज्ञातव्यं-अस्या जीवभाववेदनाया यदौदयिकादिपंचभेदा: प्ररूपिता: सन्ति। निश्चयनयेन इमे जीवस्य न सन्ति, व्यवहारनयेन जीवस्य स्वतत्त्वमिति ज्ञात्वा क्षायिकभावप्राप्त्यर्थं पुरुषार्थो विधेय:, यावत् क्षायिकभावो न लभेत तावदौपशमिक-क्षायोपशमिकसम्यक्त्वादिबलेन स्वात्मविशुद्धिं कुर्वद्भिर्मुमुक्षुभि: परमानंदपरमसौख्याभिव्यक्तये भावना कर्तव्या।
एवं द्वितीयस्थले प्रथमभेदवेदनानिक्षेपनामभेदककथनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
वेदनानिक्षेपस्योपसंहार: क्रियते-
अस्मिन् वेदनानिक्षेपनाम्नि अनुयोगद्वारे वेदना नामस्थापनाद्रव्यभाववेदनारूपेण चतुर्निक्षेपभेदेन कथितास्ति। बाह्यार्थमनवलम्ब्य स्वस्मिन् प्रवृत्तवेदनाशब्दनामवेदना प्रोक्ता। सा वेदना इयमिति अभेदपूर्वकं वेदनास्वरूपेण व्यवहृतपदार्थ: स्थापनावेदना उक्ता। सा सद्भावस्थापनासद्भावस्थापनाभेदेन द्विप्रकारा वर्णिता। वेदनामनुसरत्पदार्थे वेदनाध्यारोप: सद्भावस्थापना तामनुसरणमन्तरेण पदार्थे वेदनारोपोऽ-सद्भावस्थापना कथ्यते।
द्रव्यवेदनाया आगम-नोआगमद्रव्यवेदनानामद्विभेदौ स्त:। अत्र नोआगमद्रव्यवेदना ज्ञायकशरीर-भावि-तद्व्यतिरिक्तभेदेन त्रिविधा। ज्ञायकशरीरस्यापि भावि-वर्तमान-त्यक्तभेदा: सन्ति। तद्व्यक्तिरिक्तनो-आगमद्रव्यवेदना कर्मनोकर्मरूपेण द्विविधिा। तत्र कर्मवेदना ज्ञानावरणादिभेदेनाष्टविधा, नोकर्मवेदना सचित्ताचित्तमिश्ररूपेण त्रिविधा कथिता। एषु सिद्धजीवद्रव्यं सचित्तद्रव्यवेदना, पुद्गलधर्माधर्माकाशकाल-द्रव्याणि अचित्तद्रव्यवेदना संसारिजीवद्रव्यं च मिश्रद्रव्यवेदना कथ्यन्ते।
भाववेदना आगम-नोआगमभेदेन द्विविधा विभक्ता। अनयोर्वेदनानुयोगज्ञायक उपयोगयुक्तजीव आगमभाववेदना अस्ति। नोआगमभाववेदना जीवभाववेदनाजीवभाववेदनाभेदेन द्विप्रकारा। तत्र जीवभाववेदना औदयिकादि भेदेन पंचविधा, अजीवभाववेदना औदयिकपारिणामिकभेदेन द्विप्रकारा निर्दिष्टा अस्ति।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डे दशमग्रंथे वेदनानामद्वितीयानुयोगद्वारे प्रथमे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां वेदनानिक्षेपानुयोगद्वाराख्य: प्रथमोऽधिकार: समाप्त:।

अब दशवें ग्रंथ की पातनिका कही जा रही है-

इस दशवें ग्रंथ में तीन सौ तेईस सूत्रों में तीन महाधिकार कहेंगे। उनमें से प्रथ्मा महाधिकार में वेदनानिक्षेप, वेदनानयविभाषणता और वेदना नाम विधान नामक तीन अधिकारों में ग्यारह सूत्र हैं। द्वितीय महाधिकार में दो सौ तेरह सूत्रों में दो अधिकार विभक्त किये हैं। उनमें वेदनाद्रव्यविधान नाम का प्रथम अधिकार है। द्वितीय अधिकार चूलिका नाम से कहा गया है। तृतीय महाधिकार में वेदनाक्षेत्र विधान में निन्यानवे सूत्र हैं। यह दशवें ग्रंथ के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका कही गई है।

उनमें से प्रथम महाधिकार में तीन अधिकार हैं। उनमें भी प्रथम अधिकार में तीन सूत्र हैं। द्वितीय अधिकार में चार सूत्र हैं और वेदनानाम विधान नाम के तृतीय अधिकार में चार सूत्र हैं, ऐसा जानना चाहिए।

अब श्रीमान् भगवान् श्री धरसेनाचार्यवर्य से प्राप्त किये गये सिद्धान्त ज्ञान के द्वारा श्रीमान् भूतबली आचार्यदेव वेदनानियोगद्वार के सोलह अनियोगद्वारों का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र को अवतरित करते हैं-

सूत्रार्थ-

अब वेदना अधिकार के प्रकरण के अनुसार वेदना के ये सोलह अनुयोगद्वार ज्ञातव्य हैं-

१. वेदनानिक्षेप

२. वेदनानयविभाषणता

३. वेदनानामविधान

४. वेदनाद्रव्य-विधान

५. वेदनाक्षेत्रविधान

६. वेदनाकालविधान

७. वेदनाभावविधान

८. वेदनाप्रत्यय-विधान

९. वेदनास्वामित्वविधान

१०. वेदनावेदनविधान

११. वेदनागतिविधान

१२. वेदनाअनन्तरविधान

१३. वेदना सन्निकर्षविधान

१४. वेदनापरिमाणविधान

१५. वेदनाभागाभागविधान और

१६. वेदनाअल्पबहुत्व।।१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पूर्व में कथित अधिकार का स्मरण कराने के लिए सूत्र में ‘‘वेदना’’ ऐसा प्ररूपित किाय गया है। ये सोलहों नाम प्रथमा विभक्त्यन्त हैं अर्थात् इन सभी के अन्त में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-

यहाँ इन सभी पदों के अन्त में एकार का प्रयोग किया गया है ?

इसके उत्तर में श्री वीरसेनाचार्य ने कहा है कि-

‘‘एए छच्च समाणा’’ इस सूत्र से यहाँ एकार का आदेश किया है, इसलिए प्रत्येक पद के अन्त में एकार का प्रयोग उचित ही है।

अब इन अधिकारों के विषय की दिशा निर्देश हेतु समुदयार्थ कहते हैं-

१. वेदनाशब्द के अनेक अर्थों में से वर्तमान के अप्रकृतअर्थों को छोड़कर प्रकृत अर्थ का ज्ञान कराने के लिए वेदनानिक्षेपअनुयोगद्वार आया है।

२. लोक में सभी व्यवहारनय का आश्रय लेकर अवस्थित हैं अत: यह नाम आदि निक्षेप को प्राप्त व्यवहार किस-किस नय के आश्रय से स्थित है, ऐसी आशंका वालों की शंका का निराकरण करने हेतु अथवा अव्युत्पन्न जनों को व्युत्पन्न कराने के लिए वेदनानय विभाषणता आया है।

३. जो पुद्गलस्कंध बन्ध, उदय और सत्व रूप से जीव में स्थित हैं उनमें किस-किस नय का कहाँ-कहाँ कैसा प्रयोग होता है, इस प्रकार नय के आश्रय से प्रयोग की प्ररूपणा करने के लिए वेदनानाम विधान अधिकार आया है।

४. वेदनाद्रव्य एक प्रकार का नहीं है, किन्तु अनेक प्रकार का है-ऐसा ज्ञान कराने के लिए अथवा संख्यात व असंख्यात पुद्गलों का प्रतिषेध करके अभव्यसिद्धिकों से अनन्तगुणे और सिद्धों से अनन्तगुणे हीन पुद्गस्कंध जीव से समवेत होकर वेदनारूप होते हैं, ऐसा ज्ञान कराने के लिए वेदनाद्रव्यविधान अधिकार आया है।

५. वेदनाद्रव्यों की अवगाहना संख्यात-क्षेत्र नहीं है, किन्तु अंगुल के असंख्यातवें भाग से लेकर घनलोक पर्यन्त है, ऐसा जतलाने के लिए वेदनाक्षेत्रविधान अधिकार आया है।

६. वेदनाद्रव्य स्कंध वेदनात्वको न छोड़कर जघन्य और उत्कृष्ट रूप से इतने काल तक रहता है, ऐसा ज्ञान कराने के लिए वेदनाकालविधान अधिकार आया है।

७. वेदनाद्रव्यस्कंध में संख्यातगुणे, असंख्यातगुणे और अनन्तगुणे भावविकल्प नहीं है, किन्तु अनन्तानन्त भावविकल्प हैें, ऐसा ज्ञान कराने के लिए वेदनाभावविधान अधिकार आया है।

८. वेदनाद्रव्य, वेदनाक्षेत्र, वेदनाकाल और वेदनाभाव निष्कारण नहीं है, किन्तु सकारण हैं, इस बात का ज्ञान कराने के लिए वेदनाप्रत्ययविधान अधिकार आया है।

९. एक आदि संयोग से आठ भंग रूप जीव व नोजीव वेदना के स्वामी होते हैं या नहीं होते हैं, इस प्रकार नयों के आश्रय से ज्ञान कराने के लिए वेदनास्वामित्वविधान अधिकार आया है।

१०. एक-आदि-संयोग-गत बध्यमान, उदीर्ण और उपशान्त रूप प्रकृतियों के भेद से जो वेदनाभेद प्राप्त होते हैं, उनका नयों के आश्रय से ज्ञान कराने के लिए वेदना-वेदनाविधान अधिकार आया है।

११. द्रव्यादि के भेदों से भेद को प्राप्त हुई वेदना क्या स्थित है, क्या अस्थित है, या क्या स्थित-अस्थित है, इस प्रकार नय के आश्रय से परिज्ञान कराने के लिए वेदनागतिविधान अधिकार आया है।

१२. एक-एक समयप्रबद्धों का न म अनन्तरबन्ध है, नाना समयप्रबद्धों का नाम परम्पराबंध है और उन दोनों ही का नाम तदुभयबंध है। इन तीनों का नयसमूह के आश्रय से ज्ञान कराने के लिए वेदनाअन्तरविधान अधिकार आया है।

१३. द्रव्यवेदना, क्षेत्रवेदना, कालवेदना और भाववेदना, इनके उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य पदों में एक को विवक्षित करके शेष पदों का ज्ञान कराने के लिए वेदनासन्निकर्षविधान अधिकार आया है।

१४. प्रकृतियों के काल और क्षेत्र के भेद से मूल और उत्तर प्रकृतियों के प्रमाण का प्ररूपण करने के लिए वेदनापरिमाणविधान अधिकार आया है।

१५. प्रकृत्यर्थता, स्थित्यर्थता (समयप्रबद्धार्थता) और क्षेत्रप्रत्याश्रय में उत्पन्न हुई प्रकृतियाँ सब प्रकृतियों के कितनेवें भाग प्रमाण हैं, यह जतलाने के लिए वेदनाभागाभागविधान अधिकार आया है।

१६. और इन्हीं तीन प्रकार की प्रकृतियों का एक-दूसरे की अपेक्षा अल्प-बहुत्व बतलाने के लिए वेदनाअल्पबहुत्वविधान अधिकार आया है। इस प्रकार इन सोलह अनुयोगद्वारों की समुदयार्थ प्ररूपणा की गई है।

यहाँ सूत्र में सोलह अनुयोगद्वार यह देशामर्शक वचन है, क्योंकि मुक्त-जीव-समवेत आदि अन्य अनुयोगद्वार भी पाये जाते हैं।

तात्पर्य यह है कि कर्मों की वेदना से पीडित मन को शान्त करने के लिए एवं उसे शुद्ध करने के लिए रत्नत्रय का अवलंबन-सहारा लेना चाहिए। उसी के द्वारा जीव कर्मों से और संसार से छूटते हैं-मुक्ति पाते हैं ऐसा जानकर अपने हित का उपाय करने में प्रमाद नहीं करना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में वेदना के सोलह नामों का कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब इन अनुयोगद्वारों में वेदनानिक्षेप नाम के प्रथम अनुयोगद्वार का प्ररूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अब क्रम से वेदना निक्षेप अधिकार प्रकरण प्राप्त है। उस वेदना का निक्षेप चार प्रकार का है।।२।।

नाम वेदना, स्थापना वेदना, द्रव्य वेदना और भाववेदना ये उनके नाम हैं।।३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘‘वेदनानिक्षेप’’ यह पद पूर्व में कहे गये अधिकार का स्मरण कराने के लिए कहा गया है। अन्यथा इसका सुखपूर्वक ज्ञान नहीं हो सकता है। यहाँ पर भी पूर्व सूत्र के समान ही ओकार के स्थान पर ‘‘एए छच्च समाणा’’ सूत्र से एकार का आदेश जानना चाहिए। अतएव ‘‘वेदनानिक्षेप चार प्रकार है’’ इस प्रकार कहा है, यह भी देशामर्शक वचन है, क्योंकि पर्यायार्थिक नय का अवलम्बन लेने पर क्षेत्र-काल आदि वेदनाओं का भी अस्तित्व देखा जाता है।

उनमें से आठ प्रकार के अवलम्बन से रहित ‘वेदना’ शब्द नामवेदना है। यहाँ कोई शंका करता है कि- आत्मा की आत्मा में प्रवृति कैसे होती है ?

आचार्यदेव ने इसका समाधान करते हुए कहा है कि- ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि प्रदीप-दीपक, सूर्य, चन्द्रमा, मणि आदि जैसे अपने आपको प्रकाशित करने वाले होते हैं उसी प्रकार यहाँ भी स्वयं की स्वयं में प्रवृत्ति मानने में कोई बाधा नहीं है।

शंका-संकेत की अपेक्षा से रहित शब्द अपने आपको कैसे प्रकाशित कर सकता है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वैसी ही उपलब्धि देखी जाती है और वैसी उपलब्धि होने पर अनुपपत्ति मानना ठीक नहीं है। क्योंकि ऐसा मानने पर अव्यवस्था की आपत्ति आती है।

शब्द संकेत के बल पर ही बाह्य अर्थ का प्रकाशक हो, यह नियम भी नहीं है, क्योंकि शब्द के बिना शब्द और अर्थ का वाच्य-वाचकरूप से संकेत करना नहीं बन सकता है तथा शब्द में शब्द और अर्थ का संकेत किया जाता है, ऐसा मानने पर अनवस्था दोष का प्रसंग आता है और शब्द में स्वयं शक्ति के मानने पर दूसरे से उत्पत्ति मानने में विरोध आता है। इसलिए इस विषय में अनेकांत का ही प्रयोग करना चाहिए।

‘‘वह वेदना यह है’’ ऐसा अभेदरूप से जो अन्य पदार्थ में वेदनारूप से अध्यवसाय होता है, वह स्थापना होता है। वह सद्भावस्थापना और असद्भावस्थापना के भेद से दो प्रकार की है। उनमें से जो द्रव्य का भेद प्राय: वेदना के समान है, उसमें इच्छित द्रव्य अर्थात् वेदनाद्रव्य की स्थापना करना सद्भावस्थापनावेदना है और उससे भिन्न असद्भावस्थापनवेदना है।

द्रव्यवेदना दो प्रकार की है-आगम-द्रव्यवेदना और नोआगम-द्रव्यवेदना। जो वेदना प्राभृत का जानकार है, किन्तु उपयोग रहित है वह आगम-द्रव्यवेदना है। नोआगम-द्रव्यवेदना ज्ञायकशरीर, भव्य और तद्व्यतिरिक्त के भेद से तीन प्रकार की है। उनमें से ज्ञायकशरीर यह भावी, वर्तमान और त्यक्त के भेद से तीन प्रकार का है।

जो वेदनानुयोगद्वार का अजानकार है, किन्तु भविष्य में उसका उपादान कारण होगा, वह भावी नोआगमद्रव्यवेदना है। तद्व्यतिरिक्त-नोआगम-द्रव्यवेदना कर्म और नोकर्म के भेद से दो प्रकार की है। उनमें से कर्मवेदना ज्ञानावरण आदि के भेद से आठ प्रकार की है तथा नोकर्म-नोआगम-द्रव्यवेदना सचित्त, अचित्त और मिश्र के भेद से तीन प्रकार की है। उनमें से सचित्त द्रव्यवेदना सिद्ध-जीव-द्रव्य है। अचित्त-द्रव्यवेदना पुद्गल, काल, आकाश, धर्म और अधर्म द्रव्य है। मिश्र द्रव्यवेदना संसारी जीव-द्रव्य हैं, क्योंकि कर्म और नोकर्म का जीव के साथ हुआ संबंध जीव और अजीव से भिन्न रूप से देखा जाता है।

भाववेदना आगम और नोआगम के भेद से दो प्रकार की है। उनमें से जो वेदनानुयोगद्वार का जानकार होकर उसमें उपयोग युक्त है वह आगमभाववेदना है। नोआगमभाववेदना जीवभाववेदना और अजीवभाववेदना के भेद से दो प्रकार की है। उनमें से जीवभाववेदना औदयिक आदि के भेद से पाँच प्रकार की है। आठ प्रकार के कर्मों के उदय से उत्पन्न हुई वेदना औदयिक वेदना है। कर्मों के उपशम से उत्पन्न हुई वेदना औपशमिक वेदना है। उनके क्षय से उत्पन्न हुई वेदना क्षायिक वेदना है। उनके क्षयोपशम से उत्पन्न हुई अवधिज्ञानादि स्वरूप वेदना क्षायोपशमिक वेदना है और जीवत्व, भव्यत्व व उपयोग आदि स्वरूप पारिणामिक वेदना है।

सुवर्ण, पुत्र व सुवर्ण सहित कन्या आदि से उत्पन्न हुई वेदनाओं का इन पाँच में ही अन्तर्भाव हो जाता है, अत: उन्हें अलग से नहीं कहा है और जो पहले अजीवभाववेदना कही है वह दो प्रकार की है-औदयिक और पारिणामिक। उनमें प्रत्येक पाँच रस, पाँच वर्ण, दो गंध और आठ स्पर्श आदि के भेद से अनेक प्रकार की है। इस प्रकार इन अर्थों में वेदना शब्द वर्तमान है।

प्रश्न-यहाँ कौन सा अर्थ प्रकृत है ?

उत्तर-यह नहीं जाना जाता है। वह भी प्रकृत अर्थ नयग्रहण में लीन है। अतएव प्रथम नयविभाषा की जाती है।

यहाँ यह तात्पर्य जानना चाहिए कि-

इस जीव भाववेदना के जो औदयिक आदि पाँच प्ररूपित किये गये हैं। वे निश्चयनय से जीव के नहीं है और व्यवहार नय से जीव के स्वतत्त्व हैं, ऐसा जानकर क्षायिकभाव की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। जब तक क्षायिक भाव नहीं प्राप्त होता है तब तक आप सभी मुमुक्षुओं को औपशमिक और क्षायोपशमिक सम्यक्त्व आदि के बल से अपने आत्मा की विशुद्धि करते हुए परमानन्दरूप परम-उत्कृष्टसुख को प्रगट करने की भावना करना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में प्रथम भेद वेदनानिक्षेपनाम के भेदों का कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

अब वेदनानिक्षेप का उपसंहार किया जा रहा है-

इस वेदनानिक्षेप नाम के अनुयोगद्वार में वेदना नाम-स्थापना-द्रव्य और भाववेदनारूप से चार निक्षेपभेद के द्वारा कही है। बाह्य अर्थ का अवलम्बन न लेकर अपने में प्रवृत्त वेदना शब्द नामवेदना कही गई है। वह वेदना यह है ऐसा अभेदपूर्वक वेदनास्वरूप से व्यवहृत पदार्थ स्थापनावेदना कही है। वह सद्भावस्थापना और असद्भावस्थापना के भेद से दो प्रकार की मानी है। वेदना का अनुसरण करने वाले पदार्थ में वेदना का अध्यारोप करना सद्भावस्थापना है एवं वेदना का अनुसरण करने से अतिरिक्त भिन्न पदार्थ में वेदना का अध्यारोपण असद्भावस्थापना कहलाती है।

द्रव्यवेदना के आगमद्रव्यवेदना और नोआगमद्रव्यवेदना नाम के दो भेद हैं। यहाँ नो आगमद्रव्यवेदना ज्ञायकशरीर, भावि और तद्व्यतिरिक्त के भेद से दो प्रकार की है। ज्ञायकशरीर के भी भावि, वर्तमान और त्यक्त ये तीन भेद हैं। तद्व्यतिरिक्तनोआगम द्रव्यवेदना कर्म और नोकर्मरूप दो प्रकार की है। उनमें कर्मवेदना ज्ञानावरणादि के भेद से आठ प्रकार की है। नोकर्मवेदना सचित्त, अचित्त और मिश्र के भेद से तीन प्रकार की कही है। इनमें सिद्धजीवद्रव्य सचित्तद्रव्यवेदना हैं, पुद्गल-धर्म-अधर्म-आकाश और कालद्रव्य अचित्तद्रव्यवेदना हैं तथा संसारीजीवद्रव्य मिश्रवेदना कहे जाते हैं।

भाववेदना को आगम और नोआगम के भेद से दो प्रकारों में विभाजित किया है। उन दोनों में से वेदनानुयोग का जानकर उपयोग से संयुक्त जीव आगम भाववेदना है। नोआगमभाववेदना के जीवभाववेदना और अजीवभाववेदना के भेद से दो प्रकार कहे हैं। उनमें जीवभाववेदना औदयिक आदि के भेद से पाँच प्रकार की है और अजीवभाववेदना औदयिक और पारिणामिक के भेद से दो प्रकार की बतलाई है।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में चतुर्थखण्ड के दशवें ग्रंथ में वेदना नाम के द्वितीय अनुयोद्वार में प्रथम महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में वेदनानिक्षेपानुयोगद्वार नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।