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अन्यत्व :

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अन्यत्व :

एको मे शाश्वत आत्मा, ज्ञानदर्शनसंयुत:।

शेषा मे बाह्या भावा:, सर्वे संयोगलक्षणा:।।

—समणसुत्त : ५१६

ज्ञान और दर्शन से संयुक्त मेरी एक आत्मा ही शाश्वत है। शेष सब अर्थात् देह तथा रागादि भाव तो संयोग लक्षण वाले हैं—उनके साथ मेरा संयोग संबंध मात्र है। वे मुझसे अन्य ही हैं।

संयोगमूला जीवेन, प्राप्तदु:खपरम्परा।

तस्मात्संयोगसम्बन्धं, सर्वभावेन व्युत्सृजामि।।

—समणसुत्त : ५१७

इस संयोग के कारण ही जीव दु:खों की परम्परा को प्राप्त हुआ है। अत: सम्पूर्ण भाव से मैं इस संयोग—संबंध का त्याग करता हूँ।

यो ज्ञात्वा देहं, जीवस्यवरूपात् तत्त्वत: भिन्नम्।

आत्मानमपि च सेवते, कार्यकरं तस्य अन्यत्वम्।।

—समणसुत्त : ५१९

जो शरीर को जीव के स्वरूप से तत्त्वत: भिन्न जानकर आत्मा का अनुचिन्तन करता है, उसकी अन्यत्व भावना कार्यकारी है।