ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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उदर कृमि (पेट के कीड़े)

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लक्षण

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पेट में दर्द, दाँत किटकिटान, कब्ज रहना, दस्त हो जाना, जी मचलना, पेट में तनाव इत्यादि लक्षण होते हैं।

उपचार: १. शिशुओं के पेट के कीड़ों के लिए माँ के दूध में एक—डेढ़ ग्राम कबीला मिलाकर शिशु को सेवन करायें।

२. बाय बिडिंग, सेंधा नमक, त्रिफला और खाने का सोडा सबको मिलाकर चूर्ण बनायें। २ ग्राम चूर्ण नित्य प्रति छाछ के साथ सेवन करें, तो कीड़े निकल जायेंगे।

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अम्लपित्त (एसीडिटी):—

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१. गोदुग्ध के मट्ठे के साथ एक—एक चम्मच आँवले का चूर्ण नित्य सुबह—शाम सेवन करें।

२. फीका दूध (ठंडा) एक डली गुड़ के साथ सेवन करें। रोज शाम को इसका प्रयोग करने से अम्ल—पित्त का रोग आठ—दस दिनों में ही समाप्त हो जायेगा।

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कब्ज (कोष्ठबद्धता):—

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१. शाम को व सूर्यास्त के समय एक गिलास दूध में चार मुनक्का उबालकर गुनगुना रहने पर पियें।

२. शाम को व सूर्यास्त के समय दूध के साथ २ चम्मच ईसबागोल की भूसी का सेवन करें, तो कब्ज की शिकायत दूर हो जायेगी।

३. २०० ग्राम गरम दूध में १०० ग्राम जलेबी भिगों दें, और गुनगुना रहने पर दूध सहित जलेबियों का सेवन करें।

४. गर्मी और शुष्कता से होने वाले कब्ज के लिए १०० ग्राम ठंडे दूध में २०० ग्राम ठंडा पानी और चीनी डालकर पियें।

५. त्रिफला चूर्ण दूध के साथ (गरम) सेवन करें।

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वमन (कै, उल्टी)

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उपचार — खाने वाले चूने को १२ घंटे तक पानी में भिगोकर रखें । फिर उसे निथार कर २ चम्मच पानी एक गिलास दूध में डालकर सेवन करें। इससे उल्टी, खट्टी डकारें और सीने की जलन तीनों में आराम हो जाता है।

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नाभि विकार (सूजन)

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कारण — नवजात शिशु की नाल काटने के बाद होने वाली असावधानी से प्रदूषण या मैल जमने से नाभि में सूजन, खुजली, पीड़ा हो जाती है ।

उपचार — घी गरम करके एक चुटकी हल्दी डालकर रूई के फोहे पर रखें और गुनगुना नाभि पर बांध दें तो नाभि का विकार दूर हो जायेगा।

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श्वांस सम्बन्धी रोग

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श्वसन संस्थान में नाक, गला, श्वास नली, फैफड़े आदि अंग होते हैं। जिनके द्वारा खाँसी, जुकाम, काली खाँसी, दमा , (श्वास रोग) सीने में जकड़न, तपेदिक (टी.बी.) आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

१. एक गिलास दूध में आधा गिलास पानी, एक चम्मच पिसी हल्दी और २ चम्मच गुड़ मिलाकर इतना उबालें कि मात्र गिलास भर दूध शेष रह जाये।गुनगुना होने पर सेवन करेंगे तो रोग दूर हो जायेगा।

२. वयस्कों की पुरानी खाँसी के लिए २ ग्राम दालचीनी चूर्ण और ५ पिप्पली को २५० ग्राम दूध तथा २५० ग्राम पानी में डालकर इतना उबालें कि दूध ही रह जाये, फिर उस दूध को घूँट—घूँट करके सेवन करें । डाली गई पिप्पली को चबा—चबा कर खायें। दो—तीन सप्ताह में ही खांसी का रोग ठीक हो जायेगा।

जुकाम — १० ग्राम चिरौंजी की गिरी पीस कर गाय के एक चम्मच घी में छोंके फिर इसे एक गिलास दूध में उबाल लगायें। चुटकी भर इलायची और शक्कर मिलाकर गरम—गरम घूँट—घूँट पियें। दिन में दो बार लें, तो आपका जुकाम ठीक हो जायेगा।

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काली खाँसी :—

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१. दो लौंग तवें पर भून कर पीस कर जरा से गाय के दूध के साथ (१०० ग्राम) मिला कर दें तो खाँसी ठीक हो जायेगी।

२. दूध में घी डालकर पियें सूखी खाँसी ठीक हो जायेगी।

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दमा (श्वास रोग)

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उपचार — ५० ग्राम काली मिर्च और ५० ग्राम शुद्ध आँवला सार गंधक दोनों को बारीक पीस लें। इस चूर्ण को कपड़े में छानकर शीशी में भर लें। प्रतिदिन सुबह ४—४ ग्राम चूर्ण गाय के शुद्ध घी में मिलाकर सेवन करें। कुछ ही दिनों में आपका रोग दूर हो जावेगा। नोट— इस रोग में ठंडी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

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सीने में जकड़न

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इस रोग में घर्र—घर्र की आवाज, आवाज में भारीपन, नाक में सनसनाहट, माथे में हल्का दर्द, शरीर स्फूर्ति की कमी इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं।

उपचार — १०० ग्राम दूध में २०० ग्राम पानी, १० ग्राम सोठ, ५ ग्राम दालचीनी का चूर्ण डालकर पकायें कि काढ़े की मात्रा आधी (१५० ग्राम) रह जाये तो फिर इसे घूँट—घूँट करके पियें।

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वात रोग

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कमर दर्द — ५ ग्राम पोस्तदाना और ५ ग्राम मिश्री, दोनों को खूब कूटें और फिर बारीक पिसाई करके इसे गरम दूध के साथ सेवन करें। तीन—चार दिनों में आराम हो जायेगा।

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जोड़ों का दर्द (गठिया)

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गठिया दर्द मुख्यत: वायुवद्र्धक खान—पान के कारण होता है। इसके उपचार के लिए कुछ नुस्खे इस प्रकार हैं।

१. असली हींग पीसकर गाय के शुद्ध घी में मिलाकर दर्द वाले अंगों की मालिश करें।

२. जायफल का चूर्ण २ चुटकी और असगंध का चूर्ण ३ चुटकी दोनों को मिलाकर रोज प्रात: दूध के साथ सेवन करें।

नोट — १. गठिया के रोगी को नमक कम या फीका भोजन करना चाहिए, करेले की सब्जी खायें । तेज हवा और धूप से बचें।

२. दाना मैथी का प्रयोग भी लाभदायक होगा।

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सियाटिका का दर्द

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इसमें कूल्हे में दर्द होता है जो सियाटिका स्नायु से होता हुआ टखनों तक चला जाता है।

उपचार — सूखे तुलसी दल, मंजरी, असगंध, चोपचीनी, सौंठ तथा पीपरा मूल इन सबकी दस—दस ग्राम मात्रा लेकर कूटपीस कर चूर्ण बना लें। नित्य सुबह—शाम एक—एक चम्मच चूर्ण दूध के साथ सेवन करें तो शीघ्र ही इस रोग में लाभ मिलेगा।

नोट — आहार में केला, दही, आलू, अरबी, बाजरा, मूली, इमली, उडद, आचार इत्यादि वायु कारण चीजों का परित्याग करें कब्ज न होने दें। जैतून के तेल की मालिश करें (दर्द के स्थान पर)।

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धनुर्वात—अंगो का सुन्न हो जाना

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उपचार — त्रिकु, पीपल और चित्रक १०—१० ग्राम तथा बेल की जड़ ५ ग्राम लें। इन्हें ५०० ग्राम दूध में डालकर खूब उबालें । गुनगुना रहने पर छानकर सेवन करें। अंग शून्यता में अपूर्व लाभ होगा।

पक्षाघात:— गुड़ के शीरे में सोंठ, अजवायन, २५—२५ ग्राम (भूनने के बाद) मिलाकर सुबह—शाम चबा कर खायें, तथा ऊपर से धारोष्ण दूध पियें। पक्षाघात ग्रस्त अंग पर ८—१० साल पुराना गाय का घी गुनगुना करके मलें।

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सिर के रोग

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सिर के रोगों में मुख्यत: माईग्रेन (आधाशीशी दर्द) अनिद्रा, सिर में दर्द, स्नायु दौर्बल्य, उन्माद, मस्तिष्क भ्रम आदि रोग शामिल हैं। ये सभी रोग कमजोर मस्तिष्क की देन है।

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माइग्रेन (आधाशीशी)

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लक्षण इसमें सूर्योदय होने के साथ ही सिर के आधा भाग में दर्द शुरु हो जाता है । सर्दी लगना, चक्कर आना, मंदाग्नि होना, उल्टी होना इत्यादि लक्षण होते हैं।

उपचार — १. २५० ग्राम गाय के दूध में २५० ग्राम पानी मिलायें। अब ५ लौंग, ५ टुकड़े दालचीनी और २ टुकड़े पीपल तीनों को पीसकर दूध को इतना उबालें कि सिर्फ दूध ही रह जाये। फिर इसे छानकर गरम—गरम घूँट—घूँट करके पियें। सुबह—शाम लेने से २—३ दिनों में ही माइग्रेन ठीक हो जायेगा।

२. गाय का ताजा शुद्ध घी सुबह—शाम नाक से खींचने से नकसीर और माईग्रेन दोनों ठीक हो जाते हैं।

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अनिद्रा (नींद न आना)

उपचार — एक गिलास भैंस का दूध देर तक पकाकर गुनगुना पानी मिलाकर शाम को पीकर सोने से नींद अच्छी आती है।

नोट— रात्रि को सोने से पूर्व मानसिक आवेगों —चिंता, निराशा, शंका, भय आदि तथा कॉफी, तम्बाकू, मदिरा आदि पदार्थों से बचें।

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सिर दर्द

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उपचार:—

१. गाय के गरम दूध के साथ चुटकी भर फिटकरी भस्म और चुटकी भर सोना गेरू पीसकर सेवन करें। सिरदर्द दूर हो जायेगा।

२. धतूरे के २ बीज सादा पानी से निगल लें और ऊपर से एक गिलास गाय का दूध सेवन करें। पुराना सिर दर्द भी नियमित प्रयोग से १५—२० दिन में समाप्त हो जायेगा।

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स्नायु दौर्बल्य

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लक्षण:— जल्दी थकान, शारीरिक कमजोरी, मानसिक शिथिलता (नर्वस) अनुभव करना, भोजन में अरुचि, रक्ताल्पता, हृदय की धड़कनों में वृद्धि इत्यादि अन्य लक्षण भी स्नायु दौर्बल्य में दिखाई देते हैं।

उपचार:— पिस्ता, बादाम, किशमिश तीनों को १५—७—१५ लेकर कूट पीस कर मीठे दूध के साथ प्रतिदिन सुबह इस्तेमाल करें।

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उन्माद

उपचार — सर्पगंधा तथा जटामासी का चूर्ण ४—४ ग्राम लेकर २ ग्राम बूरा मिलाकर सुबह.शाम गाय के दूध के साथ सेवन करें)।

नोट:— भोजन में धारोष्ण दूध, ताजा घी, कच्चा नारियल आदि की अधिकता रखें, भरपूर नींद लेने दें। हल्के—हल्के कार्यों में रोगी को लगायें और ताजा हवा में सुबह शाम सैर करायें।

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मस्तिष्क भ्रम

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उपचार:— १. नित्य प्रति ५ खजूर खाकर एक गिलास गुनगुना दूध पियें। २. प्रतिदिन ब्राह्मी घृत लेकर चाटें और ऊपर से घूँट—घूँट (गाय का दूध) करके सेवन करें।

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आँख, नाक व कान के रोग

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आँखों पर सूजन और जलन

लक्षण:— पलके सूज जाती हैं आँखों पर रोशनी पड़ने पर अंधेरा लगता है । आँखों से पानी आना, पलकों के बाल कम होना, खुजली आदि लक्षण दिखाई देते है।

उपचार:— १. गरमी और धूल या धुयें के कारण हुई आँख की सूजन के लिए दूध में आधा पानी मिलाकर आँखों में छीटें दें।

२. गाय के दूध की मलाई या कच्चे दूध को फिटकरी से फाड़कर इसका पनीर लेकर आँखों पर बाँधें । आधे घंटे बाद पट्टी को खोल दें। दो दिन के प्रयोग से ही रोग दूर हो जायेगा। (जलन भी)।

३. यकृत विकार के कारण आँखों पर हुई सूजन के लिए २५० ग्राम दूध में १० ग्राम सोंठ और १५० ग्राम पानी डालकर उबालें । जब दूध रह जाये तो घूँट—घूँट सेवन करें। यकृत विकार दूर होने के साथ आँखों की सूजन उतर जायेगी। (जलन भी)

४. तुलसी और बेलपत्रों का रस समान मात्रा में लेकर गाय के दूध में मिलाकर कांसे के बर्तन में खूब घोंटे। काला पेस्ट हो जाने पर इसे काजल की तरह उपयोग करें। यह समस्त नेत्र रोगों में लाभकारी है।

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नाक से नकसीर आना

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उपचार — २०० ग्राम पानी में गाय के दूध से बने दही की लस्सी बनाकर फीकी रखें। उसमें एक ग्राम फिटकरी की भस्म पीसकर मिलायें और पी जायें। नकसीर ठीक हो जायेगी।

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कान का दर्द

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कान की समस्त बीमारियों में प्राय: समान कारण और लक्षण दिखाई देते हैं अत: इनकी चिकित्सा भी समान होती है। उपचार— १. आक के पीले पत्तों पर गाय का घी चुपड़ कर थोड़ा गरम करें। फिर इनका रस निकाल कर कान में डालने से कान के रोग दूर हो जाते हैं। २. मैल आदि होने पर कान में दर्द होता है तो गाय के दूध में आधा चम्मच गन्ने का रस का सिरका मिला कर दोनों कानों में टपका दें। थोड़ी देर बाद रूई से कान को साफ कर दें।

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गले के ऊपरी भाग के रोग

गले के ऊपरी भाग के रोग घेंघा (गलगंड) डिप्थीरिया, गंडमाला, मुखदाह इत्यादि हैं।

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घेंघा (गलगंड)

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कारण:— भोजन में आयोडीन की कमी से यह रोग होता है।

लक्षण:— गले की थायराइड ग्रंथि के बढ़ने से यह रोग प्रकट होता है। श्वांस लेने में कष्ट, सिर में दर्द, आवाज बैठना आदि लक्षण हैं। गले में कड़ी और फूली हुई गाँठ हो जाती है।

उपचार— एक गिलास दूध में १० ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर उबालें और नित्यप्रति सेवन करें। गलगंड रोग चला जायेगा।

नोट:— रोगी को प्रतिदिन पोष्टिक आहार दें। पीने को जौ का पानी दें। कब्ज से बचाव रखें।

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गंडमाला

उपचार— एक गिलास दूध में एक चम्मच एरंडी का तेल मिलाकर प्रति सप्ताह सेवन करें। गंडमाला में शीघ्र लाभ हो जायेगा।

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मुखदाह

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उपचार दूध में एक चुटकी कत्था घोलकर उससे गले के अंदर तक गरारे करें मुहँ के छाले दूर हो जायेंगे।

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त्वचा रोग

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प्राय: खून की खराबी के कारण त्वचा रोग होते हैं।

उपचार — नागपुरी संतरों के छिलके ५० ग्राम २५० ग्राम दूध में उबालकर छानकर नित्य सेवन करें। भोजन में नमक की मात्रा घटा दें। या शून्य कर दें । रक्त विकार दूर हो जायेगा।

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पित्ती उछलना

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उपचार — नियमित रूप से प्रात: आधा गिलास दूध में कतीरा गोंद कूटकर डालें और मिश्री डालकर सेवन करें। पित्ती ठीक हो जायेगी।