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अपंग किन्तु नोबल पुरस्कार

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अपंग किन्तु नोबल पुरस्कार, विजेता सेल्मा लागर लोफर

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बिना चर्चित कृतियां लिखकर साहित्य के क्षेत्र में अमर हो जाने वाली, सहृदय नारी सेल्मा लागर का जन्म १८५८ में स्वीडन के मारबाका नामक स्थान में हुआ। यह स्थान यार्मलौन क्षेत्र में है। उनका परिवार अच्छा संपन्न और प्रतिष्ठित वंश परम्परा में से था । पिता एरिफ लागर लोफ सेना में लेफ्टिनेण्ट थे तथा माता लोबिसा बालराथ स्वीडन के सचिव परिवार की पुत्री थी। सेल्मा के पिता एरिफ लागर लोफ खुश मिजाज और जिन्दा दिल व्यक्ति थे सेना से अवकाश प्राप्त कर वे प्राय: घर ही रहा करते और अपने बच्चों से घुल—मिल कर रहते थे। सेल्मा का पालन पोषण संपन्न और समृद्ध वंश परम्परा के अनुसार ही हुआ परन्तु नियति का प्रकोप उन पर साढ़े तीन वर्ष की आयु में ही हो गया। तब अचानक वे लकवे का शिकार हो गयीं।घर वालों द्वारा उपचार तथा चिकित्सा में जरा भी ढील न देने के कारण वे रोग मुक्त तो हो गयीं परन्तु उनका एक पैर हमेशा के लिए बेकार हो गया। पिता ऐरिफ लोफर ने ऐसे समय में अपूर्व सूझबूझ और धैर्य का परिचय दिया। उन्होंने सोचा कि सेल्मा इसी प्रकार रोती कलपती रही तो उसमें हीन भावना घर कर जाएगी। उसका व्यक्तित्व हमेशा के लिये कुण्ठा ग्रस्त बन जायेगा।सेल्मा को मानसिक त्राण से मुक्ति दिलाने के लिए कोई उपाय करना चाहिये। इसलिये उनके पिता ने बचपन में उनका बड़ा ध्यान रखा । इस बात के लिए निरन्तर सचेष्ट रहते कि सेल्मा अपनी बाधित अवस्था को लेकर चिंतित न हुआ करे। इसके लिए वे हर समय सेल्मा को व्यस्त रखते। कभी पिता कहानियाँ सुनाया करते तो कभी भाई चुटकुलों को सुनाकर हँसाया करते। उनकी दीदी भी अपनी पूर्वजों की कीर्तिगाथायें तथा लोककथायें सुनाकर सेल्मा का मनोरंजन करती रहतीं।

थोड़े दिनों बाद घर पर ही पढ़ने लिखने की व्यवस्था भी कर दी गई । ज्यों—ज्यों सेल्मा बड़ी होती गयी उनके मन पर से यह दुखदायी अनुभूति मिटने लगी कि मैं बाधित हूँ । घर में एक सुन्दर पुस्तकालय था। वहां बैठकर सेल्मा अपनी रूचि की पुस्तकों का स्वाध्याय करती रहती। इस प्रकार यह बाधित अवस्था उनके व्यक्तित्व के विकास में एक प्रकार से सहायक ही सिद्ध हुई और बचपन में ही उनका सामान्य ज्ञान अपनी वय के अन्य बच्चों की अपेक्षा काफी बढ़ गया ।घर में किसी बात की कमी तो थी नहीं। पिता तथा परिवार की सूझबूझ पूरी सजगता ने उन्हें सृजनात्मक दिशा दी तो उनका व्यक्तित्व विकासोन्मुख हो उठा । पुस्तकालय में कई ग्रन्थों का स्वाध्याय और उससे अर्जित ज्ञानराशि ने व्यक्तित्व को तो परिर्माजित किया ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए भी प्रेरित किया । अपनी बाल्यकाल की अनुभूतियों को उन्होंने मारवाका नामक रचना में बखूबी चित्रित किया है। उनमें जब लिखने की प्रेरणा उठी तो उन्होंने सबसे पहले एक कहानी के लिये कलम चलायी। इस कहानी का आधार बचपन में पिता से सुनी एक कहानी थी। जिसका नायक प्रभावशाली व्यक्तित्व के लिए आवश्यक सभी विशेषताओं से सम्पन्न था। परन्तु नायक में एक बहुत बड़ी शारीरिक त्रुटि (कमी) थी। जिसके लिये पाठक के हृदय में सहानुभूति भी नहीं उमड़ती। इस कहानी को पढ़ कर अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके पिता अपनी बेटी को सुनाने के लिए किस तरह की कहानियों का चयन करते थे और इस बात का कितना ध्यान रखते थे कि सेल्मा स्वयं को ही अकेली बाधित न समझे और भी लोग उस प्रकार की उससे भी भीषण परिस्थितियों में रहे हैं तथा शान से जिये हैं। उनकी शिक्षा दीक्षा का क्रम तो घर पर ही चला। पर स्वावलम्बी बनने के उद्देश्य से उनके पिता ने अध्यापन का प्रशिक्षण दिलवाया । अध्यापिका का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वे लैंड कौना नगर में अध्ययन कार्य करने लगी। वहां स्कूल के बाद जो समय मिलता उसे लिखने में लगाती। जिस समय वे प्राध्यापिका नियुक्त हुई। तब उनकी आयु मात्र २२ वर्ष थी। यह उल्लेखनीय इसलिए है कि बाधित होते हुए भी उनके पिता ने अपनी बेटी में किस प्रकार आत्मविश्वास का संचार कर दिया था कि उनका विकास सामान्य रूप से होता चला गया। उत्तरी स्वीडन के लैंड़ कोना नगर में बच्चों के साथ रहते हुये उन्हें बाल मनोविज्ञान के अध्ययन का भी अवसर मिला और उन्हें बच्चों की कहानी विषयक उत्सुकता का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ । और उन्होंने कहानी सम्बन्धी मसाला जुटाना शुरु किया। वार्मलैंड तथा डेस्कोरिया क्षेत्र में प्रचलित लोककथाओं तथा ग्राम गीतों का उन्होंने अध्ययन किया और संकलन भी।


प्रो.डॉ. वन्दना जैन