ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अपरिग्रह :

यो ममायितमिंत जहाति, स त्यजति ममायितम्।

स खलु: दृष्टपथ: मुनि:, यस्य नास्ति ममायितम्।।

—समणसुत्त : १४२

जो परिग्रह की बुद्धि का त्याग करता है, वही परिग्रह को त्याग सकता है। जिसके पास परिग्रह नहीं है, उसी मुनि ने पथ को देखा है।

ग्रंथत्याग: इन्द्रिय—निवारणे, अंकुश इव हस्तिन:।

नगरस्य खातिका इव च, इन्द्रियगुप्ति: असंगत्वम्।।

—समणसुत्त : १४६

जैसे हाथी को वश में रखने के लिए अंकुश होता है और नगर की रक्षा के लिए खाई होती है, वैसे ही इन्द्रिय—निवारण के लिए परिग्रह का त्याग (कहा गया) है। असंगत्व (परिग्रह—त्याग) से इन्द्रियां वश में होती है।

होऊण य णिस्संगो, णियभावं णिग्गहित्तु सुहदुहदं।

णिद्दंदेण दु वट्टदि, अणयारो तस्सऽिंकचण्हं।।

—बारह अणुवेक्खा : ७९

जो साधक सभी प्रकार के परिग्रह का त्याग कर नि:संग हो जाता है, अपने सुखद व दु:खद भावों का निग्रह करके निद्र्वंद्व विचरता है, उसे आिंकचन्य धर्म होता है, अर्थात् वह नितान्त अपरिग्रह—वृत्ति वाला होता है।