ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अब तो बंद हो मांस का निर्यात

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अब तो बंद हो मांस का निर्यात

सृष्टि के प्रारम्भ से ही भारत अहिंसा प्रधान देश रहा है। इस पावन धरती के कण—कण में करुणा—दया—सहिष्णुता—मानवीयता समाई हुई है। प्राचीन इतिहास के पन्ने उन महापुरुषों की गाथाओं से भरे पड़े हैं जिन्होंने प्राणी मात्र की रक्षा के लिए जीवन पर्यन्त जन—जन को उद्बोधन—प्रेरित और खुद को सर्मिपत कर दिया। त्याग, बलिदान और संयम के बल पर प्राणियों के जीवनदान हेतु न जाने कितनी महान आत्माएँ अब तक संसार से विलुप्त हो चुकी। गर्व की बात यह है कि भलें ही देश २१वीं सदी की आधुनिकतम सोच के साथ आगे बढ़ रहा है परन्तु भारत की संस्कृति आज भी उसी दया व करुणा के बल पर जानी व पहचानी जाती है। भारत का गौरव तब तक सुरक्षित है, जब तक इस देश के लोगों के हृदय में अहिंसा, करुणा व दया का स्रोत विद्यमान है। धर्म का समूचा आधार ही अहिंसा व करुणा में समाया हुआ है। सभी धर्मों की पहचान दया—करुणा पर ही आधारित है। सच कहूं तो मनुष्य के जीवन में यदि दया—करुणा—अहिंसा की भावनाएँ विद्यमान नहीं तो फिर वह मानव कहलाने का अधिकारी हो नहीं सकता। करुणा हमारी माँ है, माँ से जुदा व्यक्ति फिर दानव ही हो सकता है। यह बेहद अफसोस का पहलू है कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने जिस भारत को अहिंसा के बल पर आजादी दिलाई, आज उसी भारत की धरा पर हर वर्ष पशु हिंसा का तांड़व निरन्त बढ़ रहा है। शासक कोई भी रहे लेकिन उन्होंने उन मूक प्राणियों के व्रंदन को अपने भीतर अनुभव नहीं किया जिनका यांत्रिक कत्लखानों में बहुत व्रूरता के साथ कत्लेआम हो रहा है। खून की नदियाँ बह रही हैं और उनकी चीत्कार से प्रकृति कांप रहीं है। उसके अनेक भयावह स्वरूप विभिन्न रूपों में कई बार सामने आते रहे, आ रहे, लेकिन आँखों पर काला चश्मा लगाए बैठे संवेदनशील व हृदयहीन सत्ताधीशों और उनके स्वार्थी हुक्मरानों को कुछ नजर नहीं आया। उसी का दुष्परिणाम है कि अहिंसा प्रधान देश भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा मीट एक्सपोर्ट व्यवसाय का प्रमुख केन्द्र बन गया। प्रतिदिन लाखों पशु—पक्षी खून और मांस के चटखोरों के लिए तड़फा—तड़फा कर मारे जा रहे हैं। धरती रक्त रंजित हो रही है और हुक्मरान राक्षसों की तरह ठहाके लगाते रहे हैं। नेता जेब भरते रहे हैं। ऐसी विकट स्थिति में यह शुभ संकेत है कि पहली बार देश की सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ हिन्दुवादी सोच और भारतीय संस्कृति की खुली पैरोकरी करने वाली पार्टी काबिज हुई है। इससे पहले सत्ता में बहुत वर्षों तक जिन लोगों का वर्चस्व बना रहा, कहने को वे अपने को ‘गाँधी’ के अनुयाई कहलाते रहे मगर उनकी कथनी करनी में अंतर इतना बढ़ता गया कि माँस के कारोबारी पनपते चले गए। जब सत्ता में बैठे बड़े—बड़े लोग और उनके ‘आका’ ही खुद मांसाहारी हो, तब अहिंसा, दया, करुणा का महत्त्व वे क्या समझ पाएंगे। यह गौरव करने योग्य बात है कि इस बार देश को धरती से जुड़ा एक साधारण और पूर्ण शाकाहारी व्यक्ति, प्रधानमंत्री के रूप में मिला है। उनका यह पहला कदम बहुत सराहनीय व अनुकरणीय है जिसमें उन्होंने अपने सभी सरकारी भोजों में ‘मांसाहार’ को पूर्णतया प्रतिबंधित कर दिया और शाकाहारी भोजन को ही प्राथमिकता देने के आदेश दिए। निश्चित ही उनकी इस साहसिक पहल से देश के उन करोड़ों लोगों को बहुत खुशी अन्तर से हुई है जो जीव दया व करुणा के पक्षधर है। स्वर्ग में बैठे पूज्य ‘बापू’ भी पहली बार ऐसी करुणा भावना देख जरूर मुस्कराए होंगे और आशीष भी दी होगी। अहिंसा विचारधारा के पोषक मोदी से देश के शाकाहारी लोगों को अब बहुत अपेक्षाएँ हैं जिस पर उन्हें खरा उतरने के लिए ‘अंगद की तरह पांव रोपने ही होंगे। मांस का निर्यात जिस तीव्र गति से बढ़ा है, उस तथ्य से वे भी भली प्रकार वाकिफ हैं। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि अब दुधारू पशु लगातार कम होते जा रहे हैंं गर्भवती भैंसे व गायों तक का बहुत व्रूरता से कत्ल हो रहा है। पशु धन कम होने से पूरे देश में नकली व मिलावटी घी—दूध का धंधा इतना बढ़ चुका कि लाखों लोग भिन्न—भिन्न तरह की घातक बीमारियों से ग्रस्त हैं। कई चिकित्सकीय व जाँच विशेषज्ञों की शोध रिपोर्टस् से यह बात पूरी तरह प्रमाणित हो चुकी है कि मिलावटी दूध व घी जानलेवा सिद्ध हो रहा है। जब दुधारु पशु ही नहीं रहेंगे, फिर दूध कहां से आएगा ? एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत में जितनी मांस की आर्पूित हो रही है, उससे नब्बे गुना से भी अधिक मांस विदेशों को निर्यात हो रहा है। यानी विदेशी मुल्कों की र्पूित के लिए भारत के निरीह मूक प्राणी पर लगातार खंजर चल रहे हैं। मीट व्यवसाइयों को पिछली हुकूमत के लोगों ने इतनी भारी छूट, सब्सिड़ी व सुविधाएँ प्रदान कर रखी है जिसके कारण मांस निर्यात का धंधा पिछले दस वर्षों में ही सौ गुना अधिक हो गया। नए—नए यांत्रिक कत्लखानों की संख्या बढ़ती चली गई। डिब्बा बंद मांस दुनिया भर में सप्लाई हो रहा है और खाल व हड्डियों के व्यवसाय में निरंतर वृद्धि हो रही है। अब गाय—भैंस—पाड़े—बछड़े ही नहीं वरन् ऊँट—भेड़ बकरी—घोड़े मोर—कबूतर—चिड़िया जैसी छोटे—छोटे पक्षियों को भी मारा जा रहा है। स्वार्थी तत्त्वों ने ‘नील गाय’ जैसी शाकाहारी वन्य प्राणी को भी नहीं बख्शा और वह भी खाल—मांस के लालच में शिकारियों की भेंट चढ़ती जा रही है। हकीकत में अब तक मूक पशुओं का व्रंदन किसी सरकार व उनके आकाओं ने नहीं सुना लेकिन अब भारत को अपनी पावन संस्कृति की रक्षा के लिए तुरन्त प्रभाव से कम से कम मांस निर्यात व पशु वध पर रोक लगाने में प्रभावी पहल करनी चाहिए। मेरा ऐसा मानना है कि लाखों—करोड़ों पशुओं की इससे प्राण रक्षा होगी ओर उनकी आशीष सरकार के लिए बहुत बड़ी दुआ का काम करेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए यह अग्नि परीक्षा का वक्त है क्योंकि मीट एक्सपोर्ट माफिया बहुत ताकतवर बन चुका है। वह सत्ता की ऊँचाईयों तक अपना असर रखता आया है। साम—दाम—दण्ड—भेद की नीति पर यह मीट लॉबी सांसदों व मंत्रियों को भी जेब में रखती रही है लेक्निा अब एक सच्चा व करुणावन सपूत सत्ता के शीर्षस्थ िंसहासन पर विराजित हो चुका, तब उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने भारत की धरती से मांस निर्यात के व्रूर धंधे को अब नहीं होने देंगे। चंद चांदी के टुकड़ों (विदेशी मुद्रा) के लिए हमें किसी भी सूरत में अपने पशु धन का वध स्वीकार नहीं होना चाहिए। काश! वह दिन भी आए, जब भारत में संचालित यांत्रिक व अन्य सभी छोटे—बड़े कत्लखानों पर प्रतिबंध लगे और उनकी सब्सिड़ी बंद हो। फिर रसोई गैस पर सब्सिडी भी खत्म करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यूं भी अभयदान से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। उसका सबसे बड़ा हित व लाभ फिर यह होगा कि भारत की वसुधा अपने गौरव को पुन: हासिल कर पाएगी। राम राज्य का सपना साकार होने का श्रीगणेश इस लिहाज से होगा कि फिर किसी भी जीव की हत्या नहीं वरन् उन्हें जीवनदान मिलेगा। हकीकत में दूध—दही की नदियाँ बहने लगेगी। मिलावट पर भी अंकुश लगेगा। पशु धन की सुरक्षा ही तो भारत का मूल प्राण हैं। प्रधानमंत्री मोदी व उनकी सरकार को जाग्रत करने के लिए आम जनता, खासकर सभी अहिंसक, शाकाहारी जीव दया के पक्षधरों को अपने अपने स्तर या सामूहिक रूप से एकजुट होकर मांस निर्यात व पशु वध पर रोक व उन्हें दी जा रही सुविधाओं, सब्सिडी को बंद कराने के लिए अपनी आवाज बुलन्द करनी चाहिए। याद रहे—किसी की प्राण रक्षा के लिए उठाई गई आवाज व कदम १०० यज्ञों के पुण्य से भी बढ़कर है।


श्री अमर भारती अक्टूबर २०१४