ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अभक्ष्य

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अभक्ष्य

विजय-अभक्ष्य किसे कहते हैं ?
संजय-सुनो! हमें जैसा महाराज जी ने बतलाया है, वैसा ही बतलाता हूँ। जो पदार्थ भक्षण करने अर्थात् खाने योग्य नहीं होते हैं उन्हें अभक्ष्य कहते हैं। इनके पाँच भेद हैं-त्रस हसाकारक, बहुस्थावर हसाकारक, प्रमादकारक, अनिष्ट और अनुपसेव्य।
(१) जिस पदार्थ के खाने से त्रस जीवों का घात होता है, उसे त्रस हसाकारक अभक्ष्य कहते हैं। जैसे-पंच उदुम्बर फल, घुना अन्न, अमर्यादित वस्तु जिनमें बरसात में फपूâन्दी लग जाती है ऐसी कोई भी खाने की चीजें, चौबीस घंटे के बाद का मुरब्बा, अचार, बड़ी, पापड़ और द्विदल आदि के खाने से त्रस जीवों का घात होता है। कच्चे दूध में या कच्चे दूध से बने हुए दही में दो दाल वाले मूंग, उड़द, चना आदि अन्न की बनी चीज मिलाने से द्विदल बनता है।
(२) जिस पदार्थ के खाने से अनन्त स्थावर जीवों का घात होता है, उसे स्थावर हसाकारक अभक्ष्य कहते हैं। जैसे-प्याज, लहसुन, आलू, मूली आदि कन्दमूल तथा तुच्छ फल खाने से अनंतों स्थावर जीवों का घात हो जाता है।
एक निगोदिया जीव के शरीर में अनंतानंत सिद्धों से भी अनंतगुणे जीव रहते हैं१ और एक आलू आदि में अनंत निगोदिया जीव हैं। इसलिये इन कन्दमूल आदि का त्याग कर देना चाहिए।
(३) जिसके खाने से प्रमाद या कामविकार बढ़ता है, वे प्रमादकारक अभक्ष्य हैं। जैसे शराब, भंग, तम्बावूâ, गांजा और अफीम आदि नशीली चीजें। ये स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हैं।
(४) जो पदार्थ भक्ष्य होने पर भी अपने लिए हितकर न हों, वे अनिष्ट हैं। जैसे बुखार वाले को हलुवा एवं जुखाम वाले को ठण्डी चीजें हितकर नहीं हैं।
(५) जो पदार्थ सेवन करने योग्य न हों, वे अनुपसेव्य हैं। जैसे-लार, मूत्र आदि पदार्थ।
अभक्ष्य बाईस भी माने गये हैं-
ओला घोर बड़ा निशि भोजन, बहुबीजा बैंगन संधान।
बड़ पीपर ऊमर कठऊमर, पाकर फल या होय अजान।।
वंदमूल माटी विष आमिष, मधु माखन अरु मदिरापान।
फल अतितुच्छ तुषार चलित रस, ये बाईस अभक्ष्य बखान।।
ओला, दही बड़ा (कच्चे दूध से जमाये दही का बड़ा), रात्रि भोजन, बहुबीजा, बैंगन, अचार (चौबीस घण्टे बाद का) बड़, पीपल, ऊमर, कठूमर, पाकर, अंजानफल, (जिसको हम पहचानते नहीं, ऐसे कोई फल-पूâल-पत्ते आदि), वंâदमूल (मूली, गाजर, आदि जमीन के भीतर लगने वाले), मिट्टी, विष (शंखिया, धतूरा आदि), आमिष-मांस, शहद, मक्खन, मदिरा, अतितुच्छ फल (जिसमें बीज नहीं पड़े हों, ऐसे बिल्कुल कच्चे छोटे-छोटे फल) तुषार-बर्पâ और चलित रस (जिनका स्वाद बिगड़ जाये, ऐसे फटे हुये दूध आदि) ये सब अभक्ष्य हैं।
विजय-मक्खन से तो घी बनता है, वह अभक्ष्य वैâसे है ?
संजय-दही बिलौने के बाद मक्खन को निकालकर ४८ मिनट के अंदर ही गर्म कर लेना चाहिये, अन्यथा वह अभक्ष्य हो जाता है। अथवा कच्चे दूध से भी जो यन्त्र से मक्खन निकाला जाता है, उसमें भी कच्चे दूध की मर्यादा के अन्दर मक्खन निकालकर जल्दी से गर्म करके घी बना लेना चाहिये।
बाजार की बनी हुई चीजों में मर्यादा आदि का विवेक न रहने से, अनछने जल आदि से बनाई होने से वे सब अभक्ष्य हैं। अर्वâ, आसव, शर्बत आदि भी अभक्ष्य हैं। चमड़े में रखे घी, हींग, पानी आदि भी अभक्ष्य हैं। इसलिए इन अभक्ष्यों का त्याग कर देना चाहिये।

प्रश्नावली-(१) अभक्ष्य के कितने भेद हैं?
(२) किन-किन अभक्ष्यों में त्रस हसा होती है ?
(३) स्थावर हसाकारक और अनुपसेव्य वस्तुओं के कुछ नाम गिनाओ?
(४) बाईस अभक्ष्यों के नाम गिनाओ?
(५) मक्खन अभक्ष्य वैसे है ?