ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अभय :

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अभय :

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जे ण कुणइ अवराहे, णो णिस्संको दु जणवए भमदि।
—समयसार : ३०२

जो किसी प्रकार का अपराध नहीं करता, वह निर्भय होकर जनपद में भ्रमण कर सकता है। इसी प्रकार निरपराध (निर्दोष) आत्मा (पाप नहीं करने वाला) भी सर्वत्र निर्भय होकर विचरता है।

संवेगजनितकरणा:, नि:शल्या मन्दर इव निष्कम्पा:।

यस्य दृढ़ा जिनभक्ति:, तस्य भयं नास्ति संसारे।।

—समणसुत्त : ३०७

जिसके हृदय में संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न करने वाली, शल्य रहित तथा मेरुवत् निष्कम्प और दृढ़ जिनभक्ति है, उसे संसार में किसी तरह का भय नहीं है।

अभयं पत्थिवा! तुब्भं , अभयदाया भवाहि य।
—समणसुत्त : १५९
हे पार्थिव ! तुझे अभय है। तू भी अभयदाता हो !

यत् क्रियते परिरक्षा, नित्यं मरणभयभीरुजीवानाम्।
तद् जानीहि अभयदानम् , शिखामणिं सर्वदानानाम्।।

—समणसुत्त : ३३५

सदैव मृत्यु से भयभीत जीवों की रक्षा करने को ही अभयदान जानो ! अभयदान सभी दानों में शिरोमणि है।