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ॐ ह्रीं जन्म-तप कल्याणक प्राप्ताय श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय नमः |

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अभियान :

पुरिसा जे गुणरहिया कुलेण गव्वं वहंति ते मूढा।

वंसुप्पण्णं पि धणू गुणरहियं भणह किं कुणइ।।

—गाहारयण कोष: ९८

वे पुरुष मूर्ख हैं, जो गुणरहित होते हुए भी कुल का अभिमान करते हैं, उत्तम बांस से बना हुआ धनुष यदि गुण (रस्सी) रहित है जो कहो वह क्या कर सकता है ?