ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अभ्यंतर व बाह्य परिग्रह

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अभ्यंतर व बाह्य परिग्रह

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पाक्षिक प्रतिक्रमण पाठ में—अभ्यंतर परिग्रह में श्री गौतमस्वामी ने आठ कर्म के ८ भेद कहे है—पुनः बाह्य- परिग्रह के अनेक भेद कहे हैं। यथा—

अहावरे पंचमे महव्वदे परिग्गहादो वेरमणं, सो वि परिग्गहो दुविहो, अब्भंतरो बाहिरो चेदि तत्थ अब्भंतरो परिग्गहो णाणवरणीयं दंसणावरणीयं वेयणीयं मोहणीयं आउग्गं णामं गोदं अंतरायं चेदि अट्ठविहो, तत्थ बाहिरो परिग्गहो उवयरणभंड-फलह-पीढ-कमंडलु-संथार-सेज्ज-उवसेज्ज-भत्त-पाणादिभेएण अणेयविहो, एदेण परिग्गहेण अट्ठविहं कम्मरयं बद्धं बद्धावियं बद्धज्जंतं पि समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं।।५।।

पद्यानुवाद (गणिनी ज्ञानमती)
अब अन्य पांचवे महाव्रत में, परिग्रह रखने से विरती है।

वह परिग्रह अभ्यंतर व बाह्य से द्विविध तथा अभ्यंतर में।।
वो ज्ञानावरणी दर्शनावरण वेदनीय मोहनी आयु कहे।
पुनि नाम गोत्र अरु अन्तराय ये अठविध अंतर परिग्रह हैं।।
बाहिर परिग्रह उपकरण शास्त्र पिच्छी व भांड फलक आसन।
कमंडलु संस्तर काठ व तृण वसती व देवकुल आदि ग्रहण।
भोजनपानादिक भेदों से बहुविध परिग्रह के लेने में।
जो अठविध कर्मों को मैंने बांधा है आज्ञानादी से।
पर को भी बंध कराया हो या करते को अनुमति दी हो।
जो परिग्रह त्याग में दोष किये, वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।५।।

मूलाचार में अभ्यन्तर परिग्रह के १४ भेद एवं बाह्य परिग्रह के १० भेद बताए हैं— अभ्यन्तरस्य व्युत्सर्ग भेदप्रतिपादनार्थमाह—

मिच्छत्तवेदरागा तहेव हस्सादिया य छद्दोसा।
चत्तारि तह कसाया चोद्दस अब्भंतरा गंथा।।४०७।।

अभ्यन्तर व्युत्सर्ग का वर्णन करते हैं— गाथार्थ — मिथ्यात्व, तीन वेद, हास्य आदि छह दोष और चार कषायें ये चौदह अभ्यन्तर परिग्रह हैं।।४०७।।

आचारवृत्ति — मिथ्यात्व, स्त्रीवेद, पुरुष वेद, नपुंसक वेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, क्रोध, मान, माया और लोभ ये चौदह अभ्यन्तर परिग्रह हैं। इनका परित्याग करना अभ्यन्तर व्युत्सर्ग है। बाह्यव्युत्सर्गभेद प्रतिपादनार्थमाह—

खेत्तं वत्थु धणधण्णगदं दुपदचदुप्पदगदं च।
जाणसयणासणाणि य कुप्पे भंडेसु दस होंति।।४०८।।

बाह्य व्युत्सर्ग भेद का प्रतिपादन करते हैं— गाथार्थ — क्षेत्र, वास्तु, धन, धान्य, द्विपद, चतुष्पद, यान, शयन-आसन, कुप्य और भांड ये दश परिग्रह होते हैं।।४०८।।

आचारवृत्ति — धान्य आदि की उत्पत्ति के स्थान को क्षेत्र—खेत कहते हैं। घर, महल आदि वास्तु हैं। सोना, चाँदी आदि द्रव्य धन है। शालि, जौ, गेहूं आदि धान्य हैं। दासी, दास आदि द्विपद हैं। गाय, भैंस, बकरी आदि चतुष्पद हैं। वाहन आदि यान हैं। पलंग, िंसहासन आदि शयन-आसन हैं। कपास आदि कुप्य कहलाते है।। और हींग, मिर्च आदि को भांड कहते हैं। ये बाह्य परिग्रह दश प्रकार के हैं, इनका त्याग करना बाह्य व्युत्सर्ग है। ज्ञानार्णव में अभ्यंतर परिग्रह के १४ भेद एवं बाह्य परिग्रह के १० भेद कहे हैं—

दश ग्रन्था मता बाह्या अन्तरङ्गाश्चतुर्दश।
तान्मुक्त्वा भव निःसंगो भावशुद्ध्या भृशं मुने।।३।।

अर्थ — बाहर के परिग्रह तो दश हैं और अन्तरंग के परिग्रह चौदह हैं, सो हे मुने! इन दोनों प्रकार के परिग्रहों को छोड़कर अत्यन्त निःसंग (निष्परिग्रहरूप) होओ, यह उपदेश है।।३।।

वास्तु क्षेत्रं धनं धान्यं द्विपदाश्च चतुष्पदाः।
शयनासनयानं च कुप्यं भाण्डममी दश।।४।।

अर्थ — वास्तु (घर), क्षेत्र (खेत), धन, धान्य, द्विपद (मनुष्य) चतुष्पद (पशु, हाथी, घोड़े), शयनासन, यान, कुप्य और भांड ये बाहर के दश परिग्रह हैं।।४।। उत्तं च ग्रन्थान्तरे— आर्या—

‘‘मिथ्यात्ववेदरागा दोषा हास्यादयोऽपि षट् चैव।
चत्वारश्च कषायाश्चतुर्दशाभ्यन्तरा ग्रन्थाः।।१।।

अर्थ — मिथ्यात्व १, वेदराग ३, हास्यादिक ६, (हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा) और क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार कषाय, इस प्रकार अन्तरंग के चौदह परिग्रह हैं।।१।।’’