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डिप्लोमा इन जैनोलोजी कोर्स का अध्ययन परमपूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा प्रातः 6 बजे से 7 बजे तक प्रतिदिन पारस चैनल के माध्यम से कराया जा रहा है, अतः आप सभी अध्ययन हेतु सुबह 6 से 7 बजे तक पारस चैनल अवश्य देखें|

१८ अप्रैल से २३ अप्रैल तक मांगीतुंगी सिद्धक्ष्रेत्र ऋषभदेव पुरम में इन्द्रध्वज मंडल विधान आयोजित किया गया है |

२५ अप्रैल प्रातः ६:४० से पारस चैनल पर पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी के द्वारा षट्खण्डागम ग्रंथ का सार प्रसारित होगा |

अलोक :

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अलोक :

जीवाश्चैव अजीवाश्च, एष लोको व्याख्यात:।

अजीवदेश आकाश: अलोक: स व्याख्यात:।।

—समणसुत्त : ६३६

यह लोक जीव और अजीवमय कहा गया है। जहाँ अजीव का एक देश (भाग) केवल आकाश पाया जाता है, उसे अलोक कहते हैं।

अवियारिऊण कज्जं सहसच्चिय चे नरा पयट्टन्ति।

डज्झंति तेवराधा, दीवसिहाय पयंगो व्व।।

—गाहारयण : २५३

अविचारपूर्वक आवेश में सहसा जो काम करते हैं, वे दीपशिखा में पतंगे की तरह जल जाते हैं।