ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अलौकिक मान

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अलौकिक मान

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अलौकिक मान के चार भेद है-
१. द्रव्यमान
२. क्षेत्रमान
३. कालमान
४. भावमान
द्रव्यमान के दो भेद हैं-
१. संख्यमान २.उपमामान
संख्यामान के तीन भेद हैं - संख्यात,असंख्यात,अनन्त
संख्यात के तीन भेद हैं-जघन्य,मध्यम और उत्कृष्ट |
असंख्यात तीन प्रकार का हैं

१.परीतासंख्यात

२.युक्तासंख्यात

३.असंख्यातासंख्यात

प्रत्येकके जघन्य,मध्यम और उत्कृष्ट भेद होनेसे नौ प्रकारका हैं |

अनन्त भी तीन प्रकारका हैं-

१.परीतानंत

२.युक्तानंत

३.अनंतानंत

प्रत्येक के जघन्य मध्यम और उत्कृष्ट भेद होनेसे नौ प्रकारका हैं |

इस प्रकार संख्यात असंख्यात और अनन्त के भेद मिलाने पर इक्कीस भेद होते हैं |

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संख्यात का विवरण

जघन्य संख्यात दो (२) की संख्या हैं |

क्योंकि एकसे गुणा करनेपर या एक का भाग देने पर न वृद्धि होती है और न हानि होती है| अत: भेद का ग्राहक होने से दो की संख्या को ही जघन्य संख्यात माना है| तीन आदि मध्यम संख्यात है और एक कम जघन्य परितासंख्यात उत्कृष्ट संख्यात का प्रमाण है

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जघन्य परितासंख्यात प्रमाण-

अनवस्था, शलाका,प्रतिशलाका और महाशलाका नाम के चार कुण्डों की कल्पना करें |

प्रत्येक कुण्ड का प्रमाण योजन से एक लाख योजन का व्यास और एक हजार योजन की गहराई को लिए हुए जम्बूद्वीप के प्रमाण हो |

इस प्रथम अनवस्था कुण्ड को सरसों से मुख तक भरने के बाद उसके ऊपर आकाश में जितनी ऊँचाई तक वह भरा जा सकता हो, भरने पर समस्त सरसों का प्रमाण - एक हजार नौ सौ सत्तानवे कोटि कोटि कोटि कोटि कोटि कोटि कोटि, ग्यारह लाख उनतीस हजार तीन सौ चौरासी कोटि कोटि कोटि कोटि कोटि, इक्यावन लाख इकतीस हजार छह सौ छत्तीस कोटि कोटि कोटि कोटि, छत्तीस लाख छत्तीस हजार तीन सौ त्रेसठ कोटि कोटि कोटि, तरेसठ लाख तरेसठ हजार छह सौ छत्तीस कोटि कोटि, छत्तीस लाख छत्तीस हजार तीनसौ तरेसठ कोटि, तरेसठ लाख तरेसठ हजार छह सौ छत्तीस तथा चार बटे ग्यारह,(१९९७,११२९३८४, ५१३१३३६, ३६३६३६३, ६३६३६३६, ३६३६३६३, ६३६३६३६ ४/११ होता है | इस प्रकार शिखा तक अनवस्था के एक बार भरने पर शलाका कुण्ड में एक सरसों डाल दे |उस अनवस्था कुण्ड की सरसों को मनुष्य अपनी बुद्धी के द्वारा अथवा देव ग्रहण करके जम्बूद्वीप से लेकर प्रत्येक द्वीप और समुद्र में एक-एक सरसों क्षेपण करे | ऐसा करने पर जिस द्वीप या समुद्र में सरसों समाप्त हों ,उतने द्वीप समुद्रो के सूची व्यास प्रमाण चौड़ा तथा एक हजार योजन गहरा दूसरा अनवस्था कुण्ड करके उसे भी पूर्ववत् शिखा पर्यंत सरसों से भरकर शलाका कुण्ड में दूसरी बार एक सरसों क्षेपण करें | उस कुण्ड के सरसों को उससे आगे के द्वीपसमुद्रो में एक-एक सरसों क्षेपण करने पर जिस द्वीप या समुद्र वे सरसों समाप्त हों, वहां तक के समस्त पूर्व द्वीप समुद्रो के व्यास प्रमाण चौड़ा और एक हजार योजन गहरा तीसरा अनवस्था कुण्ड करके उसे शिखा तक सरसों से भरकर पूर्वोक्त शलाका कुण्ड में तीसरी बार एक सरसों क्षेपण करे | पुनः उसी प्रकार करे | इस क्रम से पूर्वोक्त एक नौ (१९९७,............)आदि अंको की संख्यामात्र अनवस्था कुन्ड़ो के होने पर शलाका कुण्ड शिखा पर्यन्त भरता हैं |

शलाका कुण्ड के भरने पर प्रतिशलाका कुण्ड में एक सरसों क्षेपण करें | पुनः शलाका कुण्ड को खाली करके उसी तरह अनवस्था कुण्ड के द्वारा उसे भरना चाहिए|उक्त एक नौ (१९९७ ........) आदि अंक प्रमाण अनवस्थाकुन्डो के होने पर शलाका कुण्ड भरता है|उसके भरने पर प्रतिशलाका कुण्ड में पुनः एक सरसों क्षेपण करें | इस प्रकार क्रम से एक नौ ( १९९७ ..........) आदि अंको के वर्ग प्रमाण अनवस्था कुण्डो के होने पर प्रतिशलाका कुण्ड भी भर जाता हैं | प्रतिशलाका कुण्ड के भरने पर महाशलाका कुण्ड में अन्य सरसों क्षेपण करें |

इस तरह एक नौ ( १९९७ .........) आदि अंको के घन प्रमाण अनवस्था कुण्डो के होने पर महाशलाका कुण्ड भी भर जाता है |

महाशलाका कुण्ड के भरने पर पहले के प्रतिशलाका, शलाका, और अनवस्थाकुण्ड भी भर जाते हैं | उस समय अन्तिम अनवस्था कुण्ड में जितनी सरसों समाती है , उनके प्रमाण में एक कम करने पर उत्कृष्ट संख्यात होता है | उसकी संदृष्टि(१५ ) है |

उत्कृष्ट संख्यात = जघन्य परितासंख्यात - एक (१ ) अन्तिम अनवस्थाकुण्ड की सम्पूर्ण सरसों का जितना प्रमाण है ,उतना ही जघन्य परितासंख्यात का प्रमाण है | उसकी संदृष्टि १६ है | जघन्य परितासंख्यात के ऊपर एक एक बढते हुए क्रम से एक कम उत्क्रष्ट परितासंख्यात पर्यंत मध्यम परितासंख्यात के विकल्प (भेद) होते हैं |