ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

अल्पबहुत्वानुगम प्रकरण

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


विषय सूची

[सम्पादन]
अल्पबहुत्वानुगम प्रकरण

Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg
Efsef.jpg


अथ अल्पबहुत्वानुगम:

अथ पंचमो महाधिकार:
अद्यतनात् चतुर्दिवसोन-द्वाविंशत्यधिक-पंचविंशतिशतानि वर्षाणि पूर्वं पावापुरीसरोवरमध्यात् य: सिद्धिपदमाप, तदैव तन्निमित्तेन इन्द्रादिभि: तस्यामेव निशि दीपमालिका: प्रज्ज्वाल्य सर्वदिक्षु उद्योतं चकार तस्मै अंतिमतीर्थकराय श्रीमहावीरस्वामिने नमो नम:।
अथ षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे पंचमग्रंथे अल्पबहुत्वानुगमो नामाष्टमं प्रकरणं प्रारभ्यते। तस्मिन् ग्रन्थे ओघादेशाभ्यां पंचमषष्ठनामधेयौ द्वौ महाधिकारौ स्त:। तत्रापि पंचममहाधिकारे षड्विंशतिसूत्राणि। षष्ठमहाधिकारे षट्पंचाशदधिकत्रिशतसूत्राणि वक्ष्यन्ते।
अधुना पंचममहाधिकारे नवभि: स्थलै: षड्विंशतिसूत्रै: प्रस्तावना प्रस्तूयते। तत्र प्रथमस्थले अल्पबहुत्वकथनप्रतिज्ञारूपेण ‘‘अप्पाबहुआणुगमेण’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनु द्वितीयस्थले उपशामकानां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘ओघेण’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तत्पश्चात् तृतीयस्थले क्षपकाणां सयोगि-अयोगिकेवलिनां अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘खवा’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनंतरं चतुर्थस्थले अप्रमत्तप्रमत्त-संयतासंयतानां अल्पबहुत्वकथनत्वेन ‘‘अप्पमत्त’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। पुन: पंचमस्थले सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्टयो: अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘सासण’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तत: षष्ठस्थले असंयतसम्यग्दृष्टि-मिच्छादृष्टिजीवयो: अल्पबहुत्वकथनत्वेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तत: परं सप्तमस्थले उपशमादित्रिकसम्यग्दृष्टीनां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनंतरं अष्टमस्थले संयतासंयतानां अल्पबहुत्वकथनत्वेन ‘‘संजदासंजद’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् नवमस्थले प्रमत्ताप्रमत्तादिसाधूनां अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘पमत्तापमत्त’’ इत्यादिषट्सूत्राणि इति समुदायपातनिका कथ्यते।

[सम्पादन]
'संप्रति अल्पबहुत्वानुगमप्रतिपादनाय प्रतिज्ञारूपेण प्रथमसूत्रमवतरति-अप्पाबहुआणुगमेण दुविहो णिद्देसो

ओघेण आदेसेण य।।१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अल्पं च बहुत्वं च अल्पबहुत्वे, तयोरनुगम: अल्पबहुत्वानुगम: तेन निर्देशो द्विविध: भवति ओघ: आदेशश्चेति। संगृहीतवचनकलाप: द्रव्यार्थिकनिबंधन: ओघो नाम। असंगृहीतवचनकलाप: पूर्वोक्तार्थावयवनिबंध: पर्यायार्थिकनिबंधन: आदेशो नाम।
तत्र नामस्थापनाद्रव्यभावभेदेन अल्पबहुत्वं चतुर्विधं। अल्पबहुत्वशब्दो नामाल्पबहुत्वं। एतस्मात् एतस्य बहुत्वं अल्पत्वं वा इदमिति एकत्वाध्यारोपेण स्थापितं स्थापनाल्पबहुत्वं। द्रव्याल्पबहुत्वं द्विविधं-आगम-नोआगमभेदेन। अल्पबहुत्वप्राभृतज्ञायक: अनुपयुक्त: आगमद्रव्यअल्पबहुत्वं। नोआगमद्रव्य-अल्पबहुत्वं त्रिविधं-ज्ञायकशरीर-भावि-तद्व्यतिरिक्तभेदात्। तत्र ज्ञायकशरीरं-भावि-वर्तमान-समुत्यक्तमिति त्रिविधमपि अपगतार्थं। भावि-भविष्यत्काले अल्पबहुत्वप्राभृतज्ञायक:। तद्व्यतिरिक्ताल्पबहुत्वं त्रिविधं-सचित्तमचित्तं मिश्रमिति। जीवद्रव्य-अल्पबहुत्वं सचित्तं। शेषद्रव्याल्पबहुत्वमचित्तं। द्वयोरपि अल्पबहुत्वं मिश्रं।
भावाल्पबहुत्वं द्विविधं-आगम-नोआगमभेदेन। अल्पबहुत्व-प्राभृतज्ञायक: उपयुक्त: आगमभावाल्प-बहुत्वं। आत्मन: ज्ञानदर्शनविषयं पुद्गलानां अनुभागविषयं योगादिविषयं च नोआगमभाव-अल्पबहुत्वमिति।
एतेषु अल्पबहुत्वेषु केन प्रकृतमत्र ?
सचित्तद्रव्य-अल्पबहुत्वेन प्रकृतं-प्रयोजनं।
संप्रति निर्देशस्वामित्वादिप्रसिद्धषडनुयोगद्वारै: अल्पबहुत्वं निर्णीयते।
किमल्पबहुत्वं ?
संख्याधर्मोऽल्पबहुत्वं, एतस्मात् इदं त्रिगुणं चतुर्गुणमिति बुद्धिग्राह्य:।
कस्याल्पबहुत्वं ?
जीवद्रव्यस्य, किंच-धर्मिव्यतिरिक्तसंख्याधर्मस्य पृथगनुपलंभात्।
केनाल्पबहुत्वं ?
पारिणामिकेन भावेन भवति।
कुत्राल्पबहुत्वं ?
जीवद्रव्ये भवति।
कियच्चिरं अल्पबहुत्वं ?
अनादि-अपर्यवसितं। सर्वेषां गुणस्थानानामेतेनैव प्रमाणेन सर्वकालमवस्थानात्।
कतिविधं अल्पबहुत्वं ?
मार्गणाभेदभिन्नगुणस्थानमात्रं अल्पबहुत्वमिति।
तात्पर्यमेतत्-अल्पबहुत्वं-हीनाधिकत्वं गुणस्थानेषु जीवानां मार्गणासु च ज्ञात्वा आत्मनोऽनन्तगुणमन्वेष्य ज्ञानगुणमहत्त्वेन शुद्धात्मस्वरूपं भावयित्वा निजपरमात्मपदं प्राप्तव्यमिति।
एवं प्रथमस्थले अल्पबहुत्वकथनप्रतिज्ञारूपेण एकं सूत्रं गतम्।

[सम्पादन] <center>अथ अल्पबहुत्वानुगम प्रारंभ

पंचम महाधिकार आज से चार दिन कम पच्चीस सौ बाईस वर्ष पूर्व जिन्होंने पावापुरी सरोवर के मध्य से सिद्धपद को प्राप्त किया है, उस निमित्त से उसी समय इन्द्रादिकों ने उसी रात्रि में दीपमालिका जलाकर सभी दिशाओं में प्रकाश फैला दिया था, उन अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को मेरा बारम्बार नमस्कार है।

भावार्थ-ईसवी सन् १९९६ (वीर निर्वाणसंवत् २५२२) में मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर वर्षायोग समापन से चार दिन पूर्व कार्तिक कृ. एकादशी (६-११-१९९६) को इस अल्पबहुत्वानुगम प्रकरण में सिद्धान्त चिन्तामणि टीका का लेखन प्रारंभ करते समय पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने भगवान महावीर के निर्वाण से पवित्र पावापुरी सिद्धक्षेत्र का स्मरण किया है तथा तीर्थंकर के श्रीचरणों में बारम्बार नमन करते हुए मानसिक रूप से टीका की निर्विघ्न समाप्ति के लिए मंगलभावना प्रगट की है।

मैंने सन् १९६९ से पूज्य माताजी के चरणों में रहकर यह अनुभव किया है कि तीर्थंकर भगवन्तों के पंचकल्याणक तीर्थों के प्रति इनके हृदय में तीव्र भक्ति के साथ यह भावना रहती है कि इन तीर्थों का प्रमुखरूप से भारी विकास होना चाहिए। क्योंकि ये पावन तीर्थ हमारी भारतीय संस्कृति के उद्गम स्थल हैं। इनकी भक्ति से हर प्राणी संसार समुद्र से तिर सकता है। इसी भक्ति के प्रतीक में इन्होंने भगवान शांतिनाथ-कुंथुनाथ-अरहनाथ के चार-चार कल्याणक की भूमि हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप रचना निर्माण की प्रेरणा प्रदान कर उस तीर्थ को विश्व के क्षितिज पर पहुँचा दिया। पुन: तीर्थंकरों की शाश्वत जन्मभूमि अयोध्या को कृतयुग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की जन्मभूमि के रूप में विकसित करने की प्रेरणा देकर संसार को स्मरण करा दिया कि सूर्यवंशी राजा रामचन्द्र के पूर्वज भगवान ऋषभदेव का इक्ष्वाकुवंश सर्वप्रथम अयोध्या का प्राणवंश रहा है। ऋषभदेव की दीक्षा एवं केवलज्ञान भूमि प्रयाग तीर्थ की निर्माण प्रेरणा ने इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम के प्राचीन इतिहास का स्मरण कराया है कि युग की आदि में सर्वप्रथम अध्यात्म की त्रिवेणी प्रया्रग में ही प्रवाहित हुई थी, जब ऋषभदेव ने वटवृक्ष के नीचे प्रथम जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रय को धारणकर वहाँ से अप्रतिम त्याग का प्रथम संदेश प्रसारित किया था। इसके पश्चात् रामचन्द्र आदि ९९ करोड़ मुनियों की निर्वाणभूमि मांगीतुंगी आदि अनेक तीर्थों के विकास की प्रेरणा देकर जहाँ ज्ञानमती माताजी ने अपने नाम को सार्थक किया, वहीं भगवान महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर-नालंदा-बिहार में अभूतपूर्व विकास उनकी संप्रेरणा का प्रतिफल है, भगवान मुनिसुव्रत की गर्भ-जन्म आदि चार कल्याणक भूमि राजगृही-नालंदा (बिहार), भगवान महावीर की निर्वाणभूमि पावापुरी, गौतम गणधर की निर्वाणभूमि गुणावां-बिहार, भगवान पार्श्वनाथ की जन्मभूमि वाराणसी, पाश्र्वनाथ केवलज्ञानभूमि अहिच्छत्र एवं निर्वाणभूमि सम्मेदशिखर शाश्वत सिद्धक्षेत्र, भगवान श्रेयांसनाथ जन्मभूमि सिंहपुरी (सारनाथ), भगवान पुष्पदंतनाथ की जन्मभूमि काकन्दी आदि अनेक कल्याणक तीर्थों के जीर्णोद्धार-विकास एवं प्रचार-प्रसार करने में जो भूमिका ज्ञानमती माताजी ने निभाई है वह इनकी दर्शनविशुद्धि भावना का प्रतीक है, अत: शीघ्रमोक्षगामी आत्माओं में इनकी गणना हो जाना कोई अतिशयोक्ति वाली बात नहीं है।

हम सभी को ऐसे गुरुओं के आदर्श जीवन से प्रेरणा प्राप्त करके आत्मा को तीर्थ बनाने का पुरुषार्थ अवश्यमेव करना चाहिए।

इस षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ में अल्पबहुत्वानुगम नामक आठवाँ प्रकरण प्रारंभ होता है। उसमें ओघ और आदेश नाम वाले पंचम और षष्ठम दो महाधिकार हैं। उसमें भी पाँचवें महाधिकार में छब्बीस सूत्र हैं और छठे महाधिकार में तीन सौ छप्पन सूत्र हैं।

अब पंचम महाधिकार में नौ स्थलों में छब्बीस सूत्रों के द्वारा प्रस्तावना प्रस्तुत की जा रही है।

उनमें से प्रथम स्थल में अल्पबहुत्व के कथन की प्रतिज्ञारूप से ‘‘अप्पाबहुआणुगमेण’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुन: द्वितीयस्थल में उपशामकों के अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु ‘‘ओघेण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में क्षपकों में सयोगिकेवली और अयोगिकेवली भगवन्तों का अल्पबहुत्व प्रतिपादित करने वाले ‘‘खवा’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल में अप्रमत्त, प्रमत्त और संयतासंयत जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले ‘‘अप्पमत्त’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: पंचम स्थल में सासादन और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का अल्पबहुत्व प्रतिपादित करने वाले ‘‘सासण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। उसके बाद छठे स्थल में असंयतसम्यग्दृष्टि, मिथ्यादृष्टि जीवों का अल्पबहुत्व कहने वाले ‘‘असंजद’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। आगे सातवें स्थल में उपशम आदि तीन सम्यग्दृष्टियों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले ‘‘असंजद’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तदनंतर आठवें स्थल में संयतासंयत जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु ‘‘संजदासंजद’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् नवमें स्थल में प्रमत्त और अप्रमत्त साधुओं का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने वाले ‘‘पमत्तापमत्त’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

[सम्पादन]
अब अल्पबहुत्वानुगम के प्रतिपादन हेतु प्रतिज्ञारूप से प्रथम सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

अल्पबहुत्वानुगम की अपेक्षा निर्देश दो प्रकार का है, ओघनिर्देश और आदेशनिर्देश।।१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अल्प और बहुत्व ये दोनों शब्द मिलकर अल्पबहुत्व-हीनाधिकतारूप दो चीजें कही गई हैं। दोनों को मिलाकर अनुयोगद्वार के कथन को अल्पबहुत्वानुगम कहा गया है। उसके दो प्रकार का निर्देश-कथन किया जाता है- १. ओघ-गुणस्थान के रूप में निर्देश,

२. आदेश-मार्गणा के रूप में निर्देश।

जिसमें वचनकलाप संग्रहीत हैं तथा जो द्रव्यार्थिकनय की निमित्तक है वह ओघनिर्देश है। जिसमें संपूर्ण वचन कलाप संग्रहीत नहीं हैं, जो पूर्वोक्त अर्थावयव में बताये गये भेदों के आश्रित हैं और जो पर्यायार्थिकनय निमित्तक है, वह आदेश निर्देश है।

नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव के भेद से अल्पबहुत्व चार प्रकार का है। उनमें से अल्पबहुत्व शब्द नाम अल्पबहुत्व है। यह इससे बहुत है अथवा यह इससे अल्प है, इस प्रकार एकत्व के अध्यारोप से स्थापना करना स्थापना अल्पबहुत्व है। द्रव्य अल्पबहुत्व आगम और नोआगम के भेद से दो प्रकार का है। जो अल्पबहुत्व विषयक प्राभृत को जानने वाला है,परन्तु वर्तमान में उसके उपयोग से रहित है उसे आगमद्रव्य अल्पबहुत्व कहते हैं। नो आगमद्रव्य अल्पबहुत्व ज्ञायकशरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्त के भेद से तीन प्रकार का है। उनमें से भावी, वर्तमान और अतीत, इन तीनों ही प्रकार के ज्ञायक शरीर का अर्थ जाना जा चुका है। जो भविष्यत्काल में अल्पबहुत्वप्राभृत का जानने वाला होगा, उसे भावी नोआगमद्रव्य अल्पबहुत्व निक्षेप कहते हैं। तद्व्यतिरिक्त अल्पबहुत्व तीन प्रकार का है-सचित्त, अचित्त और मिश्र। जीवद्रव्यविषयक अल्पबहुत्व सचित्त है, शेष द्रव्यविषयक अल्पबहुत्व अचित्त है और इन दोनों का अल्पबहुत्व मिश्र है।

आगम और नोआगम के भेद से भाव अल्पबहुत्व दो प्रकार का है। जो अल्पबहुत्व प्राभृत का जानने वाला है और वर्तमान में उसके उपयोग से युक्त है उसे आगम भाव अल्पबहुत्व कहते हैं। आत्मा के ज्ञान और दर्शन को तथा पुद्गलकर्मों के अनुभाग और योगादि को विषय करने वाला नोआगम भाव अल्पबहुत्व है।

शंका-इन अल्पबहुत्वों में से प्रकृत में किससे प्रयोजन है ?

समाधान-प्रकृत में सचित्त द्रव्य के अल्पबहुत्व से प्रयोजन है।

अब निर्देश, स्वामित्वादि प्रसिद्ध छह अनुयोगद्वारों से अल्पबहुत्व का निर्णय किया जाता है।

शंका-अल्पबहुत्व क्या है ?

समाधान-संख्या के धर्म को अल्पबहुत्व कहते हैं। यह उससे तिगुणा है, अथवा चतुर्गुणा है इस प्रकार बुद्धि के द्वारा ग्रहण करने योग्य है।

शंका-अल्पबहुत्व किसके होता है, अर्थात् अल्पबहुत्व का स्वामी कौन है ?

समाधान-जीवद्रव्य के अल्पबहुत्व होता है अर्थात् जीवद्रव्य उसका स्वामी है। क्योंकि धर्मी को छोड़कर संख्याधर्म पृथक् नहीं पाया जाता है।

शंका-अल्पबहुत्व किससे होता है, अर्थात् उसका साधन क्या है ?

समाधान-अल्पबहुत्व पारिणामिक भाव से होता है।

शंका-अल्पबहुत्व किसमें होता है अर्थात् उसका अधिकरण क्या है ?

समाधान-जीवद्रव्य में अर्थात् जीवद्रव्य अल्पबहुत्व का अधिकरण है।

शंका-अल्पबहुत्व कितने समय तक होता है ?

समाधान-अल्पबहुत्व अनादि और अनन्त है, क्योंकि सभी गुणस्थानों का इसी प्रमाण से सर्वकाल अवस्थान रहता है।

शंका-अल्पबहुत्व कितने प्रकार का है ?

समाधान-मार्गणाओं के भेद से गुणस्थानों के जितने भेद होते हैं, उतने प्रकार का अल्पबहुत्व होता है।

तात्पर्य यह है कि गुणस्थान और मार्गणाओं में जीवों की हीनाधिकता जानकर अपनी आत्मा के अनंत गुणों का अन्वेषण करके ज्ञानगुण की महिमा से शुद्धात्मस्वरूप की भावना करते हुए निज परमात्मपद को प्राप्त करना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में अल्पबहुत्वानुगम के कथन की प्रतिज्ञारूप से एक सूत्र पूर्ण हुआ।

[सम्पादन]
अधुना उपशामकानां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-ओघेण तिसु अद्धासु उवसमा पवेसेण तुल्ला थोवा।।२।।

उवसंतकसायवीदरागछदुमत्था तत्तिया चेय।।३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-श्रेणिसंबंधित्रिगुणस्थानेषु उपशामका: साधव: प्रवेशेन तुल्या:, एकादिचतु:पंचाशत्मात्रजीवानां प्रवेशं प्रति प्रतिषेधाभावात्। न च सर्वकालं त्रिषु उपशामकेषु प्रतिशत्जीवै: सदृशत्वनियम:, संभावनां प्रतीत्य सदृशत्वोत्ते:।
उपशान्तकषायस्य तावन्मात्रा संख्या, पुन: पृथक्सूत्रं किमर्थं ?
उपशान्तकषायस्य कषायोपशामकानां च प्रत्यासत्ते: अभावस्य संदर्शनफल:। येषां प्रत्यासत्तिरस्ति तेषामेकयोग:, इतरेषां भिन्नयोग: भवति इति एतेन ज्ञापितं अस्ति।
उचान्यत्रापि-‘‘सामान्येन तावत् सर्वत: स्तोका: त्रय उपशमका:, अष्टसु समयेषु क्रमात् प्रवेशे एको वा द्वौ वा त्रयो वा इत्यादि जघन्या:। उत्कृष्टास्तु १६/२४/३०/३६/४२/४८/५४/५४। स्वगुणस्थानकालेषु प्रवेशेन तुल्यसंख्या:। उपशान्तकषायास्तावन्त एव संख्याकथनावसरे प्रोक्ता:। उपशामकानां इतरगुणस्थानवत्र्तिश्योऽल्पत्वात् प्रथमत: कथनम्। तत्रापि त्रय उपशमका: सकषायत्वात् उपशान्तकषायेभ्यो भेदेन निर्दिष्टा: प्रवेशेन तुल्यसंख्या:। सर्वेऽप्येते षोडशादिसंख्या:।’’ ज्ञातव्या भवन्ति।
संप्रति क्षपकाणां सयोग्ययोगिकेवलिनोश्चाल्पबहुत्वनिरूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-खवा संखेज्जगुणा।।४।।
खीणकसायवीदरागछदुमत्था तत्तिया चेव।।५।।
सजोगिकेवली अजोगिकेवली पवेसेण दो वि तुल्ला तत्तिया चेव।।६।।
सजोगिकेवली अद्धं पडुच्च संखेज्जगुणा।।७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशामकगुणस्थाने उत्कर्षेण प्रविश्यमानचतु:पंचाशद्जीवेभ्य: क्षपकगुणस्थाने उत्कर्षेण प्रविश्यमानाष्टोत्तरशतजीवानां द्विगुणत्वोपलंभात्। संचयमपेक्ष्य उपशामकस्य एकगुणस्थाने उत्कर्षेण पंचोन-चतुरुत्तरत्रिशतमात्रस्यापि क्षपकगुणस्थाने उत्कृष्टसंचयस्य द्व्यूनषट्शतमात्रस्य द्विगुणत्वदर्शनात्।
क्षीणकषायवीतरागच्छद्मस्थास्तावन्त एव ज्ञातव्या:।
घातिकर्मघातिनां सयोगिनामयोगिनां च छद्मस्थजीवै: प्रत्त्यासत्तेरभावात् पृथक्सूत्रारंभो जात:। इमे सयोगिन: अयोगिनश्च प्रवेशापेक्षया अष्टोत्तरशतप्रमाणा:। अत: द्वौ अपि तुल्यौ कथ्येते। संचयापेक्षया द्व्यूनषट्शतप्रमाणा: अयोगिकेवलिन:। सयोगिकेवलिनस्तु अष्टलक्ष-अष्टानवतिसहस्र-द्व्यधिकपंचशतमात्रा: भवन्ति, अत: संख्यातगुणा: उच्यन्ते।
उक्तं च सर्वार्थसिद्धौ-सयोगिकेवलिन: स्वकालेन समुदिता: संख्येयगुणा: ८९८५०२।
एवं तृतीयस्थले क्षपकाणां सयोग्ययोगिनां चाल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
संप्रति अप्रमत्त-प्रमत्तसंयतासंयतानां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-अप्पमत्तसंजदा अक्खवा अणुवसमा संखेज्जगुणा।।८।।
पमत्तसंजदा संखेज्जगुणा।।९।।
संजदासंजदा असंखेज्जगुणा।।१०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अप्रमत्तसंयता: द्विकोटि-षष्णवतिलक्षनवनवतिसहस्र-त्र्युत्तरशतप्रमाणा: भवन्ति। अप्रमत्तसंयतापेक्षया प्रमत्तसंयता: द्विगुणा भवन्ति।
एतत्कथं ज्ञायते ?
आइरियपरंपरागदुवदेसादो।
अतो इमे पंचकोटि-त्रिनवतिलक्ष-अष्टानवतिसहस्र-षडधिकद्विशतप्रमाणा: सन्ति। संयतासंयता: पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रत्वात् पूर्वोक्तराशे: असंख्यातगुणा: कथ्यन्ते।
अत्र कश्चिदाह-मानुषक्षेत्रस्याभ्यन्तरे एव संयतासंयता भवन्ति न च बहिर्भागे, तत्रापि भोगभूमिषु संयमासंयम-भावविरोधात्। न च मानुषक्षेत्रस्याभ्यंतरे असंख्यातानां संयतासंयतानां अस्तित्वसंभव:, तावन्मात्राणामत्रा-वस्थानविरोधात्। तत: संयतासंयतै: संख्यातगुणैर्भवितव्यमिति चेत् ?
आचार्यदेव:परिहरति-नैतत्, स्वयंप्रभपर्वतपरभागे असंख्यातयोजनविस्तृते कर्मभूमिप्रतिभागे असंख्यातानां तिरश्चां संयमासंयमगुणस्थानसहितानामुपलंभात्।
एवं चतुर्थस्थले अप्रमत्त-प्रमत्त-देशसंयतगुणस्थानवर्तिनां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्टि-अल्पबहुत्वकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-सासणसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।११।।
सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१२।।
'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'त्रिविधसम्यक्त्वेषु स्थित-संयतासंयतेभ्य: एकोपशमसम्यक्त्वात् सासादनगुणस्थानं प्रतिपद्य षडावलिकासु संचितजीवानां असंख्यातगुणत्वोपदेशात्।
एतत्कथं ज्ञायते ?
एकसमये संयमासंयमं प्रतिपद्यमानजीवेभ्य: एकसमये चैव सासादनगुणस्थानं प्रतिपद्यमान-जीवानामसंख्यातगुणत्वदर्शनात्।
तदपि कुतो बोध्यते ?
अनंतसंसारविच्छेदहेतुसंयमासंयमोपलब्धे: अतिदुर्लभत्वात्।
सासादनसम्यग्दृष्टिकालं षडावलिमात्रं, सम्यग्मिथ्यादृष्टे: कालमन्तर्मुहूत्र्तमात्रं। अत: सासादन-सम्यग्दृष्टिकालात् सम्यग्मिथ्यादृष्टिकाल: संख्यातगुण:। अस्मात् हेतो: सासादनेभ्य: सम्यग्मिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा: भवन्ति। तथा च सासादनगुणस्थानं उपशमसम्यग्दृष्टय एव प्राप्नुवन्ति, सम्यग्मिथ्यात्वगुणस्थानं पुन: वेदकसम्यग्दृष्टय: उपशमसम्यग्दृष्टय: अष्टाविंशतिसत्कर्मिमिथ्यादृष्टयश्चापि प्रतिपद्यन्ते। तेन सासादनप्रतिपद्यमानराशिभ्य: सम्यग्मिथ्यात्वप्रतिपद्यमानराशय: संख्यातगुणा: भवन्ति। अत्रैतद्विशेष: ज्ञातव्य:। वेदकसम्यग्दृष्टयो मिथ्यात्वं सम्यग्मिथ्यात्वं च प्रतिपद्यन्ते, एषु अपि सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यमानेभ्य: मिथ्यात्वं प्रतिपद्यमान वेदकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा: सन्ति।
एवं पंचमस्थले सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्ट्योरल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन द्वे सूत्रे गते।
संप्रति असंयतसम्यग्दृष्टि-मिथ्यादृष्टिजीवाल्पबहुत्वकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१३।।
मिच्छादिट्ठी अणंतगुणा।।१४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सम्यग्मिथ्यादृष्टिभ्य: असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:। किंच-सम्यग्मिथ्या-दृष्टिराशि: अन्तर्मुहूर्तसंचित:, असंयतसम्यग्दृष्टिराशि: पुन: द्विसागरोपमसंचित:।
असंयतसम्यग्दृष्टिभ्यो मिथ्यादृष्टिजीवा अनंतगुणा: सन्ति, आनन्त्यात्। अभव्यसिद्धजीवेभ्योऽनन्तगुण:, सिद्धराशिभ्योऽपि अनंतगुण: गुणकारो वर्तते, नि तु अनन्तानि सर्वजीवराशिप्रथमवर्गमूलानि इति।
एवं षष्ठस्थले असंयतसम्यग्दृष्टि-मिथ्यादृष्टिजीवाल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।


[सम्पादन]
अब उपशामकों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

ओघनिर्देश से अपूर्वकरणादि तीन गुणस्थानों में उपशामक जीव प्रदेश की अपेक्षा एक समान हैं तथा अन्य सब गुणस्थानों के प्रमाण से अल्प हैं।।२।।

उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थ जीव पूर्वोक्त प्रमाण ही हैं।।३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-श्रेणीसंबंधी आदि के तीन गुणस्थानों में उपशामक साधु प्रवेश की अपेक्षा एक सदृश होते हैं, क्योंकि एक से लेकर चौवन मात्र जीवों के प्रवेश के प्रति कोई प्रतिषेध नहीं है। किन्तु सर्वकाल तीनों उपशामकों में प्रवेश करने वाले जीवों की अपेक्षा सदृशता का नियम नहीं है, क्योंकि संभावना की अपेक्षा सदृशता का कथन किया गया है।

शंका-उपशान्तकषाय गुणस्थानवर्ती जीवों की उतनी मात्र संख्या निश्चित है पुन: पृथक् से सूत्र कथन क्योें किया गया ?

समाधान-उपशांतकषाय का और कषाय के उपशमन करने वाले उपशामकों की परस्पर प्रत्यासत्ति का अभाव दिखना इसका फल है। जिनकी प्रत्यासत्ति पाई जाती है उनका ही एक योग अर्थात् एक समास हो सकता है और दूसरों का भिन्न योग होता है, यह बात इस सूत्र से सूचित की गई है।

अन्यत्र-तत्त्वार्थवृत्ति में भी कहा है-

सामान्य से तीनों उपशामक जीव सबसे कम होते हैं, क्रम से आठों समयों में प्रवेश करने पर एक अथवा दो अथवा तीन आदि जघन्य संख्या है और उत्कृष्टरूप से सोलह, चौबीस, तीस, छत्तिस, बयालीस, अड़तालिस, चौवन, चौवन प्रमाण संख्या होती है। अपने गुणस्थान कालों में प्रवेश की अपेक्षा संख्या एक समान रहती है। उपशांतकषाय गुणस्थानवर्ती जीवों की यह मात्रा संख्या कथन के प्रसंग में कही गई है। उपशामक जीवों की संख्या उनसे अन्य गुणस्थानों की अपेक्षा कम होने के कारण प्राथमिक रूप से उनका कथन किया गया है। उसमें भी तीन उपशामक जीव कषाय सहित होने के कारण उपशांतकषाय गुणस्थान-वर्तियों से भेद के द्वारा प्रवेश में उनकी तुल्यसंख्या बतलाई गई है। ये सभी सोलह संख्या प्रमाण हैं ऐसा जानना चाहिए।

[सम्पादन]
अब क्षपक महामुनियों का, सयोगिकेवलियों का एवं अयोगिकेवलियों का अल्पबहुत्व निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

उपशान्तकषाय वीतरागछद्मस्थों से क्षपक संख्यातगुणित हैं।।४।।

क्षीणकषाय वीतरागछद्मस्थ पूर्वोक्त प्रमाण ही हैं।।५।।

सयोगिकेवली और अयोगिकेवली प्रवेश की अपेक्षा दोनों ही तुल्य और पूर्वोक्त प्रमाण हैं।।६।।

सयोगिकेवली काल की अपेक्षा संख्यातगुणित हैं।।७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशामक के गुणस्थान में उत्कृष्ट से प्रवेश करने वाले चौवन (५४) जीवों की अपेक्षा क्षपक के एक गुणस्थान में उत्कृष्ट से प्रवेश करने वाले एक सौ आठ जीवों की संख्या दो गुनी पाई जाती है। एक गुणस्थान में उत्कृष्ट से कम से पाँच कम तीन सौ चार अर्थात् दो सौ निन्यानवे (२९९) संचय से भी क्षपक के एक गुणस्थान के दो कम छह सौ (५९८) रूप संचय की दुगुणता देखी जाती है।

क्षीणकषाय वीतरागछद्मस्थ महामुनियों की संख्या इतनी ही जानना चाहिए।

घातिया कर्मों का घात करने वाले सयोगिकेवली और अयोगिकेवली की छद्मस्थ जीवों के साथ प्रत्यासत्ति का अभाव होने से पृथक् सूत्र बनाया गया है। ये सयोगिकेवली और अयोगिकेवली प्रवेश की अपेक्षा एक सौ आठ प्रमाण हैं अत: दोनों ही एक समान कहे गये हैं। संचय की अपेक्षा दो कम छह सौ अर्थात् पाँच सौ अट्ठानवे संख्या प्रमाण अयोगिकेवली हैं। सयोगिकेवली आठ लाख, अट्ठानवे हजार पाँच सौ दो संख्या प्रमाण होते हैं अत: संख्यातगुणे कहे जाते हैं।

सर्वार्थसिद्धि ग्रंथ में भी कहा है-

सयोगिकेवली स्वकाल से समुदित-संख्यातगुणे प्रमाण हैं। ८९८५०२ संंख्या प्रमाण उनकी गिनती होती है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में क्षपकों का, सयोगिकेवलियों का और अयोगिकेवलियों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

[सम्पादन]
अब अप्रमत्तसंयत, प्रमत्तसंयत और संयतासंयत जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सयोगिकेवलियों से अक्षपक और अनुपशामक अप्रमत्तसंयत जीव संख्यातगुणित हैं।।८।।

अप्रमत्तसंयतों से प्रमत्तसंयत संख्यातगुणित हैं।।९।।

प्रमत्तसंयतों से संयतासंयत असंख्यातगुणित हैं।।१०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अप्रमत्तसंयत दो करोड़ छ्यानवे लाख निन्यानवे हजार एक सौ तीन संख्या प्रमाण होते हैं। अप्रमत्तसंयत की अपेक्षा प्रमत्तसंयत मुनियों की संख्या दो गुनी अधिक है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-आचार्य परम्परा के द्वारा आये हुए उपदेश से यह बात जानी जाती है। अत: पाँच करोड़ तिरानवे लाख अट्ठानवे हजार दो सौ छह संख्या प्रमाण हैं। संयतासंयत जीव पल्योपम के असंख्यातवें भाग मात्र होने से पूर्वोक्त राशि से असंख्यातगुणे कहे गये हैं।

यहाँ कोई शंकाकार कहता है-संयतासंयत जीव मनुष्यक्षेत्र के भीतर ही होते हैं, बाहर नहीं क्योंकि भोगभूमि में संयमासंयम के उत्पन्न होने का विरोध है तथा मनुष्य क्षेत्र के भीतर असंख्यात संयतासंयतों का पाया जाना संभव नहीं है, क्योंकि उतने संयतासंयतों का यहाँ मनुष्य क्षेत्र के भीतर अवस्थान मानने में विरोध आता है। इसलिए प्रमत्तसंयतों से संयतासंयत संख्यातगुणित होना चाहिए ?

तब आचार्यदेव समाधान देते हैं-नहीं, क्योंकि असंख्यात योजन विस्तृत एवं कर्मभूमि के प्रतिभागरूप स्वयंप्रभ पर्वत के परभाग में संयमासंयम गुणस्थानसहित असंख्यात तिर्यंच पाये जाते हैं।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में अप्रमत्त, प्रमत्त और देशसंयत गुणस्थानवर्तियों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

[सम्पादन]
अब सासादन और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु दो सूत्र प्रगट होते हैं-

सूत्रार्थ-

संयतासंयतों से सासादनसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।११।।

सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तीन प्रकार के सम्यक्त्व में स्थित संयतासंयतों की अपेक्षा एक उपशमसम्यक्त्व से सासादनगुणस्थान को प्राप्त होकर छह आवलियों से संचित जीव असंख्यातगुणित हैं, ऐसा उपदेश पाया जाता है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-एक समय में संयमासंयम को प्राप्त होने वाले जीवों से एक समय में ही सासादन गुणस्थान को प्राप्त होने वाले जीव असंख्यातगुणित देखे जाते हैं।

शंका-यह भी कैसे जाना जाता है ?

समाधान-क्योंकि अनन्त संसार के विच्छेद का कारणभूत संयमासंयम का पाना अतिदुर्लभ है। सासादनसम्यग्दृष्टियों का काल छह आवली मात्र है, सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान का काल अन्तर्मुहूर्तमात्र है अत: सासादनसम्यग्दृष्टियों के काल से सम्यग्मिथ्यादृष्टि का काल संख्यातगुणित है, इसी हेतु से सासादन गुणस्थानवर्तियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव संख्यातगुणे होते हैं तथा सासादनगुणस्थान को उपशमसम्यग्दृष्टि ही प्राप्त करते हैं। परन्तु सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान को वेदकसम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि और मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाले मिथ्यादृष्टि जीव प्राप्त होते हैं, इसलिए सासादनगुणस्थान को प्राप्त होने वाली राशि से सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त होने वाली राशि संख्यातगुणी होती है। यहाँ यह विशेष ज्ञातव्य है कि वेदकसम्यग्दृष्टि मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दोनों गुणस्थानों को प्राप्त होते हैं तथा सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त होने वाले वेदकसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यात्व को प्राप्त होने वाले वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।

इस प्रकार पंचम स्थल में सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

[सम्पादन]
अब असंयतसम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु दो सूत्रों का अवतार हो रहा है-

सूत्रार्थ-

सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१३।।

असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तगुणित हैं।।१४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणे हैं। दूसरी बात यह है कि सम्यग्मिथ्यादृष्टि अन्तर्मुहूर्त संचित है और असंयतसम्यग्दृष्टि राशि दो सागरोपम संचित है।

असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों से मिथ्यादृष्टि जीव अनंतगुणे हैं, क्योंकि वे संख्या में अनंत होते हैं। अभव्यसिद्धों से अनंतगुणा और सिद्धों से भी अनंतगुणा गुणकार हैं, जो संपूर्ण जीवराशि के अनंत प्रथम वर्गमूल प्रमाण है।

इस प्रकार छठे स्थल में असंयतसम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।


[सम्पादन]
उपशमसम्यग्दृष्ट्यादि-त्रिविधसम्यग्दृष्टीनामल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।१५।।

खइयसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१६।।

वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीकाचतुर्थगुणस्थाने उपशमसम्यग्दृष्टय: सर्वस्तोका: सन्ति।
कश्चिदाह-
उपशमसम्यक्त्वात् क्षायिकसम्यक्त्वमतिदुर्लभं, दर्शनमोहनीयक्षयेण उत्कर्षेण षण्मासस्य अन्तरं कृत्वा उत्कृष्टेन अष्टोत्तरशतमात्राणां चैव उत्पद्यमानत्वात्। क्षायिकसम्यक्त्वात् उपशमसम्यक्त्वमतिसुलभं, सप्तरात्रिंदिवान्तरं कृत्वा एकसमयेन पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रजीवेषु तदुत्पत्तिदर्शनात्। तत: क्षायिकसम्यग्दृष्टिभ्य: उपशमसम्यग्दृष्टिभि: असंख्यातगुणै: भवितव्यमिति चेत् ?
आचार्य: परिहरति-सत्यमेतत्, किन्तु संचयकालमाहात्म्येन उपशमसम्यग्दृष्टिभ्य: क्षायिकसम्यग्दृष्टयोऽ-संख्यातगुणा जाता:। तद्यथा-उपशमसम्यक्त्वकाल: उत्कृष्टोऽपि अन्तर्मुहूर्तमात्र एव। क्षायिकसम्यक्त्वकाल: पुन: जघन्येन अन्तर्मुहूर्तं, उत्कर्षेण द्वि पूर्वकोटि-अभ्यधिकत्रयस्त्रिंशत्सागरोपममात्रं। तत्र मध्यमकालो सार्धैकपल्योपममात्रमिति।
असंयतसम्यग्दृष्टिगुणस्थाने क्षायिकसम्यग्दृष्टिभ्य: वेदकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा: सन्ति, किंच-दर्शनमोहनीयक्षयेण उत्पन्नक्षायिकसम्यक्त्वात् क्षायोपशमिकवेदकसम्यक्त्वस्य सुष्ठु सुलभत्वोपलंभात्। ओघसौधर्म-असंयतसम्यग्दृष्टिभागहारस्य आवलिकाया: असंख्यातभागप्रमाणत्वात्, एषां गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभागो भवति।
एवं सप्तमस्थले असंयतसम्यग्दृष्टिस्थाने त्रिविधसम्यक्त्वानामल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति पंचमगुणस्थाने त्रिविधसम्यक्त्वानामल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-संजदासंजदट्ठाणे सव्वत्थोवा खइयसम्मादिट्ठी।।१८।।
उवसमसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१९।।
वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।२०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचमगुणस्थाने अणुव्रतसहितक्षायिकसम्यग्दृष्टीनामतिदुर्लभत्वात् क्षायिकसम्यग्दृष्टय: सर्वस्तोका: भवन्ति। न च तिर्यक्षु क्षायिकसम्यक्त्वेन सह संयमासंयमो लभ्यते, तत्र दर्शनमोहनीयक्षपणाभावात्।
तदपि कुतो ज्ञायते ?
तदेव आह- ‘‘दंसणमोहक्खवणापट्ठवगो कम्मभूमिजादो दु।
णियमा मणुसगदीए णिट्ठवगो चावि सव्वत्थ।।
अस्मादेव गाथासूत्राद् ज्ञायते।
येऽपि पूर्वं बद्धतिर्यगायुष्का: मनुष्या: तिर्यक्षु क्षायिकसम्यक्त्वेन उत्पद्यन्ते, तेषां न संयमासंयमोऽस्ति, भोगभूमिं मुक्त्वा तेषां अन्यत्रोत्पत्तेरसंभवात्। तेन क्षायिकसम्यग्दृष्टय: संयतासंयता: संख्याताश्चैव, तत्रापि मनुष्येष्वपि मनुष्यपर्याप्तान् मुक्त्वा अन्यत्राभावात्। अत्र एव भविष्यमाणासंख्यातराशिभ्य: स्तोका: उच्यन्ते।
अस्मिन् संयतासंयतगुणस्थाने क्षायिकसम्यग्दृष्टिभ्य: उपशमसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:। अत्र गुणकार: पल्योपमस्य असंख्यातभाग:। तथैव प्रतिभागोऽपिक्षायिकसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतमात्रसंख्यातरूप अस्ति।
कुत एतत् ?
असंख्यातावलिकाभि: पल्योपमे खण्डिते तत्र एकखण्डमात्राणामुपशमसम्यक्त्वेन सह संयता-संयतानामुपलंभात्।
अत्र देशसंयते उपशमसम्यग्दृष्टिभ्य: वेदकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा: सन्ति।
एवं अष्टमस्थले देशसंयतानां अल्पबहुत्वकथनमुख्यत्वेन सम्यक्त्वापेक्षया त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति प्रमत्ताप्रमत्तादिमहामुनीनां सम्यक्त्वापेक्षया अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-पमत्तापमत्तसंजदट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।२१।।
खइयसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।२२।।
वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।२३।।
एवं तिसु वि अद्धासु।।२४।।
सव्वत्थोवा उवसमा।।२५।।
खवा संखेज्जगुणा।।२६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रमत्ताप्रमत्तयो: उपशमसम्यग्दृष्टय: सर्वस्तोका:। अन्तर्मुहूर्तकालसंचयात्, उपशमसम्यक्त्वेन सह प्रायेण संयमं प्रतिपद्यमानानामभावाच्च। अंतर्मुहूर्तेण संचितोपशमसम्यग्दृष्टिभ्य: देशोनपूर्वकोटि-संचितक्षायिकसम्यग्दृष्टीनां संख्यातगुणत्वं प्रति विरोधाभावात्।
अत्र को गुणकार:? इति प्रश्ने सति संख्याता: समया: इति उच्यन्ते।
क्षायिकात् क्षायोपशमिकस्य सम्यक्त्वस्य प्रायेण संभवात् इमे संख्यातगुणा: भवन्ति।
यथा प्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां सम्यक्त्वस्याल्पबहुत्वं प्ररूपितं, तथा त्रिषु उपशामककालेषु प्ररूपयितव्यं। तद्यथा-एषु सर्वस्तोका: उपशमसम्यग्दृष्टय:। क्षायिकसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:, कारणं अत्र द्रव्यप्रमाणस्य अधिकत्वात्। एषु त्रिष्वपि उपशामकेषु वेदकसम्यग्दृष्टयो न सन्ति, तेन सह उपशमश्रेण्यारोहणाभावात्।
उपशान्तकषायेषु सम्यक्त्वस्याल्पबहुत्वं किन्न प्ररूपितं ?
नैष दोष:, त्रिष्वपि गुणस्थानेषु सम्यक्त्वाल्पबहुत्वेऽवगते तत्रापि अवगमात्।
अपूर्वकरणादित्रिगुणस्थानेषु उपशामका: सर्वत: स्तोका:, स्तोकप्रवेशात् संकलितसंचयस्यापि स्तोकत्वस्य न्यायसिद्धत्वात्।
एभ्य: त्रिभ्य: उपशामकेभ्य: क्षपका: त्रिगुणस्थानवर्तिन: संख्यातगुणा:, संख्यातगुणितायात् संचयोपलंभात्।
उपशम-क्षपकाणामेतदल्पबहुत्वं पूर्वं प्ररूपितं पुनरपि कथमत्र प्ररूप्यते ? नैतद् वक्तव्यं, पूर्वं उपशामक-क्षपकाणां प्रवेशापेक्षया अल्पबहुत्वकथनात् अत्र संचयापेक्षया अल्पबहुत्वं निरूप्यते।
क्षपणश्रेण्यां सम्यक्त्वाल्पबहुत्वं किन्न निरूपितं ?
नैतद् वक्तव्यं, तेषां क्षायिकसम्यक्त्वं मुक्त्वा अन्यसम्यक्त्वाभावात्।
तात्पर्यमेतत्-एतदल्पबहुत्वं गुणस्थानेषु ज्ञात्वा क्षायिकसम्यक्त्वहेतो: प्रयत्न: कर्तव्य: पुनश्च क्षपकश्रेण्यारोहणं कदा करोम्यहं इति भावनापि भावयितव्या भवद्भि:।
एवं नवमस्थले महामुनीनां अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन षट्सूत्राणि गतानि।
अद्यतनात् चतुर्दिनपूर्वं कार्तिककृष्णामावस्यायां सायंकाले केवलज्ञानमुत्पाद्य अंतिम तीर्थकरभगवन्महावीरस्य भक्तिफलं येन प्राप्तं तस्मै श्रीइन्द्रभूतिगौतमगणधरदेवाय नमोऽस्तु मे नित्यम्।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खंडागमस्य प्रथमखण्डे पंचमेग्रंथे अल्पबहुत्वानुगम-नाम्नि अष्टमप्रकरणे श्रीवीरसेनाचार्यविरचितधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्थाधारेण विरचितायां विंशतितमशताब्दौ प्रथमाचार्य: चारित्रचक्रवर्तिश्रीशांतिसागर: तस्य प्रथमपट्टाधीश:
श्रीवीरसागराचार्य: तस्य शिष्या जंबूद्वीपरचनाप्रेरिका गणिनीज्ञानमती-कृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां गुणस्थानेषु अल्पबहुत्वा-नुगमे पंचमो महाधिकार: समाप्त:।


[सम्पादन]
अब उपशमसम्यग्दृष्टि आदि तीन प्रकार के सम्यग्दृष्टियों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं।।१५।।

असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१६।।

असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदक सम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्थ गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।

यहाँ कोई शंका करता है-

उपशमसम्यक्त्व से क्षायिकसम्यक्त्व अतिदुर्लभ है, क्योंकि दर्शनमोहनीय के क्षय द्वारा उत्कृष्ट छह मास के अंतराल से अधिक से अधिक एक सौ आठ जीवों की ही उत्पत्ति होती है। परन्तु क्षायिक सम्यक्त्व से उपशमसम्यक्त्व अतिदुर्लभ है, क्योंकि सात रात-दिन के अंतराल से एक समय में पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमित जीवों में उपशमसम्यक्त्व की उत्पत्ति देखी जाती है। इसलिए क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से उपशमसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित होना चाहिए ?

तब आचार्यदेव इसका परिहार करते हैं-यह कहना सत्य है, किन्तु संचय काल के माहात्म्य से उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित हो जाते हैं। वह इस प्रकार है-उपशम सम्यक्त्व का उत्कृष्टकाल भी अन्तर्मुहूर्त ही है। परन्तु क्षायिकसम्यक्त्व का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्टकाल दो पूर्वकोटि से अधिक तेंतीस सागरोपमप्रमाण है। उसमें मध्यमकाल डेढ़ पल्योपम प्रमाण है।

असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणे हैं। क्योंकि दर्शनमोहनीयकर्म के क्षय से उत्पन्न हुए क्षायिकसम्यक्त्व की अपेक्षा क्षायोपशमिक वेदकसम्यक्त्व का पाना अति सुलभ है। सामान्य से सौधर्म स्वर्ग के असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का भागहार आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण होता है। इनका गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग प्रमाण होता है।

इस प्रकार सातवें स्थल में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में तीन प्रकार के सम्यक्त्वों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

[सम्पादन]
अब पंचमगुणस्थान में तीन प्रकार के सम्यक्त्वों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

संयतासंयत गुण्स्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।१८।।

संयतासंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से उपशमसम्यग्दृष्टि संयतासंयत असंख्यातगुणित हैं।।१९।।

संयतासंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित हैं।।२०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचमगुणस्थान में अणुव्रत सहित क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवों की अतिदुर्लभता होने के कारण क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम होते हैं। तिर्यंचों में क्षायिक सम्यक्त्व के साथ संयमासंयम नहीं पाया जाता है, क्योंकि वहाँ दर्शनमोहनीय के क्षपण का अभाव पाया जाता है।

शंका-यह भी कैसे जाना जाता है ?

समाधान-इस विषय में कषायप्राभृत ग्रंथ की गाथा में कहा है-

गाथार्थ-दर्शनमोहनीय की क्षपणा के लिए प्रतिष्ठापना नियम से कर्मभूमि में उत्पन्न मनुष्य ही करते हैं तथा निष्ठापना सभी जगह होती है।।

इसी गाथासूत्र से जाना जाता है।

जिन्होंने तिर्यंच आयु का बंध कर लिया है ऐसे जो भी मनुष्य क्षायिकसम्यक्त्व के साथ तिर्यंचों में उत्पन्न होते हैं उनके संयमासंयम नहीं होता है, क्योंकि भोगभूमि को छोड़कर उनकी अन्यत्र उत्पत्ति असंभव है। इसलिए क्षायिकसम्यग्दृष्टि संयतासंयत जीव असंख्यात ही होते हैं, क्योंकि संयमासंयम के साथ क्षायिकसम्यक्त्व पर्याप्त मनुष्यों को छोड़कर दूसरी गति में नहीं पाया जाता है और इसीलिए संयतासंयत क्षायिकसम्यग्दृष्टि आगे कही जाने वाली असंख्यात राशियों से कम होते हैं।

इस संंयतासंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि से उपशमसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणे हैं। यहाँ पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है। उसी प्रकार प्रतिभाग भी क्षायिकसम्यग्दृष्टि संयतासंयतों की जितनी संख्या है तत्प्रमाण मात्र संख्यातरूप है।

प्रश्न-ऐसा कैसे है ?

उत्तर-क्योंकि असंख्यात आवली प्रमाण काल से पल्योपम के खण्डित करने पर उनमें से एक खंडमात्र उपशमसम्यक्त्व के साथ संयतासंयत जीव पाये जाते हैं।

यहाँ देशसंयत में उपशमसम्यग्दृष्टि से वेदकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं।

इस प्रकार आठवें स्थल में देशसंयतों का अल्पबहुत्व कथन करने वाले सम्यक्त्व की अपेक्षा तीन सूत्र पूर्ण हुए।

[सम्पादन]
अब प्रमत्त-अप्रमत्तादि महामुनियों का सम्यक्त्व की अपेक्षा अल्पबहुत्व बतलाने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।२१।।

प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।२२।।

प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।२३।।

इसी प्रकार अपूर्वकरण आदि तीन उपशामक गुणस्थान में सम्यक्त्वसंबंधी अल्पबहुत्व है।।२४।।

अपूर्वकरण आदि तीन गुणस्थानों में उपशामक जीव सबसे कम हैं।।२५।।

अपूर्वकरण आदि तीन गुणस्थानवर्ती उपशामकों से तीनों गुणस्थानवर्ती क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।२६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थान में उपशम सम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं। क्योंकि उनका संचयकाल अन्तर्मुहूर्त है। उपशमसम्यक्त्व के साथ प्राय: संयम को प्राप्त होने वाले जीवों का अभाव है। अन्तर्मुहूर्त से संचित होने वाले उपशमसम्यग्दृष्टियों की अपेक्षा कुछ कम पूर्वकोटि काल से संचित होने वाले क्षायिक सम्यग्दृष्टियों के संख्यातगुणित होने में कोई विरोध नहीं है।

यहाँ गुणकार क्या है ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं कि संख्यात समय गुणकार है, क्योेंकि क्षायिक सम्यक्त्व की अपेक्षा क्षायोपशमिक सम्यक्त्व का होना अधिकता से संभव है। ये संख्यातगुणे होते हैं।

जिस प्रकार प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत जीवों के सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व कहा है, उसी प्रकार आदि के तीन उपशामक गुणस्थानों में भी प्ररूपणा करना चाहिए। वह इस प्रकार है-तीनों उपशामक गुणस्थानों में उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं। उनसे क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं, क्योंकि क्षायिकसम्यग्दृष्टियों का यहाँ द्रव्यप्रमाण अधिक पाया जाता है। उपशमश्रेणी में वेदकसम्यग्दृष्टि जीव नहीं पाये जाते हैं, क्योंकि वेदकसम्यक्त्व के साथ उपशमश्रेणी के आरोहण का अभाव है।

शंका-उपशांतकषाय गुणस्थानवर्ती जीवों में सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व क्यों नहीं होता ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि तीनों उपशामक गुणस्थानों में सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व ज्ञात हो जाने पर उपशान्तकषाय गुणस्थान में भी उसका ज्ञान हो जाता है।

अपूर्वकरण आदि तीनों गुणस्थानों में उपशामक मुनियों की संख्या सबसे कम है, क्योंकि अल्प जीवों का प्रवेश होने से संचित होने वाली राशि के स्तोकपना अर्थात् कम होना न्यायसिद्ध है।

इन तीनों गुणस्थानवर्ती उपशामकों की अपेक्षा तीनों गुणस्थानवर्ती क्षपक महामुनियों की संख्या संख्यातगुणा अधिक है, क्योंकि संख्यातगुणित आय से क्षपकों का संचय पाया जाता है।

शंका-उपशामक और क्षपकों का यह अल्पबहुत्व पहले कह आये हैं, पुनरपि यहाँ क्यों कहा है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि पहले उपशामक और क्षपक जीवों के प्रवेश की अपेक्षा अल्पबहुत्व कहा है। यहाँ संचय की अपेक्षा अल्पबहुत्व कहा गया है।

शंका-क्षपक श्रेणी में सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व क्यों नहीं कहा है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि क्षपक श्रेणी वालों के क्षायिक सम्यक्त्व को छोड़कर अन्य सम्यक्त्व का अभाव पाया जाता है।

तात्पर्य यह है कि यह अल्पबहुत्व गुणस्थानों में जानकर क्षायिक सम्यक्त्व की प्राप्ति का प्रयत्न करना चाहिए, पुनश्च मैं क्षपक श्रेणी में आरोहण कब कर सकू, ऐसी भावना भी आप सभी को भाते रहना चाहिए।

इस प्रकार नवमें स्थल में महामुनियों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

आज से (कार्तिक शु. पंचमी से) चार दिन पूर्व कार्तिक कृष्णा अमावस्या के सायंकाल में जिन्होंने केवलज्ञान उत्पन्न करके भगवान महावीर की भक्ति का फल प्राप्त किया था, उन श्री इन्द्रभूति गौतम गणधरदेव को मेरा नित्य ही नमस्कार है।

भावार्थ-सन् १९९६ में मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर वर्षायोग के पश्चात् कार्तिक शुक्ला पंचमी के दिन पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने इस अल्पबहुत्वानुगम प्रकरण के अन्तर्गत गुणस्थानों में अल्पबहुत्वानुगम विषय को समाप्त करते हुए गौतमगणधर के केवलज्ञान को स्मरण करके उन्हें नमन किया है। यह उनकी जिनेन्द्र भक्ति का परिचायक है। ऐसा अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग एवं जिनभक्ति का भाव मुझे भी प्राप्त हो, यही भगवान शांतिनाथ से प्रार्थना है।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदंत और भूतबली आचार्य प्रणीत षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचमग्रंथ के अल्पबहुत्वानुगम नाम के अष्टम प्रकरण में श्रीवीरसेनाचार्य द्वारा विरचित धवला टीका को प्रमुख करके अन्य अनेक ग्रंथों के आधार से विरचित बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्रीशांतिसागर महाराज के प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज की शिष्या जम्बूद्वीप रचना निर्माण की सम्प्रेरिका गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में गुणस्थानों में अल्पबहुत्वानुगम का कथन करने वाला पंचम महाधिकार समाप्त हुआ।


9T4eyRLLc.gif