ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अविद्या :

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अविद्या :

यावन्तोऽविद्यापुरुषा:, सर्वे ते दु:खसम्भवा:।

लुप्यन्ते बहुशो मूढा:, संसारेऽनन्तके।।

—समणसुत्त : ५८८

समस्त अविद्यावान (अज्ञानी पुरुष) दु:खी हैं—दु:ख के उत्पादक हैं। वे विवेक—मूढ़ अनन्त संसार में बार—बार लुप्त होते हैं।