ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अष्टकर्मों का मानव व्यवहार पर प्रभाव- मनोवैज्ञानिक व्याख्या

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अष्टकर्मों का मानव व्यवहार पर प्रभाव- मनोवैज्ञानिक व्याख्या

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सरोज कोठारी
विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग,शासकीय नूतन कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इन्दौर ४५२०१७
सारांश

प्रस्तुत आलेख मे विभिन्न परम्पराओं में कर्म की अभिधारणा, कर्मों के भेद, प्रभेद आदि की विवेचना के साथ कर्म बंध एवं उससे मुक्ति की प्रक्रिया बताई गई है।

इस विशाल विश्व में जीव और अजीव द्रव्य अनादिकाल से मौजूद हैं। सांसारिक जीवों का पुद्गलों के कर्म परमाणुओं से अनादिकाल से संबंध रहा है। पुद्गल के परमाणु शुभ-अशुभ रूप में उदय होकर जीव को सुख-दुख का अनुभव कराने में सहायक होते हैं। जिन क्रोधादि भावों से पुद् गल के परमाणु कर्म रूप बन आत्मा से संबद्ध होते हैं उन्हें भावकर्म और बंधने वाले परमाणुओं को द्रव्य कर्म कहा जाता है। अध्यात्म की व्याख्या ‘धर्म और कर्म’ पर आधारित है इन पर चैतन्य जगत् का समस्त व्यवहार आधारित है। धर्म मनुष्य की मुक्ति का प्रतीक है और कर्म बंधन का । प्राणी/कर्मबद्ध आत्मा प्रवृत्ति करता है, कर्म में प्रवृत्त होता है, सुख-दुख का अनुभव करता है, और फिर कर्म से मुक्त होने के लिए धर्म का आचरण करता है, मुक्ति का मार्ग अपनाता है।

अंग्रेजी में प्रारब्ध अथवा भाग्य के लिए लक (luck) और फैट शब्द प्रचलित है। शुभ अथवा सुखकारी भाग्य को गुडलक (Goodluck) अथवा गुडफैट fateful कहा जाता है, तथा ऐसे व्यक्ति को fateful या लकी (luckey) और अशुभ अथवा दुखी व्यक्ति को अनलकी (Unluckey) कहा जाता है। शुभ कर्म को पुण्य और अशुभ कर्म को पाप कहा जाता है। पश्चिमी जगत् में कर्म शब्द को एक्टिविटी, वर्क, डीड, (activity,work,deed) आदि शब्दों से व्यक्त किया जाता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में प्राणी की सभी क्रियाओं को कर्म कहा जाता है। विभिन्न दर्शनों और धर्मग्रंथों में कर्म का उल्लेख है। व्याकरणाचार्यों ने कहा है- ‘जिस पर कर्ता की क्रिया का फल पड़ता है, अथवा जो कर्ता को प्राप्त होता है वह कर्म है।’’ ‘ऋग्वेद’ मे बताया गया है कि ‘‘मृत मनुष्य की आँख सूर्य के पास और आत्मा वायु के पास जाती है तथा यह आत्मा अपने कर्म के अनुसार पृथ्वी में, स्वर्ग में, जल में और वनस्पति में जाती है।’’उपनिषद् में कहा गया है कि ‘‘जो आत्मा जैसा कर्म करता है, जैसा आचरण करता है, वैसा ही बनता है। सत्कर्म करता है तो अच्छा बनता है, पाप कर्म करने से पापी बनता है। मनुष्य इच्छा के अनुसार प्राप्त संकल्प करता है, संकल्प के अनुसार कर्म होता है तथा जैसा कर्म करता है वैसा फल प्राप्त करता है।’’ धम्मपद मे लिखा है- ‘‘ऊंचे आकाश में, गहरे समुद्र में या पर्वतो की गुफाओं में, इस संसार मे ऐसा कोई भी स्थान नहीं है, जहाँ छिपकर जीव अपने किये हुए पाप कर्मों से छुटकारा पा सके।’’ भगवान बुद्ध ने कहा है-‘‘जो जैसा बीज बोता है, वह वैसा ही फल पाता है।’’ रामायण मे लिखा है-‘‘शरीरधारी जीव स्वयं शुभ या अशुभ कर्म करता है और स्वयं ही उनके फलस्वरूप सुखो ओर दुखों को भोगता है।’’ महाभारत मे लिखा है- ‘‘यह जगत् कर्मभूमि है, इसमें मनुष्य शुभ कर्मों का शुभ और अशुभ कर्मों का अशुभ फल पाता है।’’ जैन दर्शन में कर्म के स्वरूप, प्रक्रिया, प्रभाव आदि का विस्तृत और वैज्ञानिक उल्लेख है। भगवान महावीर ने कहा है- कम्मं च जाई मरण्णस्स मूल- कर्म जन्म-मरण का मूल है, और कर्म की उत्पत्ति का कारण बताते हुए कहा है-कम्मं च मोहप्पभव वयन्ति अर्थात् कर्म की उत्पत्ति मोह से होती है। प्रसिद्ध जैनाचार्य देवेन्द्रसूरि के अनुसार-‘‘जीव की क्रिया का जो हेतु है वह कर्म है।’’ पंडित नाथूराम जी डोंगरीय के अनुसार ‘‘जीव में होने वाला भावात्मक राग-द्वेष या क्रोध, मायादि रूप क्रिया ही कर्म है।७’’ जीव की क्रियाओं से पुद्गल परमाणु प्रभावित होकर आत्मा के साथ बंध जाते हैं और आत्मा को सुख दुख का अनुभव कराते है अत: जीव की पूर्व क्रिया का फल होने से पुद्गल परमाणुओं को भी कर्म कहा जाता है। पं. सुखलाल कहते हैं- ‘‘मिथ्यात्व कषाय आदि कारणों से जीव द्वारा जो कुछ किया जाता है, वही कर्म कहलाता है।’’ जैन लक्षणावली के अनुसार ‘‘अंजन चूर्ण से परिपूर्ण डिब्बे के समान सूक्ष्म व स्थूल आदि अनंत पुद्गलों से परिपूर्ण लोक में कर्मरूप में परिणत होने योग्य नियत् पुद्गल जीव परिणाम के अनुसार बंध को प्राप्त होकर ज्ञानदर्शक के घातक (ज्ञानावरण व दर्शनावरण तथा सुख-दुख, शुभ-अशुभ, आयु, नाम, उच्च, व नीच गोत्र और अंतराय रूप) पुद्गलों को कर्म कहा जाता है।’’ हमारे जगत् के तीन आयाम है-लंबाई, चौडाई और ऊँचाई। वैज्ञानिक जगत में चौथा आयाम है-अदृश्य। हमारे शरीर में जो ग्रंथियों का स्राव है उनका संबंध स्थूल शरीर से होता है। इनसे शरीर और मन प्रभावित होता है। पांचवां आयाम है अमूर्त। इस अमूर्त के साथ कर्म का संबंध है। कर्म के पुद्गल सूक्ष्म हैं। कर्म के पुद्गल चार स्पर्श वाले है—ये चार स्पर्श हैं—शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष। कर्म का संबंध अतीत से है। सिर्पक महावीर ने ही यह सिद्धांत स्थापित किया कि कर्म पौद्गलिक है। महावीर ने कहा-राग और द्वेष आत्मा के साथ कर्म का संबंध कराते है। जैन आचार्यों ने क्रोध और मान को द्वेषात्मक अनुभूति और माया तथा लोभ को रागात्मक अनुभूति माना है।

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कर्मों का वर्गीकरण

कर्म भाव कर्म (जीव कर्म) द्रव्य कर्म अजीव (कर्म) नोकर्म बद्ध नोकर्म अबद्ध नोकर्म घातिकर्म अघातिकर्म ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीय मोहनीय अंतराय वेदनीय आयु नाम गोत्र आत्मा से सम्बद्ध पुद्गल को द्रव्यकर्म और द्रव्यकर्म से युक्त आत्मा की प्रवृत्ति को भावकर्म कहा जाता है। समयसार में कहा गया है-जो मिथ्यात्व, योग, अविरति और अजीव है, वह तो पुद्गल कर्म है और जो मिथ्यात्व, अविरति और अज्ञान जीव (सम्बद्ध) है, वह उपयोग रूप राग द्वेषादिक जीव कर्म है। इन्हीं को द्रव्यकर्म और भावकर्म कहते हैं। द्रव्यकर्म द्रव्यरूप और भावकर्म भावरूप होते हैं। भावकर्म के द्वारा द्रव्यकर्मों का आकर्षण होता है। भावकर्म जैविक, रासायनिक प्रक्रिया है और द्रव्यकर्म सूक्ष्म शरीर (पौद्गालिक) शरीर की रासायनिक प्रक्रिया है।’’ द्रव्य कर्म के मुख्य दो भेद हैं—धातिकर्म और अधातिकर्म। जो कर्म आत्मा के साथ बंधकर उसके स्वाभाविक गुणों का घात करते हैं वे धातिकर्म हैं जैसे- ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय। जो कर्म आत्मा के प्रधान गुणों को हानि नहीं पहुंचाने देते जैसे-वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र ये अघातिकर्म हैं।’’ जो कर्म नहीं है पर कर्म के सदृश है उसे नोकर्म की संज्ञा प्रदान की गई है। नो कर्म दो प्रकार के हैं-बद्ध नोकर्म और अबद्ध नोकर्म। जैसे जीव के साथ कर्म का संबंध है वैसे ही कर्म का फल जो शरीर है, उसका भी जीव के साथ एक क्षेत्रावगाह संबंध है। यह शरीर भी अमुक स्थिति के लिए आत्मा के साथ बद्ध रहता है इसलिए यह शरीर बद्ध नोकर्म है। जीव को जो भी सुख-दुख प्राप्त होते हैं वह कर्मों का फल है।’’ समस्त कर्म चेतनाकृत होते हैं जब आत्मा इस तथ्य को भली-भाँति जान लेती है तो पूर्वकृत कर्मों की निर्जरा के लिये विभिन्न उपायों-उदीरणा, गर्हणा, संवर, निर्जरा द्वारा कर्मों को काटकर जीव परमात्मा बन जाता है। इस प्रकार आत्मा स्वयं कर्म बांधती है और उनका फल भी स्वयं भोगती है। फिर सम्यग्ज्ञान एवं जागरण होने पर स्वयं ही कर्म का निरोध एवं क्षय करने का पुरूषार्थ करती है। कर्म परमाणु आत्मा की विभिन्न शक्तियों के प्रकटन का अवरोध करते हैं, और आत्मा का शरीर से संबंध स्थापित करते हैं, तथा जिन कार्यों से बद्ध जीव संसार भ्रमण करते हैं, यह कर्म आठ प्रकार के होते हैं।

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कर्मों का वर्गीकरण:-

भाव कर्म (जीव कर्म) द्रव्य कर्म (अजीव कर्म)१६ नोकर्म बद्ध नोकर्म अबद्ध नोकर्म घातिकर्म अघाति कर्म ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीय मोहनीय अंतराय कर्म १७ कर्म १८ कर्र्म१९ कर्र्म२० कर्म २४ १. मतिज्ञानावरणीय १. चक्षु दर्शनावरणीय २. श्रुत ज्ञानावरणीय २. अचक्षु दर्शनावरणीय दर्शन चारित्र ३. अवधि ज्ञानावरणीय ३. अवधि दर्शनावरणीय मोहनीय मोहनीय ४. मन:पर्याय ज्ञानावरणीय ४. केवल-दर्शनावरणीय ५. केवल ज्ञानावरणीय ५. निद्रा १.सम्यक्त मोहनीय ६. निद्रा-निद्रा २. मिथ्यात्व मोहनीय ७. प्रचला ३. मिश्र मोहनीय ८. प्रचला-प्रच ९. स्त्यानर्धि/स्त्यानगृद्धि कषाय मोहनीय नो कषाय मोहनीय १. क्रोध १. स्त्री वेद २. मान प्रत्येक के २. पुरूष वेद ३. माया चार भेद हैं। ३. नपुंसक वेद दानांतराय भोगान्तराय वीर्यान्तराय ४. लोभ ४. हास्य अनतानुबन्धी ५. रति लाभांतराय उपभोगांतराय अप्रत्याख्यान ६. अरति प्रत्याख्यान ७. भय संज्ज्वलन ८. शोक ९. जुगुप्सा (घृणा) अघाति कर्म वेदनीय कर्म १९ आयुकर्म २१ नामकर्म २२ गोत्रकर्म २३ १. साता २. असाता १. नरकायु वेदनीय वेदनीय २. तिर्यंचायु उच्च नीच ३. मनुष्यायु गौत्र गौत्र ४. देवायु १. जाति उच्च गोत्र (मातृपक्षीय सम्मान) २. कुलउच्च गोत्र (पितृपक्षीय सम्मान) ३. बल उच्च गोत्र (बलपक्षीय सम्मान) ४. रूप उच्च गोत्र (रूपसंबंधी सम्मान) ५. तप-उच्च गोत्र (तप-संबंधी सम्मान) ६. श्रुत उच्च गोत्र (ज्ञान संबंधी सम्मान) ७. लाभउच्च गोत्र (प्राप्ति संबंधी) ८. एैश्वर्यउच्च गोत्र (ऐश्वर्य संबंधी सम्मान) १. गति नामकर्म-नरक गति, तिर्यंचयति, मनुष्यगति, देवगति २. जाति नामकर्म-एकेन्द्रिय, द्विन्द्रिय, त्रीन्दियक, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय ३. शरीर नामकर्म- औदारिक, वैक्रियक आहारक, तैजस, कार्मण शरीर अंगोपांग ४. अंगोपांगक नामकर्म-औदारिक, वैक्रिय आहारक शरीर ५. बंधन नामकर्म-औदारिक-औदारिक, औदारिक तैजस, औदारिक-कार्मण, वैक्रिय-वैक्रिय,वैक्रिय-तेजस बंधन, वैक्रिय कार्मण, आहारक-आहारक, आहारक-तैजस बंधन,आहारक-कार्मण, औदारिक-तैजस-कार्मण वैक्रिय तैजस, आहारक-तैजस, तैजस-तैजस, तैजस-कार्मण, कार्मण-कार्मण बंधन नाम। ६. संघातन नामकर्म-औदारिक, वैक्रिय, आहारक, तैजस, कार्मण। ७. संहनन नामकर्म-वज्रऋषभ नाराच संहनन, ऋषभनाराच संहनन, नाराच संहनन, अर्घनाराच संहनन, सेवार्त संहनन, कीलिका संहनन। ८. संस्थान नामकर्म-समचतुरस्र, न्योग्रोधपरिमण्डल, स्वाति, वामन, कुब्जक, हुंडक संस्थान। ९. वर्ण नामकर्म- कृष्ण (काला), नील (नीला) लोहित (लाल), हारिद्र (पीला), श्वेत वर्ण (सपेâद)। १०. गंध नामकर्म-सुरभि गंध (सुगंध), दुरभि गंध (दुर्गंध) नाम। ११. रस नामकर्म-तिक्त रस (तीखा), कटु रस (कड़वा) कषाय रस (कसैला) आम्ल रस (खट्टा), मधुर रस (मीठा) १२. स्पर्श नामकर्म-कर्वâश (कठोर), मृदु (कोमल ), गुरू (भारी), लघु (हल्का), स्निग्ध (चिकना), रूक्ष (रूखा), शीत (ठन्डा), ऊष्ण (गरम) १३. अगुरूलधु नाम कर्म १४. उपाघात नामकर्म १५. पराघात नामकर्म १६. आनुपूर्वी नामकर्म-नरक, तिर्यंच, मनुष्य, देव आनुपूर्वी १७. उच्छवास नामकर्म १८. आतप नामकर्म १९.उद्योत नामकर्म २०.विहायोगति-प्रशस्त विहायोगति (अच्छी चाल), अप्रशस्त विहायोगति (खराब चाल), २१.त्रस नामकर्म २२.स्थावर नामकर्म २३.सूक्ष्म नामकर्म २४.बादर नामकर्म २५.पर्याप्त नामकर्म २६.अपर्याप्त नामकर्म २७.साधारण शरीर नामकर्म २८.प्रत्येक शरीर नामकर्म २९.स्थिर नामकर्म ३०.अस्थिर नामकर्म ३१.शुभ नामकर्म ३२.अशुभ नामकर्म ३३.सुभग नामकर्म ३४.असुभग नामकर्म (दुर्भग नामकर्म) ३५.सुस्वर नामकर्म ३६.दु:स्वर नामकर्म ३७.आदेय नामकर्म ३८.अनादेय नामकर्म ३९.यशकीर्ति नामकर्म ४०.अयशकीर्ति नामकर्म ४१.निर्माण नामकर्म ४२.तीर्थकर नामकर्म

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१.ज्ञानावरणीय कर्म:-

ज्ञानवरण कर्म की उपमा पर्दे से दी गई है। जो कर्म आत्मा के ज्ञान गुण को प्रकट नहीं होने देते हैं, उन्हें ज्ञानावरणीय कर्म कहते हैं। इस कर्म का स्वभाव आँखों पर बंधी हुई पट्टी केसमान बताया है जिसके उदय से पदार्थों का सम्य्क ज्ञान नहीं हो पाता है। ज्ञानावरणीय कर्मबंध-प्रदोष, निह्नव, मात्सर्य, अतंराय, ज्ञानासादन ओर उपघातज्ञानी के कारण होता हैं। ज्ञानी व्यक्ति की निंदा करना, ज्ञानी व्यक्ति का विरोध करना, उनके प्रति द्वेष ओर ईष्र्या का भाव रखना, ज्ञान के साधन उपलब्ध होने पर भी दूसरों को न देना, ज्ञानदाता का उपकार न मानना, किसी की ज्ञान प्राप्ति में बाधा पहुँचाना, ज्ञानी व ज्ञान के साधनों का अविनय करना, विद्वानों से व्यर्थ विवाद करना आदि व्यवहार ज्ञानावरणीय कर्मबंध के कारण हैं। वर्तमान समय में ज्ञान प्राप्त करने की अनिच्छा, गुरूजनों का अपमान, परीक्षा में बढ़ रही नकल की प्रवृत्ति, ज्ञान के साधनों का अविनय, ज्ञानियों की निंदा आदि व्यवहार ज्ञानावरणीय कर्मबंध के ज्वलंत उदाहरण हैं। ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से स्मरण शक्ति लुप्त हो जाती है। मानसिक दुर्बलता भी इसी का परिणाम है। यह कर्मबंध न हो इसके लिये बचपन से ही अच्छे संस्कार डालना व ज्ञान प्राप्ति की लालसा होना आवश्यक है।

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२. दर्शनावरणीय कर्म:-

दर्शनावरणी कर्म का स्वभाव द्वारपाल के समान होता है। जो आत्मा के दर्शन गुण को प्रकट न होने दे उसे दर्शनावरणीय कर्म कहते है। ज्ञानावरणीय कर्मबंध के जो छह कारण हैं उन्हीं छह कारणों से दर्शनावरणीय कर्म का बंध होता है। विकलांगों का तिरस्कार करना, उनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार नहीं करना, मिथ्या मान्यताओं का प्रतिपादन करना, पंच इंद्रियों का दुरूपयोग करना, किसी के देखने में विध्न डालना, स्वयं की वस्तु दूसरों को न दिखाना, दिन में सोना आदि व्यवहार दर्शनावरणीय कर्मबंध के कारण हैं। वर्तमान युग में स्वार्थवश मिथ्या मान्यताओं का प्रतिपादन, सम्य्क दृष्टि व्यक्ति का अविनय, मानवीय संवेदनाओं की कमी, परोपकारी व्यवहार मे कमी आदि दर्शनावरणीय कर्मबंध के ज्वलंत उदाहरण हैं। दर्शनावरणीय कर्म के उदय से शारीरिक विकलांगता, अत्यधिक निद्रा आलस्य आदि परिणाम होते हैं। यह कर्मबंध न हो इसके लिये दूसरों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाना तथा मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण जीवन अपेक्षित है।

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३. वेदनीय कर्म:-

वेदनीय कर्म का स्वभाव शहद में लिपटी हुई तलवार की धार के समान है। शहद लिपटी तलवार की धार चाटने से सुख-दुख दोनों होते हैं, शहद मीठा होने से सुख होता है लेकिन तलवार की धार से जीभ कटने से दु:ख होता है। जो कर्म आत्मा को सुख-दु:ख का अनुभव करए वह वेदनीय कर्म कहलाता है। इस कर्म के प्रभाव से जीव भौतिक सुख के प्रति राग और उसके अभाव से द्वेष करता है। जिससे सुख होता है उसे सातावेदनीय तथा जिससे दु:ख होता है उसे असातावेदनीय कर्म कहते हैं। सातावेदनीय कर्मबंध के प्रमुख कारण-भूतानुकम्पा, व्रती अनुकंपा , दान, सराग-संयम, शान्ति और शौच है। असाता वेदनीय कर्मबंध के कारण दु:ख, शोक, ताप, आव्रंदन, वध और परिवेदन है। दु:ख शोक, रोने, मारने-पीटने से असातावेदनीय तथा सब जीवों पर दया करने, व्रत पालने से व दान देने से सातावेदनीय कर्म का बंध होता है। असातावेदनीय कर्म के उदय से जीवन में अशांति तथा सातावेदनीय कर्म के उदय से इन्द्रिय विषयजन्य सुख की अनुभूति होती है। वर्तमान युग में व्रूरता, दान प्रवृत्ति का अभाव, स्वार्थीपन, कषाय के कारण असातावेदनीय तथा भक्ति, दान , धार्मिक श्रद्धा के कारण सातावेदनीय कर्म का बंध होता है। असातावदेनीय कर्म के उदय से जीवन में अशांति, स्वार्थीपन, दान प्रवृत्ति का अभाव, व्रूâरता आदि प्रकट होते हैं तथा सातावेदनीय कर्म के उदय से सुखद गंध, सुखद श्रवण, सुखद रूप, सुस्वाद भोजन, सुखद स्पर्श, प्रशंसा व प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। लेकिन यह सभी सुख क्षणिक व इनके परिणम कटु होते हैं। यह कर्मबंध न हो इसके लिये इन्द्रिय विषयजन्य अनुभूति के साथ ही संयमपूर्वक धर्म का मार्ग अपनाना चाहिये।

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४. मोहनीय कर्म:-

मोहनीय कर्म का स्वभाव मद्य के नशे के समान है नशा कर लेने पर व्यक्ति को होश नहीं रहता है और वह हित-अहित का विचार नहीं कर सकता उसी प्रकार मोहनीय कर्म के उदय से धर्म-अधर्म , हित-अहित का विचार नहीं कर सकता उसी प्रकार मोहनीय कर्म के उदय से आत्मा अपने को भूकर अपने से जुड़ी चीजों में लुभा जाती है। आठ कर्मों मेंयह सर्वाधिक शक्तिशाली है। मोहनीय कर्म का बंध छह कारणों से होता है- क्रोध,मान, माया, अशुभाचरण और विवेकाभाव। मोहनीय कर्म के प्रभाव से जीव की ज्ञान, दर्शन और वीर्य की शक्ति रागादि भावों के कारण विकृत हो जाती है। जीव भोगों में ही सुख मानने लगता है। मोहनीय कर्म के उदय से जीव हित-अहित को नहीं समझ पाता है। किसी जीव की हत्या करना, महापुरूषोें की, गुरूओं की या देवी-देवताओं की निंदा करना आदि मोहनीय कर्म के उदय का परिणाम है। काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, राग, द्वेष कपट आदि मनोविकार व यौनाकर्षण, वेश्यागमन, बलात्कार आदि लैंगिक विकृतियाँ मोहनीय कर्म का परिणाम है। यह कर्मबंध न हो इसके लिये संयमपूर्ण व्यवहार करना चाहिये।

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५.आयु कर्म:-

आयुकर्म कारागृह के समान है। आयुकर्म जीव को अमुक भव में ही रोके रखता है, कर्म के उदय तक उस भव से छुटकारा संभव नहीं है। आयुकर्म जीव को नरक, तिर्यंच, मनुष्य या देव शरीर में से किसी एक में रोके रखता है। नरक गति के चार कारण है:-हिंसक कर्म, संचय वृत्ति, मनुष्य-पशु की हत्या करना, नशीले पदार्थों का सेवन। तिर्यंच गति-कपट, असत्य भाषण, नाप-तौल में बेईमानी का परिणाम है। सरलता, विनय, करूणा, अहंकार से मनुष्यगति की प्राप्ति होती है। संयम का पूर्ण पालन,संयम का आंशिक पालन, तपस्या और कर्मों की निर्जरा से देवगति प्राप्त होती है। आयुकर्म के उदय से जन्म, मृत्यु, बाल्यकाल, युवावस्था, वृद्धावस्था आदि विकृतियाँ पैदा होती है। कई लोग अपार वेदना से छुटकारा पाना चाहते हैं लेकिन यदि आयु पूर्ण न हो तो मौत नहीं आ सकती। कई व्यक्ति सुखपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं लेकिन आयुकर्म पूर्ण हो जाने पर इच्छा न होने पर भी उनकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। यह कर्मबंध न हो इसके लिये हिंसा, कपट, झूठ व नशीले पदार्थों के सेवन से बचना चाहिये।

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६. नाम कर्म:-

नामकर्म का स्वभाव चित्रकार के समान है। जिस प्रकार चित्रकार अच्छे -बुरे सभी प्रकार के चित्र बनाता है उसीप्रकार नामकर्म के कारण जीव की विभिन्न प्रकार के शरीर, गति, जाति, रूप व रंग की रचना होती है। शरीर, वाणी, व मन की सरलता और अहंकार रहित जीवन से शुभ नामकर्म का बंध होता है। शरीर, वचन व मन की वक्रता और अंहकार से अशुभ नामकर्म का बंध होता है। नामकर्म जीव के व्यक्तित्व का निर्धारक है। जीव का रूप, रंग स्वभाव, चाल-ढ़ाल, आवाज आदि नामकर्म का ही परिणाम है। यह कर्म बंधन न हो इसके लिये अहंकार रहित जीवन बिताना चाहिये।

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७.गोत्र कर्म:-

गोत्रकर्म को कुम्हार की उपमा दी है। जैसे कुम्हार छोटे-बडे बर्तन बनाता है वैसे ही गोत्र कर्म जीव को उच्च या नीच कुल प्रदान करता है। जाति, कुल, रूप, बल, तपस्या, ज्ञान, उपलब्यिाँ और स्वामित्व का अहंकार न करने वाले को उच्च गोत्र कर्मबंध व जो व्यक्ति इनका अहंकार करता है उसे नीच गोत्र कर्मबंध होता है। परनिन्दा, आत्मप्रशंसा, देव, गुरू, शास्त्र का अविनय, कुल, रूप, विद्या का घमण्ड करने से नीच गोत्रबंध तथा दूसरों की प्रशंसा, विनय करने और अहंकार नहीं करने से उच्च गोत्र बंधता है। उच्च कुल में संस्कार और नीच कुल में हिंसाचरण होते हैं। गोत्र कर्म का प्रभव सिर्पâ मनुष्यों पर ही नहीं बल्कि पशु, पक्षी, फल, पूâल सभी में दृष्टिगोचर होता है। यह कर्मबंध न हो इसके लिये अहंकार व निंदा से बचना चाहिये।

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८. अंतराय कर्म:-

अंतराय कर्म का स्वभाव भंडारी के समान है। जिसके उदय होने से लाभ होने या इष्ट कार्यों तथा वस्तुओं के भोग-उपभोग करने में बाधाएँ उपस्थित होती है उसे अंतराय कर्म कहते हैं।किसी को दान देने से रोकना, किसी को लाभ न होने देना, किसी के धार्मिक कार्यों में बाधा डालना, किसी को भोजन का उपभोग नहीं करने देना आदि से अंतराय कर्म का बंध होता है। अंतराय कर्म के उदय के कारण जीव के पास भोग-उपभोग की सामग्री मौजूद होने पर भी वह उसका भोग-उपभोग नही कर पाता है। व्यक्ति में अरूचि, अस्वस्थता, शोक, चिंता, अपंगता, सुस्ती, आलस्य आदि कारण उपस्थित हो जाते हैं जो व्यक्ति के कार्य में बाधक बनते हैं। दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य में अंतराय करने से अंतराय कर्मबंध होता है। अंतराय कर्म के प्रभाव से प्राप्त वस्तुओें का विनाश हो जाता है या भविष्य में प्राप्त होने वाली वस्तु की प्राप्ति में विघ्न आ जाता है। यह कर्मबंध न हो इसके लिये किसी के कार्य में विघ्न नहीं डालना चाहिये। जैन दर्शन द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धांत सत्य है कि प्रत्येक जीव अपने-अपने कर्मों के द्वारा व्यक्तिगत संसार (जन्म-मरण, सुख-दु:ख) का कर्ता-सृष्टा एवं भोक्ता है।

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कर्मबन्ध:-

कर्म का बंध कर्म परमाणुओं का अर्जन क्रिया का परिणाम है। यह अर्जन तत्काल हो जाता है। ऐसा कभी नहीं होता कि क्रिया अभी हो रही है और कर्म का बंध कभी बाद में होगा। कर्म का बंध तत्काल हो जाता है। किन्तु जो अर्जित हो गया उसका उपभोग होता रहता है। अर्जन का काल क्षण भर का है और उपभोग का काल बहुत लम्बा है। प्राणी दीर्घकाल तक अर्जित कर्मों का उपभोग करता रहता है। सब कर्मों का अपना-अपना अस्तित्व काल होता है। जब यह अस्तित्व काल या सत्ताकाल पूरा होता है तब कर्म विपाक की स्थिति में आता है और अपना फल देने लगता है। दो काल हैं- एक क्रिया का काल, प्रवृत्ति का काल और दूसरा कर्म बंध का काल । जब कोई प्रवृत्ति होती है, उसी क्षण कर्म का बंध हो जाता है। प्रवृत्ति का फल मिला जाता है। प्रवृत्ति का फल है कर्मों का अर्जन। क्रिया के साथ-साथ फल/ परिणाम होता है। परिणाम तत्काल मिल जाता है, किन्तु परिणाम का उपयोग लम्बे समय तक चलता रहता है।

कर्म-बंध की चार अवस्थाएँ है-पहली अवस्था है कर्म परमाणुओं के आने की, उनके संग्रह की। इसे प्रदेश बंध कहा जाता है। दूसरी अवस्था है कर्म-परमाणुओं के स्वभाव-निर्माण की। कौन सा कर्म किस स्वभाव का होगा, इस अवस्था को ‘प्रकृति बंध’ कहा जाता है। तीसरी अबस्था है कर्म परमाणुओं से रस शक्ति के निर्माण की। कौन-से कर्म में कितनी रस शक्ति है, इस अवस्था को अनुभाग बंध कहा जाता है। चौथी अवस्था है- कर्म परमाणुओं के स्थिति काल की कौन-सा कर्म आत्मा के साथ कितने समय तक रह पायेगा। इस अवस्था को स्थिति बंध कहा जाता है। कर्म के स्थिति-काल के अनुसार उसका सत्ताकाल होता है जब यह सत्ताकाल पूरा हो जाता है तो प्राणी फल भोगने लगता है। उत्तराध्ययन सूत्र मे कहा गया है- ‘‘जीव ने जो भी शुभ या अशुभ सुखमय या दु:खमय कर्म किये (बांधे) हैं, उन कर्मों से संयुक्त (बद्ध) होकर जीव परलोक में जाता है।’’ कर्म का केन्द्र बिन्दु है मूच्र्छा। साधना का केन्द्र बिन्दु है जागृति। संसार में बहुत विविधता है। चैतन्य जगत में घटित होने वाली विविध घटनाओं का एक बड़ा निमित्त है कर्म। यह कर्म के अस्तित्व का बहुत बड़ा प्रमाण है। कर्म के अस्तित्व का दूसरा कारण है मनुष्य के रागात्मक और द्वेषात्मक परिणाम। तीसरा चरण है-चंचलता। चौथा कारण है पुद्गल और जीव का परस्पर प्रभाव। कर्म मुक्ति की प्रक्रिया के दो तत्व हैं। एक हैं संवर और दूसरा है तपस्या या निर्जरा।

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जैनाचार्यों के अनुसार-

संयोगमूला जीवेण पत्ता दुक्ख-परपंरा ‘‘जीव को जो दु:ख परंपरा एक दु:ख के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरे दु:ख की घटा प्राप्त होती है, उसका मूल कारण संयोग या कर्मबंध है।’’२८ ‘‘रागो दोसो वि य कम्म-वीयं ?’’ राग और द्वेष, ये दोनों कर्म (बंध) के बीज हैं।’’२९ कर्मग्रन्थ, स्थानांगसूत्र, तत्वार्थसूत्र आदि में कर्मबन्ध के पांच कारण बताये गये हैं।-मिथ्यात्व, अविरित, प्रमाद, कषाय, और योग।’’ बंध दो प्रकार का होता है- भावबंध और द्रव्यबंध। जिन राग, द्वेष, मोह आदि विकारी भावों से कर्म का बन्ध होता है उन भावों को भावबंध कहते हैं। पुद्गलों का आत्मप्रदेशों से सम्बन्ध होना, द्रव्यबंध कहलाता है। द्रव्यबंध और भावबंध सजातीय और विजातीय दो प्रकार के होते हैं।’’ कर्म से बंधा जीव ही नये कर्मों का बंध करता है। मोह कर्म के उदय से जीव राग-द्वेष में परिणत होता है, तब वह अशुभ कर्मों का बंध करता है। मोह रहित प्रवृत्ति करने से शरीर नामकर्म के उदय से जीव शुभ कर्म का बंध करता है।’’

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कर्मों से मुक्ति कैसे हो?

एक पाश्चात्य विचारक ने कहा है-‘‘Man is the architect of his own fortune’’ ‘‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं ही है।’’ गीता में सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी जीवों की कर्म करने की पद्वति को अलग-अलग दर्शाया गया है। कर्म का फल तो तीनों ही प्रकार के जीवों को मिलता है। सतोगुणी जीव कहता है- ‘‘मैं कर्म करूंगा, फल मिले या न मिले’’ रजोगुणी जीव कहता है-‘‘मैं कर्म करूंगा, किन्तु फल नहीं छोडूगा’’ तमोगुणी जीव कहता है, ‘‘फल नहीं मिलेगा, तब तक मैं कर्म नहीं करूँगा।’’ क्रियमाण कर्म (प्रवृत्ति) जिस वृत्ति और वाणीपूर्वक किये जाते है वैसा ही प्रारब्ध फल मिलता है। अत: जीव को क्रियमाण कर्म करते समय सावधान रहना चाहिये।’’ जैन कर्म विज्ञान के अनुसार संचित कर्मों (सत्ता में पड़े हुए) से प्रारब्ध की भूमिका पर आने से पूर्व यदि व्यक्ति उक्त कर्म का संक्रमण, निर्जरा या उदीरणा कर लेता है तो प्रारब्ध में परिवर्तन भी हो सकता है। जीव को लोकोत्तर अध्यामिक दृष्टि से प्रारब्ध से प्राप्त साधनों का लाभ उठाते हुए मोक्ष मार्ग पर चलने का पुरूषार्थ करना चाहिये। अर्थ और काम के लिये पुरूषार्थ की आवश्यकता नहीं है उन्हें प्रारब्ध पर छोड़कर धर्म और मोक्ष के लिए पुरूषार्थ करना चाहिये। कर्मयोग द्वारा क्रियमाण कर्मों को, भक्तियोग द्वारा प्रारब्ध कर्मों को और ज्ञानयोग द्वारा संचित कर्मों को नियंत्रित किया जा सकता है और इन कर्मों से मुक्त होकर जीव मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

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भगवान महावीर के अनुसार-

‘‘बुज्झिज्ज तिउट्टिज्जा, बंधण परिजाणिया’’ मानव मात्र को बोध प्राप्त करना चाहिये और बंधन (कर्मबंधन) के स्वरूप को जानकर उसे (पूर्ण रूप से) तोड़ देना चाहिये। १. ऋग्वेद-१०/१६/३ २. वृहदारण्यक उपनिषद् ४/४/३-५ ३. धम्मपद, ९ पापवग्ग, गाथा १२ ४. संयुक्त निकाय १, ११, १० ५. आध्यत्मिक रामायण, अयोध्याकाण्ड ९, १४ ६. महाभारत, शान्ति पूर्व, १९२,१९ ७. कर्मविपाक (कर्मग्रन्थ प्रथम) ८. समीचीन सार्वधर्म सौपान-नाथूराम डोंगरीय जैन, प्रकाशक-कुन्दकुन्दक ज्ञानपीठ, इन्दौर २०००, पृष्ठ १०९ ९. कर्मविपाक-पं. सुखलाल, पृष्ठ २३ १०. जैन लक्षणावली द्वितीय भाग), पृष्ठ ३१९ ११. कर्मवाद, युवाचार्यमहायज्ञ आदर्श साहित्य संघ प्रकाशन, चुरू (राज.) १९९०, पृष्ठ १२, १३, १६ १२. समयसार, गाथा ८८ १३. गोमटसार (कर्मकाण्ड) ९ १४. भगवती सूत्र १/६२ १५. भगवती सूत्र १/६२ १६. उत्तराध्ययन सूत्र ३३-२.३ १७. उत्तराध्ययन सूत्र ३३-४ १८. उत्तराध्ययन सूत्र ३३-५-६ १९. प्रज्ञापना सूत्र २३.२ २०. स्थानांग सूत्र २.४.१०५ २१. प्रज्ञापना सूत्र २३.२ २२. प्रज्ञापना सूत्र २३.२. २३. प्रज्ञापन सूत्र २३.२.२९३ २४. उत्तराध्यान सूत्र ३३.१५ २५. कर्मवाद, युवाचार्य महाप्रज्ञ, आदर्श साहित्य संघ प्रकाशन, चुरू (राज.)१९९०, ४२-४४ २६. उत्तराध्ययन सूत्र, अ. १८, गा.१७ २७. कर्मवाद, युवाचार्य महाप्रज्ञ , आदर्श साहित्य संघ प्रकाशन,चुरू (राज.)१९९० ९४,१००-१०१ २८. मरण विभक्ति प्रकेर्णिक से। २९. उत्तराध्ययन सूत्र अ. ३२, ३०. स्थानांग स्था.५/२/४१८ ३१. भगवती सूत्र १८/३/१० ३२. भगवती सूत्र ७/१८ ३३. कर्मनो सिद्वांत (हीराभाई ठक्कर) पृ. १६,१८ ३४. कर्मनो सिद्वांत (हीराभाई ठक्कर) पृ.१९ ३५. कर्मनो सिद्वांत (हीराभाई ठक्कर) पृ.५८



अर्हत् वचन अक्टूबर—दिसम्बर— २००५