ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अष्टमी क्रिया ( हिन्दी )

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विषय सूची

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अष्टमी क्रिया

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सिद्धभक्ति

नमोऽस्तु अष्टमीपर्वक्रियायां........सिद्धभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं।
(पूर्ववत् प्रणाम, सामायिक दण्डक, २७ उच्छ्वास में ९ जाप्य, थोस्सामिस्तव करके सिद्ध भक्ति पढ़ें।)
(शंभु छंद)
सब सिद्ध कर्म प्रकृती विनाश, निज के स्वभाव को प्राप्त किये।
अनुपमगुण से आकृष्ट तुष्ट, मैं वंदूँ सिद्धी हेतु लिये।।
गुणगण आच्छादक दोष नशें, सिद्धी स्वात्मा की उपलब्धी।
जैसे पत्थर सोना बनता, हों योग्य उपादान अरु युक्ती।।१।।
नहिं मुक्ति अभावरूप निजगुण की, हानि तपों से उचित न है।
आत्मा अनादि से बंधा स्वकृतफल-भुक् तत्क्षय से मुक्ति लहे।।
ज्ञाता दृष्टा यह स्वतनुमात्र, संहार विसर्पण गुणयुत भी।
उत्पाद व व्यय धु्रवयुत निजगुणयुत, अन्य प्रकार नहीं सिद्धी।।२।।
जो अंतर्बाह्य हेतु से प्रगटित, निर्मल दर्शन ज्ञान कहा।
चारित संपत्ती प्रहरण से, सब घाति चतुष्टय हानि किया।।
फिर प्रगट अचिन्त्य सार अद्भुतगुण, केवलज्ञान सुदर्शन सुख।
अरु प्रवर वीर्य सम्यक्त्व प्रभा-मण्डल चमरादिक से राजित।।३।।
जानें देखें यह त्रिभुवन को जो सदा तृप्त हो सुख भोगें।
तम के विध्वंसक समवसरण में सब को तर्पित कर शोभें।।
वे सभी प्रजा के ईश्वर पर की ज्योति तिरस्कृत कर क्षण में।
बस स्व में स्व से स्व को प्रगटित कर स्वयं स्वयंभू आप बनें।।४।।
अवशेष अघाती बेड़ीवत् जो कर्म बली उनको घाता।
सूक्ष्मत्व अगुरुलघु आदि अनंत, स्वाभाविक क्षायिक गुण पाया।।
वे अन्य कर्म क्षय से निज की, शुद्धी से महिमाशाली हैं।
प्रभु ऊध्र्वगमन से एक समय में लोक अग्र पर ठहरे हैं।।५।।
जो अन्याकार प्राप्ति हेतु नहिं हुआ विलक्षण विंâचित् कम।
वो पूर्व स्वयं संप्राप्त देह, प्रतिकृति है रुचिर अमूर्त अमम।।
सब क्षुधा तृषा ज्वर श्वास कास,जर मरण अनिष्ट योग रहिता।
आपत्ती आदि उग्र दुःखकर भवगत सुख कौन माप सकता।।६।।
सब सिद्ध स्वयं के उपादान से स्वयं अतिशयी बाधरहित।
वृद्धि व ह्रास से रहित विषय-विरहित, प्रतिशत्रू रहित अमित।
सब अन्य द्रव्य से निरापेक्ष निरुपम, त्रैकालिक अविनश्वर।
उत्कृष्ट अनंतसार सिद्धों के, हुआ परमसुख अति निर्भर।।७।।
नहिं भूख प्यास अतएव विविध रस-अन्न पान से नहिं मतलब।
नहिं अशुची ग्लानी निद्रादिक, माला शय्या से है क्या तब।।
नहिं रोग जनित पीड़ा है तब, उपशमन हेतु औषधि से क्या।
सब तिमिर नष्ट हो गया दिखे, सब जगत् पुनः दीपक से क्या।।८।।
जो विविध सुनय तप संयम दर्शन, ज्ञान चरित से सिद्ध हुए।
गुण संपद् से युत विश्वकीर्ति व्यापी, देवों के देव हुए।।
उत्कृष्ट जनों से संस्तुत जग में, भूत भावि सांप्रत सिद्धा।
मैं नमूं अनंतों को त्रैकालिक, उन स्वरूप की है इच्छा।।९।।
दोहा- बत्तिस दोषों से रहित, परम शुद्ध शुभ खान।
करके कायोत्सर्ग जो, भक्ति सहित अमलान।।
नित प्रति वंदे भाव से, सिद्ध समूह महान्।
वह पावे झट परम सुख, ज्ञान सहित शिव धाम।।
अंचलिका (चौबोल छंद)-
हे भगवन् ! श्री सिद्ध भक्ति का, कायोत्सर्ग किया उसका।
आलोचन करना चाहूँ जो, सम्यग्रत्नत्रय युक्ता।।
अठ विधकर्मरहित प्रभु ऊध्र्व-लोक मस्तक पर संस्थित जो।
तप से सिद्ध नयों से सिद्ध, सुसंयम सिद्ध चरित सिध जो।।
भूत भविष्यत् वर्तमान, कालत्रय सिद्ध सभी सिद्धा।
नित्यकाल मैं अर्चूं पूजूं, वंदू नमूं भक्ति युक्ता।।
दुःखों का क्षय, कर्मों का क्षय, हो मम बोधि लाभ होवे।
सुगति गमन हो समाधि मरणं मम जिनगुण संपति होवे।।
नमोऽस्तु अष्टमीपर्वक्रियायां.....श्रुतभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं।
(पूर्वोक्त सामायिक दण्डक, ९ जाप्य, थोस्सामिस्तव पढ़कर श्रुतभक्ति पढ़ें।)


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श्रुतभक्ति

(चौबोल छंद)
लोकालोक विलोकन लोकित, सल्लोचन है सम्यग्ज्ञान।
भेद कहे प्रत्यक्ष परोक्ष, द्वय हैं सदा नमूं सुखदान।।१।।
मतिज्ञान अभिमुख नियमित बोधन इन्द्रिय मन से उपजे।
अवग्रहादिक बहुआदिकयुत, तीन सौ छत्तीस भेद लसें।।२।।
विविध ऋद्धि बुद्धि कोष्ठ स्पुâट बीज सुपदानुसारी हैं।
ऋद्धि कही संभिन्नश्रोतृता, इन युत श्रुत को वंदू मैं।।३।।
जिनवर कथित रचित गणधर से, युत अंगांग बाह्य संयुत।
द्वादश भेद अनेक अनंत, विषययुत वंदूं मैं जिनश्रुत।।४।।
पर्याय अक्षर पद संघात, प्रतिपत्तिक अनुयोग सहित।
प्राभृत-प्राभृत कहे तथा, प्राभृतक वस्तु अरु पूर्व दशक।।५।।
प्रत्येकों दस में समासयुत, बीस भेद होते उनको।
वर गंभीर शास्त्र पद्धति से, द्वादश अंग नमूं सबको।।६।।
आचारांग सूत्रकृत स्थानांग तथा समवाय महान।
व्याख्याप्रज्ञप्ति अरु ज्ञातृकथा उपासक अध्ययनांग।।७।।
अंतकृत दश अनुत्तरोपपादिक दश युत अंग कहे।
अंग प्रश्नव्याकरण विपाक, सूत्र अंग प्रणमूं नित मैं।।८।।
दृष्टिवाद युत द्वादशांग हैं, दृष्टिवाद के पांच प्रकार।
परीकर्म अरु सूत्र प्रथम, अनुयोग पूर्व चूलिका सुसार।।९।।
कहे पूर्वगत चौदह उनमें, है उत्पाद पूर्व पहला।
अग्रायणि अरु पुरुवीर्यानुप्रवाद पूर्व हैं नमूं सदा।।१०।।
अस्तिनास्ति सुप्रवादपूर्व, ज्ञानप्रवाद पूर्व शुभ हैं।
सत्यप्रवाद पूर्व अरु आत्मप्रवाद पूर्व प्रणमूँ नित मैं।।११।।
कर्म प्रवादपूर्व अरु प्रत्याख्यानपूर्व है उत्तम श्रुत।
वंदूं विद्यानुप्रवाद को , क्षुद्रमहाविद्या संयुत ।।१२।।
कल्याणानुप्रवाद प्राणावाय सुक्रियाविशालं श्रुत।
पूर्व लोकविंदूसारं ये, चौदह पूर्व नमूं संतत।।१३।।
दस चौदह अठ अठरह बारह, बारह सोलह बीस अरु तीस।
पंद्रह दस-दस-दस-दस क्रम से, चौदह पूर्व की वस्तु कथित।।१४।।
एक-एक वस्तू में होते, बीस-बीस प्राभृतक नमूं।
चौदह पूर्व सुप्राभृतयुत, इक सौ पंचानवे वस्तु नमूं।।१५।।
पूर्वांतरु अपरांत धु्रवं, अधु्रव अरु च्यवन लब्धि नामक।
अधु्रव संप्रणिधि अरू अर्थ, अरु भौमावयादि संयुत।।१६।।
श्रुत सर्वारथकल्पनीय है, ज्ञान अतीत भाविकालिक।
सिद्धि उपाध्यं ये चौदह, वस्तु अग्रायणि पूर्वकथित।।१७।।
इनमें पंचम वस्तु का, चौथा प्राभृत जो कहा जिनेश।
उसके हैं अनुयोग द्वार, चौबीस वरणे मैं नमूं हमेश।।१८।।
कृतिवेदन स्पर्शन कर्म अरु, प्रकृति कहें ये पांच तथा।
बंधन और निबंधन प्रक्रम, अनुपक्रम अभ्युदय कहा।।१९।।
मोक्ष तथा संक्रम लेश्या, लेश्या के कर्म अरू परिणाम।
सातासात दीर्घ अरु ह्रस्वं, अरु भवधारणीय शुभ नाम।।२०।।
पुरु पुद्गलात्मक है तथा निधत्त, अनिधत्त निकाचित अनिकाचित।
कर्म स्थिति पश्चिमी स्वंâध अरु, अल्पबहुत्व नमूं चौबीस।।२१।।
एक सौ बारह कोटि तिरासी, लाख अठावन सहस रु पांच।
द्वादशांग श्रुत के पद इतने, वंदन करूं, नमाकर माथ।।२२।।
सोलह सौ चौतीस करोड़, तेरासी लाख अरु सात सहस।
अठ सौ अठ्यासी इतने ये, पद के वर्ण कहे शाश्वत।।२३।।
सामायिक चउबिस तीर्थंकर, स्तुति वंदन औ प्रतीक्रमण।
वैनयिक कृतिकर्म तथा दश, वैकालिक का करूं नमन।।२४।।
श्रेष्ठ उत्तराध्ययन कल्प, व्यवहार कहा वंदूं उनको।
कल्पाकल्प महाकल्पं अरु, पुंडरीक वंदूं सबको।।२५।।
परिपाटी से नमूं महायुत, पुंडरीक श्रुत को नित ही।
अंग बाह्य ये कहे प्रकीर्णक, निपुण महाश्रुत पूज्य सही।।२६।।
अवधिज्ञान मर्यादायुत, पुद्गल प्रत्यक्ष करे बहुविध।
देशावधि परमावधि सर्वावधि को वंदूं भेद सहित।।२७।।
पर मन में स्थित सब वस्तू, को प्रत्यक्ष करे जो ज्ञान।
ऋजुमति विपुलमति मनःपर्यय, उनको वंदू भव भय हान।।२८।।
केवलज्ञान त्रिकालिक सर्व, पदार्थ प्रकाशे युगपत ही।
क्षायिक एक अनंत सकल, सुखधाम उसे वंदूं नित ही।।२९।।
इस विध स्तुति करते मुझको, सकल लोकचक्षू सब ज्ञान।
ज्ञान ऋद्धि देवें झट ज्ञानों, का फल अच्युत सौख्य निधान।।३०।।
अंचलिका
हे भगवन् ! श्रुतभक्ती, कायोत्सर्ग किया उसके हेतु।
आलोचन करना चाहूँ जो, अंगोपांग प्रकीर्णक श्रुत।।
प्राभृतवंâ परिकर्म सूत्र, प्रथमानुयोग पूर्वादिगत।
पंच चूलिका सूत्र स्तव, स्तुति अरु धर्म कथादि सहित।।
सर्वकाल मैं अर्चूं पूजूं, वदूं नमूं भक्ति युत से।
ज्ञानफलं शुचि ज्ञान ऋद्धि, अव्यय सुख पाऊं झटिति से।।
दुःखों का क्षय कर्मों का क्षय, हो मम बोधि लाभ होवे।

सुगतिगमन हो समाधिमरणं, मम जिनगुण संपति होवे।।
नमोऽस्तु अष्टमीपर्वक्रियायां.......सालोचनाचारित्रभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं।
(पूर्ववत् सामायिक दंडक, ९ जाप्य, थोस्सामिस्तव पढ़कर चारित्र भक्ति पढ़ें।)

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चारित्रभक्ति

चमकित मुकुट मणि की प्रभ से, व्याप्त सु उन्नत है मस्तक।
वंâकण हारादिक से शोभित, त्रिभुवन के इंद्रादिक सब।।
जिससे उनको स्वपद कमल में, नमित किया नित मुनियों ने।
उन अर्चित पंचाचारों को, कथन हेतु अब नमूं उन्हें।।१।।
व्यंजन अर्थ उभय शुद्धी युत, काल विनय शुद्धि उपधा।
निज सूरि का निन्हव नहिं, बहुमान कहीं ये अष्ट विधा।।
श्रीमद् प्रभू जातिकुल पुंगव, तीर्थंकर से कथित महान् ।
ज्ञानाचार त्रिधा मैं प्रणमूं, कर्म नाश हेतू सुखदान।।२।।
शंका कांक्षा मूढ़दृष्टि से, रहित सदा वात्सल्य सहित।
विचिकित्सा से दूर धर्म के, वृद्धिंगत में तत्पर नित।।
जिन शासन उद्दीपन हित, पथभ्रष्टों को करना स्थिर।
आदर से शिर नत वंदूं, अष्टांग दर्शनाचार प्रवर।।३।।
अनशन अवमोदर्य वृत्ति, परिसंख्या कायक्लेश सुतप।
इन्द्रिय हस्ती को मद कारक, विविध रसों का त्याग सुतप।।
नित एकांत शयन उपवेशन, ये छह बाह्य कहे हैं तप।
शिवगति प्राप्ति के उपाय में, मैं इनकी स्तुति करूं सतत।।४।।
क्रिया व्रतों में दोष लगे तब, प्रायश्चित स्वाध्याय महान् ।
बाल वृद्ध रोगी यति गुरु की वैयावृत्ति नित्य शुचि ध्यान।।
कायोत्सर्ग विनय तप षट् विधि, अंतरंग ये कहे प्रधान।
अंतरंग रागादि दोष विध्वंसक इनको नमूं सुजान।।५।।
अर्हत मत के श्रद्धानी जो, सम्यग्ज्ञान चक्षु धारी।
तप में शक्ति नहीं छिपाते, करें प्रयत्न सदा भारी।।
उनकी चर्या छिद्र रहित, नौका सम भवदधि तरणी है।
ऐसा वीर्याचार नमूं मैं, गुणमय सज्जन अर्चित है।।६।।
मन वच काय निमित्तक उत्तम, तीन गुप्ति भव दुःख वारक।
ईर्या समिति आदि पंच हैं, पंच महाव्रत भी चारित।।
वृषभ वीर के सिवा त्रयोदश, चरित अन्य ने नहीं कहा।
परमेष्ठी जिनपती वीर को, सच्चरित्र को नमूं सदा।।७।।
पंचाचार भवोदधि तारक, तीर्थ महा मंगल उसको।
वंदू चारित युत सब यतिपति, निग्र्रंथों को भी नति हो।।
आत्माधीन सुखोदय वाली, लक्ष्मी अविनाशी अनुपम।
केवलदर्शन ज्ञान प्रकाशी, उज्जवल उसको इच्छुक हम।।८।।
यदि आगम प्रतिवूâल चरित को, मैंने किया कराया है।
उससे अर्जित पाप नाश हों, चारित तप की महिमा से।।
इस चारित तप से ये अद्भुत, सात ऋद्धि निधि भी होवें।
स्व की निंदा करते मेरे, सब दुष्कृत मिथ्या होवें।।९।।
भव दुःख से भयभीत सदोदय, सुख के इच्छुक जो प्राणी।
मुक्ति के हैं निकट सुमतियुत, पाप शांतयुत ओजस्वी।।
मोक्षमहल की सीढ़ी सम यह, चारित उत्तम अतुल विशाल।
वे इस पर चढ़ मोक्षमहल में, पहुँचे रहें अनन्तों काल।।१०।।
अंचलिका
दोहा- भगवन् ! चारित भक्ति अरु, कायोत्सर्ग महान् ।
कर उसकी आलोचना, करना चहूँ प्रधान।।१।।
सम्यग्ज्ञान युक्त सम्यक् से, सहित सभी में श्रेष्ठ प्रधान।
मोक्ष मार्गमय कर्म निर्जरा, के फल रूप क्षमा आधार।।
पंच महाव्रत संयुत पंच, समिति अरु तीन गुप्ति से युक्त।
ज्ञान ध्यान के साधक समता से संयुत उत्तम चारित।।२।।
उस चरित्र को नितप्रति अर्चूं, पूजूं वंदूँ नमूं महान।
शुद्ध भाव से भक्ति करके, पाऊँ पंचम चरित प्रधान।।
दुःखों का क्षय कर्मों का क्षय, हो मम बोधि लाभ होवे।
सुगति गमन हो समाधिमरणं, मम जिन गुण संपति होवे।।३।।
शंभु छंद- हे भगवन्! मैं अष्टमी दिवस का चाहूं आलोचन करना।
आठ दिवस औ आठ रात्री के भीतर हुए दोष हरना।।
ज्ञानाचार दर्शनाचार व वीर्याचार तपाचारा।
चारित्राचार पांच ये हैं आचार मोक्ष के आधारा।।
इनमें है ज्ञानाचार प्रथम, जो आठ भेद शुद्धीयुत है।
वह काल विनय उपधान१ तथा बहुमान२ अनिह्नव व्यंजन है।।
पुनि अर्थ उभय५ इन शुद्धि से स्तव६ स्तुति७ अर्थाख्याना८।।
अनुयोग९ और अनुयोगद्वार१० में किया यदी अक्षर हीना।।
या पद से कम या व्यंजन कम या अर्थहीन या गं्रथ कमी।
यदि अकाल में स्वाध्याय किया या करवाया या अनुमति दी।
या काल में नहिं स्वाध्याय किया या झटिति पढ़ा मिथ्या मिश्रण।
विपरीत अर्थकर पढ़ा अन्यथा कहा अन्यथा किया ग्रहण।।
छह आवश्यक में हानी की इस ज्ञानाचार में दोष किया।
पणविध स्वाध्याय की सिद्धी हो, वह दुष्कृत मेरा हो मिथ्या।।१।।
दर्शनाचार आठविध है निःशंकित निःकांक्षित गुण से।
अरु निर्विचिकित्सा अमूढ़दृक् उपगूहन स्थितिकरण गुण से।।
वात्सल्य प्रभावना इन अठ में शंका कांक्षा व जुगुप्सा की।
मिथ्यादृष्टि की प्रशंसा की अरु परपाखंड प्रशंसा की।।
अनायतन की सेवा की वात्सल प्रभावना नहीं किया।
इन दोषों से जो हानी की वह दुष्कृत मेरा हो मिथ्या।।२।।
छह अभ्यंतर छह बाहिर से बारहविध तप आचार कहा।
उनमें से अनशन अमोदर्य वृतपरिसंख्या रसत्याग कहा।।
तनुपरित्याग-तनुक्लेश२ विविक्त शयनासन तप बाह्य कहे।
प्रायश्चित विनय सुवैयावृत स्वाध्याय ध्यान३ व्युत्सर्ग कहे।।
इन बारह तप को नहीं किया परिषह से पीड़ित छोड़ दिया।
तप किरिया में जो हानी की वह दुष्कृत मेरा हो मिथ्या।।३।।
है वीर्याचार पांचविध से वर वीर्य पराक्रम से जानो।
आगमवर्णित४ तप परीमाण, बल५ वीर्य६-सहज शक्ती मानो।।
परक्रम७-परिपाटी से मैंने पण वीर्याचार में हानी की।
निज शक्ति छिपायी तपश्चरण करने में तप में हानी की।
तप क्रिया न की परीषह आदि से पीड़ित हो यदि छोड़ दिया।
इस वीर्याचार में दोष किया वह दुष्कृत मेरा हो मिथ्या।।४।।
हे भगवन् ! इच्छा करता हूँ, चारित्राचार त्रयोदशविध।
वह पांच महाव्रत पांच समिति, अरु तीन गुप्तिमय जिनभाषित।।
इनमें िंहसा का त्याग महाव्रत प्रथम कहा है जिनवर ने।
भूकायिक जीव असंख्यातासंख्यात व जलकायिक इतने८।।
अग्नीकायिक भि असंख्यातासंख्यात पवनकायिक इतने९।
जो वनस्पतिकायिक प्राणी, वे सभी अनंतानंत भणें।।
ये हरित बीज अंकुर स्वरूप, नानाविध छिन्न-भिन्न भी हों।
इन सबको प्राणों से मारा, संताप दिया पीड़ा दी हो।।
उपघात किया मनवचतन से, या अन्यों से करवाया हो।
या करते को अनुमति दी हो, वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।१।।
दो इन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात कुक्षि कृमि४ शंख कहे।
क्षुद्रक कौड़ी व अक्ष अरिष्टय५, गंडबाल लघु शंख कहे।।
जो सीप जोंक आदिक इनको, मारा या त्रास दिया भी हो।
पीड़ा दी या उपघात किया, या पर से भी करवाया हो।।
या करते को अनुमति दी हो, वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।२।।
त्रय इन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात वुंâथु६ देहिक बिच्छू।
जूं गोजों खटमल इंद्रगोप, चिउंटी आदिक बहुविध जंतू।।
इनको मारा संताप दिया, पीड़ा दी घात किया भी हो।
करवाया या अनुमति दी हो, वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।३।।
चउ इंद्रिय जीव असंख्यातासंख्यात उन्हीं में डांस मशक।
बहु कीट पतंगे भ्रमर मधूमक्खी गोमक्खी आदि विविध।।
इनको मारा परिताप विराधन, या उपघात किया भी हो।
करवाया या अनुमति दी हो, वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।४।
पंचेंद्रिय जीव असंख्यातासंख्यात इन्हों में अंडज हैं।
पोतज व जरायुज रसज पसीनज सम्मूर्छन उद्भेदिम हैं।।
उपपाद जन्मयुत भी चौरासी, लाख योनि वालों में जो।
इनको मारा संताप दिया, पीड़ा दी घात किया जो हो।।
करवाया या अनुमति दी हो, वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।१।।
अब अन्य द्वितीय महाव्रत में विरती है झूठ बोलने से।
इसमें जो क्रोध मान माया या लोभ राग या द्वेषों से।।
या मोह हास्य या भय प्रदोष या प्रमाद प्रेम या गृद्धी४ से।
लज्जा गारव५ व अनादर से या अन्य किन्हीं भी कारण से।।
जो कुछ भी झूठ वचन बोले या पर से भी बुलवाया हो।
या अन्यों को अनुमति दी हो वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।२।।
अब अन्य तृतीय महाव्रत में बिन दी वस्तू से विरती है।
ग्राम नगर खेट६ कर्वट७ मटंब८, मण्डल पत्तन९ या द्रोणमुखे१०।।
गोकुल आश्रम व सभा संवाहन६ राजधानी७ इन आदी में।
तृण लकड़ी विकृती८ मणि आदी कुछ भी बिन दिये ग्रहा मैंने।।
या पर से ग्रहण कराया हो अनुमति दी लेने वालों को।
जो दोष हुए हों इस व्रत में वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।३।।
अब अन्य चतुर्थ महाव्रत में मैथुन सेवन से विरती है।
इसमें देवी के नारी के तिर्यंचि अचेतन पुतली के।।

(आर्यिकाओं को उपरोक्त पंक्ति की जगह निम्न पंक्ति बोलना चाहिए)
(इसमें देवों के मानव के तिर्यंच अचेतन चित्रों के।।)
सुन्दर व असुन्दर रूपों में प्रिय अप्रिय शब्द व गंधों में।
चक्षूइंद्रिय के विषयों में कर्णेन्द्रिय के परिणामों में।।
घ्राणेंद्रिय के विषयों में रसनेंद्रिय की अभिलाषा में।।
स्पर्शेन्द्रिय के विषयों में या मन के अनियत विषयों में।
मन वच तन को वश में निंह कर इंद्रिय को वश नहिं करके मैं।।
इन नवविध ब्रह्मचर्य की रक्षा नहिं की नहीं करायी हो।
नहिं रक्षक को अनुमति दी हो वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।४।।
अब अन्य पांचवे महाव्रत में, परिग्रह रखने से विरती है।
वह परिग्रह अभ्यंतर व बाह्य से द्विविध तथा अभ्यंतर में।।
वो ज्ञानावरणी दर्शनावरण वेदनीय मोहनी आयु कहे।
पुनि नाम गोत्र अरु अन्तराय ये अठविध अंतर परिग्रह हैं।।
बाहिर परिग्रह उपकरण शास्त्र पिच्छी व भांड२ फलक आसन।
कमंडलु संस्तर काठ३ व तृण वसती४ व देवकुल५ आदि ग्रहण।।
भोजनपानादिक भेदों से बहुविध परिग्रह के लेने में।
जो अठविध कर्मों को मैंने बांधा है अज्ञानादी से।
पर को भी बंध कराया हो या करते को अनुमति दी हो।
जो परिग्रह त्याग में दोष किये, वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।५।।
अब अन्य छठे अणुव्रत में भी रात्रि भोजन से विरती है।
इसमें भोजन पानक व खाद्य अरु स्वाद्य चतुर्विध भोजन है।।
इसमें जो तीखा कटु कषायला खट्टा मीठा लवणमयी।
जो कुछ अयोग्य वस्तू खाने का चिंतन किया व प्रेरणा दी।।
अथवा अयोग्य आहार किया या स्वप्न मे मैंने खाया हो।
या पर को खिलाया अनुमति दी वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।छ।।
पण समिति में ईर्यासमिति व भाषासमिति एषणासमिती है।
आदान निक्षेपण समिति अरू मलमूत्रादिविसर्जन समिती है।।
इसमें ईर्यासमिती पूर्वोत्तर दक्षिण पश्चिम चउदिश में।
विदिशा में भी चलना चाहिए चउ हाथ देखकर आगे में।।
फिर भी प्रमाद से शीघ्र चला या इधर-उधर मुख कर करके।
जो प्राणभूत अरु जीव सत्त्व का घात किया नहिं लख करके।।
या पर से घात कराया हो या करते को अनुमति दी हो।
ईर्यासमिती में दोषों का वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।६।।
भाषासमिती में कर्वâश५ कडुवे मर्मभेदि६ निष्ठुर वच हैं।
परक्रोधजनक हड्डी में घुसते मध्यंकृश७ अतिमदकर८ हैं।।
विद्वेषकरी अनयंकर९ छेदंकर निमूलनाशी वच हैं।
प्राणी के वधकर ये दशविध की भाषा जिनमतभाषित हैं।।
ऐसी भाषा बोली मैंने या पर से भी बुलवायी हो।
बोलते अन्य को अनुमति दी वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।७।।
एषणसमिती में अधःकर्म३ है महादोष उसको करके।
पश्चात्४ कर्म या पुराकर्म५ उद्दिष्ट६ निर्दिष्ट७ क्रीत८ युत से।।
स्वादिष्ट रसीले आसक्तिक इंगाल९ व धूमदोष१० करके।
अतिगृद्धी से ही अग्नीसम छह जीवकाय बाधा करके।।
नहिं योग्य११ अन्नपान भिक्षा आहार लिया या लिवाया हो।
लेते को भी अनुमति दी हो वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।८।।
आदान निक्षेपण समिती में चक्कल१२ पाटा या गं्रथों को।
या कमंडलु विकृति या मणि इत्यादिक बहु उपकरणों को।।
पिच्छी से शोधन निंह करके धरते या उठाकर लेने से।
जो प्राण भूत अरु जीव सत्त्व का घात किया हो प्रमाद से।।
पर से उपघात कराया हो या करने की अनुमति दी हो।
इस समिती में जो दोष हुआ, वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।९।।
उत्सर्ग समिति मल मूत्र थूक कफ विकृति विसर्जन करने में।
रात्री में या संध्या१३ में नयन अगोचर अप्रासुक१४ थल में।।
स्थानखुला गीली भू हरितघासयुत बीज सहित थल मेंं।
इत्यादि अप्रासुक थल में जो मल आदि त्याग के करने में।।
जो प्राण भूत अरु जीव सत्त्व का घात किया या कराया हो।
करते को भी अनुमति दी हो वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।१०।।
मनगुप्ति वचनगुप्ती व कायगुप्ती त्रयगुप्ती हैं इनमें।
जो आर्तध्यान अरु रौद्र ध्यान इह भव अरु परभव संज्ञा में।।
आहार व भय मैथुन परिग्रह, इन चारों ही संज्ञाओं से।
इत्यादि अशुभ संकल्पों से मन को न नियंत्रित रखने से।।
नहिं रखी सुरक्षित मनगुप्ती नहिं अन्यों से रखवायी हो।
नहिं रखते को अनुमति दी हो वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।११।।
वचगुप्ती में जो स्त्रीकथा धन कथा व भोजन राजकथा।
अरु चोर वैर की कथा व परपाखंड कथा इत्यादि कथा।।
इनको कर मैं वचगुप्ती की रक्षा नहिं की न करायी हो।
नहिं करते को अनुमति दी हो वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।१२।।
जो कायगुप्ति में चित्रकर्म२ या पुस्तकर्म३ या काठकर्म४।
या लेप्यकर्म इत्यादि विविध स्त्रीरूपादिक बिन चेतन।।
इनमें नहिं कायगुप्ति रक्खी पर से रक्षा न करायी हो।
नहिं रक्षण करते को अनुमति दी वह दुष्कृत मेरा मिथ्या हो।।१३।।
नव२ ब्रह्मचर्य गुप्ती चउ संज्ञा चार हि आस्रव३ कारण हैं।
दो आर्तरौद्र संक्लेश भाव त्रय अप्रशस्तसंक्लेश४ कहें।।
मिथ्या अज्ञान मिथ्यादर्शन मिथ्या चरित्र चउ उपसर्गा।
चारित्र पाँच छह जीवकाय छह आवश्यक किरिया उक्ता।।
भय सात आठ शुद्धी दश विध हैं श्रमण धर्म दश धर्म ध्यान।
दश मुंडन बारह संयम बाइस परिषह भावना बीस५ पांच।।
पच्चीस क्रिया अठरह हजार हैं शील व गुण चौरासि लाख।
अठबीस मूलगुण बहु उत्तरगुण इन सबमें कीना विघात।।
इन आठ दिनों में अष्टमि में अतिक्रम व्यतिक्रम अतिचार अरू।
जो अनाचार आभोग अनाभोग उन सबका प्रतिक्रमण करूं।।
प्रतिक्रमण सुकरते हुए मेरा सम्यक्त्वमरण व समाधिमरण।
हो पंडितमरण व वीरमरण जिससे नहिं होवे पुनः मरण।।
दुःखों का क्षय कर्मों का क्षय होवे मम बोधिलाभ होवे।।
हो सुगतिगमन व समाधिमरण मम जिनगुणसंपति होवे।।
नमोऽस्तु अष्टमीपर्वक्रियायां.......शांतिभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहं।
(पूर्ववत् कृतिकर्मपूर्वक ९ जाप्य करके शांतिभक्ति पढ़ें।)

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शांतिभक्ति

भगवन् ! सब जन तव पद युग की, शरण प्रेम से नहिं आते।
उसमें हेतु विविध दुःखों से, भरित घोर भववारिधि हैं।।
अतिस्पुâरित उग्र किरणों से, व्याप्त किया भूमण्डल है।
ग्रीषम ऋतु रवि राग कराता, इंदुकिरण छाया, जल में।।१।।
कुद्धसर्प आशीविष डसने, से विषाग्नियुत मानव जो।
विद्या औषध मंत्रित जल, हवनादिक से विष शांति हो।।
वैसे तव चरणाम्बुज युग-स्तोत्र पढ़ें जो मनुज अहो।
तनु नाशक सब विघ्न शीघ्र, अति शांत हुए आश्चर्य अहो।।२।।
तपे श्रेष्ठ कनकाचल की, शोभा से अधिक कांतियुत देव।
तव पद प्रणमन करते जो, पीड़ा उनकी क्षय हो स्वयमेव।।
उदित रवी की स्पुâट किरणों से, ताड़ित हो झट निकल भगे।
जैसे नाना प्राणी लोचन-द्युतिहर रात्रि शीघ्र भगे।।३।।
त्रिभुवन जन सब जीत विजयि बन, अतिरौद्रात्मक मृत्युराज।
भव भव में संसारी जन के, सन्मुख धावे अति विकराल।।
किस विध कौन बचे जन इससे, काल उग्र दावानल से।
यदि तव पाद कमल की स्तुति-नदी बुझावे नहीं उसे।।४।।
लोकालोक निरन्तर व्यापी, ज्ञानमूर्तिमय शान्ति विभो।
नानारत्न जटित दण्डेयुत, रुचिर श्वेत छत्रत्रय हैं।।
तव चरणाम्बुज पूतगीत रव, से झट रोग पलायित हैं।
जैसे सिंह भयंकर गर्जन, सुन वन हस्ती भगते हैं।।५।।
दिव्यस्त्रीदृगसुन्दर विपुला, श्रीमेरु के चूड़ामणि।
तव भामण्डल बाल दिवाकर, द्युतिहर सबको इष्टअति।।
अव्याबाध अचिंत्य अतुल, अनुपम शाश्वत जो सौख्य महान्।
तव चरणारविंदयुगलस्तुति से ही हो वह प्राप्त निधान।।६।।
किरण प्रभायुत भास्कर भासित, करता उदित न हो जब तक।
पंकजवन नहिं खिलते, निद्राभार धारते हैं तब तक।।
भगवन् ! तव चरणद्वय का हो, नहीं प्रसादोदय जब तक।
सभी जीवगण प्रायः करके, महत् पाप धारें तब तक।।७।।
शांति जिनेश्वर शांतचित्त से, शांत्यर्थी बहु प्राणीगण।
तव पादाम्बुज का आश्रय ले, शांत हुए हैं पृथिवी पर।।
तव पदयुग की शांत्यष्टकयुत, संस्तुति करते भक्ति से।
मुझ भाक्तिक पर दृष्टि प्रसन्न, करो भगवन् ! करुणा करके।।८।।
शशि सम निर्मल वक्त्र शांतिजिन, शीलगुण व्रत संयम पात्र।
नमूं जिनोत्तम अंबुजदृग को, अष्टशतार्चित लक्षण गात्र।।९।।
चक्रधरों में पंचमचक्री, इन्द्र नरेन्द्र वृंद पूजित।
गण की शांति चहूँ षोडश-तीर्थंकर नमूं शांतिकर नित।।१०।।
तरुअशोक सुरपुष्पवृष्टि, दुंदुभि दिव्यध्वनि सिंहासन।

चमर छत्र भामण्डल ये अठ, प्रातिहार्य प्रभु के मनहर।।११।।
उन भुवनार्चित शांतिकरं, शिर से प्रणमूँ शांति प्रभु को।
शांति करो सब गण को मुझको, पढ़ने वालों को भी हो।।१२।।
मुकुटहारवुंâडल रत्नों युत, इन्द्रगणों से जो अर्चित।
इन्द्रादिक से सुरगण से भी, पादपद्म जिनके संस्तुत।।
प्रवरवंश में जन्मे जग के, दीपक वे जिन तीर्थंकर।
मुझको सतत शांतिकर होवें, वे तीर्थेेश्वर शांतिकर।।१३।।
संपूजक प्रतिपालक जन, यतिवर सामान्य तपोधन को।
देश राष्ट्र पुर नृप के हेतू, हे भगवन् ! तुम शांति करो।।१४।।
सभी प्रजा में क्षेम नृपति, धार्मिक बलवान् जगत में हो।
समय-समय पर मेघवृष्टि हो, आधि व्याधि का भी क्षय हो।।
चोरि मारि दुर्भिक्ष न क्षण भी, जग में जन पीड़ाकर हो।
नित ही सर्व सौख्यप्रद जिनवर, धर्मचक्र जयशील रहो।।१५।।
-क्षेपक श्लोक-
वे शुभद्रव्य क्षेत्र अरु काल, भाव वर्तें नित वृद्धि करें।
जिनके अनुग्रह सहित मुमुक्षु, रत्नत्रय को पूर्ण करें।।१६।।
घातिकर्म विध्वंसक जिनवर, केवलज्ञानमयी भास्कर।
करें जगत में शांति सदा, वृषभादि जिनेश्वर तीर्थंकर।।१७।।
अंचलिका-
हे भगवन् ! श्री शांतिभक्ति का, कायोत्सर्ग किया उसके।
आलोचन करने की इच्छा, करना चाहूँ मैं रुचि से।।
अष्टमहाप्रातिहार्य सहित जो, पंचमहाकल्याणक युत।
चौंतिस अतिशय विशेष युत, बत्तिस देवेन्द्र मुकुट चर्चित।।
हलधर वासुदेव प्रतिचक्री, ऋषि मुनि यति अनगार सहित।
लाखों स्तुति के निलय वृषभ से, वीर प्रभू तक महापुरुष।।
मंगल महापुरुष तीर्थंकर, उन सबको शुभ भक्ति से।
नित्यकाल मैं अर्चूं, पूजूं, वंदू, नमूं महामुद से।।
दुःखों का क्षय कर्मों का क्षय, हो मम बोधिलाभ होवे।
सुगति गमन हो समाधिमरणं, मम जिनगुण संपति होवे।।
नमोऽस्तु अष्टमीपर्वक्रियायां......सिद्ध-श्रुत-सालोचना-चारित्र-शान्ति-भक्तिः कृत्वा समाधिभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं।
(पूर्ववत् विधिपूर्वक कायोत्सर्ग करके समाधि भक्ति पढ़ें। कदाचित् समयाभाव में लघु समाधिभक्ति पढ़ लेवें।)

[सम्पादन]
समाधिभक्ति

स्वात्मरूप के अभिमुख, संवेदन को श्रुतदृग् से लखकर।
भगवन् ! तुमको केवलज्ञान, चक्षु से देखूँ झट मनहर।।१।।
शास्त्रों का अभ्यास, जिनेश्वर, नमन सदा सज्जन संगति।
सच्चरित्रजन के गुण गाऊँ, दोष कथन में मौन सतत।।
सबसे प्रिय हित वचन कहूँ, निज आत्म तत्त्व को नित भाऊं।
यावत् मुक्ति मिले तावत्, भव भव में इन सबको पाऊँ।।२।।
जैनमार्ग में रुचि हो अन्य, मार्ग निर्वेग हो भव-भव में।
निष्कलंक शुचि विमल भाव हों, मति हो जिनगुण स्तुति में।।३।।
गुरुपदमूल में यतिगण हों, अरु चैत्यनिकट आगम उद्घोष।
होवे जन्म जन्म में मम, सन्यासमरण यह भाव जिनेश।।४।।
जन्म जन्म कृत पाप महत अरु, जन्म करोड़ों में अर्जित।
जन्म जरा मृत्यु के जड़ वे, जिन वंदन से होते नष्ट।।५।।
बचपन से अब तक जिनदेवदेव! तव पाद कमल युग की।
सेवा कल्पलता सम मैंने, की है भक्तिभाव धर ही।।
अब उसका फल माँगू भगवन् ! प्राण प्रयाण समय मेरे।
तव शुभ नाम मंत्र पढ़ने में, वंâठ अवुंâठित बना रहे।।६।।
तव चरणाम्बुज मुझ मन में, मुझ मन तव लीन चरणयुग में।
तावत् रहे जिनेश्वर! यावत्, मोक्षप्राप्ति नहिं हो जग में।।७।।
जिनभक्ती ही एक अकेली, दुर्गति वारण में समरथ।
जन का पुण्य पूर्णकर मुक्ति-श्री को देने में समरथ।।८।।
पंच अरिंजय नाम पंच-मतिसागर जिन को वंदूं मैं।
पंच यशोधर नमूं पंच-सीमंधर जिन को वंदूं मैं।।९।।
रत्नत्रय को वंदूं नित, चउवीस जिनवर को वंदूं मैं।
पंचपरमगुरु को वंदूं, नित चारण चरण को वंदूं मैं।।१०।।
‘‘अर्हं’’ यह अक्षर है, ब्रह्मरूप परमेष्ठी का वाचक।
सिद्धचक्र का सही बीज है, उसको नमन करूँ मैं नित।।११।।
अष्टकर्म से रहित मोक्ष-लक्ष्मी के मंदिर सिद्ध समूह।
सम्यक्त्वादि गुणों से युत श्री-सिद्धचक्र को सदा नमूं।।१२।।
सुरसंपति आकर्षण करता, मुक्तिश्री को वशीकरण।
चतुर्गति विपदा उच्चाटन, आत्म-पाप में द्वेष करण।।
दुर्गति जाने वाले का, स्तंभन मोह का सम्मोहन।
पंचनमस्कृति अक्षरमय, आराधन देव! करो रक्षण।।१३।।
अहो अनंतानंत भवों की, संतति का छेदन कारण।
श्री जिनराज पदाम्बुज है, स्मरण करूँ मम वही शरण।।१४।।
अन्य प्रकार शरण नहिं जग में, तुम ही एक शरण मेरे।
अतः जिनेश्वर करुणा करके, रक्ष मेरी रक्षा करिये।।१५।।
त्रिभुवन में नहिं त्राता कोई, नहिं त्राता है नहिं त्राता।
वीतराग प्रभु छोड़ न कोई, हुआ न होता नहिं होगा।।१६।।
जिन में भक्ती सदा रहे दिन-दिन जिनभक्ती सदा रहे।
जिन में भक्ती सदा रहे, मम भव-भव में भी सदा रहे।।१७।।
तव चरणाम्बुज की भक्ती को, जिन! मैं याचूं मैं याचूं।
पुनः पुनः उस ही भक्ति की, हे प्रभु! याचन करता हूँ।।१८।।
विघ्नसमूह प्रलय हो जाते, शाकिनि भूत पिशाच सभी।
श्री जिनस्तव करने से ही, विष निर्विष होता झट ही।।१९।।
दोहा-
भगवन् ! समाधिभक्ति अरु, कायोत्सर्ग कर लेत।
चाहूँ आलोचन करन दोष विशोधन हेत।।१।।
रत्नत्रय स्वरूप परमात्मा, उसका ध्यान समाधि है।
नितप्रति उस समाधि को अर्चूं, पूजूँ वंदूं नमूं उसे।।
दुःखों का क्षय कर्मों का क्षय, हो मम बोधि लाभ होवे।
सुगतिगमन हो समाधिमरणं, मम जिनगुण संपति होवे।।२।।