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अष्टसहस्री हिन्दी अनुवाद की विशेषताएं

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अष्टसहस्री हिन्दी अनुवाद की विशेषताएं

लेखक-प्रो. भागचन्द्र जैन भास्कर, नागपुर
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रूपरेखा-१. अनुवाद कला और विवरणात्मक पद्धति

२. वाक्यविज्ञान और शब्दचयन, पदबन्ध, उपवाक्य आदि

३. अनुवाद के प्रकार-शाब्दिक अनुवाद, भावानुवाद और पर्याय के आधार पर अनुवाद, टीकानुवाद

४. अनुवादक की अपेक्षित योग्यता

५. अष्टसहस्री के हिन्दी अनुवाद की विशेषताएँ-

(१) मूल ग्रंथ का सटिप्पण सम्पादन (२) अष्टशती की पृथक् पहचान (३) निर्दोष अनुवाद (४) अर्थात्, अर्थ, भावार्थ और विशेषार्थ के माध्यम से स्पष्टता (५) सारांश के माध्यम से विषय की सरलतम प्रस्तुति।

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अनुवाद कला-

अनुवाद कला भाषाविज्ञान की एक विशिष्ट शाखा है, जिसके आधार पर अनुदित कृति को कसौटी पर कसा जाता है। परमपूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी आध्यात्मिकता और वैदुष्य की प्रतिकृति हैं। उन्होंने शताधिक ग्रंथों का अनूठा प्रणयनकर साहित्यिक क्षेत्र की अभिवृद्धि की है। वे संस्कृत और प्राकृत भाषाओं में भी निष्णात हैं। आचार्य विद्यानंद कृत अष्टसहस्री जैसे दुष्प्रवेश्य दार्शनिक ग्रंथ का हिन्दी अनुवाद कर उन्होंने अपने संस्कृत पाण्डित्य का सुन्दर परिचय दिया है। यहाँ हम इस अनुवाद को अनुवाद कला के परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास करेंगे।

अनुवाद एक ऐसी भाषिक प्रक्रिया है, जिसमें लेखक की अभिव्यक्ति का रूपान्तरण किया जाता है। इसे हम भिन्न भाषा में मूल विषय की पुनरुक्ति कह सकते हैं। अनुवाद का अर्थ ही है पृष्ठ कथन या समानान्तर कथन। न्यायसूत्र के अनुसार विधि और विहित का अनुवचन ही ‘‘अनुवाद’’ है (विधिविहित स्यानुवचनमनुवाद:)। मीमांसा में इसी विधि प्राप्त आशय का दूसरे शब्दों में समर्थन के लिए कथन करना ही ‘अनुवाद’ कहा गया है। वह तीन प्रकार है-भूतार्थानुवाद, स्तुत्यर्थानुवाद और गुणानुवाद। उपनिषदों में यही अनुवाद शब्द ‘पुनरुक्ति’ अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

आज यह अनुवाद अंग्रेजी शब्द ‘ट्रांसलेशन’ के अर्थ में विकसित हुआ है, जिसे हम दूसरी भाषा में ज्यों का त्यों कहना कह सकते हैं। वर्तमान भाषाविज्ञान के क्षेत्र में अनुवाद की परिभाषा अनेकरूपों में दिखाई देती है। उन परिभाषाओं के विस्तार में न जाकर हम यहाँ इतना ही कहना चाहेंगे कि अनुवाद में एक भाषा की सामग्री को दूसरी भाषा में प्रस्तुत किया जाता है। भाषाविद् नायडा के अनुसार अनुवाद के तीन स्वरूप हैं-(१) शाब्दिक अनुवाद (२) भावानुवाद और (३) पर्याय के आधार पर अनुवाद। सारानुवाद, टीकानुवाद आदि और भी अनेक रूप प्राप्त होते हैं।

अनुवादक को इस अनुवाद की प्रक्रिया में द्विभाषी होना आवश्यक है। दोनों भाषाओं का समुचित ज्ञान न होने पर अनुवादक विषय के साथ न्याय नहीं कर सकता और फिर यदि वह भाषाशास्त्र का भी कुशल अध्येता हो, तो नि:संदेह वह सफल अनुवादक सिद्ध हो सकता है। यह अनुवाद विज्ञान विवरणात्मक भाषाशास्त्र के अन्तर्गत आता है, जिसमें ध्वनिप्रक्रिया, व्याकरणात्मक और रूपस्वनिर्मात्मक विशेषताओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। अनुवाद करते समय अनुवादक कभी-कभी उपयुक्त शब्द के चुनाव में कठिनाई का अनुभव करता है। भाषा संस्कृति से जुड़ी रहती है। हर संस्कृति की अपनी-अपनी विशेषताएँ होती हैं और उन विशेषताओं को अभिव्यक्त करने के लिए विशेष शब्द भी होते हैं। दूसरी भाषाओं में ऐसे विशिष्ट शब्दों के लिए प्रतिशब्द प्राप्त हो जायें, यह सरल नहीं होता। फिर सांस्कृतिक और दार्शनिक शब्दावली होती है, जिसका अनुवाद संक्षेप में करना कठिन हो जाता है। अनुवादक के समक्ष पर्यायवाची शब्दों में से यथायोग्य शब्दों को उठाना भी कष्टसाध्य होता है।

व्यवहारत: सभी पर्यायों में निकटता तो होती है पर अर्थ की समानता कम होती है। ऐसी स्थिति में वह उपयुक्त और निकटतम शब्द का चुनाव करता है। इसी तरह वाक्यविज्ञान की ओर भी ध्यान देना अनुवादक के लिए आवश्यक हो जाता है। इसके अन्तर्गत वह उसके पदबंध और उपवाक्यों पर अपना ध्यान विशेषरूप से केन्द्रित करता है। प्रत्येक भाषा का अपना गठन होता है, उसकी अपनी वाक्य रचना होती है, जो उस भाषा की प्रकृति के अनुकूल होती है। अंग्रेजी की वाक्य रचना का हिन्दी की वाक्य रचना पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। पर भारतीय भाषाओं की प्रवृत्ति लगभग समान है।

अतएव अनुवाद में इस दृष्टि से कठिनाई नहीं होती। फिर भी सजीवता और स्वाभाविकता बनाए रखने के लिए मूल भाषा की सामग्री को अपनी भाषा की प्रकृति के अनुसार लिखना अधिक श्रेयस्कर है। इस दृष्टि से अनुवादक को स्रोत भाषा में प्रयुक्त वाक्यांश/मुहावरों की पृष्ठभूमि अच्छी तरह समझना चाहिए और उसके समकक्ष अभिव्यक्ति देने के लिए सटीक मुहावरों का चयन करना चाहिए। अनुवादक वस्तुत: अभिव्यक्ति का ही अनुवाद करता है, शब्द का नहीं।

अनुवाद की समग्रता पर विचार करते हुए हम उसके मुख्यत: तीन रूपों पर विचार कर सकते हैं-शाब्दिक अनुवाद, भावानुवाद और पर्याय के आधार पर अनुवाद-

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(१) शाब्दिक अनुवाद-

शाब्दिक अनुवाद में मात्र शब्द बदलने से काम नहींr चलता, उसके व्याकरणिक रूप पर भी ध्यान देना आवश्यक हो जाता है। शब्द भण्डार का निर्माण और संग्रह कर के अनुवादक यत्विंâचित् आवश्यक परिवर्तन के साथ मूल शब्दों को ही स्वीकार कर लेता है। पारिभाषिक शब्दावली के क्षेत्र में तो शाब्दिक अनुवाद के सिद्धान्त का ही पालन करना पड़ता है। लिप्यन्तरण की समस्या अवश्य रहती है पर संस्कृत से हिन्दी में यह समस्या अधिक नहीं रहती। इस संदर्भ में अनुवादक को यह अवश्य ध्यान रखना होगा कि शाब्दिक अनुवाद क्लिष्ट, जटिल, अटपटा और हास्यास्पद न हो। उसका शब्दचयन यथानुरूप हो और व्याकरणिक संरचना की उपेक्षा न हो।

(२) भावानुवाद में अनुवादक को लेखक के भाव को ध्यान में रखना पड़ता है। उसे व्यक्तिगत दृष्टि से शब्द के वाक्य के विश्लेषण से दूर रहना चाहिए। यदि वह अपनी मौलिकता का सदुपयोग करता है, तो अनुदित कृति में मूल जैसा आनन्द आ जाता है, रोचकता बढ़ जाती है, अभिव्यक्ति की क्षमता में वृद्धि होती है। अनुवादक को यह ध्यान में रखना होगा कि वह अपनी विचारधारा से पाठक को प्रभावित करने के लिए कहीं मूल से हट तो नहीं रहा है। भावानुवाद वस्तुत: छायानुवाद नहीं है। वह तो भावों का मात्र बाहक है, संकेतक है। अतएव उसे मूल के निकटतम ही रहना चाहिए।

(३) पर्याय के आधार पर होने वाले अनुवाद में पर्यायार्थक शब्दों का विशेष महत्व होता है। अनुवादक पर्यायार्थक शब्दों में से यथोचित शब्दों का चयन करता है ताकि शब्द की मूल आत्मा तिरोहित न हो सके। शब्द की वास्तविक शक्ति उसके प्रयोग में ही निहित होती है। व्यवहारत: सब पर्यायों में निकटता होती है पर उनके प्रयोग से अर्थ में भिन्नता आ जाती है। भारतीय परम्परा में इसी को अर्थ-संकेत कहा जाता है। शब्द शक्तियों में प्रसंगादि की दृष्टि से अर्थ तत्त्व का महत्त्व अधिक हो जाता है। अनुवादक को इसका विशेष ध्यान रखते हुए शब्दचयन करना पड़ता है।

(४) भारतीय वाङ्मय में टीकानुवाद भी एक प्राचीन पद्धति रही है। मूल गं्रथ पर टीका, भाष्य, अनुटीका, वृत्ति आदि लिखे जाते रहे हैं। अनुवादक उन्हें अपनी भाषा में अनूदित करता है। तत्त्वार्थ सूत्र, आप्तमीमांसा आदि संस्कृत ग्रंथ ऐसे ही हैं जिनपर विविध टीकाएँ लिखी गर्इं हैं और भिन्न भाषी विद्वानों ने उनका अनुवाद अपनी भाषाओं में किया है। यह टीकानुवाद उपर्युक्त भेदों के अन्तर्गत समाहित हो जाता है। अनुवाद के संदर्भ में तीन महत्वपूर्ण पक्ष हैं-प्रथम अनुवादक को मूलस्रोत की भाषिक संरचना का परिज्ञान होना चाहिए और द्वितीय उसकी विषय वस्तु की अच्छी जानकारी होना चाहिए। तीसरा पक्ष है ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक धरातल से परिचित रहना। इन तीन पक्षों के आधार पर ही वह मूल के सत्य को सुन्दरतम ढंग से सुरक्षित रख सकता है। इसलिए कहा गया है कि ‘‘अगर सुन्दर है तो सत्य (वफादार) नहीं हो सकता। अनुवाद वस्तुत: उस पत्नी की तरह होता है, जो अगर वफादार है तो खूबसूरत नहींr हो सकती और खूबसूरत है तो वफादार नहीं हो सकती।’’

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अष्टसहस्री का हिन्दी अनुवाद-

आचार्य समन्तभद्र ने आचार्य उमास्वामी के मंगलाचरण पर देवागमस्तोत्र (११४ कारिकाओं की रचना की) और आचार्य अकलंक ने उस पर अष्टशती ग्रंथ लिखा। आचार्य विद्यानंद ने उसी की विस्तृत टीका अष्टसहस्री के नाम से की। यह अष्टसहस्री जैन दर्शन ही नहीं बल्कि समग्र भारतीय दर्शनों का अगाध भण्डार है। आचार्य विद्यानंद ने स्वयं इसे ‘‘कष्टसहस्री सिद्धा’’ कहकर इसकी अगाधता का परिचय दिया है। पूज्य माताश्री ने इसी अष्टसहस्री का हिन्दी अनुवाद किया, जिसकी हिन्दी टीका का नाम उन्होंने ‘‘स्याद्वाद चिन्तामणि भाषा टीका’’ रखा है। इस टीका के लिखने की पृष्ठभूमि में क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी (ब्र. मोतीचंद के रूप में) जैसे उनके संघस्थ साधु आदि विद्यार्थी थे, जिन्हें माताश्री ने सन् १९६९ (वी. नि. सं. २४९७) के जयपुर चातुर्मास में अष्टसहस्री पढ़ाई थी। अपने अध्यापन के दौरान माताश्री को छात्र-छात्राओं की कठिनाइयों का अनुभव हुआ। फलत: उन्होंने सन् १९६९ के चातुर्मास में अनुवाद प्रारंभ करके सन् १९७१ में पौष शुक्ला द्वादशी, ९ जनवरी के दिन यह अनुवाद कार्य पूर्ण किया। प्रथमत: उन्होेंने ५४ सारांश लिखे, जो छात्रों के लिए परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध हुए। ये सारांश बाद में हिन्दी टीका के साथ यथास्थान जोड़ दिये गये। लगभग सवा एक वर्ष में यह अनुवाद पूरा हो गया। इतने वृहदाकार और गंभीर दार्शनिक ग्रंथ का अनुवाद इतनी जल्दी पूरा करना सरल नहीं रहा होगा। यह तो वस्तुत: उनकी अगाध विद्वत्ता और कर्मनिष्ठ क्षमता का प्रतीक है। इसमें प्रकरणों के शीर्षक दिये गये हैं और भावार्थ तथा विशेषार्थ देकर विशिष्ट स्थलों को स्पष्ट किया गया है।

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आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज

संस्कृत के विश्रुत विद्वान थे। उन्हें जब यह अनुवाद दिखाया गया, तो वृद्धावस्था के कारण वे स्वयं उसे पूरा तो नहींr देख सके, पर जो भी पृष्ठ पढ़कर सुनाये गये, उससे उन्होंने संतोष और प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा-‘‘अनुवाद बहुत ही सरल, स्पष्ट एवं प्रभावक हुआ है। माताजी स्वयं एक बार उसका पुनरीक्षण कर लें।’’ तदनुसार माताजी ने पुन: उसे पढ़ा और यथावश्यक सुधारकर अंतिम रूप दिया। बाद में पं. हीरालाल जी सिद्धान्तशास्त्री ने भी इस अनुवाद के कुछ पृष्ठों का पारायण किया और उसे विशुद्ध कहकर भूरि-भूरि प्रशंसा की। इतना ही नहीं, ऐलक पन्नालाल दि. जैन सरस्वती भवन ब्यावर से अष्टसहस्री की एक प्राचीन पाण्डुलिपि भी माताजी को दी, जिसमें कुछ अधिक टिप्पणियाँ और पाठातंर दिये गये थे। माताजी ने उनका भी यथावश्यक उपयोग कर लिया। इसी तरह दि. जैन नया मंदिर धर्मपुरा, दिल्ली के प्राचीन शास्त्र भंडार से प्राप्त प्रति का भी समुचित उपयोग कर उसकी टिप्पणियों और पाठान्तरों को इसमें समाहित किया गया। इस तरह अनुवाद को अपार श्रम, निष्ठा और प्रतिभा के साथ पूरा होने के बाद ही तीन भागों में उसे प्रकाशित किया गया। द्वितीय भाग में पूज्य क्षुल्लक मोतीसागर जी ने अष्टसहस्री के विख्यात विद्वान न्यायाचार्य पं. दरबारीलाल जी कोठिया, लाल बहादुर जी शास्त्री, फूलचंद जी शास्त्री, मोतीलाल जी कोठारी, पन्नालाल जी साहित्याचार्य आदि विद्वानों के नामों का भी उल्लेख किया है, जिन्हें यह अनुवाद दिखाया गया। सभी विद्वानों ने उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की। जब मुझसे इसी अनुवाद पर आलेख तैयार करने को कहा गया तब मन में विचार आया कि इन नामी विद्वानों की मुहर लगने के बाद में मैं उसे क्या देखता। फिर भी आदेश का पालन तो करना ही था। समय निकालकर मैंने भी इन तीन भागों को उलटा-पलटा, कतिपय स्थलों के अनुवाद को देखा और आश्वस्त हुआ कि अनुवाद निश्चितरूप से विशुद्ध हुआ है। माताजी ने अपनी सारस्वत प्रतिभा का भलीभांति उपयोग बड़े परिश्रम के साथ अष्टसहस्री के अनुवाद में किया है। मैंने उसे अनुवाद विज्ञान की कसौटी पर भी कसा और पाया कि वह इस दृष्टि से भी प्रभावक और निर्दोष सिद्ध हुआ है। गुरुवर्य पं. दरबारीलाल जी कोठिया के सहयोग से मैंने भी अष्टसहस्री के अनुवाद करने की योजना बनाई थी। परन्तु उनके अस्वस्थ हो जाने से मैं साहस नहीं कर सका। पूज्य माताजी ने इस कार्य को बड़ी सहजता के साथ पूरा कर दिया। बड़ी प्रसन्नता हुई। उनकी विद्वत्ता के प्रति मेरा विनम्र अभिवादन। मेरी दृष्टि से इस अनुवाद की प्रमुख निम्नलिखित विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं-

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१. मूल ग्रंथ का सम्पादन-

माताजी ने अष्टसहस्री का अनुवाद ही नहीं किया है, उसका सम्पादन भी किया है। माणिकचन्द्र ग्रंथमाला से प्रकाशित मात्र संस्कृत के संस्करण में न सही ढंग से शीर्षक दिये गये थे और न ही उसमें विशेष टिप्पण थे। माताजी ने इन सभी कमियों को दूर कर दिया। उन्होंने अपने इस अनुवाद संस्करण को तीन भागों में विभाजित किया है-

(१) प्रथम भाग में प्रथम ६ कारिकाओं पर महाभाष्य समाहित है। इसमें आप्तपरीक्षा, नियोगवाद, विधिवाद, भावनावाद, वेद का अप्रामाण्य, चार्वाक मत का खण्डन, शून्यवाद, तत्त्वोपप्लववाद, अद्वैतवाद, सर्वज्ञसिद्धि, मोक्ष, संसार तत्त्व आदि विषयों पर विस्तार से विवेचन किया गया है। परिशिष्ट में षट्कारिकान्तर्गत अष्टशती, उद्धृत श्लोक सूची और पारिभाषिक शब्दों का अर्थ दिया गया है। इसमें ‘न्यायसार’ नामक स्वतंत्र ग्रंथ भी परिशिष्ट में समाविष्ट है।

(२) द्वितीय भाग में ७ कारिकाओं से २३ कारिकाओं तक की व्याख्या सन्निहित है। यहाँ तक प्रथम परिच्छेद पूरा हुआ है। इसमें चित्रद्वैतवाद, निरंशज्ञान, प्रत्यक्ष प्रमाण, शून्यवाद, अभाववाद, ब्रह्माद्वैतवाद, सत्ताद्वैतवाद, शब्दनित्यत्व, द्रव्यक्षेत्रकाल-भाव संबंध, उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मक पदार्थ-स्वरूप नैरात्म्यवाद, सत्-असत्, निर्विकल्पवाद, स्वलक्षण, सविकल्पवाद, शब्दाद्वैतवाद, वस्तुत्ववाद, सप्तभंगवाद, अन्यापोहवाद, विधिनिषेधवाद, अर्थक्रियाकारित्व आदि विषयों पर विचार-विमर्श किया गया है।

(३) तृतीय भाग में २४वीं कारिका से ११४वीं कारिकाओं तक का विवरण है। यह विवरण दस परिच्छेदों में विभक्त है। इन परिच्छेदों में अद्वैतवाद, ब्रह्माद्वैतवाद, पुरुषाद्वैतवाद, सन्तानवाद, विज्ञानाद्वैतवाद, आत्मवाद, क्षणिकवाद, संवेदनाद्वैतवाद, अवक्तव्यवाद, पंचस्कन्धवाद, प्रत्यभिज्ञानवाद, समवायवाद, द्रव्य-पर्यायवाद, हेतुवाद, आगमवाद, अपौरुषेयत्व, भाग्य और पुरुषार्थ संबंध, पुण्य-पाप, मिथ्याज्ञान और सम्यग्ज्ञान, ईश्वर सृष्टिकर्तृत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व, प्रमाणवाद, द्रव्यार्थिक-पर्यायार्थिक नयवाद, सुनय-कुनय, स्याद्वाद और अनेकान्तवाद आदि विषयों का विवेचन किया गया है। इन तीनों भागों में अष्टशती को बोल्ड टाईप में दिया गया है। बम्बई से प्रकाशित अष्टसहस्री में अष्टशती को अष्टसहस्री में ही समाहित कर दिया गया था। यहाँ अष्टशती के हिन्दी अनुवाद को भी गहरे काले अक्षरों में दिया गया है और उसे चिन्हित भी कर दिया गया है। परिशिष्ट में भी मूलकारिका के साथ अष्टशती को प्रस्तुत किया गया है। मुद्रित प्रति के अतिरिक्त दिल्ली से प्राप्त तीन प्रतियाँ भी अ,ब,स से संकेतित हैं तथा व्यावर व दिल्ली की हस्तलिखित अष्टसहस्री में ‘भाष्य’ पद से अष्टशती को पृथक् कर दिया गया है। उन सभी के आधार से पाठभेद भी परिशिष्ट में नीचे दिया गया है।

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(२) निर्दोष अनुवाद-

अनुवाद शाब्दिक हुआ है और कहीं-कहीं भावानुवाद भी दिखाई दिया है। पर वह इतना निर्दोष और तथ्यग्राही है कि पाठक अवाक् रह जाता है। अनुवाद में प्रवाह है, गति है, भाषा सशक्त है, संस्कृतनिष्ठ है। यदि मूल ग्रंथ को अलग कर दिया जाये तो पाठक को पता नहीं चलेगा कि यह अनुवाद है। अनुवाद की अभिव्यक्ति में स्पष्टता है। यथास्थान योग्य शीर्षक पाकर पाठक और भी आश्वस्त हो जाता है। सारांश, भावार्थ और विशेषार्थ तो उस विषय को और भी स्पष्ट करते चले जाते हैं। अनुवाद भाग में जैन, बौद्ध, नैयायिक, वैशेषिक आदि को स्वतंत्र पैराग्राफ में पाकर पाठक विषय को आसानी से हृदयंगम कर लेता है। अनुवाद में शब्दचयन भी सुन्दर और सशक्त हुआ है। ‘अर्थात्’ के माध्यम से भी विषय को कुशलतापूर्वक समझाया गया है। इस ग्रंथ में संस्कृत और हिन्दी में जो शीर्षक हैं उन्हें पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी ने बनाये हैं, जिनका संकेत यह () । प्रारंभ से अष्टशती को संस्कृत एवं हिन्दी में गहरे काले अक्षरों में लिया है। ब्यावर सरस्वती भवन की हस्तलिखित प्रति की टिप्पणियों को पृथक् दिखाने के लिए अंग्रेजी अंकों द्वारा संकेत किया है। पाठान्तर के लिए ‘इतिपा.’ संकेत दिया है। दिल्ली से उपलब्ध प्रति की टिप्पणी और पाठांतरों में ‘‘दि. प्र.’’’ संकेत दिया है। यथावश्यक ‘इति वा क्वचित् पाठ:’ संकेत देकर चिन्तन के और भी द्वार खोल दिये हैं। धरमपुरा दिल्ली के नया मंदिर जी से श्री पन्नालाल जी अग्रवाल के सौजन्य से तीन प्रतियाँ हस्तलिखित अष्टशती की प्राप्त हुई हैं, जिनका सांकेतिक नाम ‘अ,ब,स’ दिया है। परिशिष्ट में मूलकारिका के साथ अष्टशती को दिया है। उस अष्टशती की एक मुद्रित प्रति है, जो कि भारतीय जैन सिद्धांत प्रकाशित संस्था से प्रकाशित हुई है। तीन प्रतियाँ दिल्ली की है, जो कि ‘अ,ब,स’ से संकेतित हैं तथा ब्यावर व दिल्ली की हस्तलिखित अष्टसहस्री में ‘भाष्य’ पद से अष्टशती को पृथक् किया है। उन सभी के आधार से पाठभेद भी परिशिष्ट में नीचे दिया गया है। इस प्रथम भाग में जितने भी उद्धृत श्लोक आये हैं, उन्हें भी अकारादि के अनुक्रम से दिया है। अनंतर पारिभाषिक शब्दों के अर्थों का स्पष्टीकरण किया गया है। अष्टसहस्री आदि सभी न्याय ग्रंथों में प्रवेश कराने के लिए कुंजी के समान ‘न्यायसार’ नामक स्वतंत्र संकलित ग्रंथ को परिशिष्ट में जोड़ दिया गया है। अन्य दार्शनिक (दर्शन शास्त्र) प्रमाण के लक्षण और भेदों को किस रूप में मानते हैं, उसका भी वर्णन है। इसी प्रकार जैनाचार्यों द्वारा मान्य प्रमाण के भेद-प्रभेदों का भी संकलन किया गया है। संसार, मोक्ष, आत्मा एवं ज्ञान आदि के विषय में अन्य दर्शनों की मान्यता के साथ-साथ जैनाचार्यों की समीचीन मान्यता को भी दर्शाया गया है। परिशिष्ट में न्यायसार ग्रंथ देकर अष्टसहस्री के पाठकों को विषयबोध का महापथ और भी सरल बना दिया। माताजी ने कुछ स्वरचित संस्कृत पद्यों को भी यथास्थान जोड़ दिया जिससे विषय की चेतना में उठाव आ गया। इस महत्त्वपूर्ण साहित्यिक कार्य के लिए माताजी को जितनी भी बधाईयाँ दी जायें, उतनी कम हैं। उन्होंने प्रारंभ से ही अष्टशती को संस्कृत एवं हिन्दी में गहरे काले अक्षरों में लिखा है।

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(३) सारांश

तीनों भागों में अनुवाद के बीच-बीच में जो सारांश दिये गये हैं, वे अपने आप में एक ग्रंथ का रूप ले लेते हैं। पाठक इन सारांशों के शीर्षक देखकर उनकी उपयोगिता पर विचार कर सकते हैं- प्रथम भाग

१. आप्त परीक्षण का सारांश (पृ. १८)

२. नियोगवाद के खण्डन का सारांश (पृ. ४२)

३. विधिवाद के खण्डन का सारांश (पृ. ८८)

४. भावनावाद के खण्डन का सारांश (पृ. १८७)

५. चार्वाक् मत के खण्डन का सारांश (पृ. १८७)

६. तत्त्वोपप्लववादी के खण्डन का सारांश (पृ. २२४)

७. सर्वज्ञ के अतीन्द्रिय ज्ञान की सिद्धि का सारांश (पृ. २७९)

८. सर्वज्ञ के दोषावरण के अभाव का सारांश (पृ. ३१२)

९. सर्वज्ञसिद्धि का सारांश (पृ. ३५०)

१०. चार्वाक् मत के खण्डन का सारांश (पृ. ३६१)

११. चार्वाक् मीमांसक और नैयायिक ज्ञान को स्वसंविदित नहीं मानते हैं। उनकी इस विचारधारा के खण्डन का सारांश (पृ. ३७३)

१२. सांख्यादि के द्वारा मान्य संसार मोक्ष के खण्डन का सारांश (पृ. ३९३)

१३. सांख्याभिमत संसार-मोक्ष कारण के खण्डन का सारांश (पृ. ४०२)

१४. नवनीत

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द्वितीय भाग

१. एकान्त शासन में दूषण का सारांश (पृ. १०१)

२. जय पराजय व्यवस्था का सारांश (पृ. १०३)

३. एकान्तवाद में पुण्य-पापादि के अभाव का सारांश (पृ. १०३)

४. भावैकान्त के खण्डन का सारांश (पृ. १०५)

५. प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव की सिद्धि का सारांश (पृ. १३१)

६. मीमांसकाभिमत शब्दनित्यत्व के खंडन का सारांश (पृ.१६६)

७. नैयायिकाभिमत शब्दनित्यत्व का सारांश (पृ. १७३)

८. नैयायिकाभिमत शब्द अमूर्तत्त्व के खण्डन का सारांश (पृ. १७७)

९. इतरेतराभाव का सारांश (पृ. २१४)

१०. इतरेतराभाव और अत्यंताभाव की सिद्धि का सारांश (पृ. २१८)

११. अत्यंताभाव का सारांश (पृ. २३२)

१२. अभावैकांत पक्ष के खंडन का सारांश (पृ. २४८)

१३. सत्, असत्, उभयैकात्म्य के खण्डन का सारांश (पृ. २५३)

१४. अवक्तव्य के खण्डन का सारांश (पृ. २८२)

१५. अनेकांतसिद्धि का सारांश (पृ. ३५५)

१६. अस्तित्व, नास्तित्व धर्म अविनाभावी का सारांश (पृ. ३८९)

१७. स्याद्वाद के अर्थक्रियाकारित्व का सारांश (पृ. ४२०)

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तृतीय भाग

१. अद्वैतवाद खण्डन का सारांश (पृ. ३२)

२. योगाभिमत पृथक्त्वैकांत खण्डन का सारांश (पृ. ४०)

३. बौद्धाभिमत पृथक्त्वैकांत खण्डन का सारांश (पृ. ५४)

४. बौद्धाभिमत सामान्य खण्डन का सारांश (पृ. ७०)

५. पृथक्त्वैकत्व रूप अनेकांत की सिद्धि का सारांश (पृ. ८५)

६. विवक्षा एवं अविवक्षा के विषय का सारांश (पृ. ९१)

७. भेदाभेद वस्तु प्रमाण का विषय है (पृ. ९९)

८. नित्य एकान्त के खण्डन का सारांश (पृ. ११९)

९. बौद्धाभिमत क्षणिवैâकान्त खण्डन का सारांश (पृ. १६८)

१०. बौद्धाभिमत अवक्तव्य के खण्डन का सारांश (पृ. १९४)

११. बौद्धाभिमत निर्हेतुक नाश एवं विसदृश कार्योत्पाद हेतु के खण्डन का सारांश (पृ. २१२)

१२. नित्य एवं क्षणिक में स्याद्वाद सिद्धि का सारांश (पृ. २५६)

१३. यौगाभिमत कार्य-कारणादिक के भिन्नत्व का खण्डन (पृ. २९७)

१४. परमाणु के अभिन्नैकान्त खण्डन का सारांश (पृ. ३०७)

१५. सांख्याभिमत कार्य-कारण के एकत्व का निरास (पृ. ३११)

१६. यौग के उभयैकान्त एवं बौद्ध के अवाच्यत्व का खण्डन (पृ. ३१४)

१७. कथंचित् अन्यत्व अनन्यत्व की सिद्धि का सारांश (पृ. ३३२)

१८. एकान्तरूप अपेक्षा-अनपेक्षा का खण्डन व स्याद्वादसिद्धि का सारांश (पृ. ३४७)

१९. ऐकांतिक हेतुवाद अथवा आगमवाद का खण्डन, स्याद्वादसिद्धि (पृ. ३७१)

२०. अपौरुषेय वेद का खण्डन (पृ. ३७२)

२१. अन्तरंगार्थ एवं बहिरंगार्थ के एकांत का खण्डन एवं स्याद्वादसिद्धि (पृ. ४०५)

२२. प्रत्यक्ष एवं बहिरंगार्थ के एकांत का खण्डन एवं स्याद्वादसिद्धि (पृ. ४०६)

२३. जीव के अस्तित्व की सिद्धि का सारांश (पृ. ४३३)

२४. दैव एवं पुरुषार्थ के एकान्त निरसन का सारांश (पृ. ४४६)

२५. पुण्य पापवाद का सारांश (पृ. ४५७)

२६. अज्ञान से बंध एवं ज्ञान से मोक्ष के खण्डन का सारांश (पृ. ४८१)

२७. ईश्वर सृष्टि-कर्तृत्व के खण्डन का सारांश (पृ. ५१४)

२८. प्रमाण का लक्षण और फल स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्वâ की पृथक् सिद्धि (पृ. ५५१)

२९. स्याद्वाद लक्षण का सारांश (पृ. ५६९)

३०. नयों के लक्षण का सारांश (पृ. ५९९)

इस तरह अष्टसहस्री के सम्पूर्ण अनुवाद का पारायण करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि पूज्य माताजी ने अपनी सारस्वत प्रतिभा और वैदुष्य का उपयोगकर अनुवाद को पूर्णत: निर्दोेष एवं सर्वग्राही बना दिया है। लगभग प्रत्येक प्रकरण में भावार्थ और विशेषार्थ तथा बाद में सारांश देकर इस अनुवाद विधा को नया आयाम तो दिया ही है, साथ ही विषय को अधिकाधिक स्पष्ट करने का भी यथाशक्य प्रयत्न किया है। जैनदर्शन के मर्म को समझने के लिए यह अनुवाद वस्तुत: एक स्वतंत्र ग्रंथ का रूप ले सकता है। स्याद्वाद और अनेकान्तवाद की शैली में लगभग सभी दार्शनिक विषयों पर आचार्य समन्तभद्र, अकलंक और विद्यानंद की तार्विâक तथा व्यवहारिक दृष्टि की झांकी इस अष्टसहस्री में मिल जाती है। इस दुरूह और दुष्प्रवेश्य ग्रंथ का अनुवाद पूज्य माताजी ने इतने कम समय में और इतनी सरल शैली में पूरा कर दिया, यह कदाचित् ‘न भूतो न भविष्यति’ की उक्ति को स्मृतिपथ पर लाता रहेगा। भाषाविज्ञान की अनुवाद विज्ञान शैली की दृष्टि से भी यह अनुवाद खरा उतरता है। उनके इस वैदुष्य भरे व्यक्तित्व को पुन: पुन: अभिवंदामि। वे निरामय रहकर शतायु हों और इसी तरह जैन वाङ्मय की अभिवृद्धि करती रहें, यही हमारी भावना है।