ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अष्टसहस्री (प्रथम भाग)

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अष्टसहस्री (प्रथम भाग) के विषय में
प्रकाशक दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर
लेखक गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी
पुस्तक के विषय में जैन न्यायदर्शन का अतिप्राचीन एवं सर्वोच्च ग्रंथ है-अष्टसहस्री। तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ में आचार्य श्री द्वारा रचित मंगलाचरण पर टीका रूप में आचार्य समंतभद्र स्वामी ने ११४ कारिकाएं लिखकर ‘‘आप्तमीमांसा’’ नाम से ग्रंथ रचना की। इन्हीं कारिकाओं पर आचार्य अकलंकदेव ने अष्टशती नाम से टीका लिखी। पुन: कारिकाओं एवं अष्टशती को लेकर अब से १२०० वर्ष पूर्व आचार्य श्री विद्यानंद स्वामी ने अष्टसहस्री नाम से आठ हजार श्लोक प्रमाण विस्तृत टीका का निर्माण किया तथा स्वयं आचार्य महोदय ने उसे कष्टसहस्री नाम दिया। इसमें विभिन्न एकांत मतों के पक्ष को अनेकांत शैली में खण्डन करके स्याद्वादमत की पुष्टि की गई है।

पूज्य माताजी ने इस ग्रंथ की हिन्दी टीका करके जन-जन के लिए कष्टसहस्री कहे जाने वाले ग्रंथ को सुगम सहस्री बना दिया। इस प्रथम भाग में ६ कारिकाओं की टीका हुई है। इसके प्रथम संस्करण में अंत में १२० पृष्ठीय न्यायसार ग्रंथ को भी जोड़ दिया गया है। द्वितीय संस्करण का प्रकाशन मार्च १९८९ में, पृष्ठ संख्या ४४४ है तथा तृतीय संस्करण भी सन् २००८ में छप चुका है।

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