ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अष्ट मंगलद्रव्य

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अष्ट मंगलद्रव्य

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श्री रतनलाल कटारिया केकड़ी (अजमेर)'
जैनशास्त्रों में विभिन्न प्रकार से अष्ट मंगल द्रव्यों के उल्लेख पाये जाते हैं नीचे सप्रमाण उन पर प्रकाश डाला जाता है—

१— तिलोयपण्णत्ती (अधिकार ४)

भिंगार कलश दप्पण, चामर धय वियण छत्र सुपइट्ठा।
इय अट्ठ मंगलाइं, अट्ठुत्तर सय जुदाणि एक्केक्वंकं।।७३८।।

(१. भृंगार·झारी १.कलश·लोठा ३. दर्पण ४.चमर ५.ध्वजा ६.व्यजन·पंखा ७. छत्र ८.सुप्रतिष्ठक (सु प्रतीक)·ठूणा ये आठ मंगल द्रव्य हैं जो प्रत्येक १०८ होते हैं)

भिंगार कलस दप्पण, धय चामर छत्त वियण सुपइट्ठा।।४९।।
भिंगार कलस दप्पण, वीयण धय छत्त चमर सुपइट्ठा।।१६०।।

२— हरिवंशपुराण, सर्ग २ (जिनसेन कृत)

छत्र चामर भृंगारै: कलशध्वज: दर्पणै: व्यजनै: सुप्रतीकैश्च प्रसिद्धैरष्टमंगलै:।।७२।।

यहाँ भी उपर्युक्त प्रकार से ही अष्ट मंगल दिये हैं। निम्नांकित ग्रन्थोें में भी इसी प्रकार दिये हैं देखो

३— महापुराण (जिनसेनाचार्य कृत)

छत्रं ध्वजं सकलशं चामरं सुप्रतिष्ठकं।
भृंगारं दर्पणं तालमियत्याहु र्मंगलाकष्टकम् ।।३७।।पर्व १३

सतालमंगलच्छत्र चामरध्वज दर्पणा:।
सुप्रतिष्ठकभृंगार कलशा: प्रति गोपुरं।।२७५।।पर्व२२

४— तिलोयसार ((नेमिचन्द्राचार्य कृत)

भिंगार कलस दप्पण, वीयण धय चामरादवत्तमह।
सुवइट्ठ मंगलाणिय, अट्ठहिय सयाणि पत्तेयं।।९८९।।

५—नंदीश्वर भक्ति के अंत में समवशरण वर्णन—

भिंगार ताल कलशध्वज सुप्रतीक, श्वेतात पत्र वर दर्पण चामराणि।
प्रत्येक मष्ट शतकानि विभांति यस्य, तस्मै नमस्त्रिकभुवन प्रभवे जिनाय।।७।।

६—नंदीश्वर भक्ति श्लोक १६ की प्रभाचन्द्रीय टीका में—

छत्रं ध्वजं कलश चामर सुप्रकंकं, भृंगार तालमतिनिर्मलदर्पणं च।
शंसंति मंगल यिदं निपुण स्वभावा: द्रव्यस्वरूपमिह तीर्थकृतोऽष्टधैव।।
(सुप्रतीक·सुठु प्रतीका अवयवा यस्य स:)

७— जयसेन प्रतिष्ठापाठ (पृष्ठ २९१)

तालातयत्र चमरध्वज सुप्रतीक—भृंगार दर्पण घटा: प्रतिवीथिचारं।
सन्मंगलानि पुरत: विलसंति यस्य, पादार विन्द युगलं शिरसा वहामि।।८८३।।

८— पंचपरमेष्ठी पूजा (यशोनंदिकृत)

आल्वब्द केतु घट चामर सुप्रतिष्ठ—, तालातपत्रमिति मंगलमष्टधैव।
भूत्वागतं जिनपदाब्जनतिं विधातुं, तन्मंगलाष्टकयुतं जिनमर्चयेतं।।३७।।

(यहाँ ‘अब्द’ का अर्थ दर्पण है और ‘आलु’ का अर्थ भृंगार·झारी है)

९— लोक विभाग (सिंहसूरि कृत) अध्याय १—

भृंगार कलशादर्शा व्यजनं ध्वज चामरे, सुसुप्रतिष्ठापत्रे चेत्यष्टौ सन्मंगलान्यपि।।२९९।।

१०— प्रतिष्ठासारोद्वार (आशाधरकृत) अध्याय ४

छत्र चामर भृंगार कुंभाब्दव्यजनध्वजान् ।
ससुप्रतिष्ठान्।यानिन्द्रो भर्तुस्तेतेडत्रसंतुते।।२०३।।

११—मुनिसुव्रत काव्य (अर्हद्दासकृत) सर्ग १० (पृष्ठ १९५)

आकीर्ण केतु चमरी रुहतालवृन्त, कालाचिकाब्द कलसातपवारणादि:।
हम्र्यावनिर्जिन जित घृत पुष्पकेतौ, सेना निवेश इव चेलकुटीचितोऽभात ।।२१।।

(इसमें ‘काला चिक’ शब्द का अर्थ संस्कृत टीका में ‘पतद्ग्रह’ (गिरते हुए को ग्रहण करने वाला ·ठूणा, पीक दानी) दिया है। संस्कृत टीका में ‘अकीर्ण’ का अर्थ व्याप्त किया है इससे ७ ही मंगलद्रव्य रह जाते हैं। शायद ८ वां (झारी द्रव्य) आदि शब्द से ग्रहण करने को छोड़ा हो। ‘अकीर्ण’ का अर्थ भी भृंगार—झारी किया जा सकता है ‘आकीर्ण’ का अर्थ होता है विखेरने वाला झारी से भी पानी झराया—विखेरा जाता है।)

१२— जिन स्तुति पंच विंशतिका (महाचन्द्रकृत, ‘‘अनेकांत’’ वर्ष १४ पृष्ठ ३१५)

चज्चचन्द्र मरीचि चामर१ लसन् , श्वेतातपत्रे २ पतत् ।
त्रैलोक्य प्रभु भवकीर्तिकथके, शुंभत्सुभृंगार३ कम्।।
कांचत्कुम्भ ४धनुद ध्वजौ ५ च विलसत् ताल: ६ सदाकंकं ७।
येऽस्योद् भांति च सुप्रतीक ८ सहितास्तस्मै जिनेशे नम:।।६।।

१३— धर्म संग्रह श्रावकाचार (पं० मेधावी कृत ) सर्ग २

छत्र चामर भृंगार ताल कुंभाब्द केतव:।
‘‘शुक्ति:’’ प्रत्येक’ माभांति मंगलान्यकंकं शतं।।१२९।।

(इसमें सुप्रतिष्ठक (ठूणा) की जगह ‘‘शुक्ति:’’ शब्द दिया है अगर ‘शुक्ति: प्रत्येक’की जगह सुप्रतिष्ठक कर दिया जाये तो छंदोभंग भी नहीं होगा और अर्थ भी ठीक हो जायेगा)

१४— समवशरणपाठ (लाला भगवान् दास ब्रह्मचारी कृत वि० सं० १९८५) पृष्ठ ६३

चमर छत्र झारी अरु कलशा, दर्पण ध्वजा बीजणा जानो।
ठूणा मिले भये मंगल द्रवि, आठ कह्यो तिनको परमानो।।११६।।

१५— पूजासार (हस्तलिखित पत्र ९९)

मुक्तालंबूषलम्बैरटतकरनभैरात१ पत्रैरघत्रै:।
भृंगारै:२ सुप्रतिष्ठै र्मणिमय मुकुरै:४ तालवृन्तैरनन्तै ५।।
त्रैलोक्येशं पातकी ६ कलश ७ सुचमरै८ र्मंगलैर्पूजयामो।
भूयासुर्मोक्षलक्ष्मीपरिणयनविधावंगिनांमंगलानि।।

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१६— रत्नकरंड श्रावकाचार टीका
(पं० सदासुखदासजी कृत) में पृष्ठ ३२४, ६६१, एवं ६६४ पर तथा बृहज्जैन शब्दार्णव भाग २ पृष्ठ ३६३ पर व प्रतिष्ठासार संग्रह (ब्र. शीतलप्रसादजी कृत) में भी उक्त प्रकार से ही अष्ट मंगल द्रव्य बताये हैं
यह तो हुआ एक ही प्रकार का शृंखलाबद्ध कथन। अब इनसे कुछ भिन्नता लिए अष्टमंगलद्रव्यों के उल्लेख हैं वे आगे प्रकट किये जाते हैं—

१७— जम्बूदीव पण्णत्ती (आ० पद्मनंदिकृत) उद्देश १३

छत्र धय कलस चामर, दप्पण सुवदीक थाल भिंगारा।
अट्ठवर मंगलाणि य, पुरदो गच्छंति देवस्स।।११२।।

(गाथा ११३ से १२१ में उपरोक्त आठ मंगल द्रव्यों का अलग अलग विस्तृत वर्णन है, गाथा ११९ में ‘थाल’ का अर्थ दिया है— ‘पूजाद्रव्यों से भरे और स्त्रियों के हाथों में सुशोभित रत्नमय थाल (पात्र)’। यहाँ ७ मंगलद्रव्य तो पूर्ववत् है सिर्फ १ ताल =·पंखा की जगह थाल दिया है त और थ के मामूली अन्तर से अर्थ में बहुत अंतर हो गया है।

१८— वसुनंदि श्रावकाचार—

छत्तेहिं चामरेहिं य, दप्पण भिंगार ताल वट्ठेहिं।
कलसेहिं पुफ्फवडलिय सुपइट्ठय दीव णिवहेहिं।।४००।।

(इसमें ‘ध्वजा’ की बजाय ‘दीपावलि’ नया मंगलद्रव्य दिया है)

१९— समवशरणस्तोत्र (विष्णुसेन कृत)

संघाटक भृंगार छत्राब्द व्यजन शुक्ति चामर कलशा:।
मंगलमष्टविधं स्यादेकैकस्याष्ट शत संख्या।।५१।।

(इसमें ठूणा और घ्वजा मंगल द्रव्यों के बजाय दो नये मंगल द्रव्य दिये हैं—संघाटक और शुक्ति।
शुक्ति का अर्थ सीप होता है। प्रमाण नं० १३ में भी ‘शुक्ति’ मंगलद्रव्य है। संधाटक का कोई अर्थ मिला नहीं, शायद िंसघाड़ा हो जो त्रिपद होने से तिपाई का भी वाची—हो)

२०— प्रतिष्ठा तिलक (भ० नेमिचन्द्र कृत) पत्र पृष्ठ १०६

न्यसामि भेरीरव शंख घंटा—प्रदीप चन्द्रार्क रथांगकाब्दान्।
मंत्रात्ककान्पूर्वमुखासुदिक्षु, क्रमादिहाष्टावपि मंगलानि।।

(इसमें एक अब्द · दर्पण को छोड़कर शेष सात मंगलद्रव्य बिल्कुल नये हैं जो इस प्रकार हैं—१.भेरी का रव·(रव की बजाय ‘वर’ पाठ हो ) २.शंख ३.घंटा ४.प्रदीप ५.चन्द्र ६.सूर्य ७.रथांग·चक्र)

२१— पूजासार (हस्तलिखित पत्र ११—१२)

भेरीं शंखं च घंटां च दीपं चन्द दिवाकरौ। चकमादकंकं विद्धिमंगलान्यष्ट धीधना:।।

(ये आठों मंगलद्रव्य ऊपर के प्रमाण नं० २० की तरह ही हैं और कुछ भी अंतर नहीं है)

२२— पूजासार (हस्तलिखित पत्र ४१)

ॐ सुप्रतिष्ठ मुकुलध्वज तालवृन्त, श्वेतातपत्र चमरीरुह तोरणानि।
सत्सम्मुखीन कलशै: सह मंगलानि स्थाप्यानि सम्यगभित: पृथुवेदिकाया:।।

(इसमें भृंगार ·झारी के बजाय तोरण’ मंगलद्रव्य नया दिया है)

२३— पूजासार (हस्तलिखित पत्र ८४)

घंटा चामर केतु ताल कलश छत्रावली थालिका।
भृंगाराष्टक चूर्णपल्लवभिदा पुंडे्रक्षुदंडादिभि:।।
अन्यैश्चाम्बरभर्मरत्नरचितैद्र्रव्यैर्जगन्मगलै:।
देवो मंगलमादिम जिनपतिर्भक्यामयाभ्यच्र्यते।।

(इसमें २ मंगलद्रव्य नये हैं जो दर्पण और सुप्रतिष्ठक की जगह घंटा और थाली के रूप में दिये हैं)

२४— चरचा संग्रह (हस्तलिखित ‘जावद’ ग्राम की प्रति)

आठ मंगलद्रव्य को ब्योरो—बीजणो, चंवर, छत्र, कलश, झारी, सांठ्यो , ठोणु, दर्पणा।।

(इसमें ‘ध्वजा’ की जगह ‘सांठिया’ मंगलद्रव्य दिया है जो नया है)

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२५— समवशरण पाठ (लाला भगवान दास जी ब्रह्मचारीकृत वि० सं० १९८५)

झारी कलशा और बीजणा जानिये, दर्पण ठोणा छत्र चंवर परमानिये।
सिंहासन युत आठ कहे द्रव हैं सही, पूजन उत्सव धरन वेदी ऊपर यही।।

(इसमें ’ध्वजा’ की बजाय ’िंसहासन’ मंगलद्रव्य दिया है)

२६— प्रतिष्ठासार संग्रह (वसुनंदि कृत) (हस्तलिखित पृष्ठ ४७)

मंगलानि च पूर्वादौ श्वेतच्छत्रं सुदर्पणं।
ध्वजं चामर युग्मं च तोरणं तालवृन्तकम्।।३६।।

नंद्यावत्र्तं, प्रदीपं च दिशाष्वष्टासु पूजयते्।।

(इसमें ठूणा, झारी, कलश इन ३ मंगलद्रव्यों की जगह तोरण, नंद्यावत्र्त, प्रदीप ये ३ नये मंगलद्रव्य दिये हैं।

२७— णमोकार मंत्र (लक्ष्मीचन्द्र बैनाड़ा, दिल्ली कृत पृष्ठ १८)

छत्र चमर घंटा ध्वजा, झारी पंखा नव्य।
स्वस्तिक दर्पण संग रहे, जिनवसु मंगलद्रव्य।।

इसमें ठूणा कलश की जगह घंटा और स्वस्तिक नये मंगलद्रव्य दिये हैं)

२८— अभिषेक पाठ (माघनंदि कृत)

भृंगार चामर सुदर्पण पीठ कुम्भ, ताल ध्वजातप निवारक भूषिताग्रे।
वर्धस्व नंद जय पाठ पदावलीभि:, िंसहावने जिन! भवन्तमहं श्रयामि।।५।।

(इसमें सुप्रतिष्ठक की बजाय ‘पीठ’ (पोढा) नयामंगलद्रव्य दिया है)

२९— दर्शनपाहुड गाथा ३५ की श्रुतसागरी टीका—

अरहंत के चौतीस अतिशयों में १४ देवकृत अतिशय हैं उसमें १४ वा अतिशय अष्टमंगल रूप में इस प्रकार बताया है—१ भृंगार·सुवर्णालुका (सोने की झारी) २ ताल · मंजीर: (कांस्य—ताल—मंजीरा) ३ कलश:·कनक कुंभ: ४ ध्वज:·पताका ५ सुप्रतीका·विचित्र चित्र मयी पूजा द्रव्य स्थापनार्हा स्तंभाधार कुंभी ६ श्वेत छत्रं ७ दर्पण: ८ चामरं।

(इसमें सब पूर्ववत् होते हुए भी ‘ताल’ शब्द का अर्थ पंखे की बजाय मंजीरा किया है यह नया है)

इस प्रकार पुराणे (१ भृंगार २ कलश ३ दर्पण ४ चमर ५ ध्वजा ६ पंखा ७ छत्र ८ ठूणा) और नये (९ थाल १० दीप ११ संघाटक १२ शुक्ति १३ भेरी १४ शंख १५ घंटा १६ चन्द्र १७ सूर्य १८ चक्र १९ तोरण २० स्वस्तिक (सांठिया) २१ सिंहासन २२ नंद्यावत्र्त २३ पीठ २४ मंजीरा) कुल चौबीस हो जाते हैं। ये मंगल—शुभ रूप होने से जिन प्रतिमा के आगे विराजमान रहते हैं। इसी से पं. आशाधर जी ने अपने जिन—सहस्रनाम में तृतीयशतक के अंत में जिनेन्द्र का एक नाम ‘‘अष्ट मंगल:’’ भी दिया है। ये मंगल द्रव राजसी ठाठ में, आहार और पूजा के उपकरणों में भी प्रयुक्त होते हैं।
लोक में और भी बहुत से मंगल हैं। ‘धवला’ पुस्तक १ पृष्ठ २७ पर आठ मंगल इस प्रकार दिये हैं—

सिद्धत्थ पुण्ण कुंभो वंदणमाला य मंगलं छत्तं। सेदो वण्णो आदंसणो य कण्णा य जच्चस्सो।। (१सिद्धार्थ·सरसों २ भरा हुआ घड़ा ३ वंदनमाला ४ छत्र ५ श् वेतवर्ण ६ दर्पण ७ कन्या ८ जात्यश्व ·उत्तम जाति का घोड़ा (ये आठ मंगल बताये हैंं ‘अष्ट मंगलद्रव्य’ नहीं) ये आठों मंगल रूप क्यों हैं इसकी सिद्धि के लिये ‘पंचास्तिकाय’ की जयसेन कृत तात्पर्यवृत्ति पृष्ठ५ पर अलग अलग ८ गाथायें दी हैं जो सुंदर और अध्ययनीय हैं)

श्वेताम्बर सम्प्रदाय में अष्टमांगल्य इस प्रकार बताये हैं—

दप्पण भद्दासण बद्धमाण सिखिच्छ मच्छ वर कलसा
सात्थिय नंदावत्ता मंगलाईणि एयाणि।। जीवाभिगमे

(१ दर्पण २ भ्रदासन ३ वर्धमान (सिकोरा, तश्तरी) ४ श्रीवत्स ५ मत्स्य ६ कलश ७ स्वस्तिक ८ नंद्यावत्र्त ये आठ मांगल्य होते हैं) औपपातिक सूत्र ३९ में भी अष्टमंगल दिये हैं वहां और तो सब उपर्युक्त वत् हैं सिर्फ ‘भद्रासन’ की जगह ‘महाराज’ दिया है सो हाथी भी आसन ·सवारी के काम आने से दोनों एकार्थक संभव है। ‘आचार दिनकर’ पृष्ठ १९७—१९८ में इन आठ मंगलों के एक एक प्रतीकार्थ की अलग अलग व्याख्या दी है।

कुषाण कालीन आयाग पट्टों पर अष्ट मंगल इस प्रकार दिये हैं—

(अ) मीन मिथुन, देव विमानगृह, श्रीवत्स, वर्धमानक, त्रिरत्न, पुष्पमाला, वैजयन्ती, पूर्णघट
(ब) स्वस्तिक, दर्पण भस्मपात्र तिपाई, मीनयुगल (२ संख्या) पुष्पमाला, पुस्तक।

(‘वैजयंती ’ का अर्थ ध्वजा है। वर्धमानक’ की जगह भस्मपात्र रत्नपात्र, चूर्णपात्र नाम दिये हैं)
पांड्य शासकों के कांस्य सिक्कों पर अंकित अष्ट मंगल—

गज, वृक्ष, नंदि पद (बैल का खुर) कुंभ, अर्धचन्द्र, श्रीवत्स, दर्पण चक्र।
मथुरा के दूसरी शताब्दी के एक छत्र पर अंकित अष्ट मंगल—

नंदिपद, मत्स्य युग्म, स्वस्तिक, पुष्पमाला, पूर्णघट, रत्नपात्र, श्री वत्स, शंख निधि।
‘‘जैनस्थापत्य और कला’’ भाग ३ (भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित ) पृष्ठ ४७३—

(अ) स्वर्ण कलश, घट दर्पण, अलंकृत, व्यजन, ध्वज, चमर, छत्र पताका।
(ब) छत्र, चमर, ध्वज, स्वस्तिक, दर्पण, कलश, चूर्णपात्र, भद्रासन।

१५ वीं शति के आठ पवित्र चीनी बौद्ध प्रतीक—

चक्र, शंख, छत्र ध्वजा, पद्म कलश, मतस्य श्रीवत्स।
शकुन कारिका (वैदिकग्रंथ)

दर्पणा: पूर्णकलश:, कन्या, सुमनसोडक्षता:। पुष्प, अक्षत, दीपमाला, ध्वजा:, लाजा, संप्रोत्तंâ चाष्टमंगलं।। कन्या, पुष्प, अक्षत, दीप, ध्वजा, लाजा (खीलें) ये ८ मंगल हैं)
बृहन्नंदिकेश्वर पुराण (वैदिकग्रंथ)

मृगराजो वृषो नाग: कलशो व्यजनं तथा। वैजयंती तथा भेरी दीप इत्यष्ट मंगलं।।

(सिंह, बैल, हाथी, कलश, पंखा, ध्वजा, भेरी, दीप ये ८ मंगल हैं)

नारदीय मनुस्मृति (वैदिकग्रंथ)

लोकेस्मिन्मंगलान्यष्टौ ब्रह्माणोगौर्हुताशन: हिरण्यं सर्पि रादित्य आपोराजातथाष्टम:।५१

लोक में ८ मंगल हैं—१ ब्राह्मण २ गाय ३ अग्नि ४ चांदी ५ घी ६ सूर्य ७ जल ८ राजा।)

इस प्रकार दिगम्बरेतर और लौकिक अष्ट मंगलों में कुल मंगल ४३ हो जाते हैं जिनके इकट्ठे नाम निम्नांकित हैं—

१ सरसों २ पूर्णघट ३ वंदनमाला ४ छत्र ५ श्वेतवर्ण के पदार्थ ६ दर्पण ७ कन्या ८ अश्व ९ भद्रासन १० वर्धमानक ११ श्रीवत्स १२ मत्स्य १३ कलश १४ स्वस्तिक १५ नंद्यावत्र्त १६ हाथी १७ देवविमानगृह १८ त्रिरत्न १९ पुष्पमाला २० ध्वजा २१ तिपाई २२ पुस्तक २३ वृक्ष २४ नंदिपद २५ चन्द्र २६ चक्र २७ शंख २८ पंखा २९ कमल ३० अक्षत ३१ दीप ३२ लाजा ३३ सिंह ३४ बैल ३५ भेरी ३६ ब्रह्मण ३७ गाय ३८ अग्नि ३९ चांदी ४० घी ४१ सूर्य ४२ जल ४३ राजा। इनमें दिगबरीय ९ मंगल (भृंगार, ठूणा, थाल, संधाटक, शुक्ति, घंटा, तोरण, पीठ, मंजीरा) और मिलाने पर मंगलों की कुल संख्या ५२ हो जाती हैं।

मंगल शब्द का अर्थ है— मं पापं गायतीति मंगलम् ·जो पापों अनिष्टों को नष्ट करे वह मंगल है। परमार्थ से तो अरिहंत, सिद्ध, साधु और केवली प्रणीत धर्म (चत्तारिमंगलं पाठ) ये चार ही मंगल बताये हैं, किन्तु उपचार से उपयुत्र्तâ अष्ट द्रव्योें को भी मंगल कह दिया गया है, क्योंकि ये अरिहंत के सान्निध्य को प्राप्त हुए हैं। आठ की संख्या ठाठ (वैभव) की सूचक है।
अरिहंत के ४६ गुणों में अष्टमहाप्रातिहार्य (अशोक वृक्ष सुरपुष्प वृष्टि, दुंदुभि, सिंहासन, दिव्यध्वनि, छत्रत्रय, चामर युगल प्रभामंडल) बताये हैं वे इन अष्ट मंगलों से जुदा हैं।

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