ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्ज एप पर मेसेज करें|

अहिंसा की वैज्ञानिक आवश्यकता और उन्नति के उपाय

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


अहिंसा की वैज्ञानिक आवश्यकता और उन्नति के उपाय

17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg
17800291-cute.jpg

महावीर अहिंसा और जैनधर्म तीनों एक दूसरे से इतने अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं कि किसी एक के बिना अन्य की कल्पना करना भी मुश्किल लगता है। अत: जैन धर्म की उन्नति हेतु अहिंसा की वैज्ञानिकता सिद्ध करना सर्वाधिक सामयिक प्रतीत होता है। स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गाँधी जैसे महामनीषी भी धर्म और विज्ञान के प्रबल पक्षधर रहे हैं। जैन धर्म में अहिंसा का विशद विवेचन किया गया है तथा वर्तमान विज्ञान के आलोक में एक ओर जहाँ अिंहसक आहार से अपराध, खाद्य समस्या, जल समस्या और रोगों का निदान दिखायी देता है वहीं दूसरी ओर अहिंसा के द्वारा जैव विविधता संरक्षण एवं कीड़ों का महत्व भी दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार अहिंसा की जीव वैज्ञानिक आवश्यकता का अनुभव होने पर अहिंसा हेतु विभिन्न वैज्ञानिक उपाय, वृक्ष खेती, ऋषि—कृति, समुद्री खेती, मशरूम खेती, जन्तु विच्छेदन विकल्प, अिंहसक उत्पाद विक्रय केन्द्र, इत्यादि हमारे सामने आते हैं। यह सब देखने पर भारत के कतिपय वैज्ञानिकों के इस विचार की पुष्टि होती है कि आधुनिक विज्ञान का आधार बनाने में प्राचीन भारत का अमूल्य योगदान रहा है।[१] इसके साथ प्रसिद्ध गांधीवादी िंचतक स्व. श्री यशपाल जैन द्वारा अपने जीवन भर के अनुभवों का निचोड़, मुझको निम्नलिखित रूप में लिखने का औचित्य भी समझ में आता है कि—‘वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की है।’

(अ) अहिंसा का जैनधर्म में महत्व—

जैनधर्म में जीवों का विस्तृत वर्गीकरण कर प्रत्येक जीव की सुरक्षा हेतु दिशा—निर्देश अनेक स्थानों पर मिलते हैं। जैन शास्त्रों में माँस के स्पर्श से भी हिन्सा बतायी गई है।[२] त्रस हिंसा को तो बिल्कुल ही त्याज्य बताया गया है।[३] निरर्थक स्थावर हिंसा भी त्याज्य बताई गई है।४ धर्मार्थ हिंसा[४]वही, पृष्ठ १३०. २६. , इां. ९५, ज्. ७३ अतिथि के लिये हिंसा[५], छोटे जीव के बदले बड़े जीवों की हिंसा[६], पानी को पाप से बचाने के लिये मारना९, दुखी[७] या सुखी को मारना[८], एक के वध में अनेक की रक्षा का विचार[९], समाधि में सिद्धि हेतु गुरु का शिरच्छेदर[१०], मोक्ष प्राप्ति के लिये हिंसा[११], भूखे को भी माँसदान[१२]— इन सब हिंसाओं को हिंसा मानकर इनको त्यागने का निर्देश है और स्पष्ट कहा गया है कि जिनमत सेवी कभी हिंसा नहीं करते।।[१३] इनके अलावा अहिंसा के संबंध में कुछ अन्य जिनसूत्र भी दृष्टव्य हैं—‘ज्ञानी होने का सार यही है कि वह किसी भी प्राणी की हिंसा ना करें’[१४], सभी जीव जीना चाहते हैं, मरना नहीं इसलिये प्राण वध को भयानक मानकर निग्र्रन्थ उसका वर्जन करते हैं’[१५], ‘जीव का वध अपना ही वध है, जीव की दया अपनी ही दया है’[१६], ‘अहिंसा के समान कोई धर्म नहीं है’[१७]

(आ) जीवन के आलोक में अहिंसा

१. आहार और अपराध—सात्विक भोजन से मस्तिष्क में संदमक तंत्रिका संचारक (न्यूरो इनहीबीटरी ट्रांसमीटर्स) उत्पन्न होते हैं जिनसे मस्तिष्क शांत रहता है वहीं असात्विक (प्रोटीन/माँस) भोजन से मस्तिष्क में उत्तेजक तंत्रिका (न्यूरो एक्साइटेटरी ट्रांसमीटर्स) उत्पन्न होते हैं जिससे मस्तिष्क अशांत होता है।

गाय, बकरी, भेड़ आदि शाकाहारी जन्तुओं में सिरोटोनिन की अधिकता के कारण ही उनमें शान्त प्रवृत्तियाँ पायी जाती हैं, जबकि मांसाहारी जन्तुओं जैसे शेर आदि में सिरोटोनिन के अभाव से उनमें अधिक उत्तेजना, अशांति एवं चंचलता पायी जाती है।

इस परिप्रेक्ष्य में सन् १९९३ में जर्नल आफ क्रिमिनल जस्टिस एजूकेशन में फ्लोरिडा स्टेट के अपराध विज्ञानी सी. रे. जैम्फरी का वक्तव्य भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वजह चाहे कोई भी हो, मस्तिष्क में सिरोटोनिन का स्तर कम होते ही व्यक्ति आक्रामक और व्रूर हो जाता है। अभी हाल में शिकागो ट्रिब्यून में प्रकाशित अग्रलेख भी बताता है कि ‘मस्तिष्क में सिरोटोनिन की मात्रा में गिरावट आते ही हिंसक प्रवृत्ति में उफान आता है’। यहाँ यह बताना उचित होगा कि माँस या प्रोटीन युक्त भोज्य पदार्थों से, जिनमें ट्रिप्टोपेन नामक एमीनो अम्ल नहीं होता है मस्तिष्क में सिरोटोनिन की कमी हो जाती है एवं उत्तेजक तंत्रिका संचारकों की वृद्धि हो जाती है। योरोप के विभिन्न उन्नत देशों में नींद ना आने का एक प्रमुख कारण वहाँ के लोगों का माँसाहारी होना भी है।

उपरोक्त सिरोटोनिन एवं अन्य तंत्रिका संचारकों की क्रिया विधि पर काम करने पर श्री पाल ग्रीन गार्ड को सन् २००० का नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

२. आहार और खाद्यान्न समस्या—

वैज्ञानिकों का मानना है कि विश्व भर के खाद्य संकट से निपटने के लिये अगले २५ वर्षों में खाद्यान्न उपज को ५० प्रतिशत बढ़ाना होगा। इस समस्या को सुन्दर समाधान अिंहसक आहार शाकाहार में ही संभव है। एक कि. ग्रा. जन्तु प्रोटीन (माँस) हेतु लगभग ८ कि.ग्रा. वनस्पति प्रोटीन की आवश्यकता होती है। सीधे वनस्पति उत्पादों का उपयोग करने पर मांसाहार की तुलना में सात गुना व्यक्तियों को पोषण प्रदान किया जा सकता है।

किसी खाद्य शृंखला में प्रत्येक पोषक स्तर पर ९०ज्ञ् ऊर्जा खर्च होकर मात्र १०ज्ञ् ऊर्जा ही अगले पोषक स्तर तक पहुँच पाती है। पादप प्लवक, जन्तु प्लवक आदि से होते होते मछली तक आने में ऊर्जा का बड़ा भारी भाग नष्ट हो जाता है और ऐसे में एक चिंताजनक तथ्य यह है कि विश्व में पकड़ी जाने वाली मछलियों का एक चौथाई भाग माँस उत्पादक जानवरों को खिला दिया जाता है।

इस प्रकार विकाराल खाद्यान्न समस्या का एक प्रमुख कारण माँसाहार तथा एकमात्र समाधान शाकाहार ही है।

३. आहार और जल समस्या—

विश्व के करीब १.२ अरब व्यक्ति साफ पीने योग्य पानी के अभाव में है। ऐसा अनुमान लगाया गया है वर्ष २०२५ तक विश्व की करीब दो तिहाई आबादी पानी की समस्या से त्रस्त होगी। विश्व के ८० देशों में पानी की कमी है। इस समस्या के संदर्भ में ‘एक किलोग्राम गेहूँ के लिये जहाँ मात्र ९०० लीटर जल खर्च होता है वहीं गोमाँस के उत्पादन में १,००,००० लीटर जल खर्च होता है, तथ्य को ध्यान में रखने पर अिंहसक आहार शाकाहार द्वारा जल समस्या का समाधान भी दिखायी दे जाता है।

४. आहार और बीमारियाँ—

विश्व स्वास्थ्य संगठन की बुलेटिन संख्या ६३७ के अनुसार माँस खाने से शरीर में लगभग १६० बीमारियाँ प्रविष्ट होती हैं। शाकाहार विभिन्न व्याधियों से बचाता है। अधिकांश औषधियाँ वनस्पतियों से ही उत्पन्न होती हैं। हरी सब्जियों में उपस्थित पोषक तत्व तथा विटामिन ‘ई’ एवं ‘सी’ प्रति आक्सीकारकों की तरह कार्य करते हैं। अल्सहाइमर रोग से बचाने में इन प्रति आक्सीकारकों की ही भूमिका होती है। शरीर ये युक्त मूलकों की सफाई में प्रति आक्सीकारक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुक्त मूलक कैंसर सहित अनेक घातक रोगों के लिये उत्तरदायी होते हैं।

५. जैव विविधता संरक्षण और जीवदया—

गत २००० वर्षों में लगभग १६० स्तनपायी जीव, ८८ पक्षी प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं और वैज्ञानिक अनुमान के अनुसार आगामी २५ वर्षों में एक प्रजाति प्रति मिनट की दर से विलुप्त हो जायेंगी। विभिन्न खाद्य शृंखलाओं के द्वारा समस्त जीव जन्तु एवं वनस्पति आपस में उस तरह से प्राकृतिक रूप से जुड़े हुये हैं कि किसी एक के शृंखला से हटने या लुप्त हो जाने से जो असंतुलन उत्पन्न होता है, उसकी र्पूित किसी अन्य के द्वारा असंभव हो जाती हैं उदाहरणार्थ—प्रतिवर्ष हमारे देश में १० करोड़ मेंढ़क मारे जाते हैं। पिछले वर्ष पश्चिमी देशों को निर्यात करने के लिये १००० टन मेंढ़क मारे गये। यदि ये मेंढ़क मारे नहीं जाते तो प्रतिदिन एक हजार टन मच्छरों और फसल नाशी जीवों का सफाया करते। इस प्रकार से प्रकृति में हर जीव जन्तु का अपना विशिष्ट जीव वैज्ञानिक महत्व है और मनुष्य जाति को स्वयं की रक्षा हेतु अन्य जीव जन्तुओं को भी बचाना ही होगा, अहिंसा की र्धािमक भावना तथा वैज्ञानिकों की सलाह इस संबंध में एक समान है।

६. कीटनाशक और कीड़ों का महत्त्व—

प्रत्येक जीव की तरह कीड़ों का भी बहुत महत्व होता है। दुनिया के बहुतेरे फूलों के परागण में कीड़ों का मुख्य योगदान रहता है अर्थात् पेड़ पौधों के बीज एवं फल बनाने में कीड़े महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। अनेक शोधकत्र्ताओं ने यह पाया कि जिस क्षेत्र में कीटनाशकों का अधिक उपयोग होता है वहाँ परागण कराने वाले कीड़ों की कमी हो जाती है और फसल की उपज पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भारत में कीट पतंगों की १३१ प्रजातियाँ संकटापन्न स्थिति में जी रही हैं। ऐसे में कीटनाशक के बढ़ते उपयोग और उसके होने वाले दुष्प्रभावों से वैज्ञानिक भी िंचतित हो बैठे हैं। विश्व में प्रतिवर्ष २० लाख व्यक्ति कीटनाशी विषाक्तता से ग्रसित हो जाते हैं जिनमें से लगभग २० हजार की मृत्यु हो जाती है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने १२९ रसायनों को प्रतिबन्धित घोषित कर रखा है। कीटनाशक जहर जैसे होते हैं और ये खाद्य शृंखला में लगातार संग्रहीत होकर बढ़ते जाते हैं, इस प्रक्रिया को जैव आवर्धन कहते हैं। उदाहरण के लिये प्रतिबन्धित कीटनाशक डी. डी. टी. की मात्रा मछली में, अपने परिवेश के पानी की तुलना में दस लाख गुना अधिक हो सकती है। और इन मछलियों को खाने वालों को स्वाभाविक रूप से अत्यधिक जहर की मात्रा निगलनी ही पड़ेगी। यही प्रक्रिया अन्य माँस उत्पाद के साथ भी लागू होती है। खाद्यान्न की तुलना में खाद्यान्न खाने वाले जन्तुओं के माँस में कई गुना कीटनाशक जमा रहेगा जो अन्तत: माँसाहारी को मारक सिद्ध होगा। अतएव कीड़ों का बचाव, कीटनाशकों का उपयोग रोकना अर्थात् अहिंसा का पालन वैज्ञानिक रूप से भी आवश्यक हो जाता है।

७. प्राकृतिक आपदायें और हिंसा—

प्रकृति अपने विरुद्ध चल रहे क्रियाकलापों को एक सीमा तक ही सहन करती है और उसके बाद अपनी प्रबल प्रतिक्रिया के द्वारा चेतावनी दे ही देती है। दिल्ली विश्वविद्यालय में भौतिकी के तीन प्राध्यापकों डॉ. मदन मोहन बजाज, डॉ. इब्राहिम तथा डॉ. विजयराज सिंह ने स्पष्ट गणितीय वैज्ञानिक गवेषणाओं द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि दुनिया भर में होने वाली समस्त प्राकृतिक आपदाओं—सूखा, बाढ़, भूकम्प, चक्रवात का कारण हिंसा और हत्याएँ हैं।

(क) अहिंसा उन्नति के वैज्ञानिक उपाय

१. वृक्ष खेती— अनेक वृक्षों के फल फूलो के साथ उनके बीज भी अच्छे खाद्य हैं। उनका उत्पादन १०—१५ टन प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष होता है जबकि कृषि औसत उत्पादन १.२५ टन प्रतिवर्ष ही है। वृक्ष खेती में किसी प्रकार के उर्वरक, िंसचाई, कीटनाशक की भी आवश्यकता नहीं होती है। इस तरह से वृक्ष खेती के द्वारा खाद्यान्न समस्या और जल समस्या का और भी कारगर समाधान तो होता ही है, यह विधि अहिंसा से अधिक निकटता भी लाती है।

२. ऋषि—

कृषि—जापानी कृषि शास्त्री मासानोबू फ्यूकुओका ने इस कृषि प्रणाली को जन्म दिया है। इसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों इत्यादि का बिल्कुल उपयोग नहीं किया जाता। यहाँ तक कि भूमि में हल भी नहीं चलाया जाता है। बीज यूँ ही बिखेर दिये जाते हैंं खरपतवारों को भी नष्ट नहीं किया जाता है। इस प्राकृतिक खेती द्वार फ्युकुओका ने एक एकड़ भूमि से ५—६ टन धान उपजाकर पूरी दुनिया को चकित कर दिया है। अिंहसक खेती के प्रवर्तन पर इस जापानी महामना को मैगसेसे पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है। प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ द्वारा प्रतिपादित ‘कृषि’ की ही इस खोज को बढ़ावा देना क्या हम अिंहसक अनुयाइयों का कत्र्तव्य नहीं बनता है ? महावीर, अहिंसा अथवा आदिनाथ की पावन स्मृति में स्थापित कोई पुरस्कार इस ऋषि तुल्य जापानी को क्या नहीं दिया जाना चाहिये ?

३. समुद्री खेती—

समुद्र की खाद्य शृंखला को देखने पर पता चलता है कि वहाँ पादप प्लवकों द्वारा संचित ३१०८० ख्व् ऊर्जा, बड़ी मछली तक आते आते मात्र १२६ ख्व् बचती है। ऐसे में यह विचार स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्यों ना भोजन के रूप में पादप प्लवकों का सीधे प्रयोग करके विशाल ऊर्जा क्षय को तो रोका ही जाये, हमारी खाद्य समस्या को भी सरलता से हल कर लिया जाये। समुद्री शैवालों का विश्व में वार्षिक जल संवद्र्धन उतपादन लगभग ६.र्५ १,००,००,००० टन है। जापान तथा प्रायद्वीपों सहित दूरस्थ पूर्वी देशों में इसके अधिकांश भाग का सब्जी के रूप में उपयोग किया जाता है। समुद्री घासों में प्रोटीन काफी मात्रा में पायी जाता है। इसमें पाये जाने वाले एमीनों अम्ल की तुलना सोयाबीन या अण्डा से की गई है। मेरे मत से तो मछली पालन के स्थान पर ‘पादप—प्लवक—पल्लवन’ से अहिंसा , ऊर्जा एवं धन तीनों का संरक्षण किया जा सकता है।

४. मशरूम खेती

—फपफूद की एक किस्म मशरूम, प्राचीन समय से खायी जाती रही है। यदि मशरूम की खेती को प्रोत्साहित और प्रर्वितत किया जाये तो यह अंडों का उत्तम विकल्प बन सकती है। चूँकि इसका पूरा भाग खाने योग्य होता है, अधिक भूमि की आवश्यकता नहीं होती है, रोशनी की अधिक आवश्यकता नहीं होती है, यह वूâड़े करकट पर उग सकता है तथा खनिजों का खजाना होता है इसलिये यह आम आदमी का उत्तम नाश्ता हो सकता है। मशरूम के प्रोटीन में सभी आवश्यक अमीनों अम्ल भी पाये जाते हैं जो इसे श्रेष्ठ आहार बनाते हैं।

५.(अ) हिंसक नव निर्माण

(क) ब्ल्यू क्रॉस ऑफ इंडिया (चेन्नई) ने कम्प्यु , काम्प्यु रैग शीर्षकों से साफ्टवेअर विकसित किये हैं जिनके प्रयोग से देश की शिक्षण संस्थाओं में लाखों मेंढ़कों, चूहों की हिंसा को समाप्त किया जा सकता है। (ख) ब्यूटी विदाउट व्रुयेल्टी, पुणे ने लिस्ट ऑफ आनर के माध्यम से अिंहसक सौंदर्य प्रसाधनों की प्रामाणिक सूची प्रस्तुत की है। इस प्रकार के कार्य को और व्यापक बनाना चाहिये। (ग) विभिन्न वैज्ञानिक जैव प्रौद्योगिकी द्वारा ऐसे बीज तैयार कर रहे हैं जिनसे वह कीट प्रतिरोधी पौधे उत्पन्न करेंगे और इस तरह कीटनाशकों का प्रयोग बंद हो सकेगा। (घ) विदेशों में अिंहसक उत्पाद विक्रय केन्द्र बॉडी शाप खोले गये हैंं। इस तरह के केन्द्र हमें अपने देश में नगर नगर, डगर डगर खोलने चाहिये। (ड़) अहिंसा शोध एवं प्रमाणन हेतु अिंहसक प्रयोगशालायें स्थापित होनी चाहिये।

(ख) अंत में—

अहिंसा की विविध क्षेत्रों में वैज्ञानिक रूप से उपयोगिता, आवश्यकता को ध्यान में रखते हुये यह तथ्य स्पष्ट रूप से रेखांकित किया जा सकता है कि आज समग्र विश्व में विभिन्न वैज्ञानिक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अहिंसा को प्रोत्साहित कर रहे हैं और कर सकते हैं। परन्तु इस बात का अहसास स्वयं उन्हें भी नहीं है कि वे अहिंसा का कितना पुनीत, धार्मिक कार्य कर रहे हैं। कितना अच्छा हो कि अहिंसा की प्रतिर्मूित जैनधर्म की कोई प्रतिनिधि संस्था अहिंसा के क्षेत्र में चल रहे विभिन्न वैज्ञानिक कार्यों पर नजर रखकर उनको संरक्षण, समन्वय तथा दिशा निर्देशन दे तथा इन अिंहसक वीर वैज्ञानिकों के अनुसार विभिन्न अिंहसक कार्य योजनायें, विकल्प, संसाधन बनाये। अगर हम इस दिशा में कुछ भी कार्य कर सवेंâ तो अहिंसा को शक्तिशाली बना सवेंâगे जिससे कि खुशी, संतुलित संसार का सृजन हो सकेगा। आभार—धर्म और विज्ञान के समन्वय के लिये लिखे गये प्रत्येक लेख के लिये मैं आचार्य कनकनन्दी एवं डॉ. अनुपम जैन, सचिव—कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ का आजीवन आभारी हूूँ।

आधार ग्रंथ

१. श्रीमद् अमृतचन्द्र सूरि, पुरूषार्थ सिद्धयुपाय, पृ. १—४८, धर्मदर्शन विज्ञान शोध संस्थान, बड़ौत (उ. प्र.) २. जिनेन्द्र वर्णी, समण सुत्तं, पृ. १—२७६, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट, वाराणसी (उ. प्र.) ३. Biology (XII) Part II, 1995, N.C.E.R.T., New Delhi P. 763-1081. ४. Biology (XI) Part II, 1995, N.C.E.R.T. New Delhi. ५. मांसाहार—सौ तथ्य—डॉ. नेमीचन्द जैन, ६५ पत्रकार कोलानी, कनाडिया रोड, इन्दौर। ६. आविष्कार—एन. आर. डी. सी. २०—२२ जमरूदपुर कम्युनिटी सेंटर, कैलाश कालोनी एक्सटेंशन, नई दिल्ली। ७. घ्हनहूग्दह घ्हूात्त्ग्ुाहम-एन. आर. डी. सी. २०—२२ जमरूदपुर कम्प्युनिटी सेंटर, कैलाश कालोनी एक्सटेंशन, नई दिल्ली। ८. विज्ञान प्रगति, सी. एस. आई. आर., डॉ० के. एस. कृष्णन मार्ग, नई दिल्ली। ९. सम्यक विकास, अहमदाबाद—३८० ००९ १०. वैज्ञानिक—भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, ट्राम्बे, मुम्बई—४०० ०८५

टिप्पणी

  1. विज्ञान प्रगति, फरवरी २००१, पृ. ४८. २१. वैज्ञानिक, जन.—मार्च ९१, पृ. ५५.
  2. पुरुषार्थ सिद्धयुपाय, पृ. १११. २२. आविष्कार, अगस्त २०००, पृ. ३७१.
  3. वही, पृष्ठ १२५. २३. वैज्ञानिक, जन.—मार्च ९१, पृ. ५५.
  4. वही, पृष्ठ १२८. २५. विज्ञान प्रगति, फरवरी २००१, पृ. १२, देवताओं के लिये िंहसा
  5. वही, पृष्ठ १३१. २७. आविष्कार, जून—२०००—पृ. २५१.
  6. वही, पृष्ठ १३२. २८. मांसाहार—सौ तथ्य, पृ. १९.
  7. वही, पृष्ठ १३४. २९. आविष्कार, अक्टूबर २०००, पृ. ४७८—७९.
  8. वही, पृष्ठ १३७. ३१. आविष्कार, जुलाई २०००, पृ. ३२२.
  9. वही, पृष्ठ १३३. ३२. विज्ञान प्रगति, अक्टूबर ९९, पृ. १३.
  10. . वही, पृष्ठ १३८. ३३. विज्ञान प्रगति, अक्टूबर ९९, पृ. ४७.
  11. वही, पृष्ठ १३९. ३४. आविष्कार, नवम्बर ९९, पृ. ५१४.
  12. वही, पृष्ठ १४८. ३५. , ज्. ९६३.
  13. वही, पृष्ठ १४९. ३६. सम्यक् विकास, श्री सूरजमल जैन, जुलाई दिसम्बर २०००, पृ. ३२.
  14. समण सुत्तम, पृ. ४७. ३७. विज्ञान प्रगति, फरवरी, २०००, पृ. २७.
  15. वही, पृ. ४७. ३८. ३१७.
  16. वही, पृ. ४९. ३९. विज्ञान प्रगति, जुलाई २०००, पृ. ५५, ५२.
  17. वही, पृ. ४९. ३९. विज्ञान प्रगति, जुलाई २०००, पृ. ५५, ५२.
अजित जैन ‘जलज’
अध्यापक, वीर मार्ग, ककरवाहा जिला टीकमगढ़ (म. प्र.)